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- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
- (26)Weekly News Update (13 April – 18 April) Iran Ukrain war, ken-betwa Pariyojana, Hungary election
- (27)Weekly News Update 20 April – 25 April(Iran war Update,SIR,Bulgaria election etc)
- (28)Weekly News Update 26 April – 2 May 2026 (Iran war, ACR SMART TV,Cyborg Botany,Methanol-Ethanol Production)
(26 April) Aljazeera, isw
ईरान–इज़राइल–अमेरिका संघर्ष: प्रमुख घटनाएँ और विस्तार (26 अप्रैल – 3 मई 2026)
इस सप्ताह ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच जारी तनाव ने कूटनीतिक प्रयासों, सैन्य गतिविधियों और आर्थिक दबावों के जटिल मिश्रण को सामने रखा। इस दौरान संघर्षविराम की कोशिशों के बावजूद क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक प्रभाव लगातार बढ़ते दिखाई दिए।
26 अप्रैल
अमेरिका ने दावा किया कि उसे ईरान की ओर से एक नया शांति प्रस्ताव मिला था, जिसे पहले ही अस्वीकार कर दिया गया। ईरान के राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि देश “दबाव या नाकेबंदी के तहत बातचीत” नहीं करेगा और वार्ता से पहले अमेरिका को अपने “ऑपरेशनल अवरोध”, विशेषकर बंदरगाहों पर लगी नाकेबंदी, हटानी होगी। इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मिस्र और तुर्किये के विदेश मंत्रियों के साथ क्षेत्रीय स्थिति और युद्धविराम पर चर्चा की।
सैन्य स्तर पर अमेरिकी केंद्रीय कमान ने ईरान से जुड़े एक जहाज को रोकने की जानकारी दी, जो ईरानी तेल और गैस उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचा रहा था। ईरान ने जैश अल-अदल से जुड़े एक व्यक्ति को सुरक्षा बलों पर हमलों के आरोप में मृत्युदंड दिया। अमेरिका में ट्रम्प ने वार्ता रद्द करने का कारण “अपर्याप्त प्रस्ताव” और अधिक खर्च बताया, साथ ही यह भी कहा कि ईरान के नेतृत्व में “अव्यवस्था और आंतरिक मतभेद” हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि वार्ता के लिए पहल ईरान को ही करनी होगी।
लेबनान मोर्चे पर, इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले के आदेश दिए, जिससे तीन सप्ताह के युद्धविराम पर दबाव बढ़ा।
27 अप्रैल
ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज किए। विदेश मंत्री अब्बास अराघची पाकिस्तान और ओमान के बाद रूस पहुँचे, जहाँ वे क्षेत्रीय स्थिति और संघर्ष पर चर्चा करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में हुई बातचीत सार्थक रही और इसमें अमेरिका के साथ वार्ता आगे बढ़ाने की शर्तों पर विचार किया गया। ईरान और ओमान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञ स्तर की बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई।
तनाव के प्रमुख मुद्दों में ईरान का परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz तक पहुँच शामिल है, जिस पर ईरान का प्रभावी नियंत्रण बना हुआ है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने स्पष्ट किया कि होर्मुज़ पर नियंत्रण उसकी रणनीति का हिस्सा है और उसे हटाने का कोई इरादा नहीं है।
इसी बीच लेबनान मोर्चे पर संघर्ष बढ़ा, जहाँ इज़राइली हमलों में कम से कम 14 लोगों की मौत और 37 घायल होने की खबर है, जिससे युद्धविराम पर दबाव बढ़ा है।
28 अप्रैल
ट्रम्प की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम ईरान के शांति प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य युद्ध को रोकना और Strait of Hormuz को फिर से खोलना है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ईरान के विदेश मंत्री ने पुतिन से मुलाकात कर संकेत दिया कि तेहरान अमेरिका के साथ वार्ता फिर शुरू करने पर विचार कर रहा है, हालांकि अभी स्थिति गतिरोध में है। इस बीच, कई देशों और Antonio Guterres ने Hormuz जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने की मांग की है। ईरान ने अमेरिका पर वार्ता विफल करने का आरोप लगाया और तेल टैंकरों की जब्ती को “समुद्री डकैती” बताया, साथ ही इस मार्ग पर सैन्य नियंत्रण की योजना भी जताई। खाड़ी देशों ने ईरान के प्रस्ताव के प्रति सकारात्मक संकेत दिए हैं, जिससे कूटनीतिक समाधान की संभावना बनी हुई है।
इज़राइल-लेबनान मोर्चे पर तनाव जारी है – एक इज़राइली सैनिक की मौत हुई है और इज़राइल ने हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले किए हैं। इस दौरान, नेतान्याहू ने दावा किया कि Hezbollah के पास अब केवल लगभग 10% हथियार बचे हैं, हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
29 अप्रैल
ईरान के सेन्य प्रवक्ता ने दावा किया कि छह सप्ताह के युद्ध में ईरानी वायुसेना ने 170 से अधिक दुश्मन विमानों को निशाना बनाया और अमेरिकी रक्षा प्रणाली को भेदने में सफलता पाई। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी हमले का “और भी कठोर जवाब” दिया जाएगा। कूटनीतिक मोर्चे पर, ट्रम्प ने जर्मनी के चांसलर की आलोचना की, जबकि यमन के Houthis ने ईरान का समर्थन करते हुए लाल सागर के महत्वपूर्ण मार्ग Bab al-Mandeb Strait को बंद करने की चेतावनी दी। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा है – UAE ने लगभग 60 साल बाद OPEC छोड़ने का ऐलान किया, जबकि Gulf Cooperation Council देशों ने Hormuz जलडमरूमध्य को बंद करने की किसी भी कोशिश का विरोध किया और क्षेत्रीय सुरक्षा बढ़ाने पर जोर दिया।
अमेरिका में, ट्रंप प्रशासन ने ईरान की तेल आय और आर्थिक नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने का दावा किया है। ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान “सैन्य रूप से कमजोर” हो चुका है, हालांकि अमेरिका परमाणु वार्ता टालने के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं दिख रहा, जिससे स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। इस बीच, ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप की लोकप्रियता घटकर 34% तक पहुंच गई है।
इज़राइल में आंतरिक विरोध भी देखने को मिला, जहां भर्ती (conscription) के खिलाफ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस अधिकारी के घर पर हमला किया।
लेबनान में इज़राइली हमलों में कई लोगों की मौत हुई, जबकि Hezbollah ने ड्रोन और रॉकेट हमले तेज कर दिए हैं, जिससे संघर्षविराम की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है।
30 अप्रैल
ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिकी नाकेबंदी को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए इसे असफल करार दिया, जबकि संसद अध्यक्ष ने कहा कि इससे तेल उत्पादन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है। इसके विपरीत, अमेरिका नाकेबंदी को और लंबा करने की तैयारी में है और अब तक इस युद्ध की लागत लगभग 25 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है।
इसी बीच, पुतिन और ट्रम्प के बीच बातचीत में संघर्षविराम बनाए रखने पर जोर दिया गया, हालांकि परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। दूसरी ओर, इज़राइल ने ईरान के खिलाफ फिर से कार्रवाई की चेतावनी दी है, जबकि लेबनान में जारी हमलों की वर्तमान राष्ट्रपति Joseph Aoun ने कड़ी निंदा की।
1 मई
तेहरान में ड्रोन और छोटे विमानों के खतरे के बीच ईरान की वायु रक्षा प्रणाली सक्रिय की गई। विश्लेषकों का मानना है कि वर्षों से कड़े प्रतिबंध झेलने के कारण ईरान ऐसी आर्थिक और सैन्य दबाव की स्थितियों के लिए पहले से तैयार है, जिससे मौजूदा नाकेबंदी का असर सीमित रह सकता है। इसी बीच, इज़राइल के रक्षा मंत्री ने ईरान के खिलाफ दोबारा कार्रवाई की चेतावनी दी। लेबनान में संघर्षविराम के बावजूद इज़राइली हमलों में कई लोगों की मौत हुई, जबकि एक ड्रोन हमले में दो इज़राइली सैनिक घायल हुए।
कूटनीतिक स्तर पर गतिरोध बना हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान को तुरंत वार्ता के लिए मजबूर करना कठिन है, हालांकि बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव भविष्य में बातचीत की संभावना को बनाए रखे हुए है। अमेरिका ने इज़राइल और लेबनान के बीच वार्ता की अपील की है। इस बीच, ट्रम्प ने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर युद्ध फिर से शुरू किया जा सकता है, भले ही फिलहाल संघर्षविराम लागू है।
खाड़ी क्षेत्र में, UAE ने अपने नागरिकों को ईरान, लेबनान और इराक छोड़ने की सलाह दी है। वहीं, अमेरिका में युद्ध के दौरान नागरिक हताहतों को लेकर आलोचना बढ़ रही है – मानवाधिकार संगठनों के अनुसार अब तक 1700 से अधिक नागरिकों की मौत हो चुकी है, जिससे सैन्य कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
2 मई
ईरान में जांजान प्रांत में बारूदी अवशेष (unexploded ordnance) निष्क्रिय करते समय 14 सैनिकों की मौत हो गई। इसी बीच, देश के सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei ने जनता से “आर्थिक युद्ध” लड़ने का आह्वान किया, जबकि IRGC नौसेना ने अपने तटीय जलक्षेत्र में नए नियम लागू करने की घोषणा की।
कूटनीतिक स्तर पर, अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात से जुड़े संस्थानों पर नए प्रतिबंध लगाए, जिन्हें चीन ने “एकतरफा और अवैध” बताया। साथ ही, अमेरिका ने मध्य पूर्व के सहयोगी देशों को अरबों डॉलर के हथियार सौदों को मंजूरी दी।
अमेरिका में, ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव पर असंतोष जताया, हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्ष “सम्मान बचाते हुए” युद्ध समाप्त करना चाहते हैं। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि ईरान में सैन्य गतिविधियां समाप्त हो चुकी हैं, जबकि अमेरिका ने नए आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए हैं। सैन्य मोर्चे पर, अमेरिकी विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford मध्य पूर्व से लौट गया, हालांकि अन्य पोत अभी भी क्षेत्र में तैनात हैं, जिससे अमेरिका की सैन्य उपस्थिति बनी हुई है।
लेबनान में संघर्षविराम के बावजूद इज़राइली हमले जारी हैं – हमलों में कई लोगों की मौत हुई।
3 मई
ईरान ने संघर्षविराम बढ़ाने के बजाय युद्ध को पूरी तरह समाप्त करने पर जोर दिया है। Tasnim News Agency के अनुसार, तेहरान के 14-सूत्रीय प्रस्ताव में अमेरिकी प्रतिबंध हटाने, नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने, जमी हुई संपत्तियों की वापसी और क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी जैसी मांगें शामिल हैं। वहीं IRGC ने संकेत दिया कि युद्ध दोबारा शुरू होने की संभावना बनी हुई है।
इस बीच, अमेरिका ने मध्य पूर्व के सहयोगी देशों को 8.6 अरब डॉलर के सैन्य सौदों को मंजूरी दी है और ट्रम्प ने ईरान के प्रस्ताव पर विचार करते हुए चेतावनी दी कि “गलत कदम” होने पर हमले फिर शुरू हो सकते हैं। साथ ही, अमेरिका Hormuz क्षेत्र में समुद्री आवागमन सुनिश्चित करने के लिए एक नए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (Maritime Freedom Construct) बनाने की कोशिश कर रहा है।
आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर, ईरान ने नाकेबंदी के बावजूद तेल निर्यात जारी रखा है, जबकि क्षेत्रीय व्यापार मार्गों में बदलाव भी देखने को मिल रहा है।
लेबनान में संघर्षविराम के बावजूद इज़राइल के व्यापक हवाई हमलों में दर्जनों लोगों की मौत हुई है और कई क्षेत्रों में लोगों को घर छोड़ने की चेतावनी दी गई है। धार्मिक स्थलों पर हमलों को लेकर भी आलोचना बढ़ रही है।
इस बीच, ईरान अमेरिकी – इजराइल हमलों में निष्क्रिय (unexploded) मिसाइलों और बमों का विश्लेषण कर उन्हें reverse engineering के माध्यम से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। वहीं, अमेरिकी पाबंदियों के बावजूद पाकिस्तान द्वारा ईरान के लिए स्थलीय व्यापार मार्ग खोले जाने और चीन जैसे देशों द्वारा ईरानी तेल की खरीद जारी रहने से प्रतिबंधों का असर सीमित होता दिख रहा है। साथ ही, संघर्षविराम के बावजूद लगातार हमलों से इसकी स्थिरता पर सवाल बने हुए हैं और यह संघर्ष Hezbollah व Houthis जैसे प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से क्षेत्रीय स्तर पर और अधिक जटिल होता जा रहा है।
(30 April) TOI
ACR तकनीक और स्मार्ट टीवी: गोपनीयता पर बढ़ता वैश्विक संकट
भारत में स्मार्ट टीवी के तेजी से फैलाव ने एक नई और गंभीर चिंता को जन्म दिया है – क्या हमारा टीवी हमें देख रहा है? इस चिंता के केंद्र में है एक तकनीक, जिसे ऑटोमैटिक कंटेंट रिकग्निशन (ACR) कहा जाता है।
समस्या
ACR एक ऐसी प्रणाली है जो टीवी स्क्रीन पर चल रहे कंटेंट को पहचान सकती है। यह केवल OTT ऐप्स (Netflix, You tube etc) तक सीमित नहीं है, बल्कि HDMI के जरिए जुड़े लैपटॉप, सेट-टॉप बॉक्स या गेमिंग कंसोल से चल रहे कंटेंट को भी ट्रैक कर सकती है। इस प्रक्रिया में टीवी स्क्रीन के पिक्सल पैटर्न या ऑडियो संकेतों का विश्लेषण कर कंटेंट का “डिजिटल फिंगरप्रिंट” बनाया जाता है। इसके बाद यह जानकारी डेटा 30के रूप में कंपनियों या तीसरे पक्ष को भेजी जा सकती है। इसका अर्थ है कि उपयोगकर्ता की देखने की आदतें, रुचियां और व्यवहार लगातार रिकॉर्ड किए जा सकते हैं – अक्सर उनकी स्पष्ट जानकारी या समझ के बिना।
समस्या का कारण
इस समस्या की जड़ तकनीकी और व्यावसायिक दोनों है। पहला, ACR अक्सर टीवी में पहले से चालू (default enabled) होता है, और उपयोगकर्ता जटिल गोपनीयता शर्तों को बिना पढ़े स्वीकार कर लेते हैं।
दूसरा, कंपनियां इस डेटा का उपयोग विज्ञापन और बाजार विश्लेषण के लिए करती हैं। दर्शकों की पसंद और व्यवहार का विस्तृत प्रोफाइल बनाकर उन्हें लक्षित विज्ञापन दिखाना एक बड़ा व्यापार मॉडल बन चुका है।
तीसरा, पारदर्शिता की कमी है। अधिकतर कंपनियां स्पष्ट रूप से यह नहीं बतातीं कि डेटा कितना एकत्र किया जा रहा है और उसका उपयोग कैसे हो रहा है।
विश्व स्तर पर प्रभाव
यह मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका और यूरोप में भी ACR आधारित ट्रैकिंग को लेकर गंभीर चिंताएं उठ चुकी हैं। कुछ मामलों में कंपनियों पर बिना स्पष्ट सहमति के डेटा एकत्र करने के लिए जुर्माना भी लगाया गया है। वैश्विक स्तर पर इसका प्रभाव तीन मुख्य रूपों में देखा जा सकता है:
- गोपनीयता का ह्रास – उपयोगकर्ता का निजी जीवन, यहां तक कि व्यक्तिगत या संवेदनशील सामग्री भी, ट्रैकिंग के दायरे में आ सकती है।
- डिजिटल निगरानी का विस्तार – टीवी जैसे पारंपरिक उपकरण अब डेटा संग्रह के सक्रिय माध्यम बन गए हैं, जिससे निगरानी का दायरा बढ़ गया है।
- नियामक दबाव में वृद्धि – विभिन्न देशों में डेटा सुरक्षा कानूनों को सख्त किया जा रहा है, जिससे कंपनियों पर पारदर्शिता और सहमति सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ रहा है।
(30 April) www.snexplores.org, TH
पौधों में तकनीक का विस्तार: ‘साइबोर्ग बॉटनी(Cyborg Botany)’ की उभरती दिशा
ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण निगरानी, कृषि प्रबंधन और उन्नत रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाओं को देखते हुए वैज्ञानिक पौधों और तकनीक के संयोजन पर काम कर रहे हैं। हाल के वर्षों में इस दिशा में हुए प्रयासों को व्यापक रूप से “साइबोर्ग बॉटनी” कहा जा रहा है, जिसमें पौधों के भीतर इलेक्ट्रॉनिक और नैनो-स्तर के घटकों को जोड़कर उन्हें डेटा देने वाली जैव-तकनीकी प्रणालियों के रूप में विकसित किया जा रहा है।
इस तकनीक के केंद्र में पौधों की आंतरिक संरचना और उनके प्राकृतिक जैव-विद्युत संकेतों को कृत्रिम प्रणालियों से जोड़ना है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने ऐसे पॉलिमर का उपयोग किया है जो विद्युत का संचालन कर सकते हैं। इन पॉलिमर अणुओं को पानी में मिलाकर पौधों को उसमें रखा जाता है। पौधे जब पानी को अपनी नलिकाओं (xylem) के माध्यम से ऊपर खींचते हैं, तो ये अणु भी भीतर प्रवेश कर जाते हैं और आपस में जुड़कर एक पतली, निरंतर रेखा के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया से पौधे के भीतर एक विद्युत मार्ग बनता है, जिससे वह एक प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक सर्किट प्रणाली का हिस्सा बन जाता है।
इसी प्रका
र, नैनो-प्रौद्योगिकी के माध्यम से सूक्ष्म कणों को पौधों की कोशिकाओं के भीतर प्रवेश कराया जा रहा है। इन कणों को इस प्रकार तैयार किया जाता है कि वे कोशिका की दीवार पार कर क्लोरोप्लास्ट तक पहुंच सकें, जहां प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया होती है। ऐसे कण “नैनो-एंटीना” की तरह कार्य करते हैं, जिससे पौधों की प्रकाश अवशोषण क्षमता में वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ प्रयोगों में यह वृद्धि लगभग 30 प्रतिशत तक पाई गई है।
पौधों को सेंसर के रूप में विकसित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। सूक्ष्म सेंसर या नैनो-कण पौधों के साथ पानी के माध्यम से भीतर प्रवेश करते हैं और मिट्टी या जल में मौजूद रासायनिक पदार्थों की पहचान कर सकते हैं। कुछ प्रयोगों में, विशेष रसायनों की उपस्थिति पर पौधों द्वारा अवरक्त प्रकाश के रूप में संकेत दर्ज किया गया है, जिसे बाहरी उपकरणों से पढ़ा गया।
इन तकनीकों का उपयोग पौधों के प्राकृतिक जैव-विद्युत संकेतों को डिजिटल प्रणाली से जोड़ने में भी किया जा रहा है। पौधे प्रकाश, स्पर्श या अन्य पर्यावरणीय बदलावों के प्रति जो सूक्ष्म संकेत उत्पन्न करते हैं, उन्हें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मापकर कंप्यूटर तक पहुंचाया जा सकता है। कुछ प्रयोगों में इन संकेतों का उपयोग रोबोटिक प्रणालियों को नियंत्रित करने के लिए भी किया गया है, जिससे पौधे प्रकाश की दिशा की ओर बढ़ने जैसी क्रियाओं को प्रभावित कर सके।
पौधों की संरचना से प्रेरित होकर रोबोटिक्स के क्षेत्र में “प्लांटॉइड” जैसे रोबोट विकसित किए गए हैं। इन रोबोट की जड़ों में लगे सेंसर मिट्टी में पानी, पोषक तत्व और बाधाओं का पता लगाते हैं और उसी के अनुसार अपनी दिशा बदलते हैं। कुछ प्रणालियों में ये जड़ें 3D प्रिंटिंग जैसी प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं, जिससे वे नई सतहों में प्रवेश कर सकें।
इन सभी प्रयासों की पृष्ठभूमि पिछले दशक में किए गए उन प्रारंभिक प्रयोगों में मिलती है, जिनमें पहली बार पौधों के भीतर पॉलिमर आधारित तार विकसित करने, नैनो-कणों को कोशिकाओं में प्रवेश कराने और पौधों को रासायनिक संकेतों के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में कार्य किया गया था। वर्तमान में “साइबोर्ग बॉटनी” इन्हीं तकनीकों का अधिक संगठित और विस्तृत रूप प्रस्तुत करती है।
इन प्रयोगों के संभावित उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में देखे जा रहे हैं। कृषि में, यदि पौधों के भीतर ही सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक तंत्र विकसित हो जाते हैं, तो वे मिट्टी की नमी, पोषक तत्वों और पर्यावरणीय बदलावों की जानकारी सीधे उपलब्ध करा सकते हैं, जिससे किसानों को त्वरित और सटीक निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। ऐसे रोबोट के संभावित उपयोग केवल कृषि या पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं। शोध में यह संकेत भी दिया गया है कि इसी सिद्धांत पर आधारित लचीले रोबोट चिकित्सा क्षेत्र में उपयोगी हो सकते हैं, जो शरीर के भीतर संकरे रास्तों—जैसे मुंह से होकर पेट तक—पहुंचकर उपचार में सहायता कर सकें।
इसी तरह, प्लांट-प्रेरित रोबोट और सेंसर सिस्टम भविष्य में अन्य ग्रहों की सतह पर जानकारी एकत्र करने के लिए भी उपयोग किए जा सकते हैं, जहां वे कठिन परिस्थितियों में स्वयं दिशा तय कर सकें और डेटा भेज सकें।
हालांकि ये सभी प्रयोग अभी नियंत्रित परिस्थितियों और प्रारंभिक चरण में हैं, और इनके व्यापक उपयोग के लिए आगे और अनुसंधान की आवश्यकता बनी हुई है।
(1 May) TH
आक्रामक पौधे से हरित ईंधन: कच्छ में ग्रीन मेथनॉल उत्पादन की पहल
समुद्री परिवहन के लिए स्वच्छ ईंधन के विकल्पों की तलाश के बीच कच्छ के बन्नी घासभूमि में फैले आक्रामक पौधे Prosopis juliflora को हरित मेथनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग करने की दिशा में पहल की गई है। यह पौधा, जो मेक्सिकन मूल का है, स्थानीय रूप से गंडो बावल(gando baval), उत्तर भारत में विलायती कीकर और तमिलनाडु में सीमाई करुवेलम (कुछ क्षेत्रों में Velikathan) के नाम से जाना जाता है।
इस पौधे को 20वीं सदी में अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न उद्देश्यों से लगाया गया था। ब्रिटिश काल में इसे दिल्ली क्षेत्र को हरा-भरा बनाने के लिए लगाया गया, जबकि गुजरात में इसे रन ऑफ कच्छ में बढ़ते खारे रेगिस्तान के विस्तार को रोकने के उद्देश्य से लगाया गया था। समय के साथ यह तेजी से फैलता गया और कच्छ के विस्तृत क्षेत्रों में स्थानीय घासों और वनस्पतियों को प्रतिस्थापित कर दिया।
अब इसी पौधे को देश के पहले ग्रीन मेथनॉल संयंत्र में उपयोग के लिए चुना गया है। यह संयंत्र Deendayal Port(कांडला) पर स्थापित किया जा रहा है, जहां प्रतिदिन लगभग पांच टन मेथनॉल उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस परियोजना में बायोमास आधारित गैसीफिकेशन तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसमें पौधे के पदार्थ को उच्च ताप पर नियंत्रित परिस्थितियों में तोड़कर सिनगैस (syngas) में बदला जाता है, और फिर उसे मेथनॉल में परिवर्तित किया जाता है।
परंपरागत रूप से मेथनॉल का उत्पादन कोयला या प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से किया जाता है, जबकि इस प्रक्रिया में बायोमास का उपयोग किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की जा सकती है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार, इस प्रकार के हरित मेथनॉल के उपयोग से जहाजों से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में बड़ी कमी संभव है, साथ ही अन्य प्रदूषकों में भी कमी आती है।
इस परियोजना में Thermax द्वारा संयंत्र निर्माण और Ankur Scientific द्वारा गैसीफिकेशन तकनीक प्रदान की जा रही है। संयंत्र को अन्य कृषि अवशेषों, जैसे गन्ने के अवशेष (बैगास) और कपास के डंठल, पर भी संचालित करने के लिए अनुकूलित किया जा रहा है।
इस प्रकार, एक ऐसा पौधा जो लंबे समय से जैव विविधता के लिए चुनौती बना हुआ था, अब ऊर्जा उत्पादन के एक वैकल्पिक स्रोत के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है।
(29 April) India today
एथेनॉल ब्लेंडिंग और जल संकट: बढ़ते दबाव के संकेत
वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में भारत एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है। एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाकर उपयोग किया जाता है, जिससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य है।
एथेनॉल मुख्यतः मक्का, गन्ना और चावल जैसी फसलों से प्राप्त होता है, जो स्वभाव से ही अधिक पानी की मांग करती हैं। उपलब्ध आंकड़े इस दबाव को स्पष्ट करते हैं। एक किलोग्राम चावल उगाने में लगभग 3,000–5,000 लीटर पानी लगता है, जबकि 2.5–3 किलोग्राम चावल से लगभग एक लीटर एथेनॉल बनता है। इस प्रकार चावल आधारित एथेनॉल के लिए प्रति लीटर पानी की खपत 10,000 लीटर से अधिक बैठती है। तुलना में, मक्का से एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 4,670 लीटर और गन्ने से लगभग 3,630 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। परिवर्तन अनुपात भी स्थिति को और स्पष्ट करता है – एक टन चावल से लगभग 470 लीटर एथेनॉल ही प्राप्त होता है, जिससे चावल इस प्रक्रिया के लिए अत्यधिक जल-गहन स्रोत बन जाता है।
एथेनॉल उत्पादन में चावल का उपयोग हाल के वर्षों में बढ़ा है। वर्ष 2024–25 में इसके लिए 52 लाख टन चावल आवंटित किया गया था, जिसे 2025–26 में बढ़ाकर 90 लाख टन करने का लक्ष्य रखा गया है। इस आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में टूटे चावल का हिस्सा 25% से घटाकर 10% करने की योजना बनाई गई है, ताकि बचा हुआ अनाज डिस्टिलरीज़ तक पहुंचाया जा सके।
उत्पादन प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न अपशिष्ट जल भी एक चिंता का विषय है। यदि इसका उपचार पर्याप्त रूप से न किया जाए, तो यह सतही और भूजल दोनों को प्रभावित कर सकता है।
यह विस्तार उन क्षेत्रों में हो रहा है जहाँ जल संसाधनों पर पहले से दबाव है। भारत की कुल एथेनॉल उत्पादन क्षमता 1,822 करोड़ लीटर है, जिसका बड़ा हिस्सा जल-संकट वाले राज्यों में केंद्रित है। महाराष्ट्र में लगभग 396 करोड़ लीटर क्षमता वाले संयंत्र मौजूद हैं, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी संयंत्र उन्हीं भूजल स्रोतों पर निर्भर हैं, जिनके तेजी से घटने की चेतावनी दी जा चुकी है।
इन परिस्थितियों में जल उपयोग पर दोहरा दबाव बनता है -एक ओर जल-गहन फसलों की खेती और दूसरी ओर उन्हीं क्षेत्रों में स्थापित उद्योगों द्वारा भूजल का उपयोग। भारत में एथेनॉल उत्पादन अभी भी मुख्यतः गन्ने पर आधारित है, जो स्वयं उच्च जल-खपत वाली फसल है।
इस पूरी स्थिति के बीच NITI Aayog के ‘कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ ने चेतावनी दी है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित 21 बड़े शहरों में भूजल समाप्त होने की आशंका है।
एथेनॉल उत्पादन को स्वच्छ ईंधन के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन जल संसाधनों पर इसके प्रभाव के संदर्भ में संतुलन का प्रश्न सामने बना हुआ है।
(28 April) IE
झीलों का घटता अस्तित्व: डेटा से उभरती तस्वीर
पृथ्वी पर झीलें एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं, जो जल सुरक्षा, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 11.7 करोड़ झीलें पृथ्वी की सतह के करीब 4 प्रतिशत हिस्से को कवर करती हैं और दुनिया के सतही मीठे पानी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करती हैं। ऐसे में इनका तेजी से घटता अस्तित्व गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
यह प्रवृत्ति भारत में भी स्पष्ट दिखाई देती है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर में 1967 में दर्ज 697 झीलों में से 518 झीलें या तो सिकुड़ चुकी हैं या क्षरण का शिकार हुई हैं, जिनमें से 315 पूरी तरह लुप्त हो चुकी हैं। यह प्रवृत्ति केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के अन्य हिस्सों में भी झीलों के क्षरण और लुप्त होने के ऐसे ही पैटर्न देखे जा रहे हैं।
झीलों के क्षरण के पीछे कई कारण एक साथ कार्य कर रहे हैं। प्रमुख कारणों में प्रदूषण शामिल है, जहां शहरी क्षेत्रों में कचरा और सीवेज सीधे झीलों में डाला जाता है। इससे जल में पोषक तत्वों की अधिकता (eutrophication) बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप शैवाल (algae) की अत्यधिक वृद्धि होती है और ऑक्सीजन की कमी से जलीय जीवन प्रभावित होता है। बेंगलुरु की बेल्लान्दुर झील इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
इसके अलावा, शहरीकरण और भूमि उपयोग में परिवर्तन के कारण झीलों पर अतिक्रमण बढ़ा है। बढ़ती भूमि कीमतों के कारण झीलों और आर्द्रभूमियों को निर्माण कार्यों के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। इसी तरह, झीलों के तल से रेत और बजरी का अवैध खनन भी उनकी संरचना को नुकसान पहुंचाता है। अनियंत्रित पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियाँ, जैसे मूर्ति विसर्जन, भी जल गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
भारत में जल निकायों का प्रबंधन मुख्यतः राज्य सरकारों के अधीन है, क्योंकि जल संविधान के अनुसार राज्य विषय है। हालांकि, झीलों के संरक्षण के लिए कोई एकीकृत राष्ट्रीय कानून मौजूद नहीं है। वर्तमान में Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017 और राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी संरक्षण कार्यक्रम (NPCA) जैसे ढांचे मौजूद हैं, लेकिन इनका दायरा सीमित है और इनके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने आती हैं।
उपलब्ध आंकड़े और स्थितियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि झीलों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक जीवन से जुड़ा एक व्यापक प्रश्न बन चुका है।