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- (23) Weekly News Update 15 March – 21 March (Global E-waste report, Iran war update)
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- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
(3-12-25) DTE
तेजी से फैलने वाली आक्रामक प्रजातियाँ : भारत के प्राकृतिक क्षेत्र पर खतरा
भारत में आक्रामक विदेशी पौधों का बढ़ता प्रसार गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप ले रहा है। Nature Sustainability में प्रकाशित नए अध्ययन के अनुसार पश्चिमी घाट, हिमालय और उत्तर-पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इन पौधों का क्षेत्रफल बीते दो दशकों में लगभग दोगुना हो चुका है। विदेशी पौधे वे प्रजातियाँ हैं जिनका मूल स्थान भारत नहीं है और जिन्हें ऐतिहासिक रूप से अन्य देशों से सजावट, भूमि-सुधार, मिट्टी कटाव रोकने या गलती से समुद्री जहाजों, माल के साथ भारत लाया गया। भारत के पर्यावरण में इनके प्राकृतिक दुश्मन न होने के कारण ये तेज़ी से फैलते हैं और आक्रामक (Invasive) बन जाते हैं।
अध्ययन के अनुसार 2022 तक 14.4 करोड़ लोग, 27.9 लाख पशुधन और 2 लाख वर्ग किमी कृषि भूमि नए आक्रामक पौधों की चपेट में आ चुके हैं। हर साल लगभग 15,500 वर्ग किमी प्राकृतिक क्षेत्र और 70 लाख लोग इनके प्रसार से प्रभावित होते हैं। सबसे तेजी से फैलने वाली प्रजातियों में Chromolaena odorata, Lantana camara और Prosopis juliflora शामिल हैं, जो सजावटी पौधे या रेगिस्तान-नियंत्रण सामग्री के रूप में लाई गई थीं, पर अब दो-तिहाई प्राकृतिक पारिस्थितिकियों पर कब्जा कर चुकी हैं।
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आग, भूमि उपयोग परिवर्तन और चराई के दबाव ने इनके विस्तार को और तेज किया है। इन पौधों से चारा, ईंधन, मिट्टी की उर्वरता और समुदायों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ रहा है। 1960–2020 के बीच भारत को 8.3 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो चुका है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा दर पर पूरी पारिस्थितिकियाँ एक पीढ़ी में बदल सकती हैं और इसके समाधान हेतु राष्ट्रीय आक्रामक प्रजाति मिशन की तत्काल आवश्यकता है।
(5-12-25) DTE
मध्य प्रदेश के डिंडोरी में साल जंगलों पर बोरर कीट का गंभीर संकट
मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में साल (Shorea robusta) के जंगल एक बार फिर साल बोरर कीट के गंभीर प्रकोप का सामना कर रहे हैं। सोंटीराथ गांव के जंगलों में बड़ी संख्या में साल के पेड़ सूखते पाए गए हैं, जिसके बाद वन विभाग ने प्रभावित पेड़ों की पहचान कर उन्हें चिह्नित करने का काम शुरू किया है। इन चिन्हित पेड़ों को बाद में काटा जा सकता है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार, केवल तीन हेक्टेयर क्षेत्र में 3,000 से अधिक पेड़ संक्रमित पाए गए हैं, जबकि पूरे गांव में यह संख्या एक लाख तक पहुंच सकती है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस वर्ष कीट का प्रभाव पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून 2025 के दौरान हुई अत्यधिक वर्षा और बढ़ी हुई नमी ने बोरर की संख्या बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कुछ क्षेत्रों में 30 से 50 प्रतिशत तक साल के पेड़ प्रभावित हो सकते हैं।
डिंडोरी के साल वन अमरकंटक क्षेत्र से सटे हुए हैं, जहां भी संक्रमण दर्ज किया गया है। वर्ष 1995 में इसी कीट के कारण मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर साल पेड़ों की कटाई करनी पड़ी थी, जिससे भारी पारिस्थितिक और आर्थिक नुकसान हुआ था। वन विभाग वैज्ञानिक रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है और स्थिति पर निगरानी बनाए हुए है।
(7-12-25) AlJazeera
बेनिन में तख्तापलट की कोशिश नाकाम, राष्ट्रपति पैट्रिस टैलोन ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया
पश्चिमी अफ्रीकी देश बेनिन में सेना के एक गुट द्वारा किया गया तख्तापलट का प्रयास विफल हो गया है। राष्ट्रपति पैट्रिस टैलोन ने रविवार शाम राज्य टेलीविजन पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार और वफादार सशस्त्र बलों की त्वरित कार्रवाई से इस साजिश को नाकाम कर दिया गया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “यह विश्वासघात बिना सज़ा के नहीं जाएगा।”
इससे करीब 12 घंटे पहले देश की राजधानी कोटोनू(Cotonou) में गोलियों की आवाज़ें सुनी गईं और कुछ सैनिकों ने टीवी पर आकर टैलोन को सत्ता से हटाने का दावा किया। हालाँकि, सरकार समर्थक बलों ने तेजी से हालात पर नियंत्रण पा लिया। सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, करीब 13 सैनिकों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें से अधिकांश सक्रिय सेवा में थे।
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब बेनिन अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहा है, जिसके बाद टैलोन का कार्यकाल समाप्त होना है। तख्तापलट की कोशिश करने वाले सैनिकों ने उत्तरी बेनिन में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और शहीद जवानों की उपेक्षा को अपना कारण बताया।
इस घटनाक्रम की ECOWAS और अफ्रीकी संघ (AU) ने कड़ी निंदा की है और लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थन की बात कही है। विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिमी अफ्रीका में हाल के वर्षों में बढ़ते सैन्य हस्तक्षेपों की कड़ी में यह घटना एक और गंभीर चेतावनी है।
(अफ्रीका और अन्य देशों में तख्तापलट: हाल के वर्षों में अफ्रीकी देशों के साथ-साथ अफ्रीका के बाहर भी तख्तापलट और सैन्य हस्तक्षेप की घटनाएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। पश्चिम अफ्रीका में बेनिन में हालिया तख्तापलट का प्रयास नाकाम हुआ, लेकिन नाइजर, माली, बुर्किना फासो, गिनी और गिनी-बिसाऊ में सेना सत्ता पर काबिज है। इन देशों में तख्तापलट के पीछे मुख्य कारण आतंकवाद, सुरक्षा विफलता, भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट और राजनीतिक दमन बताए गए।
अफ्रीका से बाहर भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं। मिस्र में 2013 में सेना प्रमुख अब्देल फतह अल-सीसी ने राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को हटाकर सत्ता संभाली। आज मिस्र में राजनीतिक स्थिरता तो है, लेकिन लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएँ सीमित मानी जाती हैं। थाईलैंड (2014)राजनीतिक हिंसा और राजशाही-सेना गठजोड़ के कारण सेना ने निर्वाचित सरकार हटाई। देश में सीमित लोकतंत्र है और राजनीति व शासन पर सेना का प्रभाव अब भी बना हुआ है। म्यांमार (2021) में सेना के तख्तापलट के बाद देश अब भी गृहयुद्ध और आर्थिक गिरावट से जूझ रहा है। अफगानिस्तान (2021) में सत्ता परिवर्तन के बाद मानवीय और आर्थिक संकट गहरा गया है। पाकिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य तख्तापलट भले न हुआ हो, लेकिन सेना के राजनीतिक प्रभाव को लेकर विवाद बना रहता है।
हालाँकि तख्तापलट के बाद कुछ देशों में अल्पकालिक स्थिरता दिखती है, पर दीर्घकाल में न तो सुरक्षा सुधरी है और न ही आर्थिक हालात। अफ्रीका हो या एशिया, अनुभव बताता है कि सत्ता परिवर्तन के ये गैर – रास्ते अक्सर अस्थिरता और दमन को ही जन्म देते हैं।)
(7-12-25) IE
चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र की सुरक्षा ढाल क्षतिग्रस्त, IAEA ने जताई गंभीर चिंता
संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने चेतावनी दी है कि यूक्रेन के चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना स्थल पर बनी सुरक्षात्मक ढाल अब अपनी प्रमुख सुरक्षा क्षमता खो चुकी है। एजेंसी के अनुसार, फरवरी 2025 में हुए ड्रोन हमलों से “न्यू सेफ कन्फाइनमेंट (NSC)” नामक इस विशाल स्टील संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचा है।
IAEA की हालिया जांच में पाया गया कि ड्रोन हमले के कारण ढाल की बाहरी परत और छत क्षतिग्रस्त हुई, जिससे उसकी रेडियोधर्मी पदार्थों को सीमित रखने की क्षमता कमजोर हो गई है। हालाँकि, एजेंसी ने स्पष्ट किया कि संरचना के मुख्य भार-वहन हिस्सों और निगरानी प्रणालियों को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचा है। फिर भी, IAEA ने व्यापक मरम्मत और पुनर्निर्माण की सिफारिश की है।
गौरतलब है कि यह सुरक्षा ढाल 2019 में स्थापित की गई थी, ताकि 1986 की चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना से क्षतिग्रस्त रिएक्टर से निकलने वाले रेडियोधर्मी तत्वों को रोका जा सके। 1986 में हुए विस्फोट में भारी मात्रा में विकिरण यूरोप भर में फैल गया था और इसे दुनिया की सबसे भीषण परमाणु दुर्घटना माना जाता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण चेर्नोबिल की सुरक्षा एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बन गई है। IAEA के अनुसार समय रहते मरम्मत नहीं हुई तो भविष्य में परमाणु सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है।
(8-12-25) DTE
भारत में बायोस्टिमुलेंट(Biostimulants): रासायनिक उर्वरक से हरे और टिकाऊ कृषि की ओर
भारत में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक पहले कृषि में चमत्कार के रूप में देखे जाते थे। हरित क्रांति के दौरान इनका योगदान महत्वपूर्ण रहा, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई। लेकिन आज इनका अत्यधिक और अनियंत्रित इस्तेमाल पर्यावरण और किसानों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। 2023-24 में उर्वरक की खपत औसतन 139.81 किग्रा/हेक्टेयर रही, जबकि पंजाब में यह लगभग दोगुना (247.61 किग्रा/हेक्टेयर) थी। अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, किसानों की लागत बढ़ रही है और ग्रामीण स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। ऐसे में बायोस्टिमुलेंट्स को एक पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जो पौधों की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को सक्रिय कर पोषक तत्वों की दक्षता, जलवायु सहनशीलता और फसल गुणवत्ता में सुधार करते हैं।
बायोस्टिमुलेंट्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कम मात्रा में प्रभावी होते हैं और मिट्टी के जैविक संतुलन को सुदृढ़ करते हैं। समुद्री शैवाल, पौधों के अर्क, सूक्ष्मजीव, अमीनो एसिड और कृषि-अपशिष्ट से बने ये उत्पाद कार्बन उत्सर्जन को कम करने और सतत कृषि को बढ़ावा देने में सहायक माने जाते हैं।
भारत में बायोस्टिमुलेंट्स को फर्टिलाइज़र कंट्रोल ऑर्डर 1985 के तहत फरवरी 2021 में विनियमित किया गया। 132 उत्पाद अब अनुमोदित हैं, जो सब्ज़ी, अनाज, दाल, तेल बीज और फलों में उपयोग किए जाते हैं। अनुमोदन के लिए विभिन्न स्थानों पर परीक्षण, विषाक्तता जांच और रसायन विश्लेषण अनिवार्य है।
समुद्री शैवाल आधारित उत्पाद विश्व बाजार का 41% हिस्सा हैं। यह कृषि, खाद्य, पशुपालन, फार्मास्यूटिकल और उद्योग में उपयोगी हैं। भारत में वर्तमान उत्पादन 74,083 टन है, जबकि क्षमता 9.7 मिलियन टन है। सही निवेश और बुनियादी ढांचे से भारत समुद्री शैवाल और बायोस्टिमुलेंट का प्रमुख हब बन सकता है।
हालाँकि, यह मान लेना कि बायोस्टिमुलेंट्स पूरी तरह समस्या-मुक्त हैं, एक सरलीकृत दृष्टिकोण होगा। यदि यह तकनीक उम्मीद के अनुरूप परिणाम देती है, तो स्वाभाविक रूप से इसे व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे औद्योगिक स्तर के उत्पादन की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। ऐसे में कच्चे माल — जैसे समुद्री शैवाल, पौधों के अर्क और सूक्ष्मजीवों — की माँग अत्यधिक बढ़ेगी। इस माँग को पूरा करने के लिए यदि इन संसाधनों का अनियंत्रित दोहन किया गया, तो यह समुद्री पारिस्थितिकी, जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन के लिए नई समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, बड़े पैमाने पर उत्पादन में ऊर्जा उपयोग, प्रसंस्करण, परिवहन और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी गतिविधियाँ जुड़ती हैं, जो यदि सतत मानकों के अनुसार न हों, तो प्रदूषण का कारण बन सकती हैं। इसलिए बायोस्टिमुलेंट्स को “हर समस्या का समाधान” मानने के बजाय, उन्हें एक जिम्मेदार और नियोजित कृषि परिवर्तन के हिस्से के रूप में देखना आवश्यक है।
आगे की राह में आवश्यक है कि बायोस्टिमुलेंट्स के उत्पादन के लिए सस्टेनेबल हार्वेस्टिंग, सर्कुलर बायोइकोनॉमी, सख्त नियामक ढाँचे और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाया जाए। तभी यह तकनीक वास्तव में हरित, टिकाऊ और दीर्घकालिक समाधान बन सकेगी।
(9-12-25) IE
थाईलैंड–कंबोडिया सीमा तनाव में वृद्धि के बिच ऐतिहासिक विवाद
थाईलैंड की सेना ने सोमवार को कंबोडिया के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, यह जवाबी कार्रवाई थी उन हमलों के लिए जिसमें कथित रूप से दो थाई सैनिक मारे गए। हवाई हमलों में एक थाई सैनिक की मौत और आठ घायल हुए, जबकि कंबोडिया के अधिकारियों ने तीन नागरिकों के घायल होने की सूचना दी। दोनों देशों की सीमावर्ती क्षेत्रों से हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर ले जाए गए। कंबोडिया ने हमले की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया और कहा कि थाईलैंड ने यह कार्रवाई स्वेच्छा से की। यह हवाई हमला अक्टूबर 2025 में हस्ताक्षरित शांति समझौते के बावजूद हुआ, जिसे मलेशिया ने मध्यस्थता और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की निगरानी में करवाया था।
यह विवाद सदी पुराने उपनिवेशीय सीमांकन तक जाता है, जिसका केंद्र प्रेह विहेयर मंदिर(Preah Vihear temple) है। यह मंदिर 11वीं–12वीं शताब्दी में खमेर साम्राज्य द्वारा बनवाया गया था और दोनों देशों के लिए सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व रखता है। थाईलैंड ने 1941 में अस्थायी कब्ज़ा किया, और WWII के बाद इसे लौटाया। 1962 में, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने मंदिर पर कंबोडिया का अधिकार मान्यता दी। 2008 में, कंबोडिया द्वारा प्रेह विहार मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध करने की मांग के बाद तनाव बढ़ गया। अगले कई सालों तक, कंबोडियाई और थाई सैनिकों के बीच सीमा पर अक्सर झड़पें होती रहीं। 2013 में मंदिर के आसपास विसैन्यीकृत क्षेत्र (demilitarised zone) बनाया गया, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों में बार-बार सीमा झड़पें हुईं।
हालिया संघर्ष मई 2025 में शुरू हुआ, जिसमें एक कंबोडियाई सैनिक की मौत हुई, इसके बाद जुलाई में 48 लोगों की हत्या और हजारों का विस्थापन हुआ। अगस्त में थाई सैनिकों पर खदान विस्फोट हुआ, जिसे कंबोडियाई सेना द्वारा लगाए जाने का आरोप है। थाईलैंड ने कंबोडिया से भारी हथियार हटाने, खदानें साफ करने, सीमा पार अपराध रोकने और संवेदनशील क्षेत्रों का प्रबंधन करने की मांग की है।
ऐसा प्रतीत होता है कि ऐतिहासिक मतभेद, राष्ट्रवाद और रणनीतिक हित इस विवाद को और बढ़ा सकते हैं, और सीमा पर संघर्ष जारी रहने की संभावना है।
(9-12-25) DTE
दक्षिणी अफ्रीका में सार्डिन मछलियों के अत्यधिक दोहन से 60,000 से अधिक अफ्रीकी पेंगुइनों की मौत: अध्ययन
दक्षिणी अफ्रीका के तटों पर सार्डिन मछलियों के अत्यधिक शिकार (ओवरएक्सप्लॉइटेशन) के कारण 60,000 से अधिक अफ्रीकी पेंगुइनों की मौत हुई है। यह निष्कर्ष Ostrich: Journal of African Ornithology में प्रकाशित एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है। शोध के अनुसार, 2004 से 2011 के बीच लगभग 62,000 पेंगुइन, विशेष रूप से डैसन और रोबेन द्वीपों के आसपास, भोजन की कमी के कारण मारे गए।
यह अवधि सार्डिन (Sardinops sagax) आबादी में भारी गिरावट के साथ मेल खाती है, जब इनकी संख्या अपने अधिकतम स्तर से लगभग 25 प्रतिशत नीचे चली गई थी। अफ्रीकी पेंगुइन, जिन्हें 2024 में IUCN रेड लिस्ट में ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ श्रेणी में रखा गया, हर साल लगभग 21 दिनों का मोल्ट (पंख झड़ने) का चरण पूरा करते हैं। इस दौरान वे समुद्र में जाकर भोजन नहीं कर सकते और पूरी तरह पहले से जमा वसा पर निर्भर रहते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि मोल्ट से पहले पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण कई पेंगुइन आवश्यक वसा जमा नहीं कर पाए और भूख से मर गए। वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन सार्डिन के वितरण को और अस्थिर बना रहा है। शोध में मछली पकड़ने के बेहतर प्रबंधन और पेंगुइन के भोजन क्षेत्रों में सार्डिन भंडार की दीर्घकालिक बहाली को प्रजाति के अस्तित्व के लिए अनिवार्य बताया गया है।
(9-12-25) IE
इज़राइल द्वारा गाज़ा में ‘येलो लाइन’ को नई सुरक्षा सीमा घोषित करने के संकेत
इज़राइल के सैन्य प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल इयाल ज़मीर ने ग़ाज़ा पट्टी में इज़राइली नियंत्रण रेखा, जिसे “येलो लाइन” कहा जा रहा है, को एक “नया सीमा क्षेत्र” बताया है। उत्तरी ग़ाज़ा में सैनिकों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि यह रेखा इज़राइली समुदायों की सुरक्षा के लिए एक अग्रिम रक्षा पंक्ति के रूप में काम करेगी। उनके अनुसार, इज़राइल का ग़ाज़ा के बड़े हिस्सों पर परिचालन नियंत्रण है और वह इन रक्षा रेखाओं पर बना रहेगा।
वर्तमान में इज़राइल ग़ाज़ा के आधे से अधिक क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है। हालाँकि, अमेरिका की मध्यस्थता से बने युद्धविराम समझौते के तहत, पहले चरण के बाद इज़राइल को लगभग पूरे ग़ाज़ा से पीछे हटना था, सिवाय सीमा से लगे एक छोटे बफ़र ज़ोन के। यदि इज़राइल “येलो लाइन” पर अड़ा रहता है, तो वह ग़ाज़ा की अधिकांश कृषि भूमि और मिस्र से लगने वाले सीमा पार मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखेगा।
यह स्थिति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 20-सूत्रीय युद्धविराम योजना के दूसरे चरण को जटिल बना सकती है, जिसमें निरस्त्रीकृत ग़ाज़ा का पुनर्निर्माण, अंतरराष्ट्रीय निगरानी और फिलिस्तीनी राज्य की संभावित राह शामिल है। इज़राइली सरकार ने ज़मीर के बयान को औपचारिक नीति के रूप में स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया है, लेकिन यह संकेत देता है कि आगे की वापसी पर इज़राइल का रुख सख्त हो सकता है।
(10-12-25) DDN
भारत की परमाणु ऊर्जा उत्पादन में नया रिकॉर्ड
वित्त वर्ष 2024–25 में भारत की परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता ने नया कीर्तिमान बनाया है। परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अनुसार, न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) ने 56,681 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया, जो अब तक का सर्वाधिक वार्षिक उत्पादन है। इससे लगभग 4.9 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सका।
इस दौरान नए रिएक्टर प्रोजेक्ट्स, कैंसर उपचार सेवाओं का विस्तार, उन्नत तकनीकी अनुसंधान और रणनीतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। राजस्थान में माही बांसवाड़ा परमाणु परियोजना की आधारशिला रखी गई, जबकि काकरापार और रावतभाटा परियोजनाओं ने संचालन में अहम उपलब्धियाँ दर्ज कीं।
(10-12-25) DTE
ग्रेट बैरियर रीफ में जलवायु संकट: 75% गोनियोपोरा कोरल नष्ट
ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ में स्थित वन ट्री रीफ (One Tree Reef) पर अत्यधिक समुद्री तापमान और एक दुर्लभ कोरल बीमारी के संयुक्त प्रभाव से गोनियोपोरा (फ्लावरपॉट) कोरल की लगभग 75 प्रतिशत कॉलोनियाँ नष्ट हो गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह घटना वैश्विक स्तर पर जारी चौथी सामूहिक कोरल ब्लीचिंग की गंभीरता को दर्शाती है।
अध्ययन के मुताबिक, दिसंबर 2023 से फरवरी 2025 के बीच समुद्री तापमान लगातार 28°C से ऊपर रहा, जिससे तीव्र ब्लीचिंग (अत्यधिक समुद्री तापमान जैसे तनाव के कारण कोरल अपने भीतर रहने वाले शैवाल को बाहर निकाल देते हैं, जिससे उनका रंग सफेद हो जाता है और वे कमजोर होकर मरने के खतरे में आ जाते हैं) हुई। इसके बाद ब्लैक बैंड डिज़ीज़ नामक आक्रामक बैक्टीरियल संक्रमण फैला, जिसने कमजोर हो चुके कोरल ऊतकों को तेजी से नष्ट किया। यह बीमारी आमतौर पर कैरेबियन क्षेत्र में पाई जाती है और दक्षिणी ग्रेट बैरियर रीफ में दुर्लभ मानी जाती थी।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती समुद्री हीटवेव्स कोरल पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक सहनशीलता को खत्म कर रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्सर्जन में त्वरित और वैश्विक कटौती के बिना कोरल रीफ्स का भविष्य गंभीर खतरे में है।
(12-12-25) ET
मेक्सिको ने भारत सहित गैर-FTA देशों से आयात पर 50% तक शुल्क बढ़ाया
मेक्सिको ने गुरुवार को घोषणा की कि वह अपने गैर-प्राथमिक व्यापार साझेदार देशों से होने वाले आयात पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाएगा। यह निर्णय 1 जनवरी 2026 से लागू होगा और भारत, चीन, ब्राज़ील सहित उन देशों को प्रभावित करेगा जिनके साथ मेक्सिको का कोई मुक्त व्यापार समझौता (FTA) नहीं है। इस कदम से भारत के लगभग 5.75 अरब डॉलर के वार्षिक निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। मेक्सिको की संसद ने इस संबंध में विधेयक को मंजूरी दे दी है। बढ़े हुए शुल्क इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटोमोबाइल और धातुओं जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर लागू होंगे।
मेक्सिको सरकार का तर्क है कि यह निर्णय घरेलू उद्योग को संरक्षण देने, स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने और US-Mexico-Canada Agreement (USMCA) के तहत क्षेत्रीय उत्पादन को मजबूत करने के लिए लिया गया है।
इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद (EEPC) ने चिंता जताते हुए कहा है कि मेक्सिको भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण बाज़ार है। उद्योग जगत ने भारत सरकार से मेक्सिको के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत तेज़ करने की मांग की है।
(12-12-25) PIB
भारत–इटली व्यवसाय मंच 2025
मुंबई में आयोजित भारत–इटली व्यवसाय मंच 2025 ने रणनीतिक साझेदारी के तहत द्विपक्षीय व्यापार, नवाचार और उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग को नई गति दी। इस अवसर पर 22वें भारत–इटली संयुक्त आर्थिक आयोग (JCEC) के सहमत कार्यवृत्त पर हस्ताक्षर किए गए, जो भविष्य के आर्थिक सहयोग का स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करते हैं। साथ ही, इटली–भारत संयुक्त रणनीतिक कार्ययोजना 2025–2029 के माध्यम से AI, साइबर सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, दूरसंचार और जैव प्रौद्योगिकी में सहयोग को बढ़ावा दिया गया। इटली, भारत का EU में चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जहाँ 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 13.76 अरब डॉलर तक पहुँचा।
(5-12-25) TH
क्या गूगल का क्वांटम इकोज़ Q-डे को करीब ला रहा है?
गूगल ने क्वांटम कंप्यूटिंग में एक बड़ी वैज्ञानिक प्रगति की है, जिसे “क्वांटम इकोज़” कहा जाता है। यह एक ऐसा प्रयोग है जो यह समझने में मदद करता है कि क्वांटम जानकारी एक जटिल और उलझे हुए सिस्टम में कैसे फैलती है और फिर कैसे वापस लौटती है। यह प्रयोग गूगल के 65-क्यूबिट Willow क्वांटम प्रोसेसर पर किया गया। वैज्ञानिकों ने इसके लिए OTOC (Out-of-Time-Order Correlator) नामक तकनीक का उपयोग किया, जिसमें सिस्टम को हल्का-सा धक्का दिया जाता है, फिर उसे उल्टा चलाकर देखा जाता है कि जानकारी किस हद तक वापस “इको” की तरह लौट सकती है।
इस सफलता ने Q-डे पर वैश्विक चर्चा को फिर तेज कर दिया है—वह दिन जब क्वांटम कंप्यूटर इतने शक्तिशाली हो जाएंगे कि वे आज के पब्लिक-की एन्क्रिप्शन (जैसे RSA-2048) को तोड़ सकेंगे। खतरा यह है कि दुश्मन अभी डेटा चुरा ले और भविष्य में क्वांटम कंप्यूटर आने पर उसे डिक्रिप्ट कर ले—इसे “अभी संग्रह करें, बाद में डिक्रिप्ट करें” जोखिम कहा जाता है।
RSA-2048 को तोड़ने के लिए क्वांटम कंप्यूटर शोर एल्गोरिदम का उपयोग करेंगे, जो बड़े संख्याओं को अत्यंत तेज गति से फैक्टर कर सकते हैं। लेकिन अभी तकनीक बहुत पीछे है—एक RSA-2048 को तोड़ने के लिए लगभग 2 करोड़ भौतिक क्यूबिट चाहिए, जबकि आज के प्रोसेसर में केवल सौ के आसपास नॉइज़ी क्यूबिट हैं। फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटर बनने में अभी 5–8 वर्ष लग सकते हैं।
इस खतरे को देखते हुए NIST (National Institute of Standards and Technology) ने नए पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) मानक जारी किए हैं, जैसे Kyber और Dilithium। भारत में RBI ने संस्थानों को जल्दी क्वांटम-सुरक्षित सिस्टम अपनाने की सलाह दी है, हालाँकि अभी अधिकांश नेटवर्क तैयार नहीं हैं।
(RSA-2048 एक पब्लिक-की एन्क्रिप्शन सिस्टम है जो इंटरनेट पर बैंकिंग, लॉग-इन और सुरक्षित संचार की रक्षा करता है। यह दो बहुत बड़े प्राइम नंबरों के गुणन पर आधारित है, जिन्हें तोड़ना सामान्य कंप्यूटरों के लिए असंभव है। भविष्य में क्वांटम कंप्यूटर शोर एल्गोरिदम से इसे तोड़ सकते हैं।)
(जब क्वांटम कंप्यूटर इंटरनेट की सुरक्षा को भेदने लायक बन जाएंगे, उसे Q-Day कहा जाता है)
(13-12-25) ET
भारत को बाहर रखते हुए अमेरिका ने ‘पैक्स सिलिका’ रणनीतिक पहल शुरू की
अमेरिका के नेतृत्व में शुरू की गई नई रणनीतिक पहल ‘पैक्स सिलिका’ में भारत को शामिल नहीं किया गया है। इस पहल का उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा इनपुट, उन्नत विनिर्माण, सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब भारत–अमेरिका व्यापार समझौता अब तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है।
अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, पैक्स सिलिका के पहले शिखर सम्मेलन में जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड, ब्रिटेन, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। ये देश AI और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला में अग्रणी माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास सेमीकंडक्टर डिज़ाइन और क्वार्ट्ज जैसे संसाधन तो हैं, लेकिन उच्च-स्तरीय प्रोसेसिंग क्षमता की कमी के कारण उसे फिलहाल बाहर रखा गया है। हालांकि, पूर्व की तरह भारत भविष्य में इस पहल से जुड़ सकता है।
“यह त्रुटिकारी मनुष्यजाति सदा ही अपने परिवेश को शासन तथा समाज की मशीनरी से पूर्ण बनाने की कल्पना करती है; परन्तु केवल अंतःस्थ आत्मा की पूर्णता के द्वारा ही बाह्य परिवेश को पूर्ण बनाया जा सकता है। जो कुछ तुम भीतर हो, उसी का तुम बाहर आस्वादन कर सकते हो; कोई भी मशीनरी तुम्हें तुम्हारी सत्ता के विधान से नहीं बचा सकती।”
… श्रीअरविन्द (CWSA 12: 468)

