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- (26)Weekly News Update (13 April – 18 April) Iran Ukrain war, ken-betwa Pariyojana, Hungary election
(13 April) Reuters, politico, EN
हंगरी का चुनाव : सत्ता परिवर्तन से अधिक एक दिशा परिवर्तन
12 अप्रैल 2026 को हंगरी में संपन्न हुए चुनाव में Péter Magyar की Tisza Party ने दो-तिहाई बहुमत से विजय प्राप्त की। पंद्रह वर्षों से सत्ता पर काबिज Viktor Orbán को संवैधानिक मूल्यों के हनन, व्यापक भ्रष्टाचार, रूस के प्रति झुकाव तथा यूरोपियन यूनियन की मुख्यधारा से अलग चलने के कारण जनता में व्याप्त असंतोष का सामना करना पड़ा, जिसने उनकी हार में प्रमुख भूमिका निभाई। ओर्बन की यह पराजय Russia-Ukraine War के संदर्भ में Ukraine तथा यूरोपीय संघ के लिए एक सकारात्मक शुरुआत के रूप में देखी जा रही है।
हंगरी का संक्षिप्त परिचय
मध्य यूरोप का एक स्थलरुद्ध देश है, इसकी सीमा 7 देशों से लगती है: उत्तर में स्लोवाकिया; उत्तर-पूर्व में यूक्रेन; पूरब में रोमानिया; दक्षिण में सर्बिया और क्रोएशिया; दक्षिण-पश्चिम में स्लोवेनिया और पश्चिम में ऑस्ट्रिया। इसका क्षेत्रफल लगभग 93,030 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के बिहार राज्य के लगभग बराबर है। हंगरी की राजधानी Budapest है। यहाँ मुख्य रूप से ईसाई समुदाय की बहुलता है। यह देश अपनी विशिष्ट भाषा, समृद्ध इतिहास और यूरोप की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने के लिए जाना जाता है।
ओर्बन शासन और विवाद
Viktor Orbán वर्ष 2010 से लगातार चार आम चुनाव जीतकर हंगरी की सत्ता पर काबिज रहे। उन्होंने 2010, 2014, 2018 और 2022 के चुनाव स्पष्ट बहुमत से जीते, जिससे उन्हें लंबे समय तक बिना बड़े राजनीतिक अवरोध के शासन चलाने का अवसर मिला।
2010 के बाद ओर्बन सरकार ने देश की राजनीति और संस्थागत ढाँचे में व्यापक परिवर्तन किए। संविधान में कई संशोधन किए गए, चुनावी नियमों में बदलाव लाए गए, मीडिया व्यवस्था पर सरकारी प्रभाव बढ़ा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर प्रश्न उठे तथा प्रशासनिक शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ा। इन परिवर्तनों से लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई और सत्ता एक सीमित समूह के हाथों में सिमटती गई। उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगातार बढ़ते रहे। विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने आरोप लगाया कि अनेक सरकारी ठेके सत्ता से जुड़े व्यापारिक समूहों तथा करीबी लोगों को दिए गए। पारदर्शिता और विधि शासन से जुड़े प्रश्नों के कारण यूरोपियन यूनियन ने हंगरी की अरबों यूरो की कुछ सहायता राशियों पर रोक लगाई।
यूरोपीय संघ के भीतर भी ओर्बन कई मुद्दों पर अलग रुख अपनाने के लिए जाने जाते रहे। प्रवासन नीति पर उन्होंने कठोर रुख अपनाया और अवैध आप्रवासन के विरोध को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया। इसी संदर्भ में यूरोपीय न्यायालय ने हंगरी पर 200 मिलियन यूरो का दंड लगाया था।
Russia-Ukraine War के दौरान Viktor Orbán सरकार का रूस के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख लगातार विवाद का विषय बना रहा। जहाँ अधिकांश यूरोपीय देश रूस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंधों और यूक्रेन को व्यापक सहायता देने के पक्ष में थे, वहीं हंगरी ने अपनी ऊर्जा निर्भरता का हवाला देते हुए रूसी तेल और गैस आयात जारी रखा। यूरोपीय संघ ने रूसी ऊर्जा पर निर्भरता घटाने और वैकल्पिक आपूर्ति की दिशा में कदम बढ़ाए, किंतु हंगरी ने अपने लिए कई छूटें और समयसीमा की माँग की। दिसंबर 2023 में यूरोपीय संघ द्वारा यूक्रेन के लिए प्रस्तावित €50 billion सहायता पैकेज को हंगरी ने वीटो कर दिया, जिससे पूरे यूरोप में तीखी प्रतिक्रिया हुई। बाद में फरवरी 2024 में संशोधित व्यवस्था के साथ यह पैकेज पारित हो सका। 2026 में भी ओर्बन सरकार पर यूक्रेन के लिए प्रस्तावित लगभग €90 billion ऋण सहायता को रोकने का आरोप लगा, जिसे चुनाव परिणाम के बाद शीघ्र स्वीकृति मिलने की संभावना जताई गई।
ओर्बन सरकार का तर्क था कि हंगरी को युद्ध में नहीं घसीटा जाना चाहिए और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। लेकिन इस नीति ने हंगरी को यूरोपीय संघ के भीतर अलग-थलग किया तथा रूस के विरुद्ध सामूहिक यूरोपीय रुख को कमजोर किया। यही कारण था कि शहरी मतदाताओं, युवाओं और यूरोप समर्थक वर्ग में सरकार के प्रति असंतोष बढ़ता गया।
मैग्यार की जीत और नई दिशा
Péter Magyar की विजय केवल सत्ता विरोधी मतों का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक संगठित और विश्वसनीय विकल्प के रूप में उनकी स्वीकार्यता का संकेत भी थी। लंबे समय तक Viktor Orbán के शासन के बाद जनता ऐसे नेतृत्व की तलाश में थी, जो संस्थागत सुधार, आर्थिक स्थिरता और यूरोप से सामान्य संबंध बहाल कर सके।
मैग्यार ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद संकेत दिया कि वे संविधान में संशोधन करेंगे तथा शासन व्यवस्था में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करेंगे। उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि भविष्य में कोई भी प्रधानमंत्री दो कार्यकाल से अधिक पद पर न रहे, जिससे दीर्घकालिक सत्ता केंद्रीकरण पर रोक लग सके।
विदेश नीति के स्तर पर मैग्यार ने स्पष्ट किया कि रूस के साथ व्यापारिक संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं किए जाएंगे, किंतु ऊर्जा निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि रूसी तेल पर निर्भरता समाप्त करने की समयसीमा(2027) को व्यावहारिक रूप से आगे बढ़ाते हुए(2035) चरणबद्ध परिवर्तन किया जाएगा, ताकि घरेलू अर्थव्यवस्था पर अचानक दबाव न पड़े।
साथ ही उन्होंने यूरोपियन यूनियन से संबंध सुधारने, रुकी हुई वित्तीय सहायता बहाल कराने, भ्रष्टाचार की जाँच तेज करने तथा न्यायपालिका और प्रेस की स्वतंत्रता मजबूत करने की बात कही। चुनाव परिणाम के बाद यूरोपीय देशों और निवेशकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया इसी कारण देखी गई।
हालाँकि उनके सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। लंबे समय से स्थापित प्रशासनिक ढाँचे में सुधार, महँगाई पर नियंत्रण, ऊर्जा सुरक्षा, यूरोपीय संघ का विश्वास पुनः प्राप्त करना तथा गहराई तक ध्रुवीकृत समाज को साथ लेकर चलना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
Magyar की जीत का Ukraine युद्ध, EU और रूस पर प्रभाव
Péter Magyar की विजय का प्रभाव केवल हंगरी की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर यूरोपियन यूनियन तथा Russia-Ukraine War से जुड़े व्यापक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। सामरिक और आर्थिक दृष्टि से हंगरी यूरोप की सबसे बड़ी शक्ति नहीं है, किंतु यूरोपीय संघ का सदस्य होने तथा कई महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर अलग रुख अपनाने के कारण पिछले वर्षों में उसका महत्व अपेक्षाकृत बढ़ गया।
यूक्रेन युद्ध के दौरान Viktor Orbán सरकार ने कई सहायता पैकेजों, प्रतिबंध प्रस्तावों और सामूहिक यूरोपीय नीति पर आपत्तियाँ दर्ज कीं, जिससे Budapest बार-बार केंद्र में रहा। यदि नई सरकार यूरोपीय संघ के साथ अधिक समन्वित रुख अपनाती है, तो यूक्रेन सहायता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया में आने वाली बाधाएँ कम हो सकती हैं। हालाँकि Magyar ने यह भी संकेत दिया है कि यूक्रेन को बिना शर्त समर्थन नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा यूक्रेन के साथ संबंध सुधारने की एक महत्त्वपूर्ण शर्त Transcarpathia क्षेत्र में रहने वाले Hungarian समुदाय के भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों का समाधान होगा। उनके अनुसार वहाँ के लोग केवल वे अधिकार चाहते हैं, जो उन्हें पूर्व वर्षों में प्राप्त थे। साथ ही यूक्रेन की यूरोपियन यूनियन सदस्यता का समर्थन तभी किया जाएगा जब वह आवश्यक राजनीतिक, आर्थिक और विधिक शर्तों को पूरा करे। आवश्यकता पड़ने पर इस विषय पर राष्ट्रीय जनमत-संग्रह कराने की बात भी कही गई है।
रूस के संदर्भ में भी यह परिणाम महत्त्वपूर्ण है। Viktor Orbán के दौर में हंगरी यूरोप के भीतर उन देशों में गिना जाने लगा था, जो रूस के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख रखते थे। इसका मुख्य कारण वैचारिक निकटता से अधिक ऊर्जा निर्भरता और आर्थिक व्यवहारिकता थी। हंगरी ने रूसी तेल और गैस आयात जारी रखा तथा कई यूरोपीय प्रतिबंध प्रस्तावों पर नरमी या छूट की माँग की।
Magyar की जीत का अर्थ यह नहीं है कि हंगरी तत्काल रूस विरोधी नीति अपना लेगा। देश की ऊर्जा संरचना अभी भी बाहरी आपूर्ति पर निर्भर है, इसलिए अचानक परिवर्तन व्यावहारिक नहीं होगा। किंतु इतना संभव है कि हंगरी यूरोपीय संघ के भीतर रूस के पक्ष में बार-बार अवरोध खड़ा करने वाली भूमिका से पीछे हटे। यदि ऐसा होता है, तो रूस के लिए यूरोप के भीतर एक उपयोगी राजनीतिक सहारा कमजोर पड़ेगा।
इसके साथ ही यूरोप के उन देशों के सामने भी नई परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है, जो अब तक हंगरी के विरोधी रुख की आड़ में रूस के प्रति अपेक्षाकृत नरम या सतर्क नीति अपनाए हुए थे। यदि Budapest का रुख बदलता है, तो ऐसे देशों को भविष्य में अपने वास्तविक मत और रणनीतिक प्राथमिकताएँ अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखनी पड़ सकती हैं।
(April) Reuters, ISW, politico, businessinsider
रूस – यूक्रेन युद्ध का बदलता स्वरूप: तकनीक, रणनीति और पश्चिमी सहायता की नई दिशा
रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल तोप, टैंक और सैनिकों का संघर्ष नहीं रह गया है। यह युद्ध अब तकनीक, डेटा, ड्रोन, रोबोटिक सिस्टम, रक्षा उद्योग, आर्थिक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के सहारे लड़ा जा रहा है। हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि यूक्रेन अब केवल अपनी रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि युद्ध की प्रकृति को बदलने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर अमेरिका अपनी प्रत्यक्ष भूमिका सीमित कर रहा है, जबकि यूरोप यूक्रेन की सहायता में अधिक सक्रिय होता दिखाई दे रहा है।
तकनीक आधारित युद्ध की ओर यूक्रेन का झुकाव
यूक्रेनी राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy ने हाल ही में कहा कि पहली बार युद्ध में एक रूसी position पर कब्ज़ा केवल unmanned platforms की मदद से किया गया। इस अभियान में ground robotic systems और aerial drones का उपयोग हुआ। इसमें न infantry भेजी गई और न ही यूक्रेन को किसी सैनिक हानि का सामना करना पड़ा। यह केवल एक tactical सफलता नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध के नए युग का संकेत है।
Delta System: यूक्रेन का डिजिटल युद्ध-मस्तिष्क
यूक्रेन ने अपनी combat units के लिए Delta system को अनिवार्य बनाया है। यह एक डिजिटल battlefield management platform है, जो frontline units, commanders और intelligence inputs को real-time में जोड़ता है। इसका लाभ यह है कि यूक्रेन अब केवल सामने मौजूद रूसी सैनिकों से नहीं लड़ रहा, बल्कि पूरे battlefield को एक network के रूप में देख रहा है। कौन-सी supply line कहाँ है, किस sector में कमजोरी है, किस स्थान पर drone strike करनी है — ऐसे निर्णय तेजी से लिए जा रहे हैं। युद्ध में सूचना जितनी तेज, प्रतिक्रिया उतनी प्रभावी होती है। Delta system ने यूक्रेन को यही क्षमता दी है।
यूक्रेन की उभरती सैन्य रणनीति
यूक्रेन की नई रणनीति यह प्रतीत होती है कि वह सीधे बड़े infantry assault की जगह पहले रूसी व्यवस्था को कमजोर करता है। इसके लिए वह:
- रूसी drone units Rubicon को target कर रहा है
- air defence systems पर हमला कर रहा है
- military bases और logistics nodes को निशाना बना रहा है
- rear positions पर precision strikes कर रहा है
जब battlefield कमजोर पड़ता है, तब सीमित ground push की जाती है। यही कारण है कि कुछ क्षेत्रों में यूक्रेन स्थानीय gains लेने में सफल रहा है।
युद्धक्षेत्र की गति और बदलता गति (momentum)
हाल के आकलनों के अनुसार रूस अब भी कुछ क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी territorial gains की गति पहले की तुलना में काफी धीमी हुई है। जहाँ पिछले वर्ष रूस औसतन प्रतिदिन 5 square miles से अधिक क्षेत्र पर बढ़त बना रहा था, वहीं अब यह दर घटकर लगभग 1 square mile प्रतिदिन रह गई है।
दूसरी ओर यूक्रेन ने चुनिंदा क्षेत्रों में counter gains हासिल किए हैं। उपलब्ध आकलनों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी दैनिक gains rate में 1.8 square miles प्रतिदिन से अधिक सुधार किया है। फरवरी के दौरान कुछ क्षेत्रों में यूक्रेन ने रूस द्वारा कब्ज़ा किए गए क्षेत्र से अधिक भूमि पुनः प्राप्त की।
यह व्यापक counter offensive नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि यूक्रेन battlefield initiative के छोटे-छोटे अवसर बना रहा है। युद्ध में केवल यह नहीं देखा जाता कि किसने कितनी जमीन ली, बल्कि यह भी देखा जाता है कि कौन momentum खो रहा है और कौन उसे पुनः प्राप्त कर रहा है।
रोबोटिक सिस्टम और मानव संसाधन संरक्षण
यूक्रेन ने बताया कि 2026 के पहले तीन महीनों में ground robotic systems ने 22,000 से अधिक missions पूरे किए। इसका अर्थ है कि हजारों बार उन क्षेत्रों में मशीनें भेजी गईं जहाँ मानव सैनिक भेजना अत्यंत खतरनाक होता।
इन robotic systems का उपयोग:
- घायल सैनिकों को निकालने
- reconnaissance missions
- forward assault support
- दुश्मन position पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे युद्ध में man power किसी भी देश की सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। यूक्रेन सैनिकों को बचाते हुए युद्ध लड़ने का मॉडल विकसित कर रहा है।
अमेरिकी नीति में परिवर्तन
अमेरिकी रक्षा विभाग के वरिष्ठ नीति अधिकारी Elbridge Colby ने कहा कि भविष्य में यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता महत्वपूर्ण (significant) अमेरिकी योगदान पर निर्भर नहीं रह सकती। उनके अनुसार यूरोप को अब महाद्वीप की conventional defence की प्राथमिक जिम्मेदारी लेनी होगी। यह बयान केवल नीति टिप्पणी नहीं, बल्कि अमेरिकी रणनीतिक दिशा का संकेत है। पिछले वर्षों में अमेरिका ने यूक्रेन को बड़े पैमाने पर हथियार और सैन्य सामग्री दी थी। इनमें से बहुत-सी सहायता अमेरिकी stockpiles से भेजी गई थी। अब वॉशिंगटन का तर्क है कि सीमित भंडार को लगातार खाली करना लंबे समय तक संभव नहीं है। राष्ट्रपति Donald Trump के कार्यकाल में नई अमेरिकी सैन्य सहायता लगभग समाप्त हो चुकी है। अब अमेरिका सीधे मुफ्त सहायता देने के बजाय हथियार बेचने को तैयार है, यदि उसके लिए सहयोगी देश भुगतान करें। यह बदलाव “grant model” से “purchase model” की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
यूरोप की बढ़ती भूमिका
यूक्रेन के लिए यह स्पष्ट है कि युद्ध जारी रखने हेतु बाहरी सहायता आवश्यक है। ऐसे में वह कई माध्यमों से संसाधन जुटाने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में यूरोपीय देश अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
Germany ने अतिरिक्त Patriot air defence missiles के वित्तपोषण की घोषणा की है। साथ ही IRIS-T systems (air defence system) और यूक्रेन में निर्मित long-range drones के लिए भी धन उपलब्ध कराया जा रहा है।
United Kingdom ने अपने वार्षिक सैन्य सहायता पैकेज के अंतर्गत 120,000 drones देने की घोषणा की है।
Netherlands ने drone capabilities के लिए सैकड़ों मिलियन यूरो निर्धारित किए हैं।
Belgium और Spain ने भी air defence, artillery और fighter support के लिए नई सहायता घोषित की है।
इन घोषणाओं से स्पष्ट है कि यूरोप अब केवल राजनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि सैन्य क्षमता निर्माण में भी आगे बढ़ रहा है।
सहायता के आँकड़े क्या बताते हैं
Kiel Support Tracker के अनुसार 2025 में अमेरिकी सैन्य सहायता में 99 प्रतिशत गिरावट आई। दूसरी ओर यूरोप ने अपनी सहायता बढ़ाई:
- वित्तीय और मानवीय सहायता में 59 प्रतिशत वृद्धि
- सैन्य सहायता में 67 प्रतिशत वृद्धि
इसके परिणामस्वरूप कुल सहायता स्तर पिछले वर्षों के करीब बना रहा।
सबसे बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है
सहायता घोषणाओं के बावजूद यूक्रेन अभी भी air defence systems की कमी से जूझ रहा है। विशेष रूप से रूसी ballistic missiles को रोकने के लिए पर्याप्त systems उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी समस्या यह है कि पश्चिमी रक्षा उद्योग मांग की गति के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रहा। अर्थात धन और राजनीतिक इच्छा पर्याप्त हो सकती है, परंतु औद्योगिक क्षमता अभी भी बाधा बनी हुई है।
निष्कर्ष
यूक्रेन अब केवल मोर्चे पर टिके रहने की कोशिश नहीं कर रहा। वह युद्ध को अधिक बुद्धिमान, अधिक तकनीकी और कम मानव-हानि वाला बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। Delta system, precision strikes, drones और robotic systems मिलकर उसकी नई सैन्य सोच को आकार दे रहे हैं।
दूसरी ओर युद्ध का अंतरराष्ट्रीय पक्ष भी बदल रहा है। अमेरिका प्रत्यक्ष सहायता से दूरी बना रहा है, जबकि यूरोप धीरे-धीरे उसकी जगह लेने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में यह युद्ध केवल frontline पर नहीं, बल्कि factories, budgets, parliaments और alliances के भीतर भी तय होगा।
रूस के पास संख्या और संसाधन हो सकते हैं, लेकिन यूक्रेन का प्रयास दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध में innovation, coordination और sustained external support भी निर्णायक शक्ति बन सकते हैं।
(April) Reuters, ISW
ईरान–इज़राइल–अमेरिका संघर्ष: प्रमुख घटनाएँ और विस्तार (13 अप्रैल – 19 अप्रैल 2026)
13 से 19 अप्रैल के बीच ईरान से जुड़ा संकट केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परमाणु वार्ताओं, समुद्री मार्गों, आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय कूटनीति के स्तर पर तेजी से आगे बढ़ा। इस सप्ताह Strait of Hormuz संघर्ष का मुख्य केंद्र बना रहा, जहाँ अमेरिका और ईरान दोनों ने दबाव तथा वार्ता की समानांतर रणनीति अपनाई।
13अप्रैल
अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz को लेकर अटक गई। अमेरिकी पक्ष ने uranium enrichment पर 20 वर्ष की रोक, enriched uranium stockpile बाहर भेजने और Hormuz में निर्बाध shipping की शर्त रखी। ईरान ने इन शर्तों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। उसने enrichment पर लंबी रोक के बजाय कम अवधि का प्रस्ताव दिया और stockpile बाहर भेजने के स्थान पर उसे down blend करने का विकल्प रखा। इसी दौरान US Central Command ने ईरानी shipping पर दबाव बढ़ाया, जबकि अन्य जहाजों के लिए मार्ग खुला रखने की कोशिश की। इस प्रकार वार्ता और दबाव नीति साथ-साथ चल रही है।
(Down blend = खतरनाक स्तर तक enriched uranium को कम शक्तिशाली स्तर पर बदलना।)
14 अप्रैल
US Central Command ने कहा कि 13 अप्रैल से लागू maritime blockade के बाद किसी vessel ने Iranian port restrictions breach नहीं किया। साथ ही अमेरिका ने Iranian oil exports पर sanctions waiver renew न करने का संकेत दिया, जिससे ईरान के तेल निर्यात पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा। इसी बीच दोनों पक्षों ने Islamabad channel के माध्यम से आगे की वार्ता की संभावना खुली रखी, जिससे टकराव और बातचीत साथ-साथ चलते दिखाई दिए।
15 अप्रैल
अमेरिका ने ईरान के साथ बातचीत के अगले दौर के लिए दो स्पष्ट शर्तें रखीं। पहली, Strait of Hormuz को पूरी तरह फिर से खोला जाए, ताकि समुद्री आवाजाही सामान्य हो सके। दूसरी, ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पास किसी संभावित समझौते को अंतिम रूप देने का पूर्ण अधिकार हो।
उधर Pakistan ने अमेरिका और ईरान दोनों पर 45 दिनों के लिए संघर्ष-विराम बढ़ाने का दबाव बनाया। हालांकि Donald Trump ने संकेत दिया कि 22 अप्रैल को समाप्त हो रहे ceasefire को आगे बढ़ाने पर वे सहमत नहीं हैं।
इसी बीच ईरान ने मौजूदा विराम का उपयोग अपनी सैन्य क्षमताओं को पुनर्गठित करने में करना शुरू किया। रिपोर्टों के अनुसार वह missile bases पर सुरंग प्रवेश द्वार फिर से खोलकर अपने ballistic missile network को सक्रिय करने की कोशिश कर रहा है। साथ ही खबरें सामने आईं कि ईरान ने 2024 में China से खरीदे गए एक advanced reconnaissance satellite का उपयोग युद्ध के दौरान मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और assets की निगरानी के लिए किया। उधर Israel की security cabinet ने Lebanon में संभावित ceasefire पर विचार करने के लिए बैठक की। इस प्रकार क्षेत्रीय मोर्चों पर समानांतर कूटनीतिक प्रयास भी जारी रहे।
16 अप्रैल
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता का मुख्य विवाद uranium enrichment और ईरान के highly enriched uranium stockpile पर केंद्रित रहा। इससे संकेत मिला कि nuclear मुद्दा अब भी किसी संभावित समझौते की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। इसी बीच रिपोर्टों में कहा गया कि इन वार्ताओं में Islamic Revolutionary Guard Corps की भूमिका बढ़ी है। परंपरागत रूप से ऐसे निर्णय ईरान के नागरिक नेतृत्व के दायरे में माने जाते रहे हैं। ट्रम्प ने घोषणा की कि Israel और Lebanon 10 दिन के ceasefire पर सहमत हुए हैं। हालांकि Benjamin Netanyahu ने कहा कि स्थायी शांति के लिए Hezbollah को disarm करना होगा।
17 अप्रैल
IRGC ने Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों के लिए नई शर्तें रखीं। इन शर्तों के अनुसार केवल गैर-शत्रु देशों के commercial vessels को गुजरने की अनुमति होगी, जहाजों को ईरान द्वारा स्वीकृत route से जाना होगा, और passage के लिए Iranian forces से समन्वय करना होगा। इसी दिन IRGC ने ईरानी विदेश मंत्री Abbas Araghchi की उस टिप्पणी की आलोचना की, जिसमें उन्होंने Hormuz को “पूरी तरह खुला” बताया था। इससे Tehran के भीतर नीति स्तर पर मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए। उधर अमेरिकी नाकाबंदी के बीच कोई Iranian-linked vessel blockade line पार नहीं कर सका। US Central Command ने कहा कि 19 जहाजों ने अमेरिकी निर्देश पर वापसी की, जबकि गैर-ईरानी जहाजों की आवाजाही जारी रही।
18 अप्रैल
IRGC ने Strait of Hormuz से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर और कड़ा रुख अपनाते हुए घोषणा की कि किसी भी प्रकार या किसी भी देश के जहाज को passage की अनुमति नहीं होगी। इससे क्षेत्रीय shipping और ऊर्जा बाजार पर नया दबाव बना। IRGC से जुड़े माध्यमों ने यह भी कहा कि अमेरिकी मांगों को अत्यधिक मानते हुए ईरान ने फिलहाल अगली वार्ता पर सहमति नहीं दी है। कूटनीतिक प्रक्रिया फिर अनिश्चित हो गई है। उधर US Central Command ने बताया कि अमेरिकी blockade जारी है और अब तक 23 जहाजों को वापस मोड़ा जा चुका है।
19 अप्रैल
IRGC ने संकेत दिया कि Strait of Hormuz पर उसका सख्त रुख जारी रहेगा। दूसरी ओर अमेरिकी पक्ष ने कहा कि ईरान समुद्री मार्ग को दबाव या blackmail के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता। उधर Pakistan ने अगले सप्ताह अमेरिका और ईरान के बीच नई वार्ता की संभावना जताई। इस प्रकार टकराव के बीच कूटनीतिक चैनल अब भी खुले हुए हैं।
इस सप्ताह के घटनाक्रमों से स्पष्ट हुआ कि ईरान संकट अब केवल अमेरिका और ईरान के बीच सीमित विवाद नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक क्षेत्रीय राजनीति और शक्ति-संतुलन पर पड़ रहा है। Pakistan ने मध्यस्थ भूमिका निभाने के साथ Gulf देशों से अपने संबंध मजबूत किए। Saudi Arabia ने Pakistan को 3 अरब डॉलर की अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने पर सहमति दी, जबकि पहले से मौजूद 5 अरब डॉलर की जमा सहायता व्यवस्था भी आगे बढ़ाई गई। यह Pakistan की आर्थिक स्थिति को सहारा देने और Gulf-पक्षीय समीकरणों को मजबूत करने वाला कदम माना गया।
समानांतर रूप से Pakistan ने Saudi Arabia में fighter jets और support aircraft भेजे, जिनका घोषित उद्देश्य संयुक्त रक्षा सहयोग, operational readiness और क्षेत्रीय सुरक्षा समन्वय था। इससे संकेत मिला कि क्षेत्रीय देश इस संकट को केवल कूटनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा चुनौती के रूप में भी देख रहे हैं।
आने वाले समय में यह संघर्ष केवल वार्ता मेज़ या सैन्य मोर्चे पर नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार मार्गों, ऊर्जा बाज़ारों और बदलते क्षेत्रीय गठबंधनों के भीतर भी तय होगा।
(17April) PIB, Indian express, bbc, mongabay
केन-बेतवा परियोजना: उद्देश्य, प्रभाव और वर्तमान आन्दोलन का प्रश्न
केन-बेतवा परियोजना भारत की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना है जिसे क्रियान्वयन स्तर तक लाया गया है। इसके अंतर्गत केन नदी का जल बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जाना है। दोनों नदियाँ यमुना नदी की सहायक नदियाँ हैं। परियोजना के अंतर्गत लगभग 221 किलोमीटर लंबी नहर, सुरंग, बाँध तथा अन्य संरचनाएँ बनाई जानी हैं। इसका मुख्य केंद्र दौधन बाँध है, जो मध्य प्रदेश में प्रस्तावित है। यह परियोजना राष्ट्रीय नदी जोड़ो योजना का हिस्सा है, जिसकी अवधारणा 1980 में रखी गई थी।
परियोजना कब शुरू हुई?
केन-बेतवा लिंक का विचार लंबे समय से चर्चा में रहा है। वर्ष 2005 में केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के लिए समझौता हुआ। 2008 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। 22 मार्च 2021 को जल शक्ति मंत्रालय तथा दोनों राज्यों के बीच औपचारिक समझौता हुआ। दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लगभग ₹44,605 करोड़ की स्वीकृति दी। इसके बाद परियोजना के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया गया।
सरकार के अनुसार संभावित लाभ
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार इस परियोजना से:
- लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी
- लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा
- 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य है
- बुंदेलखंड क्षेत्र के कई जिलों को जल संकट से राहत मिलने का दावा किया गया है
लाभार्थी जिलों में पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, रायसेन, झाँसी, ललितपुर, बांदा और महोबा आदि शामिल बताए गए हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव
परियोजना का सबसे अधिक विवादित पक्ष इसका पर्यावरणीय प्रभाव है। आधिकारिक पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के अनुसार दौधन जलाशय से लगभग 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र डूब क्षेत्र में आएगा। इसमें:
- Panna Tiger Reserve का लगभग 4,141 हेक्टेयर कोर क्षेत्र
- लगभग 1,314 हेक्टेयर बफर क्षेत्र
प्रभावित होने की बात कही गई है। अन्य रिपोर्टों में पन्ना टाइगर रिजर्व के लगभग 10 प्रतिशत हिस्से पर प्रभाव की आशंका व्यक्त की गई है। सरकारी दस्तावेज़ों में लगभग 6,809 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन का उल्लेख मिलता है। पेड़ों की कटाई परियोजना के सबसे विवादित पहलुओं में शामिल हैं। विभिन्न रिपोर्टों में लगभग 20 से 30 लाख पेड़ों के कटने या डूबने की संभावना व्यक्त की गई है। यदि ऐसा होता है तो इसका प्रभाव केवल वृक्ष संख्या तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय तापमान, जैव विविधता, मिट्टी संरक्षण और वर्षा चक्र पर भी पड़ सकता है।
वन्यजीवों पर प्रभाव
पन्ना क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वर्ष 2009 में यहाँ बाघों की स्थानीय समाप्ति के बाद पुनर्स्थापन कार्यक्रम चलाया गया था। बाद में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई। बड़े बाँध, जलाशय और निर्माण गतिविधियाँ इस संरक्षण प्रयास को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त नीचे की धारा में स्थित घड़ियाल संरक्षण क्षेत्र, गिद्धों के घोंसले वाले क्षेत्र तथा अन्य वन्यजीव आवासों पर भी प्रभावित होने की पूरी संभावना है।
वर्षा और जलवायु पर अध्ययन
IIT Bombay के वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में बड़े पैमाने पर नदी जोड़ो परियोजनाओं से भूमि की नमी, वाष्पोत्सर्जन, वायु प्रवाह और वर्षा चक्र पर प्रभाव की संभावना जताई गई।
अध्ययन के अनुसार सितंबर माह में कुछ क्षेत्रों में औसत वर्षा में कमी देखी जा सकती है:
- ओडिशा – लगभग 12% कमी
- आंध्र प्रदेश – लगभग 10% कमी
- राजस्थान, गुजरात – लगभग 9% कमी
- मध्य भारत के कुछ भाग – लगभग 8% कमी
वहीं कुछ क्षेत्रों में वर्षा बढ़ने की संभावना भी व्यक्त की गई:
- बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश – लगभग 12% वृद्धि
- महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ भाग – लगभग 10% वृद्धि
अर्थात अध्ययन के अनुसार नदी जोड़ो परियोजनाएँ वर्षा को समान रूप से प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न कर सकती हैं।
विस्थापन और पुनर्वास
परियोजना से प्रभावित परिवारों की संख्या अलग-अलग स्रोतों में भिन्न बताई गई है। आधिकारिक उत्तरों में 10 गाँवों के लगभग 1,913 परिवारों के प्रभावित होने का उल्लेख है। अन्य रिपोर्टों में छतरपुर और पन्ना जिलों के 21 गाँवों तथा लगभग 7,000 परिवारों के विस्थापन की बात कही गई है।
सरकार ने पुनर्वास योजना Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 के अनुसार तैयार किए जाने की बात कही है।
वर्तमान आन्दोलन क्यों हो रहा है?
हाल के महीनों में परियोजना क्षेत्र में ग्रामीणों द्वारा आन्दोलन किया गया, जिसके कारण निर्माण कार्य भी प्रभावित हुआ। मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के धौड़न गाँव क्षेत्र में प्रभावित ग्रामीण कई दिनों तक धरने पर बैठे रहे। बाद में प्रशासन से बातचीत के बाद आन्दोलन अस्थायी रूप से स्थगित किया गया।
ग्रामीणों की मुख्य माँगें थीं:
- घर के बदले घर
- ज़मीन के बदले ज़मीन
- गाँव के बदले गाँव
- उचित मुआवज़ा
- पारदर्शी पुनर्वास व्यवस्था
ग्रामीणों का आरोप था कि:
- घरों और ज़मीन का मूल्यांकन बहुत कम किया गया
- भुगतान में देरी हुई
- मुआवज़ा पाने में प्रशासनिक कठिनाइयाँ आईं
- कुछ मामलों में रिश्वत माँगे जाने के आरोप भी लगाए गए
प्रशासन का पक्ष
स्थानीय प्रशासन ने मुआवज़े के वितरण, शिकायतों की जाँच और समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया है। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार बड़ी राशि प्रभावित लोगों में वितरित की जा चुकी है तथा शेष शिकायतों पर कार्यवाही की जा रही है।
कानूनी और संस्थागत प्रश्न
परियोजना के कानूनी और संस्थागत पक्ष भी उल्लेखनीय हैं। Supreme Court of India की केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) ने पूर्व में परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता, वैकल्पिक सिंचाई उपायों तथा वन्यजीव प्रभावों पर प्रश्न उठाए थे। कुछ मामलों में पर्यावरणीय और वन्यजीव स्वीकृतियों को लेकर न्यायिक स्तर पर भी विवाद रहे हैं। अंतिम वन स्वीकृति कई शर्तों के साथ दी गई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि परियोजना को सामान्य निर्माण योजना की तरह नहीं देखा गया।
निष्कर्ष
केन-बेतवा परियोजना को केवल सिंचाई या केवल पर्यावरण के प्रश्न के रूप में नहीं देखा जा सकता। एक ओर सरकार इसे बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए जल, कृषि और ऊर्जा समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर वन क्षेत्र, पन्ना टाइगर रिजर्व, वर्षा पैटर्न, विस्थापन, मुआवज़ा और पुनर्वास से जुड़े गंभीर प्रश्न लगातार उठ रहे हैं।
उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि यह परियोजना केवल इंजीनियरिंग निर्माण नहीं, बल्कि विकास, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़ा व्यापक विषय है।
(17April) PIB
डीलिमिटेशन और महिला आरक्षण से जुड़े 2026 के विधायी प्रस्ताव
भारत सरकार ने हाल ही में तीन महत्त्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत किए हैं, जिनका उद्देश्य नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण (डीलिमिटेशन) करना, लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाना और संसद तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करना है। यह पूरा कदम 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून से भी जुड़ा है, क्योंकि उस कानून के लागू होने को नई जनगणना और डीलिमिटेशन प्रक्रिया से जोड़ा गया था।
वर्तमान लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं। यह सीट व्यवस्था लंबे समय से 1971 की जनगणना के आधार पर बनी हुई है और बाद के दशकों में इसे स्थिर रखा गया था, ताकि राज्यों के बीच सीटों का अनुपात तुरंत न बदले। यह व्यवस्था 2026 तक प्रभावी मानी जाती है। अब सरकार नई जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण करना चाहती है।
नए प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 तक की जा सकती है। इसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटों का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाना बताया गया है।
नई जनगणना के प्रकाशित आँकड़ों के आधार पर पूरे देश में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ दोबारा तय की जाएँगी। इससे कई राज्यों में सीटों की संख्या और संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं में परिवर्तन संभव है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जाएगा। प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षित वर्गों में भी महिलाओं के लिए समान अनुपात लागू होगा। आरक्षित सीटों का निर्धारण रोटेशन के आधार पर किया जाएगा। यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा।
डीलिमिटेशन की पूरी प्रक्रिया के लिए एक आयोग गठित किया जाएगा, जो राज्यों के बीच सीटों का आवंटन करेगा, निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएँ तय करेगा और आरक्षण व्यवस्था लागू करेगा। प्रारूप प्रकाशित किया जाएगा, उस पर आपत्तियाँ ली जाएँगी और सार्वजनिक सुनवाई भी कराई जा सकती है। वर्तमान स्थिति में नई जनगणना अभी पूरी नहीं हुई है। इसलिए इन प्रस्तावों का वास्तविक क्रियान्वयन जनगणना के बाद ही आगे बढ़ेगा।
परन्तु यह विधेयक संसद से पारित नहीं हो सका, इसलिए फिलहाल 1971 की जनगणना पर आधारित वर्तमान सीट व्यवस्था यथावत बनी रहेगी। लोकसभा के विस्तार, नई जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण और महिला आरक्षण के तत्काल क्रियान्वयन से जुड़े प्रस्ताव अभी लागू नहीं हुए हैं।
