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- (20) Weekly News 22 Feb – 28 Feb
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- (23) Weekly News Update 15 March – 21 March (Global E-waste report, Iran war update)
- (24) Weekly News Update 22 March – 5 April (Water Crisis | Iran War | Russia–Ukraine War)
- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
(17-11-25) the Guardian
ढाका की अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को ‘इंसानियत के खिलाफ अपराधों’ में मौत की सजा सुनाई
बांग्लादेश की हटाई गई प्रधानमंत्री शेख हसीना को ढाका के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने पिछले वर्ष हुए छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर कथित जानलेवा दमनात्मक कार्रवाई की भूमिका के लिए इंसानियत के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराते हुए ग़ैर–हाज़िर स्थिति में मौत की सजा सुनाई है। तीन जजों की बेंच ने कहा कि हसीना ने जुलाई–अगस्त 2024 के आंदोलन के दौरान ड्रोन, हेलीकॉप्टर और घातक हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति देकर आम नागरिकों पर बड़े पैमाने पर अत्याचार कराए। निर्णय पढ़ते समय न्यायाधीश गोलाम मुर्तुज़ा मोजुमदार ने उन्हें “सुपीरियर कमांडर” बताते हुए कहा कि वे हिंसात्मक अभियानों की निगरानी कर रही थीं और उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।
हसीना ने इन आरोपों को “राजनीतिक रूप से प्रेरित नाटक” बताया था। अगस्त 2024 में वे देश छोड़कर भारत आ गईं और तब से वहीं सुरक्षा में रह रही हैं। भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण अनुरोध को अनदेखा किया। फैसले के दौरान कोर्टरूम में मारे गए प्रदर्शनकारियों के परिवार भावुक हो गए।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने फैसले को पीड़ितों के लिए महत्वपूर्ण बताया, लेकिन मौत की सजा की निंदा करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार ऐसा दंड नहीं दिया जाना चाहिए। फैसले से पहले ढाका में भारी तनाव था—पुलिस, सेना और पैरामिलिट्री ने ट्रिब्यूनल क्षेत्र को घेर लिया था, जबकि शहर में कच्चे बम धमाकों, आगजनी और राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही थीं। अदालत क्षेत्र के पास भी एक कच्चा बम फेंका गया।
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने हसीना को “जुलाई क्रांति” के दमन की “मास्टरमाइंड” बताते हुए कॉल रिकॉर्डिंग, वीडियो सबूत और प्रधानमंत्री कार्यालय से मिले कथित निर्देश पेश किए। इसमें छात्र अबू सईद की कैमरे में कैद हत्या प्रमुख साक्ष्य रही। ट्रिब्यूनल की पारदर्शिता पर मानवाधिकार समूहों की आलोचना के बावजूद ढाका की सड़कों पर फैसले के बाद जश्न मनाया गया, जबकि समर्थकों का कहना है कि यह राजनीतिक प्रतिशोध है।
फरवरी 2026 के चुनावों में हसीना की अवामी लीग पहले ही प्रतिबंधित है। उनके बेटे सजीब वाजेद ने कहा कि वे भारत में सुरक्षित रहते हुए कानूनी और राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगी।
(17-11-25) Indian express
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर जब्त करने की पुष्टि की
ईरान ने मार्शल द्वीप समूह का झंडा फहरा रहे एक तेल टैंकर को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय अपने नियंत्रण में ले लिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की संवेदनशीलता पर चिंता बढ़ गई है। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है और विश्व तेल आपूर्ति का लगभग 20% इसी मार्ग से गुजरता है। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, UAE और कतर जैसे प्रमुख तेल निर्यातक इस मार्ग पर निर्भर हैं।
भारत के लिए भी यह मार्ग महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश का लगभग 40% कच्चा तेल और 54% LNG इसी से आता है। इसकी संकीर्ण चौड़ाई (लगभग 21 मील) इसे नाकाबंदी या व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है। पिछले टैंकर हमले और अमेरिका-ईरान तनाव ने इसकी संवेदनशीलता को और बढ़ाया। सऊदी अरब और UAE ने बाईपास पाइपलाइनों का संचालन किया है, जबकि ईरान गोरेह-जस्क पाइपलाइन पर निर्भर है।
(17-11-25) the Hindu
आदिवासियों को कानूनी धोखा
पिछले महीने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने हसदेव अरंड के घाटबर्रा गाँव के सामुदायिक वन (CFR) अधिकार रद्द करने का फैसला दिया। यह फैस़ला सिर्फ़ एक कानूनी बात नहीं है — गाँव के आदिवासियों के लिए एक बड़ा अन्याय है। ये लोग पिछले नौ सालों से अदालत में अपने अधिकार वापस दिलाने की मांग करते रहे, लेकिन इस दौरान उनकी जमीन पर खनन तेज़ी से शुरू हो गया और लाखों पेड़ काट दिए गए। अब कोर्ट कह रही है कि उन अधिकारों में “गलती” थी और मुआवजे की जगह सिर्फ़ पैसे दिए जा सकते हैं।
यह आदिवासियों के लिए बहुत गहरा नुकसान है, क्योंकि उनके लिए जंगल सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा(living relationship) है। यह फैसला कानूनी तो है, लेकिन नैतिक रूप से बहुत गलत माना जा रहा है — वनों के अधिकारों की रक्षा करने वाला FRA (Forest Rights Act) 2006 उनका मकसद खो चुका है।
जब खदान की शुरूआत हुई, संसदीय पर्यावरण मंत्री (Union Environment Minister) जयराम रमेश थे। साल 2011 में जयराम रमेश ने विशेषज्ञों की सलाहकार समिति (FAC) की मना करने की राय के बावजूद खनन को मंज़ूरी दी थी। उसके बाद, 2012 में खनन के लिए वन भूमि अधिकृत कर दी गई थी।
पहले, 2011 में पर्यावरण मंत्रालय की FAC ने इस इलाके को “नो-गो” क्षेत्र कहा था क्योंकि यह जैव-विविधता से भरपूर था। लेकिन रमेश ने उसे खनन के लिए मंजूरी दे दी, यह तर्क देते हुए कि विकास ज़्यादा ज़रूरी है। बाद में एनजीटी (NGT) ने इस मंज़ूरी को रद्द किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खनन को रोकने की बजाय उसे फिर से चलाने की इजाज़त दी। कोर्ट ने यह तर्क दिया है कि जब जमीन पहले से खनन के लिए “डाइवर्ट” हो चुकी थी, तब CFR देना गलत है — लेकिन FRA की धारा 4(7) कहती है कि अधिकार “सभी बाधाओं से मुक्त” होने चाहिए। मतलब अगर खनन पट्टा(lease) एक बाधा है, तो उसे हटाना चाहिए था, न कि अधिकारों को रद्द करना। कोर्ट ने यह भी नहीं माना कि ग्राम सभा की सहमति सही तरह से ली गई नहीं थी — जबकि FRA नियमों के मुताबिक Gram Sabha की सहमति बहुत ज़रूरी है।
अंत में, ये मामला दिखाता है कि कैसे कानूनी झंझटों और प्रक्रियाओं को बड़ा दिखाकर आदिवासियों की ज़मीन और हक ले लिए जाते हैं। अगर FRA सही से लागू न किया जाए, तो आदिवासियों का जंगल और उनके अधिकार सिर्फ़ नाम के रह जाएंगे।
(18-11-25) the Hindu
भारत को अफ्रीका के साथ ‘जुड़ने, निर्माण करने और पुनर्जीवित करने’ की आवश्यकता है।
भारत और अफ्रीका के संबंधों को नई ऊर्जा देने की आवश्यकता है। 2015 में हुए इंडिया-अफ्रीका फोरम समिट (IAFS-III) के दस वर्ष पूरे हो चुके हैं, जहाँ भारत ने सभी 54 अफ्रीकी देशों का स्वागत किया था। पिछले दशक में भारत ने अफ्रीका में 17 नए मिशन खोले, व्यापार $100 बिलियन पार कर गया और इन्वेस्टमेंट फ्लो तेज़ हुआ। इसके साथ ही, भारत ने G-20 में अफ्रीकन यूनियन की पूर्ण सदस्यता सुनिश्चित कराने में अहम भूमिका निभाई। अब समय है कि किए गए वादों और रखी गई नींव का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।
2050 तक दुनिया का हर चौथा व्यक्ति अफ्रीका में होगा, और भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका होगा। दोनों मिलकर कॉमर्स, डेमोग्राफी, टेक्नोलॉजी और आकांक्षाओं के एक शक्तिशाली ग्रोथ कॉरिडोर का निर्माण कर सकते हैं।
भारत आज अफ्रीका के शीर्ष पाँच निवेशकों में है। पोर्ट्स, पावर लाइन्स, वैक्सीन उत्पादन और डिजिटल टूल्स में मिलकर काम करने का मॉडल मजबूत हुआ है। अप्रैल 2025 में नौ अफ्रीकी नौसेनाओं के साथ AIKEYME समुद्री अभ्यास ने साझी सुरक्षा साझेदारी को नई दिशा दी।
शिक्षा सबसे मज़बूत मानव-सेतु है। ITEC, ICCR और पैन-अफ्रीकन ई-नेटवर्क के ज़रिए 40,000 से अधिक अफ्रीकी छात्र भारत में प्रशिक्षण ले चुके हैं। ज़ांज़ीबार में IIT मद्रास का नया कैंपस इसी धरोहर का विस्तार है। अफ्रीकी छात्र, प्रोफेशनल और एथलीट भी भारत में अपनी पहचान बना रहे हैं, जिससे यह रिश्ता जीवंत बन गया है।
भविष्य के लिए तीन कदम ज़रूरी हैं—फाइनेंस को ठोस नतीजों से जोड़ना, संयुक्त डिजिटल कॉरिडोर बनाना और IAFS को पुनः शुरू करना। एक दशक बाद फिर समय आ गया है कि भारत और अफ्रीका हाथ मिलाकर मिलकर आगे बढ़ें।
(18-11-25) Business standard
भारत–अमेरिका पहला LPG आयात समझौता
भारत के तेल पीएसयू ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन LPG आयात के लिए 2026 का पहला वार्षिक अनुबंध किया है, जो भारत के कुल LPG आयात का लगभग 10% होगा। यह सौदा दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को मज़बूत करता है और व्यापार अधिशेष संतुलित करने की भारत की रणनीति का हिस्सा है। अनुबंध माउंट बेलवियू मूल्य (Mount Belvieu price) आधारित है और इंडियन ऑयल, BPCL व HPCL द्वारा अमेरिकी उत्पादकों से बातचीत के बाद तय हुआ।
भारत अपनी LPG ज़रूरतों का लगभग 60% आयात करता है, जिनमें से 90% पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में अमेरिकी स्रोत जोड़ना ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही, भारत अमेरिका से कच्चे तेल के आयात भी बढ़ा रहा है, जिससे द्विपक्षीय ऊर्जा संबंध गहरे हो रहे हैं।
भारत में LPG खपत 2025-26 में 7% बढ़ी है, जिसमें उज्ज्वला योजना की बड़ी भूमिका है। सरकार सब्सिडी के ज़रिए उपभोक्ताओं को 500–550 रुपये में सिलेंडर उपलब्ध करा रही है, जबकि वास्तविक कीमत 1,100 रुपये से अधिक है।
(19-11-25) Indian express
UN Security Council द्वारा ट्रंप का Gaza Plan अपनाया गया
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 20-बिंदु Gaza Peace Plan को मंजूरी दे दी है, जिसे ग़ज़ा संकट पर प्रगति की एक कोशिश माना जा रहा है। हालांकि योजना कई मामलों में अस्पष्ट है, लेकिन इसमें पहली बार UN-स्तर पर फ़िलिस्तीनी आत्मनिर्णय और भविष्य में संभावित राज्य का स्पष्ट संदर्भ शामिल है, जो अरब देशों और फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को साथ लाने में महत्वपूर्ण था। रूस और चीन ने वीटो न करते हुए केवल मतदान से दूरी बनाई, जिससे प्रस्ताव पारित हो सका।
योजना तीन नई संस्थाएँ स्थापित करती है। पहली है Board of Peace, जिसकी अध्यक्षता ट्रंप स्वयं करेंगे और जो ग़ज़ा के पुनर्निर्माण एवं आर्थिक पुनर्जीवन की निगरानी करेगा। दूसरी है International Stabilization Force (ISF) — (इसकी बागडोर भी ट्रम्प ने ली है) एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल, जिसका काम हथियारों की तस्करी रोकना तथा पुनर्निर्माण सामग्री की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है। तीसरी संस्था है एक अराजनीतिक, तकनीकी फ़िलिस्तीनी समिति, जो संक्रमणकालीन शासन, सार्वजनिक सेवाओं और नगरपालिका प्रशासन को संभालेगी। पुनर्निर्माण के लिए धनराशि विश्व बैंक समर्थित ट्रस्ट फंड से आएगी।
हालाँकि, योजना के सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं। इज़राइल के दक्षिणपंथी समूह और प्रधानमंत्री नेतन्याहू फ़िलिस्तीनी राज्य की अवधारणा से असहमत हैं। उधर, हमास इसे “अंतरराष्ट्रीय अभिरक्षा” बताकर खारिज करता है और ISF को पक्षपाती मानता है। तीनों संस्थाओं का गठन, सदस्यता और कार्यप्रणाली अभी स्पष्ट नहीं है, जिससे व्यावहारिक पहलू अनिश्चित बने हुए हैं। कई देश ISF में संभावित संघर्ष के कारण शामिल होने से हिचकते हैं।
इसके बावजूद, UN-मान्यता के कारण ग़ज़ा पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी बढ़ेगी और ट्रंप की व्यक्तिगत भागीदारी से दीर्घकालिक शांति प्रयासों को गति मिल सकती है — यही इस योजना का संभावित “सिल्वर लाइनिंग” है।
(19-11-25) Indian express
Indian Army ने तेज़ गश्ती नौकाओं और Landing Craft Assault (LCA) के लिए बोली आमंत्रित की
भारतीय सेना ने Sir Creek(96km), ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन, सुंदरबन डेल्टा और पूर्वी लद्दाख जैसे कठिन व संवेदनशील इलाकों में तैनाती के लिए 8 Landing Craft Assaults (LCA) और 6 Fast Patrol Boats की खरीद प्रक्रिया तेज कर दी है। इसके लिए तकनीकी और वाणिज्यिक प्रस्तावों (RFPs) को आमंत्रित किया गया है। इन नौकाओं का उद्देश्य उभयचर (amphibious) अभियानों को मजबूत करना, निगरानी बढ़ाना और सीमावर्ती जल-क्षेत्रों में त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करना है।
LCA का उपयोग वाहनों, सैनिकों, हथियारों और सामग्री के परिवहन के साथ-साथ Sir Creek और नदी क्षेत्रों में पेट्रोलिंग तथा सीमित खोज एवं बचाव कार्यों के लिए होगा। इन्हें अधिकतम 20 knots की गति, 35 सैनिकों या एक वाहन (Tata Storme) व 12 सैनिकों के परिवहन की क्षमता और लगभग 5.2 टन कुल पेलोड के साथ डिज़ाइन किया जा रहा है। Fast Patrol Boats को तेज़ गति (25–30 knots) पर छह घंटे लगातार चलने, आठ लोगों की क्षमता और 1,000 kg पेलोड के साथ निगरानी व हस्तक्षेप अभियानों के लिए उपयोग किया जाएगा। दोनों श्रेणियों में न्यूनतम 60% स्वदेशी सामग्री अनिवार्य है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रक्षा प्रतिष्ठान Sir Creek क्षेत्र पर अधिक ध्यान दे रहा है, जहाँ भारत-पाक सीमा विवाद और घुसपैठ की संभावनाएँ मौजूद हैं। रणनीतिक दृष्टि से यह इलाका तेल-गैस संसाधनों के कारण भी अहम है। नई नौकाएँ इन क्षेत्रों में सेना की उपस्थिति और प्रतिक्रिया क्षमता को मज़बूत करेंगी।
(20-11-25) The Hindu
प्रदूषित भूजल की छिपी हुई लागत की (Hidden cost of polluted groundwater)
भारत में भूजल प्रदूषण एक गंभीर और बहुआयामी संकट बन चुका है, जो स्वास्थ्य, कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक असमानता—सभी पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। पंजाब, गुजरात, बिहार और अन्य राज्यों में साफ दिखने वाला पानी वास्तव में यूरेनियम, फ्लोराइड, नाइट्रेट और आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों से भर चुका है। Annual Groundwater Quality Report 2024 के अनुसार, 440 से अधिक जिलों में लिए गए नमूनों में लगभग 20% असुरक्षित पाए गए, जबकि पंजाब में एक-तिहाई नमूनों में यूरेनियम तय सीमा से अधिक है। भारत की लगभग 600 मिलियन आबादी पीने और सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर है, इसलिए प्रदूषण सीधे स्वास्थ्य संकट में बदल रहा है—फ्लोरोसिस, आर्सेनिकोसिस, दस्त की बीमारियाँ, बच्चों में विकास संबंधी कमी और लाखों कार्य-दिवसों का नुकसान इसका प्रमाण हैं। विश्व बैंक के अनुसार, पर्यावरणीय क्षति से भारत को हर साल लगभग 80 अरब डॉलर (GDP का 6%) तक नुकसान होता है।
भूजल प्रदूषण कृषि को भी गहराई से क्षति पहुँचा रहा है। भारी धातुएँ और रासायनिक अवशेष फसलों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों घटाते हैं, जिससे किसानों की आय प्रभावित होती है और भारत के 50 अरब डॉलर के कृषि निर्यात पर जोखिम बढ़ जाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय खरीदार अब अधिक सख्त गुणवत्ता मानक मांगते हैं। उधर, भूजल के अत्यधिक दोहन—खासतौर पर पंजाब में—ने जलस्तर इतना गिरा दिया है कि किसानों को और गहराई से पानी निकालना पड़ता है, जो पहले से अधिक प्रदूषित होता है, और रसायनों के बढ़ते उपयोग से मिट्टी का क्षरण तेज हो रहा है।
यह संकट सामाजिक असमानता को भी बढ़ा रहा है। अमीर परिवार फिल्टर और पैकेज्ड पानी खरीद लेते हैं, पर गरीब समुदाय दूषित पानी के कारण बीमारी, कर्ज और कमज़ोर उत्पादकता में फँसे रहते हैं। समाधान के लिए राष्ट्रीय रियल-टाइम निगरानी प्रणाली, औद्योगिक अपशिष्ट पर कठोर कार्रवाई, कृषि विविधीकरण, स्थानीय जल-शोधन, और कड़े निर्यात गुणवत्ता मानक आवश्यक हैं। भूजल प्रदूषण एक धीमी, लेकिन विनाशकारी आर्थिक और सामाजिक त्रासदी है। पानी की कमी कभी-कभी ठीक हो सकती है,
लेकिन प्रदूषण अक्सर स्थायी होता है। यदि अभी कार्रवाई नहीं हुई, तो छोटी-छोटी गलतियाँ भविष्य में भारी कीमत वसूलेंगी। भारत को तुरंत, साहसिक और समन्वित कार्रवाई करनी होगी —
वरना यह संकट राष्ट्रीय आपदा बन सकता है।
(21-11-25) Indian express
अरावली खनन पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला में अनियंत्रित और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले खनन को रोकने के लिए केंद्र सरकार को एक Management Plan for Sustainable Mining (MPSM) तैयार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब तक यह योजना तैयार नहीं होती, नई खनन लाइसेंस जारी नहीं किए जाएंगे।
मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अरावली — जो गुजरात से दिल्ली तक फैली एक सतत भूगर्भिक श्रृंखला है — में खनन तभी संभव होना चाहिए जब वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित करे कि पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा। कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) को निर्देश दिया है कि वह भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के माध्यम से यह योजना बनाए, ठीक उसी तरह जैसे सरंडा क्षेत्र के लिए पहले तैयार की गई थी।
MPSM का उद्देश्य होगा—अरावली क्षेत्र का भू-संदर्भित पारिस्थितिक मूल्यांकन करना, यह पहचानना कि कौन से इलाके वन्यजीव और पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं, कौन-से क्षेत्र संरक्षण-प्रधान या पुनर्स्थापन-प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ खनन पूर्णतः प्रतिबंधित होना चाहिए, और कहाँ सीमित, वैज्ञानिक रूप से न्यायसंगत, सतत खनन संभव हो सकता है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि विशेषज्ञों की राय के बिना खनन जारी रहा तो अरावली की पहले से क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी को गंभीर हानि हो सकती है, इसलिए यह वैज्ञानिक, व्यापक और दीर्घकालिक योजना अत्यावश्यक है। हालाँकि यह प्रकरण कही हसदेव अरंड जैसे मामला का शिकार न हो जाये।
(सरंडा क्षेत्र : झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित सरंडा क्षेत्र एशिया का सबसे बड़ा सघन साल (Sal) वन माना जाता है। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता, हाथियों के महत्वपूर्ण गलियारे और कई जनजातीय समुदायों के पारंपरिक निवास के लिए प्रसिद्ध है। सरंडा में उच्च गुणवत्ता वाला लौह अयस्क बड़ी मात्रा में मौजूद है, जिसके कारण पिछले दो दशकों में यहां व्यापक खनन हुआ। यही खनन इस क्षेत्र के विवाद का मुख्य कारण बना।
अत्यधिक खनन से जंगल कटे, पहाड़ियाँ क्षतिग्रस्त हुईं और नदियाँ-जलधाराएँ प्रदूषित होने लगीं। हाथियों के मार्ग टूटने से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा, जबकि स्थानीय जनजातीय समुदायों की आजीविका, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ा। कई खनन परियोजनाओं पर पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन के आरोप भी लगे।
इन समस्याओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरंडा के लिए सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान (MPSM) बनाने का निर्देश दिया, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, संरक्षण और वैज्ञानिक ढंग से खनन के नियमन को सुनिश्चित किया जा सके।)
(21-11-25) The Hindu
क्या वायु प्रदूषण दक्षिण एशिया का साझा संकट बन चुका है?
दिल्ली एक बार फिर गंभीर वायु प्रदूषण के कारण सुर्खियों में है। हर साल की तरह इस बार भी AQI लगातार ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गया है। कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट ने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान के तहत चरण 1 और 2 से आगे बढ़ते हुए चरण 3 लागू कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल स्थानीय नहीं है—दक्षिण एशिया की वायु एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, और प्रदूषण की जड़ें सीमाओं के पार तक जाती हैं।
दक्षिण एशिया में क्या हो रहा है?
नवंबर 2024 में भारत और पाकिस्तान के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों ने ‘2024 इंडिया-पाकिस्तान स्मॉग’ का सामना किया था। दिल्ली और लाहौर वैश्विक स्तर पर सबसे प्रदूषित शहर बनने की होड़ में थे। सैटेलाइट तस्वीरों में दोनों देशों के ऊपर घने भूरे बादल साफ दिखाई दे रहे थे। हवा की दिशा बदलने से प्रदूषक भारत-पाकिस्तान सीमा पार करते रहे।
2025 में भी स्थिति दोहराई जा रही है—दिल्ली के बाद लाहौर फिर से उच्च AQI दर्ज कर रहा है। कराची के ‘डॉन’ अखबार के अनुसार पाकिस्तान में स्थानीय प्रदूषण के साथ भारत की ओर से धीमी हवाओं के कारण धुआँ पहुंचा। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी सर्दियों में AQI मध्यम से बहुत खराब स्तर तक पहुंचता है। नेपाल की राजधानी काठमांडू में AQI हर साल ‘अस्वास्थ्यकर’ श्रेणी में बना रहता है।
कारण क्या हैं?
ग्रीनपीस की 2023 वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में प्रदूषण के मुख्य कारण हैं—औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण, ठोस ईंधन और कचरा जलाना। इंडो-गंगेटिक क्षेत्र की भौगोलिक बनावट हवा को स्थिर रखती है, जिससे प्रदूषक सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे क्षेत्र में फैल जाते हैं।
विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में 9 दक्षिण एशिया में हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी समस्या को और गंभीर बनाती है।
क्या यह विकास का संकट है?
विश्व बैंक के अनुसार भारत अपने GDP का लगभग 3% खराब वायु गुणवत्ता पर होने वाले स्वास्थ्य खर्च और श्रम उत्पादकता की हानि में खो देता है। 2019 में भारत की GDP में 1.36% की गिरावट केवल वायु प्रदूषण से हुई थी। अनियोजित शहरीकरण, बढ़ते वाहन, कमजोर सार्वजनिक परिवहन और शहरी हरियाली की कीमत पर कंक्रीट के स्ट्रक्चर बनाना प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञ कहते हैं कि समाधान केवल स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय एयरशेड प्रबंधन, सीमा-पार सहयोग, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, और किसानों व श्रमिकों को ध्यान में रखकर बनाई गई मानवीय विकास नीति में है।
IIT भुवनेश्वर के हालिया अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है—जब तक हम पूरे दक्षिण एशिया को एक साझा वायुमंडलीय क्षेत्र (airshed) के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक प्रदूषण की जड़ें नहीं हटेंगी।
(क्षेत्रीय एयरशेड मैनेजमेंट: ऐसा मॉडल है जिसमें कई राज्य या जिले हवा के एक बड़े साझा क्षेत्र (एयरशेड) को एक इकाई मानकर प्रदूषण की संयुक्त निगरानी, डेटा-साझाकरण और नियंत्रण करते हैं। क्योंकि हवा सीमाएँ नहीं मानती, इसलिए पूरे क्षेत्र के लिए एकीकृत रणनीति बनाकर वायु गुणवत्ता सुधारी जाती है।)
(इंडो-गंगेटिक क्षेत्र उत्तर भारत और पाकिस्तान में फैला एक विस्तृत मैदान है, जिसमें हिमालय की तलहटी, गंगा और सहायक नदियाँ शामिल हैं। इसकी प्राकृतिक बनावट हवा के प्रवाह को सीमित करती है, जिससे धूल और औद्योगिक प्रदूषण क्षेत्र में स्थायी रूप से जमा रहता है, और गंभीर वायु गुणवत्ता समस्या उत्पन्न होती है।)
(21-11-25) Indian express
अमेरिका ने भारत को एक्सकैलिबर और जेवलिन मिसाइलें बेचने की मंजूरी दी
अमेरिका ने भारत को 155 मिमी एक्सकैलिबर गाइडेड आर्टिलरी शेल और FGM-148 जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल बेचने की मंजूरी दी है, जिसकी कुल कीमत 90 मिलियन डॉलर से अधिक है। भारत को 216 एक्सकैलिबर राउंड और 100 जेवलिन राउंड, लॉन्च यूनिट्स, फायर कंट्रोल सिस्टम, तकनीकी सहायता और लॉजिस्टिक सपोर्ट मिलेंगे। एक्सकैलिबर शेल 40–57 किमी की दूरी तक सटीक हमला कर सकती हैं और भारतीय तोपखाने जैसे बोफोर्स, M777, K9 वज्र और धनुष के लिए उपयुक्त हैं। जेवलिन एक पोर्टेबल और फायर-एंड-फॉरगेट सिस्टम है। यह बिक्री भारत की सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने, घरेलू सुरक्षा बढ़ाने और अमेरिकी-भारतीय रणनीतिक संबंधों को गहरा करने के उद्देश्य से है, बिना क्षेत्रीय सैन्य संतुलन को प्रभावित किए।
(22-11-25) The Hindu
औद्योगिक हरे क्षेत्र और पर्यावरणीय जिम्मेदारी
हाल ही में औद्योगिक ग्रीन-कवर की आवश्यकताओं को घटाने का ट्रेंड बढ़ा है, जिसे “ease of doing business” के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, औद्योगिक परिसरों में हरे क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लाभ प्रदान करना है—जैसे धूल कम करना, शोर कम करना और माइक्रो-क्लाइमेट नियंत्रित करना। यह पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली या वन्य जीवन की सुरक्षा नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों को देखकर बिना स्थानीय पर्यावरणीय संदर्भ के ग्रीन-कवर घटाना जोखिमपूर्ण है। घनी आबादी और औद्योगिक गतिविधि वाले क्षेत्रों में कम ग्रीन बेल्ट स्थानीय वायु गुणवत्ता और जीवन स्तर पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
लेख में सुझाव दिया गया है कि औद्योगिक विस्तार के दौरान दो-स्तरीय रणनीति अपनाई जाए। फैक्ट्री के भीतर ग्रीन बेल्ट को कम किया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ऑफ-साइट हरा क्षेत्र और पर्यावरणीय बहाली अनिवार्य हो। इसमें राज्य या क्षेत्र स्तर पर हरे रिज़र्व, क्षतिग्रस्त भूमि की बहाली और संरक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा शामिल हो।
इस दृष्टिकोण से उद्योग केवल नियम पालन करने वाले नहीं, बल्कि पर्यावरणीय भागीदार बनेंगे। फैक्ट्री के भीतर ग्रीन बेल्ट स्थानीय “हीलिंग ज़ोन” के रूप में काम करेगा, जबकि बड़े परिदृश्य स्तर पर हरा क्षेत्र संपूर्ण पारिस्थितिकी की सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित करेगा। औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा तभी संतुलित रह सकती है जब उद्योग स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर हरे क्षेत्रों की बहाली में सक्रिय रूप से भाग लें।
(22-11-25) Economic Times
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की नदियों में प्रदूषण रोकने समिति गठित की
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की जोझारी, बांदी और लूणी नदियों में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को देखते हुए एक उच्चस्तरीय इकोसिस्टम निगरानी समिति गठित की है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रदूषण ने लगभग दो मिलियन लोगों, जानवरों और पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल दिया है और यह प्रशासन की लगभग दो दशकों की लापरवाही का परिणाम है।
कोर्ट ने कहा कि प्रदूषित नदियां केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं हैं, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षित पानी के अधिकार पर हमला है। समिति की अध्यक्षता न्यायमूर्ति संगीता लोढ़ा (रिटायर्ड) करेंगी। समिति का काम नदी तंत्र के विज्ञान आधारित, समयबद्ध पुनर्जीवन और संरक्षण योजना बनाना, सभी कानूनी और अवैध जल निकासी बिंदुओं का नक्शा तैयार करना और सुधारात्मक उपाय सुझाना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य ने जो कदम उठाए हैं, वे केवल कोर्ट की चेतावनी के बाद हुए, जबकि उन्हें वर्षों पहले उठाना चाहिए था। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के फरवरी 2022 आदेश के अधिकांश दिशा-निर्देश अब पूरी तरह लागू किए जाएंगे। समिति की पहली रिपोर्ट 27 फरवरी को कोर्ट में प्रस्तुत करनी होगी।
कोर्ट का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए तत्काल, व्यापक और प्रभावी उपाय आवश्यक हैं, और राज्य सरकार को जल संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
(22-11-25) Business standard
ट्रम्प का 28-बिंदु यूक्रेन शांति प्रस्ताव: रूस की अधिकांश मांगें मानने को तैयार
अमेरिका और रूस के प्रतिनिधियों द्वारा तैयार किया गया 28-बिंदु शांति प्रस्ताव यूक्रेन के लिए कई कठिन शर्तें रखता है। इसके अनुसार यूक्रेन को क्रीमिया, लुहान्स्क और डोनेट्स्क क्षेत्रों को रूस के अधिकार क्षेत्र के रूप में मान्यता देनी होगी। साथ ही नाटो में शामिल होने की कोई उम्मीद नहीं रखी जा सकती और 100 दिनों में चुनाव कराने होंगे।
यूक्रेन को अमेरिकी सुरक्षा गारंटी मिलेगी, लेकिन इसके लिए अमेरिका को मुआवजा देना होगा। प्रस्ताव में अमेरिका को यूक्रेन के पुनर्निर्माण और निवेश में 50% मुनाफा लेने का प्रावधान भी है। रूस को धीरे-धीरे प्रतिबंधों से राहत मिलेगी और वह जी8 समूह में लौटेगा।
यूक्रेन और उसके सहयोगियों ने अब तक इस योजना को खारिज किया है। राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की इसे देख रहे हैं, लेकिन इसे स्वीकार करने की संभावना कम है। नाटो सदस्य देशों को भी यह योजना पसंद नहीं है क्योंकि यह गठबंधन की विस्तार नीति को रोकती है।
पूर्व अमेरिकी एनाटो एम्बेसडर जूलियाने स्मिथ ने कहा कि योजना “मृतजन्म”(dead on arrival) की तरह है और ज़ेलेंस्की इसे स्वीकार नहीं करेंगे। अमेरिका ने इस योजना के समर्थन में कहा है कि यह यूक्रेन और रूस दोनों के लिए लाभकारी है।
यूरोप और अन्य देशों ने जोर देकर कहा कि कोई भी शांति समझौता यूक्रेन की सहमति के बिना नहीं हो सकता। इस प्रस्ताव में रूस को सीमित करने और यूरोप के प्रति आक्रामक न रहने की शर्तें भी शामिल हैं।
Science and Technology
(20-11-25) Indian express
भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित की नई सस्ती और स्वतंत्र जेनेटिक एडिटिंग तकनीक
भारतीय वैज्ञानिकों ने पौधों की जेनेटिक एडिटिंग (GE) के लिए एक नई तकनीक विकसित की है, जो CRISPR-Cas तकनीक का छोटा और कम खर्च वाला विकल्प है। इस नई प्रणाली में TnpB प्रोटीन का इस्तेमाल किया जाता है, जो DNA को सटीक रूप से काटने और बदलने का काम करता है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह भारतीय शोध का उत्पाद है और इसके लिए विदेशी पेटेंट या लाइसेंस फीस की बाधा नहीं है। CRISPR-Cas तकनीक के पेटेंट अधिकांशतः अमेरिका की कंपनियों और संस्थानों के पास हैं, जिससे वाणिज्यिक उपयोग में किसान और शोधकर्ता सीमित हैं। वहीं, TnpB तकनीक स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल की जा सकेगी।
TnpB प्रोटीन छोटा होने की वजह से इसे सीधे पौधों की कोशिकाओं में पहुँचाना आसान है, जबकि Cas प्रोटीन के लिए जटिल tissue culture की जरूरत होती है। इसे “मॉलिक्यूलर कैंची” के रूप में समझा जा सकता है, जो किसी खास जीन को काटकर उसके कार्य को बदल सकती है।
इस तकनीक से सूखा-सहिष्णु और अधिक पैदावार वाले चावल (DST (drought and salt tolerance) gene) जैसी फसलें विकसित की जा सकती हैं। ICAR ने इस तकनीक का पेटेंट हासिल कर लिया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुरक्षा देने की योजना है।
ICAR के वरिष्ठ वैज्ञानिक कुंतुबुद्दीन अली मोल्ला ने कहा, “TnpB तकनीक छोटे और मध्यम किसानों के लिए सस्ती और प्रभावी समाधान है। अब हम विदेशी पेटेंट पर निर्भर नहीं रहेंगे और GE फसलें स्वतंत्र रूप से उगा सकेंगे।”
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह खोज भारतीय कृषि में एक बड़ा कदम है, जो किसानों और शोधकर्ताओं को वैश्विक पेटेंट के दबाव से मुक्त कर प्रभावी और टिकाऊ खेती की दिशा में मदद करेगी।
