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- (23) Weekly News Update 15 March – 21 March (Global E-waste report, Iran war update)
- (24) Weekly News Update 22 March – 5 April (Water Crisis | Iran War | Russia–Ukraine War)
- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
(4 Dec – 10 Jan) euro news, reuters, bbc
आर्थिक संकट के बीच ईरान में बढ़ता विरोध, हिंसा और इंटरनेट शटडाउन
ईरान में आर्थिक तंगी के कारण शुरू हुआ सरकार-विरोधी आंदोलन अब तेज़ी से व्यापक रूप लेता जा रहा है। 28 दिसंबर को सैकड़ों दुकानदारों और कारोबारियों द्वारा शुरू किए गए इस विरोध में धीरे-धीरे युवा और कॉलेज के छात्र भी शामिल होते चले गए। हालांकि 2022 के आंदोलनों की तुलना में इस बार महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम देखी जा रही है।अब तक यह आंदोलन ईरान के 31 में से 24 प्रांतों के 80 से अधिक ज़िलों में फैल चुका है। कई स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए हैं, जिससे जान-माल की क्षति बढ़ी है। हालात को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने देशभर में व्यापक इंटरनेट पाबंदी लागू कर दी है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया को ईरान के भीतर स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग की अनुमति नहीं दी गई है, जिससे ज़मीनी स्थिति की पुष्टि कठिन हो गई है।
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने प्रदर्शनों पर “बहुत निर्णायक कार्रवाई” की घोषणा की है। परिषद का दावा है कि ये प्रदर्शन “वैध सार्वजनिक मांगों से भटक गए हैं” और इन्हें अमेरिका व इज़राइल के “मार्गदर्शन और योजना” के तहत अस्थिरता फैलाने के लिए उकसाया जा रहा है। सरकार इसी आधार पर इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मान रही है। इस रुख के बाद प्रदर्शनकारियों को असंतुष्ट नागरिकों के बजाय दुश्मन तत्व के रूप में देखा जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप कई इलाकों में गोलीबारी, सामूहिक गिरफ्तारियाँ और मौतों की खबरें सामने आई हैं। अस्पतालों में घायलों की बढ़ती संख्या से स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ रहा है। इसी बीच कुछ प्रदर्शनों में ईरान के अंतिम शाह के पुत्र रज़ा पहलवी के समर्थन में नारे सुनाई दिए हैं, जो हाल के वर्षों के आंदोलनों से अलग स्वर को दर्शाते हैं। दूसरी ओर, सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने स्पष्ट किया है कि शासन किसी भी दबाव में पीछे नहीं हटेगा और उन्होंने प्रदर्शनों को विदेशी हितों से प्रेरित “दंगे” बताया है। ट्रंप ने कहा है कि उनका प्रशासन ईरान की स्थिति पर नज़र रखे हुए है, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका ज़मीनी सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेगा। इंटरनेट बंदी के कारण सूचनाएँ सीमित हैं, लेकिन देश में गंभीर तनाव की स्थिति बनी हुई है।
(6 Jan) IE
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका का दबाव, लैटिन अमेरिका में बढ़ता तनाव
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ट्रम्प ने कोलंबिया और मेक्सिको को चेतावनी दी कि यदि अमेरिका में अवैध मादक पदार्थों की आपूर्ति पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वेनेज़ुएला का सहयोगी क्यूबा गंभीर आर्थिक दबाव में है।
इन घटनाओं को केवल मुनरो सिद्धांत तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे वैचारिक टकराव, मादक पदार्थ तस्करी, अवैध आव्रजन और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन जैसे तत्व भी जुड़े हैं। स्पेन, ब्राज़ील, चिली, कोलंबिया, मेक्सिको और उरुग्वे ने संयुक्त बयान जारी कर अमेरिकी कदमों को क्षेत्रीय शांति और नागरिक सुरक्षा के लिए ख़तरनाक बताया। कोलंबिया, जो लंबे समय से अमेरिका का प्रमुख सुरक्षा और व्यापारिक साझेदार रहा है, मादक पदार्थ उत्पादन को लेकर दबाव में है। वामपंथी राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के संबंधों में खटास बढ़ी है। वहीं, मेक्सिको के साथ अमेरिका के गहरे व्यापारिक संबंध होने के बावजूद सीमा पार अवैध आव्रजन और नशीले पदार्थों की तस्करी लगातार विवाद का विषय बनी हुई है। क्यूबा पहले से ही आर्थिक प्रतिबंधों और मंदी से जूझ रहा है। वेनेज़ुएला की स्थिति में बदलाव का सीधा प्रभाव क्यूबा की ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
(मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine)
- 1823 में अमेरिका के राष्ट्रपति जेम्स मुनरो द्वारा घोषित किया गया।
- इसका मूल उद्देश्य अमेरिकी महाद्वीपों को यूरोपीय शक्तियों के नए उपनिवेशी विस्तार से बचाना था।
- सिद्धांत के अनुसार पश्चिमी गोलार्ध में किसी भी यूरोपीय हस्तक्षेप को अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानेगा।
- अमेरिका यूरोप के आंतरिक मामलों और युद्धों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
- इस नीति का लक्ष्य लैटिन अमेरिकी देशों की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना।)
(4 Dec – 10 Jan) The guardian, reuters, aljazeera
वेनेज़ुएला में नया नेतृत्व, आंतरिक अस्थिरता और अमेरिका की तेल-केंद्रित रणनीति
वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन के बाद 5 जनवरी को उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। राजधानी कराकास सहित कई क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है तथा समाचार माध्यमों की गतिविधियों पर नियंत्रण जारी है।
इसी दौरान न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की पेशी हुई, जहाँ उन्होंने मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े आरोपों से स्वयं को निर्दोष बताया और पूरे मुकदमे को राजनीतिक साजिश करार दिया।
ट्रंप ने वेनेज़ुएला के नए नेतृत्व को चेतावनी दी है कि सहयोग न होने की स्थिति में अमेरिका और कठोर कदम उठा सकता है। 10 जनवरी को अमेरिकी प्रशासन ने एक आदेश जारी कर वेनेज़ुएला के तेल से होने वाली आय को अमेरिकी खातों में सुरक्षित रखने का निर्णय लिया। इसी क्रम में व्हाइट हाउस में अमेरिकी तेल कंपनियों के साथ बैठक हुई। इस बैठक में कुछ कंपनियों ने वेनेज़ुएला को फिलहाल निवेश के लिए अनुपयुक्त बताया, जबकि अन्य कंपनियों ने परिस्थितियाँ स्पष्ट होने पर तेल उत्पादन बढ़ाने की संभावना जताई।
देश के भीतर विपक्ष की प्रमुख नेता मारिया कोरिना मचाडो ने नए नेतृत्व को अवैध बताते हुए स्वतंत्र चुनाव कराने और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने के प्रयास तेज़ कर दिए हैं। नए नेतृत्व, सक्रिय विपक्ष और अमेरिकी दबाव के बीच वेनेज़ुएला का राजनीतिक भविष्य फिलहाल अनिश्चित बना हुआ है।
(4 Dec – 10 Jan) The guardian, reuters, Euro News,
ग्रीनलैंड पर बढ़ता दबाव: रणनीति, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
डेनमार्क और उसके स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय तनाव तेज़ हो गया है। 1979 से ग्रीनलैंड धीरे-धीरे डेनमार्क से अधिक स्वायत्तता और अंततः स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ रहा है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने इस मुद्दे को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला दिया है। यूरोपीय देशों ने डेनमार्क के समर्थन में एकजुटता दिखाई है, लेकिन संकट ने एक जटिल सच्चाई भी उजागर की है—डेनमार्क ऐसे क्षेत्र की रक्षा कर रहा है, जिसकी आबादी स्वतंत्रता चाहती है।
शुक्रवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कुछ नहीं करता, तो रूस या चीन वहां कब्जा कर सकते हैं। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया और कहा कि यह “अच्छे तरीके से” नहीं हुआ तो “कठिन तरीके से” किया जाएगा। ये बयान व्हाइट हाउस में ऊर्जा क्षेत्र और तेल कंपनियों के साथ बैठक के दौरान आए, जहां आर्कटिक क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति पर भी चर्चा हुई। ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिया है कि सैन्य विकल्प भी खुले हैं और विभिन्न साधनों पर विचार किया जा रहा है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने इन बयानों को सख्ती से खारिज करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कोई अधिकार नहीं है और ऐसा कोई कदम नाटो गठबंधन के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ग्रीनलैंड के राजनीतिक दलों और श्रमिक संघों ने संयुक्त बयान में स्पष्ट किया कि वे “बेचने योग्य नहीं हैं” और ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला केवल स्थानीय लोग और डेनमार्क ही कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप के दबाव ने ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है। यह विवाद आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति को भी उजागर करता है।
(8 Jan) The Hindu
ऊर्जा मुद्दे पर भारत पर अमेरिकी दबाव, रूसी तेल और सौर गठबंधन से जुड़े फैसले
ट्रंप के हालिया फैसलों से भारत पर ऊर्जा को लेकर दोहरा दबाव बना है। एक ओर ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर “500 प्रतिशत तक आयात शुल्क” लगाने वाले विधेयक को समर्थन दिया है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने भारत के नेतृत्व वाले International Solar Alliance से हटने का निर्णय लिया है।
यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब अमेरिका के नामित राजदूत सर्जियो गोर इस सप्ताह दिल्ली पहुंचने वाले हैं। गोर पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत द्वारा रूसी तेल आयात समाप्त कराना उनकी प्राथमिकता होगी। इस बीच पेरिस में पोलैंड के विदेश मंत्री ने भारत द्वारा रूसी तेल आयात में कमी पर संतोष जताया, जिसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खंडित नहीं किया। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा कि रूस प्रतिबंध विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है और इसे जल्द संसद में लाया जा सकता है। इस विधेयक के तहत भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों पर कड़े शुल्क लगाए जा सकते हैं।
इसी दबाव के बीच रिलायंस ने दिसंबर और जनवरी में रूसी तेल की कोई खेप न मिलने की पुष्टि की है। इससे संकेत मिलता है कि भारत पहले ही आयात घटा रहा है। वहीं, अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से बाहर होना बहुपक्षीय सहयोग और जलवायु प्रयासों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
(10 Jan) EN
रूस-यूक्रेन युद्ध की नवीनतम जानकारी
यूक्रेन ने रूस द्वारा ओरेश्निक नामक हाइपरसोनिक मिसाइल के उपयोग को नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमला बताते हुए युद्ध अपराध के रूप में जांच शुरू की है। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने इस हमले को “उकसाने वाला और अस्वीकार्य” करार दिया है। शुक्रवार रात रूस ने पश्चिमी यूक्रेन के ल्वीव क्षेत्र में महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाते हुए ओरेश्निक मिसाइल दागी, जो यूरोपीय संघ और नाटो सीमा के क़रीब है।
यूक्रेन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और यूक्रेन-नाटो परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की। रूस ने मिसाइल उपयोग की पुष्टि करते हुए दावा किया कि यह कार्रवाई यूक्रेन द्वारा रूसी राष्ट्रपति के निवास पर कथित हमले के जवाब में थी, जिसे यूक्रेन और अमेरिका दोनों ने खारिज किया है। इसी दौरान कीव पर हुए बड़े मिसाइल-ड्रोन हमले में चार लोगों की मौत हुई और लगभग आधा शहर कड़ाके की ठंड में बिना हीटिंग के रह गया।