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- (22) News Update 8 March – 14 March (Nepal Election 2026)
- (23) Weekly News Update 15 March – 21 March (Global E-waste report, Iran war update)
- (24) Weekly News Update 22 March – 5 April (Water Crisis | Iran War | Russia–Ukraine War)
- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
(9 Feb) Reuters
AI और चिकित्सा: सुविधा, भ्रम और मानवीय विवेक
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग लगभग हर क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य कार्यों को अधिक सटीक बनाना, सही मूल्यांकन करना और जीवन को आसान एवं सुगम बनाना है। चिकित्सा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। विशेषकर मेडिसिन में लोग सलाह लेने के लिए AI का उपयोग करने लगे हैं।
बाजार में ऐसे बहुत से AI चैटबॉट और AI आधारित मेडिकल ऐप्स उपलब्ध हैं। इनमें से कई स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि वे केवल स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और समझ प्रदान करने के लिए हैं, न कि किसी बीमारी का निदान करने के लिए। फिर भी, कुछ ऐप इस सीमा को पार करते दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, “Eureka Health: AI Doctor” नामक एक ऐप स्वयं को “आपका ऑल-इन-वन पर्सनल हेल्थ साथी” बताता है। ऐप स्टोर पर यह दावा किया गया कि यह केवल जानकारी देने के लिए है, लेकिन अन्य प्रचार माध्यमों में इसे “अपना डॉक्टर खुद बनें” जैसे संदेशों के साथ प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार के विरोधाभासी दावे चिंता का विषय हैं।
ऐसे कई मामले सामने आए हैं जो AI आधारित चिकित्सा सलाह की सीमाओं और खतरों को उजागर करते हैं। तुर्की के अंकारा में एक 18 वर्षीय युवक के बाएँ पैर में कैंसरयुक्त ट्यूमर पाया गया। परिवार ने ChatGPT से सलाह ली, जिसने उसके जीवन की अवधि बहुत सीमित (लगभग 5 वर्ष) बताई। इससे परिवार में भय फैल गया। बाद में सर्जरी द्वारा ट्यूमर हटा दिया गया और युवक लगभग पूर्णतः स्वस्थ हो गया। कुछ समय बाद जब उसे खाँसी हुई, तो AI से पूछने पर फेफड़ों में कैंसर फैलने की आशंका बताई गई। जाँच में यह गलत निकला; खाँसी का कारण हाल ही में शुरू किया गया धूम्रपान था।
इसी प्रकार “AI Dermatologist: Skin Scanner” नामक ऐप दावा करता है कि उसकी सटीकता एक पेशेवर त्वचा रोग विशेषज्ञ के समान है। एक उपयोगकर्ता ने अपने हाथ के तिल की तस्वीर अपलोड की, तो ऐप ने 75–95% कैंसर का जोखिम बताया। डॉक्टर से परामर्श करने पर यह निष्कर्ष गलत साबित हुआ। एक अन्य मामले में मेलानोमा (गंभीर त्वचा कैंसर) को ऐप ने शुरुआती या साधारण बताकर उसकी गंभीरता को कम करके आँका।
इन मामलों की शिकायत किए जाने पर डेवलपरों को अपने बचाव में यह कहते पाया गया कि यह निदान नहीं, बल्कि केवल प्रारंभिक विश्लेषण प्रदान करता है और उपयोगकर्ताओं को डॉक्टर से मिलने के लिए प्रेरित करता है। फिर भी, ऐसे अनेक उदाहरण दर्शाते हैं कि AI चैटबॉट और AI-आधारित मेडिकल ऐप्स कभी-कभी मरीजों की सहायता करने के बजाय भय, भ्रम और गलत निर्णय उत्पन्न कर सकते हैं विशेष रूप से तब, जब लोग डॉक्टर के स्थान पर AI पर निर्भर होने लगते हैं।
किंतु इस समस्या की जड़ केवल तकनीक में नहीं, बल्कि मानवीय प्रवृत्तियों में भी निहित है। जब तक व्यक्ति की सोच, समझ और कर्म की प्रेरक शक्ति नाम, यश, धन और व्यक्तिगत लाभ तक सीमित रहेगी, तब तक उसके द्वारा निर्मित तकनीक चाहे वह AI ही क्यों न हो पूर्णतः विश्वसनीय और कल्याणकारी नहीं बन सकेगी। दुर्भाग्य से यह प्रवृत्ति आज व्यापक रूप से दिखाई देती है।
(9 Feb) Reuters
AI मेडिकल डिवाइस: सुविधा या नए खतरे?
AI के दौर में विभिन्न प्रयोगों में से एक महत्वपूर्ण प्रयोग चिकित्सा उपकरणों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) को जोड़कर इलाज को आसान और अधिक सटीक बनाने का प्रयास है। लेकिन इलाज आसान होने के बजाय कुछ नए खतरे भी सामने आने लगे हैं।
Johnson & Johnson की TruDi Navigation System एक सर्जिकल मशीन है, जो साइनस सर्जरी के दौरान डॉक्टर को यह बताती है कि उपकरण मरीज के सिर के अंदर किस स्थान पर हैं। वर्ष 2021 में इसमें AI / Machine Learning जोड़ा गया और दावा किया गया कि इससे सर्जरी और अधिक सुरक्षित तथा सटीक हो जाएगी।
किन्तु रिपोर्टों के अनुसार, AI जोड़ने के बाद 100 से अधिक खराबी और दुर्घटना संबंधी शिकायतें सामने आईं तथा कम से कम 10 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इन घटनाओं में मस्तिष्क से तरल का नाक से बहना, खोपड़ी के आधार में छेद होना और दो मरीजों को स्ट्रोक आना जैसी गंभीर स्थितियाँ शामिल हैं। इसके विपरीत, AI जोड़े जाने से पहले केवल 7 खराबी और 1 चोट का मामला सामने आया था।
कुछ मामलों में मशीन ने डॉक्टरों को उपकरण की गलत स्थिति बताई। डॉक्टरों को लगा कि उपकरण सुरक्षित स्थान पर है, जबकि वास्तविकता में कैरोटिड आर्टरी को क्षति पहुँची, रक्त का थक्का बना और मरीज को स्ट्रोक का सामना करना पड़ा। पीड़ितों ने इसके खिलाफ मुकदमे दायर किए हैं, जबकि कंपनियाँ यह कहती हैं कि AI और चोटों के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध सिद्ध नहीं हुआ है। मामले अभी न्यायालय में विचाराधीन हैं।
इन घटनाओं ने नियामक संस्था FDA (अमेरिकी दवा एवं उपकरण नियामक) की क्षमता पर भी प्रश्न उठाए हैं। AI युक्त मेडिकल उपकरण बहुत तेजी से बाजार में आ रहे हैं; 2022 के बाद इनकी संख्या दोगुनी हो गई है और FDA अब तक 1,357 AI मेडिकल डिवाइस को मंजूरी दे चुका है। लेकिन जैसे-जैसे उपकरणों की संख्या बढ़ रही है, खराबी और रिकॉल के मामले भी बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 60 AI उपकरणों को 182 बार रिकॉल किया गया, जिनमें से 43% को एक वर्ष के भीतर वापस बुलाना पड़ा। यह दर सामान्य उपकरणों की तुलना में लगभग दोगुनी है।
कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि डेवलपर उपकरणों को पूर्ण मानकों के अनुसार परखने के बजाय उन्हें शीघ्र बाजार में उतारने की प्रतिस्पर्धा में लगे हैं। इसके अतिरिक्त, FDA के संसाधनों और विशेषज्ञ कर्मियों में कमी के कारण समीक्षा प्रक्रिया पर दबाव बढ़ा है, जिससे त्रुटियों के छूट जाने की संभावना भी बढ़ सकती है।
एक अन्य चिंता यह है कि जहाँ नई दवाओं पर व्यापक क्लिनिकल ट्रायल आवश्यक होते हैं, वहीं अनेक AI उपकरणों को पुराने, बिना-AI उपकरणों के “अपग्रेड” के रूप में प्रस्तुत कर मंजूरी प्राप्त कर ली जाती है। यह प्रक्रिया नई तकनीक से जुड़े जोखिमों का पर्याप्त आकलन नहीं कर पाती।
अन्य उदाहरणों में AI सहायित हार्ट मॉनिटर द्वारा धड़कन की गड़बड़ी को पहचानने में विफलता तथा अल्ट्रासाउंड AI द्वारा भ्रूण के अंगों की गलत पहचान जैसी घटनाएँ सामने आई हैं। कई बार कंपनियाँ इन घटनाओं को “यूज़र की गलती” या “कोई नुकसान नहीं हुआ” कहकर टालने का प्रयास करती हैं।
(8 – 14 Feb) Various Source
इस सप्ताह मध्य पूर्व: कूटनीति, सैन्य गतिविधियाँ और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा
पिछले कुछ दिनों में मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों में कूटनीतिक गतिविधियाँ, सैन्य तैयारियाँ और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएँ प्रमुख रहीं। गाज़ा युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रयास तेज होते दिखाई दे रहे हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, गाज़ा से संबंधित “Board of Peace” की एक बहुपक्षीय बैठक में कम से कम 20 देशों के भाग लेने की संभावना है। रिपोर्टों के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रम्प गाज़ा के लिए बहु-अरब डॉलर के फंड की घोषणा की तैयारी कर रहे हैं, जबकि क्षेत्र में स्थिरीकरण बल (stabilization force) के लिए सैनिक योगदान का खाका भी सामने आ सकता है। यह पहल युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था को स्थापित करने के प्रयासों का हिस्सा मानी जा रही है।
इसी बीच, डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को उनके भ्रष्टाचार मामलों में माफी (pardon) मिलनी चाहिए। नेतन्याहू पर 2019 में रिश्वत, धोखाधड़ी और विश्वासघात (bribery, fraud, breach of trust) के आरोप लगे थे। वे इज़राइल के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पद पर रहते हुए आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं, हालांकि वे इन आरोपों से इनकार करते हैं। इज़राइल के कानून के अनुसार, दोषसिद्धि की स्थिति में राष्ट्रपति के पास माफी देने का अधिकार होता है।
सैन्य मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिकी सेना ने अल-तनफ़ बेस खाली कर दिया, जिसके बाद इस रणनीतिक अड्डे का नियंत्रण सीरियाई सरकारी बलों ने संभाल लिया। अमेरिकी सैनिकों को जॉर्डन स्थानांतरित किया गया है। अल-तनफ़ बेस सीरिया, जॉर्डन और इराक की सीमा के मिलन-बिंदु (tri-border) पर स्थित एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना रहा है। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखेगा और ISIS के खतरे पर नजर रखेगा। यह निर्णय क्षेत्रीय सुरक्षा और शक्ति संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
खाड़ी क्षेत्र में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में संघर्षों और गठबंधनों को प्रभावित कर रही है। अफ्रीकी देश इस प्रतिस्पर्धा में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन बाहरी शक्तियों की होड़ से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिकी प्रशासन ने यमन के नागरिकों के लिए दिया गया Temporary Protected Status (TPS) समाप्त करने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि यमन अब TPS के कानूनी मानकों को पूरा नहीं करता और यह अमेरिकी “राष्ट्रीय हित” के अनुरूप नहीं है। इस निर्णय से प्रभावित यमनी नागरिकों को अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है या उन्हें कोई अन्य वैध आप्रवासन स्थिति प्राप्त करनी होगी। यह कदम ट्रम्प प्रशासन की सख्त आप्रवासन नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
ईरान को लेकर भी स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। ओमान की मध्यस्थता में जेनेवा में परमाणु समझौते पर बातचीत की कोशिशें जारी हैं, हालांकि अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। ईरान अमेरिकी मांगों के विपरीत केवल परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा तक सीमित रहने और मिसाइल मुद्दे को इसमें शामिल न करने पर जोर दे रहा है। अमेरिका इस बीच कूटनीति और सैन्य दबाव दोनों का सहारा ले रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, दूसरा अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर भी क्षेत्र की ओर भेजा गया है।
अमेरिकी सैन्य विभाग संभावित रूप से कई सप्ताह तक चलने वाले अभियान की तैयारी कर रहा है, जिसमें हवाई और नौसैनिक हमले शामिल हो सकते हैं। जमीनी सैनिक भेजे जाने की संभावना कम बताई जा रही है। दूसरी ओर, ईरान के पास बड़ी मिसाइल क्षमता है और वह संभावित जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार बताया जा रहा है। वॉशिंगटन में ट्रम्प से मुलाकात के दौरान नेतन्याहू ने कहा कि यदि कोई समझौता होता है, तो उसमें इज़राइल की सुरक्षा से जुड़े अहम तत्व शामिल होने चाहिए। निर्वासित ईरानी विपक्षी नेता रज़ा पहलवी ने अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन करते हुए कहा है कि इससे ईरान में जानें बचाई जा सकती हैं और शासन परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो सकती है। उन्होंने ट्रम्प प्रशासन से तेहरान के साथ लंबी वार्ताओं में समय न गंवाने की अपील की है।
(11 Feb) The HIndu
जलवायु परिवर्तन से बदल रहे हैं प्रकृति के रंग: समुद्र हरे, जंगल भूरे, जीवों के रंग में बदलाव
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के प्राकृतिक रंग तेजी से बदल रहे हैं। महासागर हरे हो रहे हैं, जंगल समय से पहले भूरे पड़ रहे हैं और कई जीव-जंतु अपने रंग बदल रहे हैं। रंग जीवों के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और वे उन्हें शिकारी से बचने, साथी आकर्षित करने और तापमान नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
बढ़ते तापमान के कारण कई कीट और अन्य प्रजातियाँ हल्के रंग की होती जा रही हैं, जिससे वे अधिक गर्मी से बच सकें। दूसरी ओर, वनों की कटाई जैसे मानव हस्तक्षेप से तितलियाँ अपने चमकीले रंग खो रही हैं, जिससे उन्हें छिपने में मदद मिलती है, लेकिन प्रजनन प्रभावित हो सकता है।
शहरीकरण और प्रदूषण भी वन्य जीवों के रंग बदल रहे हैं; शहरों में पक्षी अधिक गहरे और फीके पाए गए हैं। पौधों में भी पिगमेंट परिवर्तन देखे जा रहे हैं, जिससे परागण करने वाले जीवों को आकर्षित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
महासागरों का हरा होना शैवाल की बढ़ती मात्रा से जुड़ा है, जो जल में ऑक्सीजन घटाकर समुद्री जीवन के लिए खतरा बनती है। भारत में कई क्षेत्रों में कोरल ब्लीचिंग दर्ज की गई है, जिससे समुद्री जैव विविधता प्रभावित हो रही है।
हालाँकि, पुनर्जीवित वनों में तितलियों के रंगों में सुधार जैसे सकारात्मक संकेत बताते हैं कि संरक्षण प्रयासों से प्रकृति के संतुलन को पुनर्स्थापित किया जा सकता है। (विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिया गया लेख पढ़ें।)
(जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से दुनिया के प्राकृतिक रंगों में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। पिछले 20 वर्षों में आधे से अधिक महासागर हरे हो गए हैं, जंगल समय से पहले भूरे पड़ रहे हैं और अनेक जीव-जंतु अपने रंग बदल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह परिवर्तन पारिस्थितिक असंतुलन का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
जीवों के रंग उनके अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। रंग उन्हें शिकारी से बचने (कैमुफ्लाज), साथी को आकर्षित करने, चेतावनी देने और शरीर का तापमान नियंत्रित करने में सहायता करते हैं। बढ़ते तापमान के कारण कई प्रजातियाँ हल्के रंग की होती जा रही हैं, जिससे वे अधिक गर्मी से बच सकें।
2024 में Ecology and Evolution में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, उत्तरी गोलार्ध में कई कीट जैसे – लेडीबर्ड और ड्रैगनफ्लाई, हीटवेव के कारण हल्के रंग के हो रहे हैं। हल्का रंग शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है, जबकि गहरे रंग वाले जीव अधिक तेजी से गर्म हो जाते हैं और गर्म परिस्थितियों में कम सक्रिय रह पाते हैं।
ऐसे परिवर्तन अतीत में भी देखे गए हैं। औद्योगिक क्रांति के दौरान धुएँ और कालिख से पेड़ों की छाल काली हो गई थी, जिससे हल्के रंग की peppered moth आसानी से दिखाई देने लगीं और शिकार बनने लगीं। समय के साथ गहरे रंग वाली पतंगें अधिक सामान्य हो गईं। यह पर्यावरण के अनुसार रंग परिवर्तन का एक प्रसिद्ध उदाहरण है।
Biodiversity and Conservation में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अमेज़न वर्षावन में वनों की कटाई के कारण तितलियाँ अपना चमकीला रंग खो रही हैं। जिन क्षेत्रों में जंगल कटे, वहाँ कम रंगीन तितलियाँ पाई गईं। कम चमकीला रंग उन्हें बेहतर छिपने में मदद करता है, लेकिन इससे प्रजनन पर प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि रंग साथी आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि पुनर्जीवित जंगलों में तितलियों के रंगों में सुधार देखा गया।
शहरीकरण और प्रदूषण भी वन्य जीवों के रंग को प्रभावित कर रहे हैं। चीन में 547 पक्षी प्रजातियों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि शहरों में पक्षी अधिक गहरे और फीके रंग के होते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में वे अपेक्षाकृत अधिक रंगीन पाए गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि भारी धातुएँ, जैसे सीसा, मेलानिन से जुड़कर पंखों का रंग गहरा कर सकती हैं।
पौधों में भी परिवर्तन देखा जा रहा है। कैरोटिनॉयड पिगमेंट, जो पौधों को लाल, पीला और नारंगी रंग देते हैं, शहरी क्षेत्रों में कम बन रहे हैं। कुछ फूल सूर्य के तीव्र विकिरण से बचाव के लिए अपने पराबैंगनी (UV) पिगमेंट में बदलाव कर रहे हैं। ये पिगमेंट परागण करने वाले कीटों को आकर्षित करते हैं, इसलिए इनके बदलने से परागण और प्रजनन प्रभावित हो सकता है।
महासागरों के हरे होने का एक प्रमुख कारण शैवाल (algal blooms) की बढ़ती मात्रा है। ये जल की पारदर्शिता कम कर देते हैं और पानी में ऑक्सीजन स्तर घटाकर मछलियों तथा अन्य समुद्री जीवों के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।
भारत में भी समुद्री पारिस्थितिकी में बदलाव के संकेत मिले हैं। 2025 में वैज्ञानिकों ने गल्फ ऑफ मन्नार, लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और कच्छ की खाड़ी में कोरल ब्लीचिंग दर्ज की। समुद्र के तापमान बढ़ने पर कोरल अपने सहजीवी शैवाल को बाहर निकाल देते हैं और सफेद हो जाते हैं। स्वस्थ कोरल रीफ को “अंडरवॉटर फॉरेस्ट” कहा जाता है। इनके नष्ट होने से मछलियों की संख्या घटती है, शैवाल बढ़ते हैं और समुद्र का रंग अधिक हरा दिखाई देने लगता है, जिससे समुद्री जैव विविधता प्रभावित होती है।
हालांकि कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। जिन क्षेत्रों में जंगलों का पुनर्जनन हुआ है, वहाँ तितलियों के रंगों में सुधार देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक आवासों की रक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु परिवर्तन को सीमित करने के प्रयासों से प्रकृति के रंगों और पारिस्थितिक संतुलन को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।)
(12 Feb) The HIndu
मिस्र में खोजे गए तमिल ब्राह्मी अभिलेख
मिस्र के Valley of the Kings स्थित Theban Necropolis में लगभग 30 शिलालेखों की पहचान की गई है, जो तमिल ब्राह्मी, प्राकृत और संस्कृत भाषाओं में हैं। इनका काल 1वीं से 3वीं शताब्दी ईस्वी के बीच का माना गया है। यह खोज प्राचीन तमिलकम, भारत के अन्य भागों और रोमन साम्राज्य के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों पर नई जानकारी प्रदान करती है।
इन शिलालेखों की पहचान 2024–2025 में पेरिस की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड और स्विट्ज़रलैंड के प्रोफेसर इंगो स्ट्रॉख द्वारा किए गए अध्ययन के दौरान हुई। शोधकर्ताओं ने छह कब्रों में इन लेखों का दस्तावेजीकरण किया। इससे पहले 1926 में फ्रांसीसी विद्वान जूल्स बायले ने इस क्षेत्र में 2,000 से अधिक ग्रीक ग्रैफिटी दर्ज किए थे।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन कब्रों में आए आगंतुकों ने दीवारों पर अपने नाम उकेरकर अपनी उपस्थिति दर्ज की। ये लेख अन्य भाषाओं, विशेषकर ग्रीक, में लिखे गए ग्रैफिटी के साथ पाए गए, जिससे संकेत मिलता है कि भारतीय आगंतुक स्थानीय प्रथा का पालन कर रहे थे।
इन शिलालेखों में “Cikai Koṟṟaṉ” नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो पाँच कब्रों में आठ बार अंकित मिला। इस नाम का पहला भाग संस्कृत शब्द “शिखा” से जुड़ा माना जाता है, जबकि “Koṟṟaṉ” तमिल मूल का शब्द है, जिसका संबंध विजय और युद्ध से है तथा यह चेरा परंपरा से जुड़ा पाया गया है। इसी प्रकार “Koṟṟaṉ” नाम मिस्र के लाल सागर बंदरगाह बेरनिके में मिले एक शिलालेख और संगम साहित्य में वर्णित चेरा शासकों से भी संबद्ध पाया गया है।
अन्य तमिल ब्राह्मी शिलालेखों में “Kopāṉ varata kantan” (कोपान आया और देखा) सहित Cātaṉ और Kiraṉ जैसे नाम भी दर्ज हैं। “Kopāṉ” नाम तमिलनाडु के अम्मनकोविलपट्टी में भी पाया गया है।
(14 Feb) IE
बांग्लादेश चुनाव 2026: BNP की जीत और भारत–बांग्लादेश संबंधों पर प्रभाव
13 फरवरी 2026 को हुए बांग्लादेश के आम चुनावों में तारीक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने निर्णायक जीत दर्ज करते हुए 300 सदस्यीय संसद में दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़त बनाई। 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के पदच्युत होने के बाद हुए इस पहले चुनाव में उनकी अवामी लीग अनुपस्थित रही, जिससे BNP और जमात-ए-इस्लामी को व्यापक राजनीतिक अवसर मिला। जमात ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए 60 से अधिक सीटें हासिल कीं।
ऐतिहासिक रूप से BNP शासन (2001–06) के दौरान भारत को उग्रवादी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं का सामना करना पड़ा था, जबकि हसीना काल में आतंकवाद-रोधी सहयोग मजबूत हुआ।
नई सरकार के सामने भारत के साथ संबंधों को संतुलित रखने की चुनौती है। प्रमुख मुद्दों में भारत में शरण लिए हसीना का भविष्य, द्विपक्षीय व्यापार, सीमा-पार सुरक्षा, कनेक्टिविटी परियोजनाएँ, अवैध प्रवासन और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा शामिल हैं। BNP की “Bangladesh Before All” नीति और जमात की पड़ोसी देशों से सहयोग की प्रतिबद्धता संभवतः संतुलित विदेश नीति के संकेत देती है।