(24) Weekly News Update 22 March – 5 April (Water Crisis | Iran War | Russia–Ukraine War)

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(22 March – 5 April)

(22March) IE, washington post, CGWB REPORT 2025

पानी पर बढ़ता तनाव: पंजाब–राजस्थान विवाद से वैश्विक जल संकट तक          

भारत में जल संकट अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक, राजनीतिक और संघीय संबंधों को भी प्रभावित करने लगा है। हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री Bhagwant Mann द्वारा राजस्थान से ₹1.44 लाख करोड़ की मांग ने इस संकट को फिर से केंद्र में ला दिया है। यह विवाद केवल ऐतिहासिक समझौतों का परिणाम नहीं, बल्कि बदलती जल वास्तविकताओं और संसाधनों पर बढ़ते दबाव का स्पष्ट संकेत है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कानूनी परिप्रेक्ष्य

इस विवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल तक जाती हैं। 1920 के दशक में बीकानेर रियासत और अखंड पंजाब के बीच हुए समझौते के तहत महराजा गंगा सिंह को सतलज नदी से जल प्राप्त करने की अनुमति दी गई थी, जिसके बदले पंजाब को रॉयल्टी दी जाती थी।

1960 में Indus Waters Treaty के बाद सतलज, ब्यास और रावी नदियों का नियंत्रण भारत को मिला और जल बंटवारा “अधिकार” के आधार पर होने लगा, जिससे भुगतान-आधारित व्यवस्था समाप्त हो गई।

इसके बाद 1981 के त्रिपक्षीय समझौते में कुल 17.17 MAF(Million Acre-Feet) जल का पुनर्वितरण हुआ, जिसमें राजस्थान को 8.6 MAF आवंटित किया गया। 2004 में पंजाब ने समझौतों को समाप्त करने का प्रयास किया, परंतु 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य एकतरफा ऐसे समझौते समाप्त नहीं कर सकता।

बदलती जल वास्तविकताएँ: संकट की जड़

वर्तमान विवाद का मूल कारण जल उपलब्धता में तेजी से हो रहा परिवर्तन है। प्रारंभिक आकलनों में जिन नदियों में “अधिशेष” जल माना गया था, वे अब घटती प्रवाह और बढ़ती मांग के कारण दबाव में हैं।

पंजाब में भूजल दोहन 150% से अधिक पहुंच चुका है, जो गंभीर असंतुलन को दर्शाता है। साथ ही, सिंचाई व्यवस्था में भी बदलाव देखा गया है—2022 में जहां लगभग 26.5% कृषि क्षेत्र तक ही नहर जल पहुंच पा रहा था, वहीं हाल के वर्षों में यह बढ़कर लगभग 78% क्षेत्र तक पहुंच गया है। हालांकि, इसके बावजूद राज्य की कृषि व्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर भूजल पर निर्भर बनी हुई है।

जल संकट के संरचनात्मक कारण

भारत और विश्व दोनों में जल संकट के पीछे कुछ समान और गहरे कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा और बढ़ता वाष्पीकरण जल उपलब्धता को प्रभावित कर रहे हैं।

इसके साथ ही, भूजल का अत्यधिक दोहन जलभंडारों की पुनर्भरण क्षमता को कम कर रहा है। कृषि, उद्योग और मानव अपशिष्ट से उत्पन्न प्रदूषण उपलब्ध जल को भी अनुपयोगी बना रहा है, जबकि वनों की कटाई और आर्द्रभूमियों के नष्ट होने से प्राकृतिक जल-संरक्षण तंत्र कमजोर हो गए हैं।

भारत में संकट: मात्रा से अधिक गुणवत्ता की चुनौती

भारत में जल संकट अब केवल उपलब्धता का नहीं, बल्कि गुणवत्ता का भी गंभीर प्रश्न बन चुका है। भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 के लगभग 5,200 घन मीटर से घटकर 2024 में लगभग 1,400–1,500 घन मीटर रह गई है, जो जल-संकट की स्थिति को दर्शाती है। 2050 तक इसके लगभग 1,191 घन मीटर तक गिरने का अनुमान है, जो जल-अभाव की गंभीर सीमा 1000 के निकट है।

भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है, अपनी 87% भूजल सिंचाई में उपयोग करता है। Central Ground Water Board की रिपोर्ट के अनुसार देश में भूजल प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। 2023 तक 440 जिलों में नाइट्रेट स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया, जो 2017 में 359 जिलों से बढ़कर एक चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। वर्तमान में देश के लगभग 56% जिलों में नाइट्रेट स्तर 45 mg/L की सुरक्षित सीमा से ऊपर है।

नाइट्रेट मुख्यतः रासायनिक उर्वरकों, कृषि अपवाह और पशु अपशिष्ट के कारण भूजल में पहुंचता है। इसके अधिक स्तर से शिशुओं में ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। राज्य स्तर पर राजस्थान (49%), कर्नाटक (48%) और तमिलनाडु (37%) सबसे अधिक प्रभावित हैं, जबकि महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। मानसून के बाद स्थिति और खराब हो जाती है, जहां 32.66% नमूनों में नाइट्रेट सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया, जबकि मानसून से पहले यह 30.77% था।

इसके अतिरिक्त, यूरेनियम और फ्लोराइड प्रदूषण भी कई राज्यों में गंभीर समस्या बना हुआ है। यूरेनियम की सुरक्षित सीमा लगभग 30 ppb (parts per billion) मानी जाती है, लेकिन राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में कई क्षेत्रों में यह इससे काफी अधिक (100 ppb) पाया गया है। लंबे समय तक इसके संपर्क से कैंसर और किडनी क्षति का खतरा बढ़ता है। अध्ययन के अनुसार भूजल का अत्यधिक दोहन (over-extraction) इस संकट को और बढ़ा रहा है। जब पानी का स्तर नीचे जाता है, तो गहरी परतों में मौजूद विषैले तत्व जैसे यूरेनियम और फ्लोराइड भूजल में घुलकर ऊपर आने लगते हैं।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश में लगभग 60.4% भूजल का दोहन किया जा रहा है, हालांकि 73% क्षेत्र ‘सुरक्षित’ श्रेणी में हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य: ‘जल दिवालियापन’ की चेतावनी

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया अब “जल दिवालियापन” (Water Bankruptcy) की स्थिति में पहुंच चुकी है। विश्व की 50% से अधिक बड़ी झीलें सिकुड़ रही हैं और लगभग 70% भूमिगत जलभंडार दीर्घकालिक गिरावट का सामना कर रहे हैं।

सूखे की घटनाएं अधिक व्यापक और महंगी होती जा रही हैं, जिनसे हर वर्ष औसतन 307 अरब डॉलर का नुकसान होता है। वर्तमान में लगभग 4.4 अरब लोग वर्ष में कम से कम एक महीने जल संकट का सामना करते हैं।

शहरों से देशों तक

यह समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। केप टाउन, चेन्नई और मेक्सिको सिटी जैसे शहर ‘डे जीरो’ की स्थिति के करीब पहुंच चुके हैं, जहां नलों में पानी खत्म होने का खतरा उत्पन्न हो गया। वहीं, ईरान जैसे देशों में जल संकट ने राशनिंग, बिजली कटौती और सामाजिक अशांति तक को जन्म दिया है।

प्रभाव: अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति पर दबाव

जल संकट का प्रभाव बहुआयामी है। यह खाद्य उत्पादन को प्रभावित करता है, जिससे महंगाई और खाद्य असुरक्षा बढ़ती है। ऊर्जा क्षेत्र में भी इसका असर पड़ता है, विशेषकर जलविद्युत उत्पादन पर।

साथ ही, अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय जल विवाद(Nile River Dispute और Colorado River water dispute), पलायन और सामाजिक अस्थिरता जैसे मुद्दे भी इससे जुड़े हैं। पंजाब–राजस्थान विवाद इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य का एक उदाहरण है, जहां घटते संसाधनों के बीच अधिकार और उपयोग का प्रश्न अधिक तीव्र हो गया है।

निष्कर्ष
जल की प्रचुरता का युग समाप्त हो चुका है। वर्तमान स्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि अब जल संसाधनों के उपयोग को वास्तविक उपलब्धता के अनुसार पुनर्संतुलित करना अनिवार्य है। इसके लिए समय रहते प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप, संसाधनों का संरक्षण और न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना आवश्यक होगा, ताकि जल संकट भविष्य में गहरे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण न बने।

हालांकि, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इस दिशा में गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। अधिकांश देश आर्थिक विकास और सामरिक सुदृढ़ता की दौड़ में पारिस्थितिक संतुलन और नैतिक सीमाओं की उपेक्षा कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में समाधान के बजाय समस्याएं और गहरी होती जा रही हैं।

उदाहरण के रूप में, हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की, लेकिन इसके साथ ही भूजल दोहन, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और मृदा क्षरण की समस्याएं भी बढ़ीं। इसी प्रकार, तीव्र औद्योगिकीकरण ने आर्थिक विकास को गति दी, परंतु जल स्रोतों के प्रदूषण और असंतुलित शहरीकरण को भी जन्म दिया। इन परिस्थितियों में यह स्पष्ट होता है कि जब विकास की दिशा स्वार्थ, उपभोग और अल्पकालिक लाभ से संचालित होती है, तब दीर्घकालिक संसाधन संरक्षण पीछे छूट जाता है। ऐसी स्थिति में बनाए गए नियम और नीतियाँ न तो प्रभावी सिद्ध होती हैं और न ही टिकाऊ।

अतः जल संकट का स्थायी समाधान केवल तकनीकी या नीतिगत उपायों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए विकास की वर्तमान सोच, प्राथमिकताओं और मानवीय मूल्यों को आन्तरिक मूल्यों के साथ संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।

(23 March – 5 April) Institute for the Study of War

ईरान–इज़राइल–अमेरिका संघर्ष: प्रमुख घटनाएँ और विस्तार (23 मार्च – 5 अप्रैल 2026)

22 मार्च तक के घटनाक्रम के बाद, 23 मार्च से 4 अप्रैल के बीच ईरान–अमेरिका–इज़राइल संघर्ष ने नई दिशा ली। इस अवधि में सैन्य अभियानों के साथ-साथ समुद्री, आर्थिक और बहु-क्षेत्रीय आयाम अधिक स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आए।

 23 मार्च

ट्रम्प  ने ईरान के साथ समझौते की समय-सीमा 27 मार्च तक बढ़ाते हुए दावा किया कि तेहरान यूरेनियम संवर्धन रोकने, अपने मौजूदा स्टॉकपाइल छोड़ने और मिसाइल गतिविधि को सीमित रखने पर सहमत है। वहीं Benjamin Netanyahu ने कहा कि अमेरिका युद्ध की सैन्य बढ़त का उपयोग कर अपने रणनीतिक लक्ष्यों को समझौते के जरिए हासिल करना चाहता है। इसके विपरीत Mohammad Bagher Ghalibaf ने अमेरिका-ईरान वार्ता की खबरों को खारिज किया।

इस बीच संयुक्त बलों ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल संरचना और IRGC के ग्राउंड फोर्स को निशाना बनाते हुए केंद्रीय और दक्षिणी क्षेत्रों में हवाई हमले तेज किए। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने सऊदी अरब पर अपने हमले सीमित कर दिए हैं, ताकि किसी संभावित प्रत्यक्ष सैन्य प्रतिक्रिया से बचा जा सके। वहीं Hezbollah ने 22 से 23 मार्च के बीच उत्तरी इज़राइल और दक्षिणी लेबनान में 55 हमले किए, जिनमें रॉकेट के साथ-साथ ड्रोन का बढ़ता उपयोग देखा गया।

 24 मार्च

रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने Strait of Hormuz से गुजरने वाले कुछ जहाजों पर शुल्क लगाना शुरू कर दिया है, जहां कई जहाज “Tehran-approved route” से गुजर रहे हैं और सुरक्षित मार्ग के बदले भुगतान कर रहे हैं। संयुक्त बलों ने मिसाइल और औद्योगिक ठिकानों पर हमले तेज किए; Israel Defense Forces के अनुसार 600+ स्ट्राइक, जिनमें इस्फहान भी शामिल है। दूसरी ओर ईरान ने इज़राइल पर मिसाइल हमलों की नौ नई लहरें चलाईं और क्लस्टर म्यूनिशन का उपयोग जारी रखा, जिससे अधिकतम नुकसान और नागरिकों में भय फैलाने का प्रयास किया गया। वहीं Hezbollah ने 23 से 24 मार्च के बीच 54 हमले किए, जबकि Israel Defense Forces अब लेबनान में अपने जमीनी और हवाई अभियान को और विस्तार देने की तैयारी कर रहा है।

 25 मार्च

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 24 मार्च को ईरान को Pakistan के माध्यम से 15 बिंदुओं वाला प्रस्ताव भेजा, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने, यूरेनियम संवर्धन रोकने, अपने स्टॉकपाइल सौंपने, मिसाइल क्षमताओं को सीमित करने, “Axis of Resistance” को समर्थन बंद करने और Strait of Hormuz में मुक्त नौवहन सुनिश्चित करने जैसी शर्तें शामिल हैं। White House को अब तक ईरान का औपचारिक जवाब नहीं मिला; समझौता न होने पर अमेरिका ने आगे सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी।

इस बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के सदस्य देशों को पत्र भेजकर कहा कि “गैर-शत्रुतापूर्ण” जहाज समन्वय के बाद होर्मुज से गुजर सकते हैं, जबकि अमेरिका, इज़राइल या “आक्रामक पक्षों” से जुड़े जहाजों को अनुमति नहीं दी जाएगी और उन्हें IRGC से जुड़े माध्यमों से संपर्क करना होगा। “Iraqi Islamic Resistance” की ड्रोन फुटेज उन्नत FPV तकनीक का संकेत देती है, जो अमेरिका के लिए नई चुनौती हो सकती है; इसी बीच संयुक्त बलों ने ईरान के रक्षा ठिकानों पर हमले तेज किए और Benjamin Netanyahu ने Israel Defense Forces को हथियार उद्योग को अधिकतम नुकसान पहुंचाने का निर्देश दिया।

 26 मार्च

संयुक्त बलों ने 25 और 26 मार्च को Mashhad (खोरासान रज़ावी प्रांत) के आसपास हवाई हमले किए, जो इस युद्ध में अब तक के सबसे उत्तर-पूर्वी हमले माने जा रहे हैं, जिससे संकेत मिलता है कि अभियान धीरे-धीरे पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हुए ईरान के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच गया है। इस बीच Israel Defense Forces ने ईरान की कमान और नियंत्रण व्यवस्था को कमजोर करने के लिए वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को निशाना बनाना जारी रखा और 26 मार्च को IRGC नौसेना कमांडर रियर एडमिरल अलीरेज़ा तंगसीरी को Bandar Abbas में मार गिराने का दावा किया।

वहीं IRGC के एक सांस्कृतिक अधिकारी ने बताया कि भर्ती में आ रही कठिनाइयों और संचालन संबंधी बाधाओं के चलते संगठन ने न्यूनतम भर्ती आयु घटाकर 12 वर्ष कर दी है। दूसरी ओर Hezbollah ने 25 से 26 मार्च के बीच उत्तरी इज़राइल और दक्षिणी लेबनान में हमले तेज कर दी।

 27 मार्च

ईरान ने इज़राइल पर मिसाइल हमलों की रणनीति में बदलाव करते हुए पूरे दिन छोटे-छोटे अंतराल में हमले करना शुरू किया है, जिससे नागरिकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके और उन्हें बार-बार शेल्टर लेने के लिए मजबूर किया जा सके। इसी क्रम में ईरान ने क्लस्टर म्यूनिशन का उपयोग भी बढ़ा दिया है, जो अधिकतर मनोवैज्ञानिक प्रभाव और व्यापक नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

संयुक्त बलों ने ईरान के भूमिगत मिसाइल ठिकानों पर हमले जारी रखे, जहां US Central Command ने सुरंगें खोलने वाले उपकरण नष्ट किए। वहीं Israel Defense Forces ने परमाणु ठिकानो को निशाना बनाया।

दूसरी ओर Ukraine और Saudi Arabia के बीच 27 मार्च को रक्षा सहयोग समझौता हुआ, जिसमें एयर डिफेंस और तकनीकी सहयोग शामिल है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में नए बदलाव का संकेत देता है।

 28 मार्च

Houthis ने 27–28 मार्च के बीच दक्षिणी इज़राइल को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और क्रूज़ मिसाइल हमले किए, जो इस युद्ध में उनकी पहली प्रत्यक्ष भागीदारी है।  इस बीच ईरान के सर्वोच्च नेता से जुड़े Mojtaba Khamenei के चैनल ने “resistance economy” पर एक इन्फोग्राफिक जारी किया, जिसे मौजूदा युद्ध और आर्थिक परिस्थितियों से अलग माना जा रहा है और इसे उनकी सक्रिय छवि बनाए रखने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है। वहीं रिपोर्ट्स के अनुसार Russia और ईरान के बीच उन्नत ड्रोन की आपूर्ति को लेकर बातचीत तेज हुई है, जिससे सैन्य सहयोग और गहरा हो सकता है।

दूसरी ओर Volodymyr Zelensky ने घोषणा की कि Ukraine और Qatar के बीच 10 साल का रक्षा समझौता हुआ है, जिसमें एयर डिफेंस, AI और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसी दौरान संयुक्त बलों ने तेहरान और बुशेहर सहित कई क्षेत्रों में ईरान के रक्षा औद्योगिक ठिकानों पर हमले जारी रखे, जबकि US Central Command ने पश्चिमी सीमा पर एक चौकी को भी निशाना बनाया।

29 मार्च

The Washington Post की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध की शुरुआत से अब तक संयुक्त बलों ने ईरान के चार प्रमुख बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन केंद्रों और 29 लॉन्च बेस को निशाना बनाया है, जिससे उसकी मिसाइल क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा है। इस बीच ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष के संकेत भी उभर रहे हैं, जहां Masoud Pezeshkian की आर्थिक चिंताओं को IRGC के वरिष्ठ अधिकारी नजरअंदाज कर रहे हैं और उनके तथा IRGC कमांडर Ahmad Vahidi के बीच मतभेद बढ़ने की खबरें हैं।

साथ ही ईरानी सरकार ने “Janfada” नाम से एक भर्ती अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य संभावित अमेरिकी जमीनी अभियान के खिलाफ नागरिकों को शामिल करना और आंतरिक सुरक्षा मजबूत करना है। दूसरी ओर Russia द्वारा ईरान को मध्य-पूर्व में अमेरिकी और सहयोगी ठिकानों की सैटेलाइट जानकारी देने की बात सामने आई है, जिसकी पुष्टि Volodymyr Zelensky ने की। इन ठिकानों में Diego Garcia, Incirlik Airbase, Al Udeid Airbase और Shaybah क्षेत्र शामिल हैं, जिन पर युद्ध के दौरान हमले हो चुके हैं।

 30 मार्च

ट्रम्प  के अनुसार 28 फरवरी से अब तक संयुक्त बल 13,000+ लक्ष्यों पर हमला कर चुके हैं, जबकि Israel Defense Forces ने पिछले 24 घंटों में 170 ठिकानों को निशाना बनाया। IDF के मुताबिक ईरान की 80% से अधिक वायु रक्षा नष्ट हो चुकी है और माज़ंदरान में हमलों से एयर डोमिनेंस और मजबूत हुई है।

रक्षा औद्योगिक ठिकानों पर हमले जारी रहे, जिससे ईरान की मिसाइल और ड्रोन उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई; रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले दो दिनों में करीब 40 साइट्स को निशाना बनाया गया। White House ने दावा किया कि अमेरिका ने अब तक ईरान के 150 जहाज, जिनमें 92% बड़े जहाज शामिल हैं, नष्ट कर दिए हैं।

क्षेत्रीय तनाव और बढ़ा, जब NATO ने तुर्की के हवाई क्षेत्र में घुसे ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल को इंटरसेप्ट किया; वहीं PMF लड़ाकों की पश्चिमी ईरान में तैनाती और कुवैत के एक डीसैलिनेशन प्लांट पर हमले की रिपोर्ट सामने आई। इस बीच Hezbollah ने 29–30 मार्च के बीच 65 हमलों का दावा किया, जबकि इज़राइल के अनुसार 2 मार्च से अब तक 5,000 से अधिक मिसाइल, रॉकेट और ड्रोन दागे जा चुके हैं; वहीं Houthis ने इलात के पास ड्रोन हमलों के साथ तीसरी बार इज़राइल को निशाना बनाया।

 31 मार्च

ईरानी कमांडरों पर लक्षित हमलों का असर दिखने लगा है; The New York Times के अनुसार इससे ईरान की समन्वित बड़े पैमाने के हमलों की क्षमता कमजोर हुई है। लगातार नेतृत्व पर प्रहार से कमांड-एंड-कंट्रोल बाधित हुआ है, जिसके चलते हाल में इज़राइल पर केवल तीन छोटे मिसाइल हमले हुए—जो अब तक का सबसे कम स्तर है—और 20 मार्च के बाद से हर सैल्वो (एक साथ दागी गई मिसाइलों की संख्या) सीमित रहा है।

ईरान की संसद ने “Strait of Hormuz Management Plan” पारित कर Strait of Hormuz पर नियंत्रण मजबूत करने और शिपिंग पर दबाव बनाने के संकेत दिए। दूसरी ओर Kataib Hezbollah पर बगदाद में अमेरिकी पत्रकार के अपहरण का आरोप लगा। इस बीच Hezbollah ने दक्षिणी लेबनान में FPV ड्रोन (first-person view) से इज़राइली बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाया, जो बदलती तकनीक और रणनीति को दर्शाता है।

 1 अप्रैल

तेहरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने Strait of Hormuz और ऊर्जा मार्गों को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के संकेत दिए, साथ ही कहा कि अमेरिका-इज़राइल हमले बंद होने तक न युद्धविराम होगा, न शिपिंग व्यवधान रुकेगा। इसी क्रम में ईरान ने कतर के पास एक तेल टैंकर को निशाना बनाया।

Israel Defense Forces ने ईरान के ~15 हथियार उत्पादन स्थलों, एक उन्नत मिसाइल कॉम्प्लेक्स और एक फार्मा रिसर्च कंपनी को निशाना बनाया; साथ ही IRGC कुद्स फोर्स से जुड़े एक वरिष्ठ इंजीनियर को मार गिराया, जो लेबनान-सीरिया में भूमिगत सैन्य ढांचे से जुड़ा था।दूसरी ओर ईरान ने इज़राइल पर पांच मिसाइल हमले किए, जिनमें 10 मिसाइलों का एक बड़ा सैल्वो शामिल था, और बहरीन को भी ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। इस बीच Hezbollah ने 71 हमलों का दावा किया, जबकि Houthis ने चौथी बार इज़राइल पर हमला कर इसे ईरान-हिज़्बुल्लाह समन्वय का हिस्सा बताया।

 2 अप्रैल

संयुक्त अमेरिका-इज़राइल बलों ने सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर व्यापक लक्ष्यों को निशाना बनाया, जिसमें तेहरान में Darou Pakhsh और Pasteur Institute of ईरान शामिल हैं; हाल में स्टील कारखानों पर हमले भी हुए, जो सैन्य उत्पादन और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अहम हैं।

इस बीच ट्रम्प  ने कहा कि अमेरिकी “रणनीतिक लक्ष्य” पूरा होने के करीब हैं और हमले अगले 2–3 हफ्तों तक जारी रहेंगे; इसी क्रम में अमेरिकी बलों ने तेहरान-करज B1 ब्रिज को निशाना बनाया, जो मिसाइल लॉजिस्टिक्स के लिए इस्तेमाल हो रहा था।

दूसरी ओर Hezbollah ने पासओवर(यहूदी धार्मिक त्योहार) के दौरान हमले तेज किए, जिस पर Israel ने कड़ी चेतावनी दी।

 3 अप्रैल

रिपोर्ट के अनुसार ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम केवल मिसाइलों और लॉन्चरों तक सीमित नहीं, बल्कि रिसर्च, विकास और औद्योगिक ढांचे को भी शामिल करता है, इसलिए इसकी क्षमता का आकलन केवल एक हिस्से से संभव नहीं है। इसी बीच संयुक्त अमेरिका-इज़राइल बलों ने कई लॉन्चरों को “combat ineffective” (युद्ध में अप्रभावी) बना दिया—जैसे उन्हें भूमिगत करना या उनकी गतिशीलता रोकना—और साथ ही स्टॉकपाइल व रक्षा औद्योगिक ढांचे पर हमलों से ईरान की दीर्घकालिक सैन्य पुनर्निर्माण क्षमता कमजोर की है।

इसी बीच अमेरिकी और इज़राइली अधिकारियों ने पुष्टि की कि ईरान ने 3 अप्रैल को एक अमेरिकी F-15E लड़ाकू विमान को मार गिराया, जो इस युद्ध में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान के नुकसान का मामला है। दूसरी ओर Israel Defense Forces ने इज़राइल-लेबनान सीमा पर “security zone” बनाने की योजना तैयार की है, जिसमें सीमा क्षेत्र के लेबनानी गांवों को हटाने या नष्ट करने की बात शामिल है; इससे Hezbollah को खुद को “रक्षक” के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिल सकता है।

 4 अप्रैल

अमेरिकी विमानों के नुकसान के बावजूद यह संकेत नहीं मिलता कि संयुक्त अमेरिका-इज़राइल बलों ने ईरान के ऊपर अपनी वायु श्रेष्ठता खो दी है, क्योंकि ईरानी वायु रक्षा अभी भी उनके अभियानों को प्रभावी रूप से बाधित नहीं कर पा रही है और देशभर में लगातार हमले जारी हैं। इस बीच China द्वारा ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पुनः स्थापित करने में संभावित सहायता की खबरें सामने आई हैं, जो संयुक्त बलों के दीर्घकालिक सैन्य उद्देश्यों को कमजोर कर सकती हैं।इसी क्रम में संयुक्त बलों ने ईरान-इराक सीमा पर स्थित शालामचेह क्रॉसिंग को निशाना बनाया, जहां से PMF लड़ाकों के बसीज ठिकानों तक पहुंचने की रिपोर्ट थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संघर्ष अब जमीनी नेटवर्क और आपूर्ति मार्गों को भी लक्ष्य बना रहा है।

 5 अप्रैल

ट्रम्प  ने चेतावनी दी कि 48 घंटे में समझौता न होने पर ईरान पर हमले तेज किए जाएंगे, जिसे तेहरान ने “घबराया हुआ अल्टीमेटम” कहकर खारिज कर दिया। इस बीच अमेरिका-इज़राइल बलों ने अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और अन्य नागरिक ढांचे पर हमले जारी रखे, जबकि पेट्रोकेमिकल ठिकानों पर हमलों में कम से कम पांच लोगों की मौत और कई घायल हुए।

इसी दौरान गिराए गए अमेरिकी विमान के बाद एक एयरमैन अब भी लापता है, जबकि Houthis ने Hezbollah और ईरान के साथ संयुक्त हमले का दावा किया। Tyre पर हमले में छह लोगों की मौत और बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, जबकि Tel Aviv, Jerusalem और Haifa में युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन हुए। साथ ही अमेरिका ने Qassem Soleimani की कथित रिश्तेदार दो महिलाओं की गिरफ्तारी और रेजिडेंसी रद्द करने की बात कही, हालांकि परिवार ने संबंधों से इनकार किया।

निष्कर्ष

अमेरिका की स्थिति

इस संघर्ष ने ट्रम्प के ईरान संबंधी आकलन को चुनौती दी है। युद्ध अपेक्षा से अधिक लंबा खिंचने के कारण उन पर दबाव बढ़ता दिख रहा है, जिसका संकेत बार-बार बदलती समय-सीमाओं और अल्टीमेटम में मिलता है। अमेरिका के भीतर भी विरोध और असंतोष बढ़ा है, जहां व्यापक प्रदर्शन, प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों के स्थानांतरण और इस्तीफे सामने आए हैं।

इसके साथ ही युद्ध का आर्थिक बोझ भी अमेरिका पर स्पष्ट रूप से दिख रहा है, जो जनता में असंतोष का कारण बन रहा है। इस संदर्भ में युद्ध लागत को अरब देशों से वसूलने और रक्षा बजट बढ़ाने की मांग यह दर्शाती है कि अमेरिका इस संघर्ष को लंबे समय तक चलने वाले रणनीतिक निवेश के रूप में देख रहा है।

इज़राइल की आंतरिक स्थिति

Benjamin Netanyahu के नेतृत्व में इज़राइल के भीतर भी राजनीतिक स्थिति स्थिर नहीं है। प्रधानमंत्री को विपक्ष और जनता दोनों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जबकि चुनावी माहौल इस संघर्ष को और संवेदनशील बना रहा है। नेतृत्व पर भ्रष्टाचार के आरोप और यह धारणा कि युद्ध के जरिए राजनीतिक समर्थन या सहानुभूति हासिल की जा रही है, इस स्थिति को और जटिल बनाते हैं। साथ ही इज़राइल की सैन्य रणनीति काफी हद तक अमेरिका के समर्थन पर निर्भर दिखती है—यदि यह समर्थन कमजोर पड़ता है, तो अकेले लंबे समय तक युद्ध जारी रखना उसके लिए कठिन हो सकता है।

ईरान की रणनीति और क्षेत्रीय प्रभाव

ईरान को यह स्पष्ट है कि अमेरिका और इज़राइल उसके नेतृत्व और सैन्य क्षमताओं को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए उसने प्रत्यक्ष युद्ध के साथ-साथ प्रॉक्सी और क्षेत्रीय रणनीति अपनाई है। वह प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से दबाव बना रहा है और क्षेत्रीय हमलों के जरिए संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

ईरान की रणनीति में Strait of Hormuz का विशेष महत्व है, जहां वह कुछ देशों को मार्ग देकर और कुछ पर दबाव बनाकर रणनीतिक संतुलन बना रहा है। खाड़ी क्षेत्र में हमलों की प्रकृति भी ऐसी रखी गई है कि संबंधित देश उन्हें सीधे अपने खिलाफ न मानें, जिससे व्यापक क्षेत्रीय युद्ध से बचा जा सके, हालांकि शिया-सुन्नी कारक भी पृष्ठभूमि में मौजूद है।

इस पूरे परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी बदलाव दिख रहा है—NATO से अलग होने की अमेरिकी चेतावनी, यूरोपीय देशों द्वारा एयरबेस उपयोग को लेकर हिचकिचाहट, और अरब देशों का सुरक्षा के लिए अमेरिका पर घटता भरोसा यह संकेत देता है कि पारंपरिक गठबंधन संरचना कमजोर पड़ रही है।

यह संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, क्षेत्रीय राजनीति और आर्थिक दबावों का जटिल मिश्रण बन चुका है, जहां प्रत्येक पक्ष अपनी सीमाओं और संसाधनों के भीतर रहते हुए अधिकतम रणनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

साथ ही, Strait of Hormuz पर बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों को प्रभावित कर सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। इसके अतिरिक्त, वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि सैन्य स्तर पर आंशिक बढ़त के बावजूद युद्ध का अंतिम परिणाम अभी अनिश्चित है, और यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो यह व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में परिवर्तित हो सकता है।

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“… रक्षा करनी है संसार की और वह अवश्य की जायेगी, भले ही वह उतनी आसानी से या उतनी जल्दी से न हो जितनी कुछ लोग चाहते या कल्पना करते हैं, या भले वह उस ढंग से न हो जिसे वे अपनी कल्पना में लाते हैं। वर्तमान सभ्यता को निश्चित रूप से बदलना ही होगा, पर वह विनाश के द्वारा बदलेगी या महत्तर सत्य के आधार पर, नव निर्माण के द्वारा – यही विचारणीय विषय है। ….न आशावाद ही सत्य है, और न निराशावाद, वे तो केवल मन की दशाएँ या स्वभाव के पहलू हैं।

अतः हम अति आशावाद या अति निराशावाद के बिना “प्रतीक्षा करें और देखें”।”

….श्रीअरविन्द (२ सितम्बर १९४५)

 

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