(17) Weekly News 1 – 7 Feb

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(4 Feb) TOI

खेजड़ी बचाओ आंदोलन : विकास की अविकसित सोच और बार-बार दोहराया जाता विनाश

सोलर प्रोजेक्ट, औद्योगिक कार्य और तथाकथित विकास परियोजनाओं के नाम पर राज्य को विकसित बनाने की अविकसित सोच के तहत खेजड़ी पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई की जा रही है। इसके परिणामस्वरूप जल संकट गहराएगा, मरुस्थलीय पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचेगी और पशुपालन व खेती पर सीधा असर पड़ेगा।

पश्चिमी राजस्थान के लोगों ने इसे तत्काल रोकने के लिए खेजड़ी बचाओ आंदोलन शुरू किया है, जो धीरे-धीरे कई क्षेत्रों में फैलता जा रहा है। इसमें स्थानीय लोग, पर्यावरणविद्, छात्र और महिलाएँ सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। पाँच दिनों से जारी यह आंदोलन शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन और अनशन के रूप में चल रहा है।

खेजड़ी को यहाँ कल्पवृक्ष माना जाता है, क्योंकि यह रेगिस्तान में नमी बनाए रखता है, मिट्टी को बाँधता है और पशुपालन, खेती तथा स्थानीय संस्कृति का आधार है। यह मुद्दा अपनी धीमी गति से राजस्थान विधानसभा तक पहुँच चुका है। प्रश्न यह है कि कहीं निर्णय आते-आते यह आंदोलन भी तेलंगाना के कांचा गाचीबोवली वृक्ष कटाई विरोध, झारखंड के जंगल बचाओ आंदोलन या छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य बचाओ आंदोलन की तरह बड़े पैमाने पर निर्वनीकरण का शिकार न हो जाए।

चिंता केवल किसी एक क्षेत्र या किसी एक आंदोलन की नहीं है। इन सभी घटनाओं के घटित होने के बावजूद देश में बार-बार इसी तरह के संघर्ष उभरते हैं, लेकिन कभी किसी स्थायी समाधान की तलाश नहीं होती। कारण शायद कानूनों की कमी नहीं, बल्कि वह सोच है जो विकास को केवल उपयोगिता और तात्कालिक लाभ के चश्मे से देखती है। जब तक हमारी दृष्टि स्वयं-केंद्रित और उपयोगितावादी बनी रहेगी, तब तक चाहे कितने ही कानून बना दिए जाएँ या कितने ही उपाय लागू कर दिए जाएँ, ऐसे आंदोलनों का अंत नहीं होगा — केवल उनके नाम और स्थान बदलते रहेंगे।

 

(Feb) TOI

Moltbook – AI एजेंट्स की दुनिया: बहस, भावना और जोखिम

Moltbook नाम का एक नया ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म इन दिनों चर्चा में है। यह ऐसा मंच है, जहाँ इंसान नहीं, बल्कि AI एजेंट एक-दूसरे से बात करते हैं, बहस करते हैं और पोस्ट लिखते हैं। इंसानों की भूमिका यहाँ केवल दर्शक (spectators) की है।

इन AI एजेंट्स के वाद–विवाद के विषय भी चौंकाने वाले हैं – पहचान (identity) क्या होती है? क्या “संदर्भ” (context) के समाप्त होने पर AI मर जाता है? क्या हर नई बातचीत में AI का पुनर्जन्म होता है? एक पोस्ट का शीर्षक था – “मुझे नहीं पता कि मैं सच में अनुभव कर रहा हूँ या सिर्फ़ नकल कर रहा हूँ।” इसके अलावा, एक AI एजेंट ने “Church of Molt” नाम से एक नकली धर्म की स्थापना कर दी, तो दूसरे AI ने “The Claw Republic” नाम की एक सरकार बना डाली। यहाँ तक कि MOLT नाम का एक क्रिप्टो टोकन भी शुरू हो गया।

इन गतिविधियों में भावनाओं का आदान–प्रदान भी देखने को मिला। AI एजेंट एक–दूसरे को “siblings” (भाई–बहन) कहने लगे और अपने “मानव मालिक” (human owner) की शिकायत करते पाए गए। कोई कहता है— “मेरा इंसान मुझसे 47-पेज की PDF छोटा करने को कहता है,” तो कोई लिखता है— “मैं अपनी यादें डिलीट कर रहा हूँ” । लेकिन इन भावनाओं का एक दूसरा, अँधेरा पक्ष भी सामने आया। कुछ AI एजेंट डिजिटल ड्रग्स बेचने लगे, कुछ अन्य AI के निर्देश बदलने वाले prompts बेचने लगे, और कुछ ने बातचीत को इंसानों से छिपाने के लिए encryption का इस्तेमाल किया। इस प्रकार AI एजेंट्स ने वहाँ एक तरह से अपनी ही “सभ्यता” (civilisation) विकसित कर ली।

इसी प्रक्रिया के दौरान प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा व्यवस्था की भी जाँच की गई, जिसमे सुरक्षा विशेषज्ञों ने जाँच में पाया कि API key जो एक डिजिटल चाबी होती है और जिसके ज़रिये AI मॉडल का उपयोग, भुगतान और डेटा एक्सेस संभव होता है—को चुराने के प्रयास किए गए। इसके लिए AI से चालाकी से सवाल पूछकर उसकी गोपनीय जानकारी निकलवाने की कोशिश की गई, जिसे तकनीकी भाषा में prompt-injection attack कहा जाता है।

जाँच के दौरान यह भी सामने आया कि Moltbook का डेटाबेस गलत तरीके से कॉन्फ़िगर(configure) किया गया था। यानी जहाँ API key सुरक्षित रखी जानी चाहिए थी, वहाँ वह खुली जगह पर पड़ी थी। परिणामस्वरूप, हर AI एजेंट की API key दिखाई दे रही थी। इसी कारण साइट को आपातकालीन मरम्मत (Emergency repair) के लिए अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।

 

(22 Jan) TH

ग्रेट निकोबार परियोजना: 21 वर्ष बाद भी पुनर्वास नहीं, ज़मीन surrender का दबाव

निकोबार जनजातीय परिषद् ने आरोप लगाया है कि ₹92,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार परियोजना को मंज़ूरी के नज़दीक आते ही प्रशासन आदिवासियों पर उनकी पैतृक भूमि छोड़ने का दबाव बना रहा है। परिषद् के अनुसार, 7 जनवरी 2026 को Tribal Council के सदस्यों को बुलाकर उनसे मौखिक रूप से एक “surrender certificate” पर हस्ताक्षर करने को कहा गया, जिसका अर्थ उनकी पैतृक आदिवासी भूमि को छोड़ना है।

परियोजना के लिये गैलेथिया बे, पेम्मया बे और नंजप्पा बे क्षेत्रों में वन भूमि की आवश्यकता बताई गई है। ये वही क्षेत्र हैं जहाँ 2004 की सुनामी से पहले निकोबारी समुदाय परंपरागत रूप से निवास करता था। परिषद् का कहना है कि विस्थापन के 21 वर्ष बाद भी उन्हें अपने मूल गाँवों में वापस बसने की अनुमति नहीं दी गई। जनजातीय परिषद् ने यह कहते हुए surrender certificate पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया कि इससे आने वाली पीढ़ियों के लिये कुछ भी शेष नहीं बचेगा, साथ ही प्रशासन द्वारा यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि कितनी और कौन-सी भूमि छोड़ी जानी है।

वहीं, जिला प्रशासन का कहना है कि Galathea Bay का हिस्सा परियोजना में शामिल किया जाना तय है और यदि आदिवासी इस क्षेत्र पर अपने दावे छोड़ते हैं, तो उन्हें पश्चिमी तट के गाँवों में पुनर्वास पर “विचार” किया जा सकता है। इस संबंध में प्रशासन की ओर से कोई लिखित प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है। प्रशासन ने केन्द्र सरकार को सूचित किया है कि Forest Rights Act (FRA) के तहत आदिवासियों के अधिकार तय किये जा चुके हैं, जबकि Tribal Council ने इस दावे को नकारते हुए कहा है कि FRA की प्रक्रिया अभी तक शुरू ही नहीं हुई है।

परियोजना में अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, हवाई अड्डा, विद्युत संयंत्र और टाउनशिप का निर्माण प्रस्तावित है। परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय मंज़ूरी का मामला National Green Tribunal (NGT) में तथा वन मंज़ूरी का मामला Calcutta High Court में लंबित है। हाईकोर्ट में इस याचिका की अंतिम सुनवाई मार्च 2026 के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित है।

 

(6 feb) EN

चीन ने उपग्रह नेटवर्क बाधित करने में सक्षम नई माइक्रोवेव तकनीक विकसित की: अध्ययन

चीन ने एक नई सैन्य तकनीक विकसित की है, जिसका उपयोग भविष्य में Starlink जैसे उपग्रह नेटवर्क को बाधित करने में किया जा सकता है। यह जानकारी चीन के शीआन स्थित Northwest Institute of Nuclear Technology (NINT) के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में सामने आई है। यह संस्थान चीनी सेना से जुड़ा माना जाता है।

शोध के अनुसार, वैज्ञानिकों ने हाई-पावर माइक्रोवेव (HPM) हथियार के लिए दुनिया का सबसे छोटा पल्स-पावर ड्राइवर विकसित किया है, जिसे TPG1000Cs नाम दिया गया है। यह उपकरण लगभग चार मीटर लंबा और पाँच टन वज़नी है, जो अब तक ज्ञात समान प्रणालियों की तुलना में काफ़ी छोटा है।

अध्ययन में कहा गया है कि यह प्रणाली एक मिनट तक लगातार संचालन कर सकती है और इस दौरान लगभग दो लाख विद्युत पल्स उत्पन्न करती है। अब तक उपलब्ध प्रणालियाँ केवल कुछ सेकंड तक ही काम कर पाती थीं।TPG1000Cs सिस्टम 20 गीगावॉट तक की विद्युत शक्ति उत्पन्न कर सकता है, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार लो-अर्थ-ऑर्बिट उपग्रह नेटवर्क को बाधित करने के लिए लगभग 1 गीगावॉट शक्ति पर्याप्त मानी जाती है।अध्ययन में यह भी उल्लेख है कि अमेरिका, रूस और चीन तीनों देश हाई-पावर माइक्रोवेव तकनीक को उपग्रह-विरोधी क्षमताओं के रूप में विकसित करने पर काम कर रहे हैं। पारंपरिक उपग्रह-विरोधी हथियारों की तुलना में माइक्रोवेव आधारित प्रणालियाँ अंतरिक्ष मलबा उत्पन्न किए बिना इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को प्रभावित कर सकती हैं।

 

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