(15) Weekly News 18 – 24 Jan

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(18 Jan) TOI & Others

लोकतंत्र का कर्मफल: युगांडा की राजनीतिक यात्रा

युगांडा में हुए राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पर काबिज 81 वर्षीय योवेरी मुसवेनी ने 71.65 प्रतिशत मतों के साथ लगातार सातवीं बार जीत दर्ज की है, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी, 43 वर्षीय बॉबी वाइन को 24.72 प्रतिशत वोट मिले। चुनाव प्रक्रिया के दौरान विपक्ष के प्रचार-प्रसार और रैलियों पर पाबंदी, सुरक्षा बलों द्वारा दमन, कई स्थानों पर हिंसा और लोगों की मौत, पूरे चुनाव दिवस इंटरनेट शटडाउन तथा बैलेट पेपर में कथित धांधली जैसी घटनाओं ने चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद विपक्षी उम्मीदवार बॉबी वाइन को पुलिस और सेना की छापेमारी के चलते भूमिगत होना पड़ा, जबकि उनके परिवार को सशस्त्र बलों ने घर में नजरबंद कर दिया।

मुसवेनी 1986 से सत्ता में हैं और उन्होंने पूर्व में संविधान में संशोधन कर कार्यकाल(2) और उम्र सीमा (75) को समाप्त किया। हालांकि उन्हें देश को अराजकता से बाहर निकालने और आर्थिक स्थिरता लाने का श्रेय भी दिया जाता है। युगांडा की अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। 2026 के अंत तक तेल उत्पादन शुरू होने की संभावना है, जिससे आर्थिक विकास दर 10 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है। इसके बावजूद कर्ज जीडीपी के लगभग 52 प्रतिशत तक पहुँच चुका है और लगभग 60 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन 3 डॉलर से कम पर जीवन यापन कर रही है। क्षेत्रीय स्तर पर युगांडा पूर्वी और मध्य अफ्रीका में एक अहम सुरक्षा शक्ति बना हुआ है। सोमालिया में ATMIS मिशन में इसकी प्रमुख सैन्य भूमिका और तंजानिया के साथ बन रही ईस्ट अफ्रीकन क्रूड ऑयल पाइपलाइन (EACOP) इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।

2024 की जनगणना के अनुसार, युगांडा की जनसंख्या लगभग 4.59 करोड़ है, जिसमें 81.7 प्रतिशत ईसाई और 13.2 प्रतिशत मुस्लिम, अन्य/पारंपरिक 5% हैं। (51% महिला, 49% पुरुष)

 

(18 Jan) TOI & Others

नील नदी विवाद: सत्ता, विकास और न्याय की परीक्षा

नील नदी को लेकर मिस्र, सूडान और इथियोपिया के बीच विवाद औपनिवेशिक दौर के जल समझौतों और इथियोपिया द्वारा बनाए जा रहे GERD बाँध के कारण गहराया है, जिसे मिस्र अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए ट्रम्प द्वारा मध्यस्थता कराने के सुझाव का मिस्र और सूडान ने स्वागत किया है, जबकि इथियोपिया की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

नील नदी अफ्रीका के 11 देशों से होकर बहती है, लेकिन तीन देश इस पर सबसे अधिक निर्भर हैं—मिस्र (लगभग 95% नील पर निर्भर), सूडान (कृषि और बिजली के लिए) और इथियोपिया (जहाँ से लगभग 85% पानी आता है)। विवाद की जड़ 1929 और 1959 के वे समझौते हैं, जो ब्रिटिश शासन के दौरान हुए, जिनमें मिस्र (55.5 BCM) और सूडान (18.5 BCM) को अधिकांश पानी दिया गया, जबकि उस समय स्वतंत्र इथियोपिया को प्रक्रिया में शामिल ही नहीं किया गया। ब्रिटेन ने स्वेज नहर और व्यापार मार्गों की सुरक्षा के साथ-साथ मिस्र में राजनीतिक स्थिरता को अपने साम्राज्यवादी हितों से जोड़ते हुए उसे विशेष अधिकार प्रदान किए, जिसके तहत ऊपरी देशों को मिस्र की अनुमति के बिना कोई बाँध या परियोजना बनाने से रोका गया। यही कारण है कि इथियोपिया इन समझौतों को औपनिवेशिक और अन्यायपूर्ण मानता है। अपने विकासात्मक दबावों—विशेषतः इस तथ्य कि उसकी लगभग 45–50% आबादी आज भी बिजली से वंचित है—को देखते हुए इथियोपिया ने 2011 से लगभग 5000 मेगावाट क्षमता वाले अफ्रीका के सबसे बड़े जलविद्युत बाँध GERD का निर्माण शुरू किया। अब बाँध का निर्माण पूरा हो चुका है और उसमें जलभराव जारी है।

मिस्र, जो लगभग 95% नील पर निर्भर है, को आशंका है कि पानी कम होने से देश गंभीर संकट में पड़ सकता है। इसी संदर्भ में राष्ट्रपति अल-सीसी ने कहा है कि नील के पानी से छेड़छाड़ युद्ध का कारण बन सकती है। वहीं सूडान, जो दोनों के बीच स्थित है, इस परियोजना में बाढ़ नियंत्रण, कृषि और सस्ती बिजली के अवसर भी देखता है। इसी कारण तीनों देशों के बीच मुख्य विवाद के बिंदु बने हुए हैं—बाँध को कितनी जल्दी और कितनी मात्रा में भरा जाए, सूखे के समय पानी कैसे छोड़ा जाए, इसकी निगरानी कौन करे और क्या कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता हो पाएगा।

 

(22 Jan) Al Jazeera

शांति के नाम पर नियंत्रण: दावोस में ट्रम्प का ‘बोर्ड ऑफ़ पीस

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पिछले वर्ष ग़ज़ा में युद्ध की समाप्ति और शांति स्थापना के उद्देश्य से प्रस्तावित “बोर्ड ऑफ़ पीस” की इस वर्ष वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की दावोस बैठक में औपचारिक शुरुआत की गई। ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने दशकों पुराने संघर्ष, नफ़रत और ख़ून-ख़राबे को समाप्त किया है और यह पहल केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित करने में सहायक हो सकती है। प्रस्तावित बोर्ड ऑफ़ पीस संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर कार्य करेगा और समय के साथ संयुक्त राष्ट्र की जगह भी ले सकता है। उद्घाटन अवसर पर 19 देशों ने भाग लिया। इनमें से कुछ देशों ने सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की, जबकि कई अन्य देशों ने इससे दूरी बनाए रखी। ब्रिटेन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की संभावित भागीदारी को लेकर चिंता जताई, जबकि स्वीडन और नॉर्वे ने प्रस्ताव में मौजूद अस्पष्टताओं की ओर ध्यान दिलाया।

सात मुस्लिम देशों—छह अरब देशों के साथ तुर्की और इंडोनेशिया—ने स्पष्ट किया कि उनकी भागीदारी केवल ग़ज़ा में न्यायपूर्ण शांति की प्रक्रिया तक सीमित रहेगी। हालांकि, बोर्ड ऑफ़ पीस के चार्टर में ग़ज़ा का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

भारत सहित कई प्रमुख देशों की ओर से इस पहल को लेकर अब तक कोई औपचारिक या सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

बोर्ड ऑफ़ पीस के लीक हुए ड्राफ़्ट चार्टर के अनुसार, डोनाल्ड ट्रम्प आजीवन इसके चेयरमैन होंगे, चाहे वे राष्ट्रपति पद पर रहें या नहीं। उन्हें सदस्य देशों को आमंत्रित करने या रोकने का अधिकार होगा। वे सहायक संस्थाओं की स्थापना या उन्हें भंग करने का निर्णय भी ले सकेंगे। इसके अतिरिक्त, वे अपने उत्तराधिकारी को स्वयं नामित कर सकेंगे। चार्टर के अनुसार, स्थायी सदस्य बनने के लिए किसी देश को एक बिलियन डॉलर का योगदान देना होगा।

यह पहल संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, उसकी प्रभावशीलता और उत्तरदायित्व को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सामने आई है तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मौजूदा संरचना में सुधार की माँग को भी रेखांकित करती है।

 

(19 Jan) BS

चीन की जनसंख्या लगातार चौथे वर्ष घटी, जन्म-मृत्यु संतुलन और बिगड़ा  

चीन की जनसंख्या 2025 में लगातार चौथे वर्ष घट गई, जिससे देश के नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 2025 में चीन की आबादी 33.9 लाख घटकर लगभग 1.4 अरब रह गई। यह गिरावट 2022 से जारी है और हर वर्ष तेज़ होती जा रही है।

2025 में चीन में केवल 79.2 लाख जन्म दर्ज हुए, जो 2024 की तुलना में 17 प्रतिशत कम हैं। जन्म दर गिरकर 5.63 प्रति 1,000 रह गई, जो 1949 के बाद सबसे निचला स्तर है। प्रजनन दर लगभग 1 है, जबकि जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए 2.1 आवश्यक मानी जाती है। इसके विपरीत, 2025 में 1.13 करोड़ मौतें दर्ज की गईं, जिससे मृत्यु दर 8.04 प्रति 1,000 तक पहुँच गई, जो 1968 के बाद सबसे अधिक है।

जनसंख्या गिरावट को रोकने के लिए चीन ने एक-बच्चा नीति समाप्त कर तीन-बच्चा नीति, सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन लागू किए हैं, लेकिन इसके बावजूद जन्म दर में गिरावट जारी है।

 

(21 Jan) IE

सरसों की फसल पर ओरोबैंकी का खतरा: छिपी चुनौती और GM सरसों DMH-11

भारत की सरसों (Mustard) की फसल, जो देश की सबसे बड़ी स्वदेशी खाद्य तेल स्रोत है, आज एक गंभीर “छिपे हुए खतरे” (Hidden Threat) का सामना कर रही है। यह खतरा है ओरोबैंकी एजिप्टियाका (Orobanche aegyptiaca) नामक परजीवी खरपतवार (Parasitic Weed), जो सरसों की जड़ों से चिपककर पौधे से पोषक तत्व, पानी और कार्बन (Nutrients, Water and Carbon) चूस लेती है। इसके कारण पौधे पीले पड़ जाते हैं, उनकी वृद्धि रुक जाती है और बीज उत्पादन (Seed Yield) घट जाता है।

सरसों भारत की सबसे बड़ी खाद्य तेल उत्पादक फसल (Edible Oil Crop) है, जिससे हर वर्ष लगभग 4 मिलियन टन (Million Tonnes) तेल प्राप्त होता है। देश में सरसों लगभग 90 लाख हेक्टेयर (Hectares) क्षेत्र में उगाई जाती है, मुख्यतः राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में। चूँकि भारत को हर साल करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करना पड़ता है, इसलिए सरसों की उपज बढ़ाना राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है।

ओरोबैंकी को “छिपा खतरा” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह भूमिगत (Underground) रूप से नुकसान पहुँचाती है। जब तक इसका अंकुर ऊपर दिखाई देता है, तब तक फसल को गंभीर क्षति हो चुकी होती है। एक ओरोबैंकी पौधा 40–45 फूल (Flowers) पैदा करता है और प्रत्येक फूल में 4,000–5,000 बीज (Seeds) होते हैं, जो मिट्टी में 20 वर्षों (Years) तक जीवित रह सकते हैं। सिंचाई के बाद मिट्टी की नमी इनके अंकुरण को और बढ़ावा देती है।

इसी बढ़ते खतरे और उपज की सीमाओं के बीच GM सरसों (Genetically Modified Mustard) DMH-11 पर चर्चा हो रही है। इसे दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) के CGMCP ने विकसित किया है। इसमें बारनेज़ (Barnase) और बारस्टार (Barstar) जीन तकनीक का उपयोग कर सरसों में हाइब्रिडाइजेशन (Hybridisation) संभव बनाया गया है। ICAR के नियंत्रित परीक्षणों में DMH-11 ने पारंपरिक ‘वरुणा (Varuna)’ किस्म की तुलना में लगभग 28% अधिक उपज दिखाई है।

ओरोबैंकी को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता है:

(राजस्थान / हरियाणा – मटका, मालो, जड़ चूसनी), (उत्तर प्रदेश / मध्य भारत – परजीवी घास, जड़ मार)

 

(22 Jan) IE

महाशक्ति दबाव के बीच कनाडा का स्पष्ट संदेश: ‘झूठे दिखावे’ से बाहर आने का आह्वान

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के दिनों में कनाडा को लेकर कड़े बयान दिए हैं। ट्रंप ने न केवल कनाडा पर अमेरिका के प्रति “कृतज्ञता न दिखाने” का आरोप लगाया, बल्कि यह चेतावनी भी दी कि यदि कनाडा चीन के साथ व्यापार समझौते आगे बढ़ाता है तो उस पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है। ट्रंप ने यह दावा भी किया कि कनाडा अमेरिका की वजह से ही अस्तित्व में है। इन बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कनाडा ने स्पष्ट रूप से खंडन किया है कि उसका आर्थिक और राजनीतिक अस्तित्व किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं है। कनाडा की ओर से कहा गया कि उसकी संप्रभुता, संस्थाएँ और वैश्विक भूमिका उसकी अपनी क्षमताओं और निर्णयों पर आधारित हैं।

इसी पृष्ठभूमि में, वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की दावोस बैठक में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का भाषण विशेष ध्यान खींचता है। अपने वक्तव्य में कार्नी ने कहा कि दुनिया किसी सामान्य संक्रमण से नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की गहरी टूटन के दौर से गुजर रही है।(“We are in the midst of a rupture, not a transition.”) उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में महाशक्तियाँ व्यापार, वित्त और आपूर्ति शृंखलाओं को दबाव के औज़ार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं और ऐसे में केवल समझौते या चुप्पी से सुरक्षा नहीं मिलती।(“There is a strong tendency to go along to get along. It won’t.”) कार्नी ने ज़ोर देकर कहा कि मध्य शक्तियों की वास्तविक ताकत सच को स्वीकार करने और ईमानदारी से उसका सामना करने से शुरू होती है।(“The power of the less powerful begins with honesty.”) वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि जो देश चर्चा की मेज़ पर मौजूद नहीं होते, वे अक्सर दूसरों के फैसलों का शिकार बन जाते हैं।(“If you are not at the table, you are on the menu.”) अपने रुख को और स्पष्ट करते हुए कार्नी ने कहा कि केवल औपचारिक स्वतंत्रता दिखाना संप्रभुता नहीं है, यदि उसके पीछे वास्तविक निर्भरता बनी रहे। (“This is not sovereignty. It is the performance of sovereignty while accepting subordination.”) भाषण के अंत में उन्होंने कहा कि कनाडा अब पुराने दिखावों से बाहर निकलकर वास्तविकता को नाम देने, अपनी घरेलू क्षमता मजबूत करने और समान सोच वाले देशों के साथ मिलकर आगे बढ़ने का रास्ता चुन रहा है।(“We are taking the sign out of the window.”)

इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि जब अमेरिकी नीतियों के प्रभाव भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर दिखाई देते हैं, तब नई दिल्ली अपेक्षाकृत संयमित और सतर्क रुख क्यों बनाए हुए है।

 

(23 Jan) ET

यूएन रिपोर्ट: प्रकृति बचाने से 33 गुना अधिक खर्च उसे नुकसान पहुँचाने पर

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के नुकसान और प्रदूषण के दुष्प्रभावों पर बढ़ते वैज्ञानिक प्रमाणों और लगातार बढ़ती चरम मौसम घटनाओं के बावजूद, वैश्विक खर्च की प्राथमिकताओं में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2023 में दुनिया ने प्रकृति की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से केवल 220 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि उसी अवधि में 7.3 ट्रिलियन डॉलर ऐसे कार्यों और नीतियों पर खर्च किए गए जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाते हैं। यह राशि प्रकृति संरक्षण पर किए गए खर्च से लगभग 33 गुना अधिक है।

रिपोर्ट के अनुसार, प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाले खर्च में जीवाश्म ईंधन से जुड़ी गतिविधियाँ, प्रदूषणकारी उद्योग, संसाधनों का अत्यधिक दोहन और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली नीतियाँ शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र ने यह भी कहा है कि हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता ह्रास से जुड़े जोखिमों के बारे में वैज्ञानिक चेतावनियाँ और डेटा लगातार बढ़े हैं, लेकिन वैश्विक वित्तीय प्रवाह अब भी उन गतिविधियों की ओर अधिक केंद्रित हैं जो पर्यावरणीय क्षरण से जुड़ी हैं।

 

(13 Jan) Deccan Chronicle

पोलर सिल्क रोड: आर्कटिक में चीन की उभरती रणनीति

चीन ने वर्ष 2018 में पोलर सिल्क रोड (Polar Silk Road) की घोषणा की, जिसे उसकी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (Belt and Road Initiative) का आर्कटिक संस्करण माना जाता है। इस पहल का उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में उभरते समुद्री मार्गों, संसाधनों और वैज्ञानिक गतिविधियों में चीन की भागीदारी बढ़ाना है। बीजिंग ने 2030 तक स्वयं को एक “पोलर ग्रेट पावर (Polar Great Power)” के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।

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जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक समुद्री बर्फ के पिघलने से नए व्यापारिक मार्ग खुल रहे हैं, जिनमें नॉर्दर्न सी रूट (Northern Sea Route – NSR) प्रमुख है। यह मार्ग रूस के उत्तरी तट के साथ चलता है और एशिया को यूरोप से जोड़ता है। वर्ष 2024 में एक चीनी जहाज़ ने इसी मार्ग से लगभग 20 दिनों में ब्रिटेन तक यात्रा की। पोलर सिल्क रोड के तहत चीन ने आइसलैंड और नॉर्वे में वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र स्थापित किए हैं तथा आइसब्रेकर जहाज़ों और उपग्रह प्रणालियों के माध्यम से आर्कटिक अध्ययन को बढ़ावा दिया है। यद्यपि चीन आर्कटिक में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है, उसकी भूमिका फिलहाल सीमित मानी जाती है और वह काफी हद तक रूस के सहयोग पर निर्भर है।

 

(23 Jan) EN

ग्रीनलैंड : दबाव की राजनीति से सामूहिक प्रतिरोध तक

कोपेनहेगन और नूक में हुए प्रदर्शनों के बाद ग्रीनलैंड को लेकर वाशिंगटन की भाषा में अचानक नरमी दिखाई दी। जिस मुद्दे पर कुछ दिन पहले तक दबाव, धमकी और टैरिफ की चेतावनियाँ दी जा रही थीं, उसी पर अब बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग की बात होने लगी। डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर सीधे नियंत्रण की माँग से पीछे हटते हुए आर्कटिक सुरक्षा को नाटो के ढाँचे में देखने का संकेत दिया।

यह बदलाव नाटो महासचिव मार्क रुटे की मध्यस्थता के बाद सामने आया। डेनमार्क और ग्रीनलैंड पहले ही आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा ढाँचे पर निवेश बढ़ा चुके हैं, जिसे अब सामूहिक प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड से जुड़े विषयों पर संवाद संभव है, लेकिन उसकी संप्रभुता किसी भी स्थिति में बातचीत का विषय नहीं है।

ग्रीनलैंड की नेता टिली मार्टिनुसेन ने इस पूरे घटनाक्रम को यूरोप के बदले हुए रवैये का संकेत बताया। उनके अनुसार, इस बार यूरोपीय देश और कनाडा केवल दर्शक नहीं रहे, बल्कि खुलकर ग्रीनलैंड के साथ खड़े हुए। इस समर्थन ने यह स्पष्ट कर दिया कि आर्कटिक अब केवल रणनीतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहमति और आत्मनिर्णय का भी प्रश्न है।

 

(23 Jan) Al Jazeera

मिनियापोलिस: कानून प्रवर्तन या शक्ति-प्रदर्शन?

मिनियापोलिस में इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (ICE) के खिलाफ उठी असहमति अब केवल किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं रह गई है। 7 जनवरी को एक ICE एजेंट की गोली से रेनी गुड की मौत के बाद, शहर में संघीय एजेंसियों की भूमिका और उनकी सीमाओं पर सवाल खुलकर सामने आए। इसके बाद दुकानों और सार्वजनिक स्थानों में एजेंटों की मौजूदगी ने इस आशंका को और गहरा किया कि प्रवर्तन अब निगरानी में नहीं, दबाव में बदल रहा है।

इसी पृष्ठभूमि में 23 जनवरी को ‘डे ऑफ ट्रुथ एंड फ्रीडम’ के तहत आर्थिक बहिष्कार देखा गया। सैकड़ों कारोबार बंद रहे और सामान्य गतिविधियाँ जानबूझकर रोकी गईं। यह विरोध केवल ICE के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस तरीके के खिलाफ था जिसमें कानून लागू किया जा रहा है।

व्हाइट हाउस ने ICE का बचाव किया है, जबकि स्थानीय प्रशासन ने विरोध को समझने योग्य बताते हुए छोटे कारोबारों पर पड़ने वाले असर पर चिंता जताई है।

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