(07) Weekly News 24 – 29 Dec

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 (24-11-25) the Hindu, TOI, D News, Wikipedia

बेलेम, ब्राज़ील में आयोजित UNFCCC COP 30

बेलेम, ब्राज़ील में आयोजित COP 30 शनिवार, 22 नवंबर 2025 को समाप्त हुआ, जहाँ COP अध्यक्ष आंद्रेई लागो ने दो महत्वपूर्ण रोडमैप तैयार करने की घोषणा की—एक वनों की कटाई रोकने और जंगलों को पुनर्स्थापित करने का रोडमैप और दूसरा फॉसिल फ्यूल से न्यायपूर्ण, क्रमबद्ध और समानांतर रूप से दूर जाने का। यह घोषणा ब्राज़ीलियाई राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के उस संदेश के अनुरूप है जिसमें उन्होंने मानवता के लिए योजनाबद्ध ऊर्जा परिवर्तन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था।

लागो ने इन घोषणाओं के साथ COP 30 का प्रमुख सहमति दस्तावेज़ “Global Mutirão” भी औपचारिक रूप से पारित किया गया। Mutirão पुर्तगाली-ब्राज़ीलियाई शब्द है जिसका अर्थ है सभी का मिलकर प्रयास। इस समझौते में कई विवादित विषयों पर न्यूनतम सहमति हासिल की गई। इसमें पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9 के तहत विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त जुटाने की अनिवार्यता को दोहराया गया, साथ ही देशों के बीच जलवायु के नाम पर लागू किए जाने वाले इकतरफा व्यापारिक प्रतिबंधों पर चिंता व्यक्त की गई। दस्तावेज़ में देशों से उनके राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) पर प्रगति तेज करने और 1.5°C लक्ष्य के अंतर को पाटने की अपील भी की गई।

फॉसिल फ्यूल को समाप्त करने की टाइमलाइन COP 30 का सबसे विवादित विषय रही। विकसित देश इसका स्पष्ट उल्लेख चाहते थे, परंतु भारत समेत कई विकासशील और तेल-उत्पादक देशों ने इसका कड़ा विरोध किया। अंततः Mutirão में ऐसी कोई भाषा शामिल नहीं की गई। हालांकि, अध्यक्ष लागो की रोडमैप संबंधित घोषणा ‘Mutirão’ दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है, इसलिए यह किसी देश पर अनिवार्य नहीं मानी जाएगी।

Mutirão के अलावा, COP 30 में 10 प्रमुख सहमति दस्तावेज़ भी बने। इनमें जस्ट ट्रांज़िशन (ऊर्जा बदलाव के दौरान मजदूरों और समुदायों को नई नौकरियाँ और सुरक्षित परिवर्तन दिलाने की प्रक्रिया), लॉस एंड डैमेज (जलवायु आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई और उससे प्रभावित देशों को दी जाने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता), स्वच्छ तकनीक हस्तांतरण(साफ ऊर्जा वाली आधुनिक तकनीक को विकसित देशों से विकासशील देशों तक पहुँचाने की व्यवस्था) और Global Goal on Adaptation (दुनिया जलवायु आपदाओं से निपटने के लिए कितनी तैयार है और इस तैयारी को कैसे मजबूत करना है—इसका वैश्विक ढांचा) जैसे विषय शामिल थे। अनुकूलन लक्ष्य (Global Goal on Adaptation) पर कई दक्षिण अमेरिकी देशों ने आपत्ति जताई, जिसके चलते बैठक कुछ समय बाधित भी हुई।

COP 30 में दस प्रमुख समझौतों के अलावा कई नई पहलें भी सामने आईं। इसमें वैश्विक अनुकूलन लक्ष्य (GGA) के तहत बाकू अनुकूलन रोडमैप को अंतिम मंजूरी दी गई और प्रगति मापने के लिए 59 स्वैच्छिक संकेतकों पर सहमति बनी। बेलेम हेल्थ एक्शन प्लान स्वास्थ्य प्रणालियों को जलवायु संकट का सामना करने लायक बनाने और स्वास्थ्य समानता, जलवायु न्याय और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने पर केंद्रित है।

ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी (TFFF) उष्णकटिबंधीय वनों के संरक्षण के लिए पेमेंट-फॉर-परफॉर्मेंस मॉडल पर आधारित है, जिसमें ब्राज़ील ने पहला 1 अरब डॉलर योगदान दिया और कुल 125 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। बेलेम 4x प्रतिज्ञा 2035 तक संधारणीय ईंधनों(Sustainable Fuels) का उपयोग चार गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखती है, विशेषकर हाइड्रोजन, जैव ईंधन, बायोगैस और ई-फ्यूल के लिए और इसकी प्रगति IEA द्वारा सालाना निगरानी की जाएगी।

बेलेम घोषणा में भूख, गरीबी और कमजोर समुदायों को केंद्र में रखकर जलवायु कार्रवाई, अनुकूलन और सामाजिक सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता दी गई है। बेलेम लैंगिक कार्य योजना (GAP) जलवायु कार्रवाई को लैंगिक-संवेदी बनाती है और महिलाओं, विशेषकर कमजोर समुदायों की महिलाओं की नीति निर्माण में सार्थक हिस्सेदारी सुनिश्चित करती है।

भारत का COP30 में पक्ष

वैश्विक जलवायु सम्मेलन COP30 में भारत ने विकासशील देशों की आवाज़ को दृढ़ता से उठाते हुए जलवायु न्याय, समानता और अनुदान-आधारित वित्त की अनिवार्यता पर जोर दिया। भारत ने ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और चीन सहित BASIC समूह और LMDC (Like-Minded Developing Countries) के साथ मिलकर विकसित देशों से अपने वित्तीय दायित्वों को पूरा करने की मांग की।

भारत ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 की याद दिलाते हुए कहा कि विकसित देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी दायित्व है कि वे विकासशील देशों को पर्याप्त जलवायु वित्त उपलब्ध कराएँ।भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान ऋण-आधारित मॉडल विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं, इसलिए वित्त “पूर्वानुमानित, बड़े पैमाने पर और अनुदान-आधारित” होना चाहिए।भारत ने COP29 द्वारा निर्धारित 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वार्षिक जलवायु वित्त लक्ष्य को जुटाने की आवश्यकता दोहराई।

भारत ने एडैप्टेशन गैप रिपोर्ट 2025 का हवाला देते हुए बताया कि विकासशील देशों को वर्ष 2035 तक प्रतिवर्ष 310–365 बिलियन अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता होगी, जबकि वर्तमान प्रवाह केवल लगभग 26 बिलियन डॉलर है। भारत ने ग्लासगो की उस प्रतिबद्धता की भी याद दिलाई जिसमें 2025 तक अनुकूलन वित्त को दोगुना कर 40 बिलियन डॉलर करने की बात कही गई थी—जिसके पूरा होने की संभावना कम दिख रही है।

भारत ने अपने वक्तव्य में कहा कि जलवायु कार्रवाई की नींव “साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएँ” (CBDR-RC) है।

भारत ने जोर दिया कि

  • ऐतिहासिक उत्सर्जक देशों को उत्सर्जन कटौती में नेतृत्व करना चाहिए।
  • सभी देशों को UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते को पूर्ण रूप से लागू करना चाहिए।

विकासशील देशों ने मिलकर यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे व्यापारिक प्रतिबंधात्मक कदमों का विरोध किया। भारत ने इन्हें “भेदभावपूर्ण अवरोध” बताया।

भारत ने कहा कि अनुकूलन को उत्सर्जन कमी (mitigation) के बराबर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इसके साथ ही, विकासशील और संवेदनशील देशों—विशेषकर द्वीपीय, अफ्रीकी और गरीब देशों—के लिए पूर्वानुमेय और निरंतर वित्त व तकनीकी सहायता की आवश्यकता पर जोर दिया।

COP30 की प्रमुख चुनौतियाँ

  1. वित्तीय प्रतिबद्धताओं में अस्पष्टता -सम्मेलन में अनुकूलन और शमन के लिए बड़ी रकम की बात तो हुई, लेकिन पैसा कहाँ से आएगा, कब आएगा और कैसे मिलेगा, इस पर स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं बनी।
  2. अनुकूलन वित्त के लिए ठोस रोडमैप का अभाव -विकासशील देशों को 2035 तक बहुत बड़ी धनराशि चाहिए, लेकिन वर्तमान फंडिंग बेहद कम है। COP30 इस अंतर को पाटने के लिए ठोस समाधान नहीं दे सका।
  3. स्वैच्छिक लक्ष्यों पर अधिक निर्भरता – 59 indicators (GGA) और 4x fuel pledge जैसे कदम स्वैच्छिक हैं, जिनके पालन की कानूनी मजबूरी नहीं है। इससे वास्तविक क्रियान्वयन कमजोर हो सकता है।
  4. जलवायु न्याय और CBDR के मुद्दों पर पर्याप्त सहमति नहीं – विकसित और विकासशील देशों के बीच वित्त, तकनीक और उत्सर्जन कटौती को लेकर मतभेद बने रहे।
  5. व्यापारिक विवादों का समाधान नहीं – यूरोपीय संघ के CBAM जैसे कदमों पर कई देशों ने विरोध जताया, लेकिन सम्मेलन में इस विवाद का ठोस हल नहीं निकला।
  6. महत्वपूर्ण क्षेत्रों (जैसे हानि-नुकसान) पर सीमित प्रगति – नुकसान और क्षति (Loss & Damage) फंड के लिए नई, बढ़ी हुई प्रतिबद्धताएँ या योगदान सामने नहीं आए।
  7. बहुपक्षीय प्रक्रिया में राजनीति का हस्तक्षेप – कई वार्ताएँ राजनीतिक टकराव की वजह से धीमी रहीं, जिससे कई मुद्दों पर मजबूत निर्णय नहीं हो पाए।

(CBAM क्या है?

Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) यूरोपीय संघ (EU) का एक कार्बन टैक्स है।

जब कोई देश EU को स्टील, सीमेंट, एल्यूमिनियम, बिजली, उर्वरक जैसे उत्पाद बेचता है, तो EU यह देखेगा कि उस उत्पाद को बनाने में कितना कार्बन उत्सर्जन हुआ।अगर उत्पाद “ज्यादा प्रदूषण” से बना है, तो EU अतिरिक्त टैक्स (कार्बन टैक्स) वसूलेगा। इसका उद्देश्य: दुनिया भर की फैक्ट्रियों को “कम प्रदूषण वाला उत्पादन” अपनाने के लिए मजबूर करना।

CBAM क्यों विवादित है?

भारत, चीन, ब्राज़ील जैसे देशों की निर्यात लागत बढ़ जाएगी और उनके उत्पाद EU में महंगे हो जाएँगे जिससे प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी। भारत और कई विकासशील देशों का कहना है कि यह एक छिपा हुआ व्यापारिक टैक्स है। इससे गरीब और विकासशील देशों के उद्योगों को नुकसान होगा। EU खुद भी दशकों तक भारी प्रदूषण करता रहा है।अब वह गरीब देशों पर बोझ डाल रहा है कि वे स्वच्छ तकनीक अपनाएँ — जो महँगी है। EU ने यह नियम पारदर्शी वैश्विक सहमति के बिना लागू किया। इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के खिलाफ बताया जा रहा है। EU गरीब देशों को स्वच्छ तकनीक के लिए कोई विशेष वित्तीय मदद नहीं दे रहा, लेकिन टैक्स लगाकर पैसा वसूल रहा है — यही सबसे बड़ा विवाद है।)

 

 (24-11-25) The Hindu

बिहार में स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध में यूरेनियम मिला, शिशुओं के स्वास्थ्य पर चिंता बढ़ी

बिहार में किए गए एक नए अध्ययन ने स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध में यूरेनियम (U-238) की मौजूदगी का खुलासा किया है। शोधकर्ताओं ने 40 नमूनों का विश्लेषण किया और सभी में यूरेनियम पाया। इसमें 70% शिशुओं के लिए गैर-कैंसरजन्य स्वास्थ्य जोखिम की संभावना दर्ज की गई, हालांकि कुल स्तर स्वीकार्य सीमा से नीचे थे।

सबसे अधिक औसत संदूषण खगड़िया में और व्यक्तिगत स्तर पर कटिहार में पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार यूरेनियम का प्रभाव शिशुओं में गुर्दे, तंत्रिका विकास और IQ पर पड़ सकता है, लेकिन जब तक चिकित्सकीय सलाह न हो, स्तनपान बंद करने की आवश्यकता नहीं है।

भारत में भूजल संदूषण पहले से चिंता का विषय है—18 राज्यों के लगभग 1.7% स्रोतों में यूरेनियम पाया गया है। WHO पेयजल में यूरेनियम की अधिकतम सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर मानता है। शोधकर्ता अब अन्य राज्यों में भी समान अध्ययन और स्तनदूध में भारी धातुओं व कीटनाशकों की निरंतर जैव-निगरानी की अनुशंसा कर रहे हैं। अध्ययन में बिहार में U-238 की नियमित निगरानी को तत्काल प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई है ताकि माताओं और शिशुओं के संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सके।

 

 (25-11-25) PIB

G20 2025: जोहान्सबर्ग में Global South की प्राथमिकताओं पर जोर

दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 22-23 नवंबर 2025 को आयोजित G20 शिखर सम्मेलन पहली बार अफ्रीका में हुआ। सम्मेलन की थीम थी “समानता, एकजुटता, स्थिरता”, जिसमें Global South की प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। नेताओं ने G20 Johannesburg Leaders’ Declaration को अपनाया, जिसमें जलवायु कार्रवाई, multilateral सुधार, महिला सशक्तिकरण और वित्तीय स्थिरता पर सहमति बनी।

सम्मेलन में Spirit of Ubuntu को अपनाया गया, जिसका अर्थ है साझा जिम्मेदारी और सहयोग। UNSC सुधार के तहत अफ्रीका, एशिया‑पैसिफिक और लैटिन अमेरिका को अधिक प्रतिनिधित्व देने का समर्थन किया गया। Mission 300 के तहत 2030 तक सब-सहारन अफ्रीका में 3 करोड़ लोगों को बिजली पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया। Critical Minerals Framework खनिज आपूर्ति श्रृंखला को स्थायी और पारदर्शी बनाने पर केंद्रित है।

भारत ने अफ्रीका-केंद्रित विकास, स्वास्थ्य और ज्ञान साझेदारी में सक्रिय भूमिका निभाई। प्रमुख पहलें: Africa Skills Multiplier Initiative, Global Healthcare Response Team, Open Satellite Data Partnership और Critical Minerals Circularity Initiative। भारत ने आतंक वित्त और Drug-Terror Nexus को नियंत्रित करने के लिए भी प्रस्ताव पेश किए।

सम्मेलन में ऋण संकट और वित्तीय सुधार पर ध्यान दिया गया, तथा महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए लक्ष्य तय किए गए। G20 2025 ने Global South की आवाज़ को मजबूती दी और सतत विकास, समानता और सुरक्षा पर वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दिया।

(G20 (Group of Twenty) एक अंतरराष्ट्रीय मंच है जिसमें 19 बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ और यूरोपीय संघ शामिल हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक सहयोग, वित्तीय स्थिरता और व्यापार, ऊर्जा, जलवायु व स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सहमति बनाना है। G20 देशों की GDP लगभग 85%, व्यापार 75% और विश्व की आबादी का दो‑तिहाई हिस्सा कवर करती है। अध्यक्षता हर साल बदलती है।)

 

(25-11-25) Indian Express

भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका (IBSA) फोरम

भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका के त्रिपक्षीय मंच IBSA की बैठक G20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दुनिया विभाजित है, ऐसे समय में IBSA तीनों देशों की साझेदारी एकता और सहयोग का संदेश देती है। मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ एकजुट खड़े होने पर जोर दिया और कहा कि आतंकवाद पर दोहरा मापदंड (double standards) स्वीकार्य नहीं है।

मोदी ने NSA (National Security Advisors) ‑स्तर संवाद को संस्थागत करने, डिजिटल अवसंरचना साझा करने और IBSA Digital Innovation Alliance स्थापित करने का सुझाव दिया। उन्होंने एक IBSA फंड बनाने की भी बात की, जो जलवायु-रोधक खेती और दक्षिण–दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देगा।

IBSA मंच का उद्देश्य विकासशील देशों की आवाज़ को मजबूत करना, वैश्विक सुरक्षा और सतत विकास पर सहयोग करना है। बैठक ने Global South की प्राथमिकताओं को प्रमुखता दी और विकासशील देशों के लिए आर्थिक, डिजिटल और पर्यावरणीय सहयोग को बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाए।

 

 (25-11-25) Indian Express

इथियोपिया में हेली गुब्बी ज्वालामुखी विस्फोट

उत्तर-पूर्वी इथियोपिया में हेली गुब्बी ज्वालामुखी ने 12,000 वर्षों में पहली बार विस्फोट किया। इसमें लावा नहीं निकला, बल्कि गैस और धुएँ का विशाल गुबार ऊपर उठा, जिससे राख और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) 15-40 किमी ऊँचाई तक पहुंची। राख पश्चिम की ओर उड़कर गुजरात, राजस्थान और दिल्ली-उत्तर प्रदेश तक पहुँची। हवाई यातायात बाधित हुआ, क्योंकि सूक्ष्म कण हवाई जहाज इंजन और सेंसर के लिए खतरा थे। मानव स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष असर नहीं था, लेकिन निगरानी और अलर्ट जारी किए गए। अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क और मौसम की मदद से हवाई सेवा जल्द सामान्य होने की संभावना है। धुएँ और कण अल्पकालिक प्रभाव डालते हैं, जबकि सल्फर गैस लंबे समय तक वातावरण में बनी रह सकती है।

 

 (26-11-25) Reuters

चीनी एयरपोर्ट पर भारतीय महिला की हिरासत: भारत ने चीन से कड़ा विरोध जताया

चीनी एयरपोर्ट पर भारतीय महिला की हिरासत: भारत ने चीन से कड़ा विरोध जताया” भारत ने बुधवार को चीन के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया, क्योंकि शंघाई एयरपोर्ट पर एक भारतीय पासपोर्ट धारक महिला को हिरासत में लिया गया और उसका पासपोर्ट अमान्य (invalid) बताया गया। भारतीय अधिकारियों ने बताया कि यह महिला यूके में रहने वाली प्रेमा वांगजॉम थोंगडोक हैं। चीन के अधिकारियों ने उनकी यात्रा रोक दी क्योंकि उनके भारतीय पासपोर्ट पर जन्मस्थान अरुणाचल प्रदेश लिखा है — जिसे चीन दक्षिण तिब्बत बताता है और अपने क्षेत्र का हिस्सा दावा करता है।भारत ने कहा कि यह कार्रवाई पूरी तरह अस्वीकार्य है। विदेश मंत्रालय ने बताया कि भारत ने बीजिंग में चीनी दूतावास के साथ इस मामले में औपचारिक आपत्ति (formal protest) दर्ज की है। विदेश मंत्रालय ने यह भी जोर दिया कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है, और किसी भी भारतीय नागरिक के साथ इस तरह का व्यवहार गलत है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रेमा को कुछ समय बाद रिहा कर दिया गया, लेकिन घटना ने भारत-चीन संबंधों में एक नया तनाव जोड़ दिया है।

 

 (26-11-25) BBC

ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर बड़ा फैसला

ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर 2025 से फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसी सभी सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से 16 वर्ष से कम बच्चों के अकाउंट हटाने का आदेश दिया है। नियम का पालन न करने पर कंपनियों पर 50 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। सरकार का कहना है कि यह कदम बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया की लत से बच्चों में चिंता, अवसाद, आत्मसम्मान की कमी, और नींद में गड़बड़ी जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। लगातार स्क्रीन उपयोग से गतिहीन जीवनशैली, मोटापा, और अवास्तविक सुंदरता आदर्शों का दबाव भी बढ़ता है। इसके अलावा साइबरबुलिंग, हानिकारक कंटेंट और ऑनलाइन यौन शोषण जैसी सुरक्षा चिंताएँ गंभीर रूप से सामने आती हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि पूर्ण प्रतिबंध से डिजिटल कौशल विकास सीमित हो सकता है और कुछ बच्चे जिज्ञासा में इंटरनेट के असुरक्षित क्षेत्रों, जैसे डार्क वेब, की ओर जा सकते हैं।

 

 (26-11-25) The Hindu

अमेरिका–सऊदी अरब संबंध: 80 वर्षों पुरानी समझौते की नई दिशा

हालिया सऊदी-अमेरिकी शिखर सम्मेलन ने दर्शाया कि 80 साल पुराना यह रणनीतिक गठजोड़ आज भी मजबूत है। 1945 में राष्ट्रपति रूजवेल्ट और किंग अब्दुल अज़ीज़ के बीच “तेल-के-बदले-सुरक्षा” सौदे से शुरू हुई यह साझेदारी अब बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुसार नए रूप ले रही है।

ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। मई 2025 की उनकी रियाद यात्रा में 142 अरब डॉलर के रक्षा सौदे और 270 अरब डॉलर के निवेश समझौते हुए। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MbS) ने अमेरिका में निवेश लक्ष्य 600 अरब डॉलर से बढ़ाकर 1 ट्रिलियन डॉलर कर दिया। साथ ही, अमेरिका ने सऊदी अरब को “प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी” का दर्जा दिया।

हालांकि संबंधों में उतार–चढ़ाव रहे हैं—1973 तेल प्रतिबंध, यमन युद्ध में हथियार सीमाएँ, खशोगी हत्या, और बाइडेन प्रशासन की शुरुआती दूरी। चीन द्वारा अरब–ईरान वार्ता की मध्यस्थता तथा अमेरिकी समर्थन के बावजूद इज़राइल-सऊदी सामान्यीकरण में रुकावट भी तनाव के कारण रहे।

लेकिन ट्रम्प–MbS समीकरण ने नई रणनीतिक दिशा दी है। सहयोग परमाणु ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चिप्स और क्षेत्रीय सुरक्षा तक विस्तृत हो रहा है। अमेरिका और सऊदी दोनों तेल कीमतों को स्थिर रखना चाहते हैं—और रूस, ईरान व वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंध कथित तौर पर इस लक्ष्य को मजबूत करते हैं।

भारत पर प्रभाव
यह नया समीकरण भारत के लिए मिश्रित परिणाम ला सकता है:

  • पाकिस्तान को उन्नत अमेरिकी रक्षा तकनीक की पहुंच बढ़ सकती है।
  • तेल बाजार में स्थिरता भारत के लिए उपयोगी हो सकती है।
  • सऊदी विज़न–2030 परियोजनाओं में भारतीय तकनीकी और अवसंरचना निवेश के अवसर बढ़ेंगे।
  • चीन की सऊदी में घटती पकड़ भारत के लिए कूटनीतिक लाभ ला सकती है।
  • भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे को भी गति मिल सकती है।

इस प्रकार, पुरानी “तेल–सुरक्षा” धुरी से आगे बढ़ते अमेरिका–सऊदी संबंध वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरण रचते दिख रहे हैं।

 

 (27-11-25) The Hindu

China’s JUNO पूरा, भारत का INO अब भी अटका: वैज्ञानिक दौड़ में बड़ा अंतर

चीन ने अपना महत्वाकांक्षी Jiangmen Underground Neutrino Observatory (JUNO) पूरा कर लिया है, जबकि भारत का India-based Neutrino Observatory (INO) वर्षों से अवरुद्ध पड़ा है। दोनों परियोजनाएँ अत्यंत दुर्लभ उप-परमाण्विक कणों — न्यूट्रिनो — का अध्ययन करने के लिए बनाई गई थीं। चीन की सफलता और भारत की देरी के बीच का अंतर वैज्ञानिक समुदाय में चिंता का विषय बन गया है।

INO के विशाल आकार (50 किलोटन) के कारण इसे तमिलनाडु के थेनी में पर्वत के भीतर स्थापित किया जाना था। निर्माण के पैमाने, पर्यावरण संबंधी चिंताओं और राजनीतिक विरोध ने परियोजना को रोक दिया। प्रक्रिया संबंधी चूक और जनभावनाओं को संभालने में कमी भी बड़ी वजह रही।

इसी दौरान चीन ने तेजी से JUNO का निर्माण आगे बढ़ाया और अब इसकी टीम ने नवंबर 2025 में दो शुरुआती शोध-पत्र जारी कर दिए हैं। इन अध्ययनों में न्यूट्रिनो के प्रमुख पैरामीटर θ-12 के बहुत सटीक मापन की रिपोर्ट दी गई है।

चीन की इस उपलब्धि से न्यूट्रिनो मास ऑर्डरिंग निर्धारित करने में वैश्विक विज्ञान को बढ़त मिलेगी, जबकि भारत इस दौड़ में अपनी जगह खोता दिख रहा है।

 

 (27-11-25) ET

Building RRRare Earth Resilience

भारत ने रणनीतिक खनिजों की वैश्विक होड़ में अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने पहली बार ₹7,280 करोड़ का वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज मंज़ूर किया, जिसका उद्देश्य देश में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स (REPM) के निर्माण को बढ़ावा देना है। यह नया PLI (Production Linked Incentive Programme)  कार्यक्रम उद्योगों में मौजूद गंभीर आपूर्ति शृंखला की कमियों को दूर करने पर केंद्रित है।

गौरतलब है कि चीन लंबे समय से REPM उत्पादन में वैश्विक दबदबा रखता है और अमेरिका के साथ व्यापार विवादों में इसे रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। चीन के निर्यात नियंत्रणों का असर भारत सहित कई देशों पर पड़ा है, जिससे वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की आवश्यकता तीव्र हुई। भारत अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने और अन्य देशों के साथ मिलकर ऑफशोर क्षमता विकसित करने की योजना बना रहा है।

FY25 में भारत ने 53,748 मीट्रिक टन REPM आयात किए और 2030 तक इस खपत के दोगुना होने की संभावना है। ऐसे में इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना है। इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में PLI योजनाओं की सफलता को देखते हुए सरकार को इस पहल से भी बड़े परिणामों की उम्मीद है।

इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में REPM की भारी आवश्यकता को देखते हुए यह कदम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा राजनीति के चलते भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ़ के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। स्थानीय उत्पादन भारत को इस भू-राजनीतिक दबाव से राहत दिला सकता है। साथ ही, REPM पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेट जैसी नई तकनीकों पर भी शोध जारी है। नए वित्तीय प्रोत्साहन भारत को वैश्विक REPM बाज़ार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

(ऑफशोर क्षमता विकसित करना (Developing offshore capacity) का अर्थ है– किसी आवश्यक संसाधन, तकनीक या उत्पाद का उत्पादन अपने देश के बाहर (दूसरे देशों में) स्थापित करना या वहाँ साझेदारी बनाना, ताकि सप्लाई लगातार बनी रहे और एक ही देश पर निर्भरता न रहे।)

 

 (28-11-25) Indian express

अरावली पर्वतमाला के लिए नई परिभाषा: पर्यावरणीय चिंताओं के बीच विवाद  

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को पर्यावरण मंत्रालय की उस सिफारिश को स्वीकार कर लिया जिसमें कहा गया है कि कोई भी भू-आकृति जो अपने आसपास की सतह से 100 मीटर या अधिक ऊँची है, उसे अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा। उद्देश्य था खनन गतिविधियों को नियंत्रित करना, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस परिभाषा से 90% अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा, जिससे खनन और निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है।

FSI के आकलन के अनुसार, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली 12,081 पहाड़ियों में से केवल 8.7% पहाड़ियाँ ही 100 मीटर से ऊँची हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि 20–30 मीटर ऊँचे छोटे पहाड़ भी धूल और रेत को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं, विशेषकर दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता बचाने में। छोटे पहाड़ों के हटने से थार मरुस्थल की धूल इंडो-गंगेटिक मैदानों तक आसानी से पहुँच सकती है, जिससे प्रदूषण और किसानों की आजीविका पर असर पड़ेगा।

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि मंत्रालय ने अपनी परिभाषा में “ऊँचाई” और “ढलान” के आँकड़ों को गलत तरीके से मिलाया, और कई अरावली मौजूद जिलों—जैसे चित्तौड़गढ़ और सवाई माधोपुर—को सूची से बाहर रखा। इससे महत्वपूर्ण जैव-विविधता वाले क्षेत्र तथा सरिस्का–रणथंभौर जैसे वन्यजीव कॉरिडोर भी प्रभावित हो सकते हैं।

हालाँकि मंत्रालय का कहना है कि नई परिभाषा अवैध खनन रोकने और टिकाऊ खनन नीति बनाने में मदद करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय को ICFRE के साथ मिलकर सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार करने का निर्देश दिया है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मत है कि सरकार को संदेह की स्थिति में ज्यादा क्षेत्रों को संरक्षण में रखना चाहिए था, न कि उन्हें बाहर करना, ताकि अरावली जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी ढाल सुरक्षित रह सके।

 

 (28-11-25) ET

भारत और इंडोनेशिया ने खुले, शांतिपूर्ण और मुक्त इंडो-पैसिफिक का आह्वान किया

भारत और इंडोनेशिया ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को मुक्त, खुला, शांतिपूर्ण और समृद्ध बनाने के लिए साझा प्रतिबद्धता दोहराई है। तीसरी भारत–इंडोनेशिया रक्षा मंत्रियों की वार्ता में दोनों देशों ने समुद्री डोमेन जागरूकता, साइबर सुरक्षा और संयुक्त परिचालन क्षमता बढ़ाने पर सहमति जताई। बैठक में हथियार प्रणालियों के संयुक्त विकास और उत्पादन को मजबूत करने पर चर्चा हुई, जिसमें भारत द्वारा संयुक्त रक्षा उद्योग सहयोग समिति बनाने के प्रस्ताव की सराहना की गई। ब्रह्मोस मिसाइल आपूर्ति पर भी आगे बातचीत की गई। दोनों पक्षों ने सैन्य प्रशिक्षण, अधिकारी विनिमय और संयुक्त अभ्यासों को जारी रखने का निर्णय किया।

 

 (28-11-25) ET

प्रधानमंत्री ने कहा कि निजी कंपनियों को परमाणु क्षेत्र में अवसर मिलेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पेस उद्योग की तरह अब न्यूक्लियर ऊर्जा क्षेत्र में भी निजी कंपनियों के लिए दरवाज़े खोलने का ऐलान किया है। हैदराबाद की निजी स्पेस कंपनी Skyroot Aerospace के इंस्टॉल किया गया नया ‘Infinity’ कैंपस वर्चुअल उद्घाटन के दौरान उन्होंने कहा कि छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर, उन्नत रिएक्टर और न्यूक्लियर इनोवेशन में निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया जाएगा। मोदी ने यह भी कहा कि देश की युवा पीढ़ी, खासकर जेनेरेशन-Z, स्पेस स्टार्टअप्स और टेक्नोलॉजी नवाचारों में सक्रिय है। उन्होंने इस अवसर को लेकर उत्साह व्यक्त करते हुए कहा कि भारत का स्पेस और ऊर्जा क्षेत्र अब ग्लोबल निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बन रहा है।

 

 (28-11-25) The Hindu

खाद्य पदार्थों में घातक मिलावट: Auramine O डाई के बढ़ते खतरे पर चिंता

देश में खाद्य पदार्थों में रासायनिक मिलावट की समस्या एक बार फिर गंभीर रूप से सामने आई है, विशेषकर गैर-अनुमोदित सिंथेटिक डाइज़ के उपयोग के कारण। हाल के निरीक्षणों और अध्ययनों में  Auramine O नामक इंडस्ट्रियल पीले रंग की डाई की मौजूदगी मिठाइयों, नमकीनों और चने जैसे खाद्य पदार्थों में पाई गई है। यह डाई भारत सहित विश्व के किसी भी देश में खाद्य उपयोग के लिए अनुमोदित नहीं है।

Auramine O का उपयोग वस्त्र, चमड़ा, कागज़ और इंक उद्योग में होता है, लेकिन खाद्य पदार्थों में इसके उपयोग से लीवर-किडनी क्षति, जेनेटिक बदलाव और कैंसर का जोखिम बढ़ता है। इसके बावजूद यह सस्ती होने और आसानी से उपलब्ध होने के कारण छोटे मिठाई निर्माताओं एवं स्ट्रीट वेंडरों के बीच उपयोग में आती रहती है। पिछले दो दशकों में कई राज्यों के अभियान लगातार गैर-अनुमोदित रंगों—जैसे मेटानिल येलो, रोडामाइन B और मलेचाइट ग्रीन—की मौजूदगी को उजागर करते रहे हैं। अनियमित आपूर्ति-श्रृंखला, कम जागरूकता और कमजोर प्रवर्तन इस समस्या को और बढ़ाते हैं। त्योहारों के समय चमकीले रंग वाली मिठाइयों और स्नैक्स की मांग बढ़ने पर मिलावट की संभावना और अधिक हो जाती है।

FSSAI और राज्य एजेंसियां विशेष सैंपलिंग ड्राइव चला रही हैं, अवैध रंग जब्त किए जा रहे हैं और उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जा रही है। छोटे विक्रेताओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम और त्वरित परीक्षण किट विकसित किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक बाज़ारों पर नियंत्रण, सख्त प्रवर्तन और उपभोक्ता जागरूकता ही इस खतरे को स्थायी रूप से कम कर सकते हैं।

 

 (28-11-25) The Hindu

कमलेसन केस और उसका आसान सबक

भारतीय सेना से बर्खास्त लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन का मामला सेना की अनुशासन आवश्यकता और व्यक्तिगत अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बीच टकराव का नया उदाहरण बन गया है। कमलेसन ने धार्मिक कारणों से अपने रेजीमेंट के मंदिर या गुरुद्वारे के गर्भगृह में प्रवेश करने से इनकार किया था, जिसके बाद उन्हें सेवा से हटा दिया गया। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस निर्णय को बरकरार रखा और सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

सेना ने अदालत को बताया कि रेजीमेंटल परंपराएँ और धार्मिक-आधारित समारोह सैनिकों के मनोबल और एकता के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और एक कमांडिंग अधिकारी का पूर्ण सहभाग जरूरी है। अदालत ने सैन्य अनुशासन और अनुशासनात्मक आदेश का पालन न करने को मुख्य आधार माना। हालाँकि, विशेषज्ञों का मत है कि कमलेसन का इनकार सम्मानजनक और ईमानदार धार्मिक आपत्ति पर आधारित था, और वह परेड तथा अन्य औपचारिकताओं में हिस्सा लेते रहे। आलोचकों का कहना है कि मामूली रियायत देकर सेना अंतरात्मा और एकता दोनों को संतुलित रख सकती थी, जैसा कई अंतरराष्ट्रीय उदाहरण दर्शाते हैं।

इस निर्णय ने अल्पसंख्यक सैनिकों में संदेश को लेकर चिंता बढ़ाई है कि क्या उनकी धार्मिक सीमाओं को सम्मान मिलेगा। टिप्पणीकारों का मानना है कि सेना और न्यायपालिका दोनों को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और अनुपातिक दृष्टिकोण दिखाना चाहिए ताकि विश्वास और समावेशिता कायम रह सके।

 

 (28-11-25) The Hindu

चीन के वैश्विक ऋण पर नया अध्ययन : अमेरिका सबसे बड़ा लाभार्थी

AidData की नई रिपोर्ट के अनुसार, 2000 से 2023 के बीच चीन ने 2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के ऋण और अनुदान दुनिया के 80% से अधिक देशों को दिए, जिनमें अमेरिका सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बनकर उभरा। इस अवधि में चीनी सरकारी संस्थाओं ने अमेरिकी कंपनियों के लिए लगभग 200 अरब डॉलर की राशि लगभग 2,500 परियोजनाओं के लिए मंजूर की, जिनमें 95% फंडिंग सरकारी बैंकों और उद्यमों से आई।

रूस और ऑस्ट्रेलिया क्रमशः दूसरे और तीसरे बड़े लाभार्थी रहे, जबकि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों को 161 अरब डॉलर मिले। रिपोर्ट बताती है कि चीन का फोकस अब गरीब देशों की सहायता से हटकर विकसित देशों में वाणिज्यिक निवेश की ओर बढ़ गया है। 2023 में अमेरिकी कंपनियों को चीन से 19 अरब डॉलर मिले, जबकि वर्ष 2000 में यह राशि केवल 320 मिलियन डॉलर थी।

भारत ने भी इसी अवधि में 11.1 अरब डॉलर उधार लिए, जिनका बड़ा हिस्सा ऊर्जा और वित्तीय सेवाओं में लगा।

 

 (29-11-25) PIB

IIT बॉम्बे में क्वांटम अनुसंधान को नई गति, विज्ञान मंत्री ने लिक्विड हीलियम सुविधा का उद्घाटन किया

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने IIT बॉम्बे की क्वांटम अनुसंधान प्रयोगशालाओं का दौरा किया और देश की उन्नत लिक्विड हीलियम सुविधा का उद्घाटन किया। यह सुविधा भारत में क्वांटम विज्ञान, क्रायोजेनिक्स, अतिचालकता और उन्नत सामग्रियों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। अत्यंत निम्न तापमान पर कार्य करने वाली यह प्रणाली स्वदेशी डाइल्यूशन रेफ्रिजरेटर विकसित करने का मार्ग प्रशस्त करेगी, जो क्वांटम कंप्यूटिंग और मेडिकल इमेजिंग जैसे क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण है।

IIT बॉम्बे ने कई अत्याधुनिक उपकरण भी प्रदर्शित किए। इनमें भारत का पहला पोर्टेबल मैग्नेटोमीटर QMagPI शामिल है, जो अल्ट्रा-लो नैनोटेस्ला चुंबकीय क्षेत्रों को मापने में सक्षम है और रक्षा व खनन जैसे क्षेत्रों में उपयोगी होगा। संस्थान द्वारा विकसित देश का पहला क्वांटम डायमंड माइक्रोस्कोप (QDM) नैनोस्केल 3D मैग्नेटिक इमेजिंग की सुविधा देता है और AI/ML एकीकरण के साथ न्यूरोसाइंस व सेमीकंडक्टर परीक्षण को आगे बढ़ाता है। इसके अलावा स्वदेशी क्यू-कॉन्फोकल माइक्रोस्कोप को भी प्रदर्शित किया गया, जो कोशिकाओं में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों का पता लगाकर कैंसर के प्रारंभिक निदान में सहायक होगा।

भारत का राष्ट्रीय क्वांटम मिशन इन नवाचारों को रणनीतिक समर्थन देता है, जिसका लक्ष्य क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार और सेंसिंग में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है।

 

 (29-11-25) The Hindu

IAU द्वारा मंगल की विशेषताओं को भारतीय नाम देने पर चर्चा क्यों?  

अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने मंगल ग्रह की सात भू-विशेषताओं को भारतीय नाम देकर न केवल भारतीय वैज्ञानिक परंपरा का सम्मान किया है, बल्कि अंतरिक्ष अनुसंधान में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को भी मान्यता दी है। केरल के पेरियार, वर्कला, थुंबा, वलियामाला, बेकल और प्रमुख भूविज्ञानी एम.एस. कृष्णन के नामों को स्वीकृति मिलने से भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रतिष्ठित हुई हैं। IAU की यह पहल सांस्कृतिक विविधता, वैज्ञानिक योगदान और वैश्विक साझेदारी को मजबूत करती है। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम, ISRO की विरासत और देश की वैज्ञानिक पहचान को मंगल जैसी बाह्य दुनिया तक विस्तार देने का प्रतीक है।

 

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