(19) Weekly News 15 – 21 Feb

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CPI 2025: वैश्विक भ्रष्टाचार बढ़ा, भारत 91वें स्थान पर

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (Corruption Perceptions Index – CPI) 2025 में वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार की गंभीर स्थिति सामने आई है। रिपोर्ट में 182 देशों का मूल्यांकन सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा के आधार पर किया गया है। सूचकांक में 0 को अत्यधिक भ्रष्ट तथा 100 को अत्यंत स्वच्छ व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है।

वैश्विक औसत दशक के न्यूनतम स्तर पर

रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक औसत स्कोर 42 दर्ज किया गया है, जो पिछले दस वर्षों में सबसे कम है। कुल 122 देशों का स्कोर 50 से नीचे रहा, जो दर्शाता है कि अधिकांश देशों में भ्रष्टाचार अभी भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।

उच्च पारदर्शिता वाले देशों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है। 80 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले देशों की संख्या घटकर पाँच रह गई है — डेनमार्क, फिनलैंड, सिंगापुर, न्यूज़ीलैंड और नॉर्वे।

रैंक देश स्कोर
1 डेनमार्क 89
2 फिनलैंड 88
3 सिंगापुर 84
4 न्यूज़ीलैंड 81
5 नॉर्वे 81
रैंक देश स्कोर
181 सोमालिया 9
181 दक्षिण सूडान 9
180 वेनेज़ुएला 10
177 यमन 13
177 लीबिया 13

शीर्ष पाँच सर्वाधिक पारदर्शी एवं निम्न पाँच सर्वाधिक भ्रष्ट देश

दक्षिण एशिया में भूटान अग्रणी, भारत 91वें स्थान पर

दक्षिण एशियाई देशों में भूटान 71 अंक और 18वें स्थान के साथ सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला देश रहा। क्षेत्र के अन्य देशों की स्थिति इस प्रकार है:

देश स्कोर रैंक स्थिति
भूटान 71 18 क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ
भारत 39 91 मध्यम
मालदीव 39 91 मध्यम
श्रीलंका 35 107 कमजोर
नेपाल 34 109 कमजोर
पाकिस्तान 28 136 उच्च भ्रष्टाचार
बांग्लादेश 24 150 गंभीर स्थिति
अफगानिस्तान, म्याँमार  16 169 अत्यधिक भ्रष्ट

एशिया क्षेत्र में जापान 73 अंको के साथ  16 वी  पायदान पर है वही चीन 43 अंकों के साथ 76वें स्थान पर ।

भारत: स्थिर स्कोर, जारी चुनौतियाँ

भारत का स्कोर 39 रहा, जो इसे मध्यम स्तर के भ्रष्टाचार वाले देशों की श्रेणी में रखता है। रिपोर्ट में राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता की कमी, नौकरशाही में रिश्वतखोरी, सरकारी ठेकों में अनियमितताएँ तथा जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल को प्रमुख चिंताओं के रूप में रेखांकित किया गया है।

हालाँकि, डिजिटल गवर्नेंस, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), यूपीआई, ई-प्रोक्योरमेंट तथा आधार आधारित सेवाओं को सकारात्मक कदम माना गया है, जिन्होंने मानव संपर्क कम कर भ्रष्टाचार के अवसरों को सीमित करने में भूमिका निभाई है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं और पारदर्शिता में संबंध

विभिन्न वैश्विक शासन अध्ययनों (जैसे Democracy Index और तुलनात्मक शासन विश्लेषण) से संकेत मिलता है कि पूर्ण लोकतंत्रों का औसत CPI स्कोर लगभग 70 के आसपास, त्रुटिपूर्ण लोकतंत्रों का लगभग 45–50 तथा अधिनायकवादी शासन(Authoritarian Regime) का औसत 30 के आसपास पाया जाता है।

(CPI कैसे तैयार किया जाता है

भ्रष्टाचार बोध सूचकांक विशेषज्ञों और व्यावसायिक सर्वेक्षणों के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमें विश्व बैंक, विश्व आर्थिक मंच, एशियाई विकास बैंक तथा अन्य शोध संस्थानों के डेटा का उपयोग किया जाता है। सूचकांक रिश्वतखोरी, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, राजनीतिक भ्रष्टाचार और न्यायिक निष्पक्षता जैसे मानकों पर आधारित होता है।)

(20 Feb) TH

पोलैंड ने Ottawa Convention छोड़ा, रूस से सुरक्षा खतरे का हवाला

पोलैंड ने आधिकारिक रूप से 1997 की Ottawa Convention (Anti-Personnel Mine Ban Treaty) से बाहर निकलने की घोषणा की है। सरकार का कहना है कि रूस से बढ़ते सुरक्षा खतरे के मद्देनज़र यह कदम उठाया गया है। रूस ने इस संधि पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए पोलैंड का तर्क है कि अपनी रक्षा के लिए उसे पुनः लैंड माइंस का निर्माण करना पड़ सकता है।

पोलैंड ने 2012 में इस संधि की पुष्टि की थी और 2016 तक अपने सभी एंटी-पर्सनल लैंड माइंस के भंडार नष्ट कर दिए थे। किंतु 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बाद पूर्वी यूरोप के देशों में सुरक्षा चिंताएँ बढ़ गई हैं।

पोलैंड की सीमाएँ रूस के कालिनिनग्राद क्षेत्र और बेलारूस से लगती हैं। इन परिस्थितियों में पोलैंड “Eastern Shield” परियोजना के तहत अपनी पूर्वी सीमाओं को मजबूत कर रहा है। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने कहा है कि यदि सुरक्षा खतरा उत्पन्न होता है, तो 48 घंटे के भीतर पूर्वी सीमा पर माइंस बिछाने की क्षमता विकसित की जा रही है।

मानवाधिकार संगठनों ने इस निर्णय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि एंटी-पर्सनल माइंस अत्यंत खतरनाक होती हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद भी ये वर्षों तक जमीन में दबे रहकर नागरिकों को नुकसान पहुँचाती हैं, और बच्चों सहित आम लोग इनके शिकार बनते हैं।

जबकि पोलैंड का कहना है कि वह आक्रामक राष्ट्र नहीं है और यह कदम केवल निवारण (deterrence) तथा राष्ट्रीय रक्षा के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। सरकार के अनुसार माइंस का उपयोग केवल वास्तविक खतरे की स्थिति में ही किया जाएगा।

(Ottawa Convention क्या है?

Ottawa Convention (1997) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसके तहत सदस्य देश:

  • एंटी-पर्सनल लैंड माइंस का निर्माण नहीं करेंगे
  • उनका उपयोग नहीं करेंगे
  • मौजूदा भंडार नष्ट करेंगे

इन माइंस की विशेषता यह है कि वे वर्षों तक जमीन में सक्रिय रह सकती हैं और युद्ध समाप्त होने के बाद भी नागरिकों के लिए गंभीर खतरा बनी रहती हैं।)

 

(20 Feb) VS

India AI Impact Summit 2026: घोषणा, सहयोग और नीति दिशा

भारत मंडपम में आयोजित पाँच दिवसीय India AI Impact Summit 2026 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी नवाचार और नीतिगत पहलें चर्चा के केंद्र में रहीं। समिट का मुख्य परिणाम दस्तावेज़ New Delhi Declaration on AI Impact रहा, जिस पर 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हस्ताक्षर किए।

घोषणा में इस बात पर जोर दिया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल कुछ बड़ी कंपनियों या देशों तक सीमित न रहे। AI संसाधनों, शोध और उपयोग को विभिन्न देशों के बीच साझा करने और सभी के लिए सुलभ बनाने की बात कही गई है। साथ ही, प्रत्येक देश की संप्रभुता और कानूनों का सम्मान करते हुए सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया है।

हस्ताक्षरकर्ताओं में अमेरिका, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। पिछले वर्ष पेरिस में आयोजित AI Action Summit के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन ने समान घोषणा पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस वर्ष उनकी भागीदारी दर्ज की गई।

घोषणा स्वैच्छिक सहयोग के ढाँचे पर आधारित है और AI संसाधनों तथा उपयोग मामलों के साझा विकास पर बल देती है।

घोषणा के प्रमुख प्रावधान

घोषणा में निम्न सहयोगात्मक पहलें शामिल हैं:

  • AI संसाधनों तक व्यापक पहुँच बढ़ाने का समर्थन
  • स्थानीय नवाचार को प्रोत्साहन
  • राष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करते हुए AI पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना
  • AI उपयोग मामलों को साझा करने हेतु सहयोग मंच
  • तकनीकी मानकों और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान
  • वैज्ञानिक संस्थानों के बीच AI अनुसंधान सहयोग
  • AI आधारित अर्थव्यवस्था के लिए कौशल विकास और कार्यबल तैयारी

समिट के दौरान नीति आयोग के Atal Innovation Mission द्वारा ‘AI-Preneurs of India’ पुस्तक का विमोचन किया गया। पुस्तक में 45 AI स्टार्टअप्स की यात्राओं और स्वास्थ्य, शिक्षा, स्थिरता, मोबिलिटी तथा सामाजिक प्रभाव जैसे क्षेत्रों में उनके समाधानों का विवरण दिया गया है।

AI शिक्षा और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र

समिट में AI से संबंधित शिक्षा, कौशल विकास और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र पर भी चर्चा हुई। भारत में CBSE द्वारा माध्यमिक स्तर पर AI विषय की शुरुआत, Atal Tinkering Labs के माध्यम से स्कूल स्तर पर नवाचार को बढ़ावा तथा भविष्य कौशल पर नीति-स्तरीय जोर का उल्लेख किया गया।(1)

समिट के दौरान चर्चा में रहा रोबोट प्रदर्शन

समिट के दौरान एक रोबोटिक डॉग प्रदर्शन को लेकर विवाद हुआ। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, Galgotias University द्वारा प्रदर्शित रोबोट को प्रारंभ में इन-हाउस उत्पाद बताया गया, जबकि बाद में इसे चीन की कंपनी Unitree का व्यावसायिक मॉडल बताया गया। इस मामले में विश्वविद्यालय ने स्पष्टीकरण जारी किया और प्रस्तुति संबंधी त्रुटि पर खेद व्यक्त किया।

समिट का संदर्भ

समिट में जिम्मेदार और समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा तकनीकी विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। विभिन्न देशों, उद्योग प्रतिनिधियों और नीति विशेषज्ञों की भागीदारी दर्ज की गई।

घोषणा के प्रावधान स्वैच्छिक प्रकृति के हैं और उनका क्रियान्वयन हस्ताक्षरकर्ता देशों पर निर्भर करेगा।

(1) भारत में स्कूलों में AI शिक्षा का विस्तार: CBSE, NEP 2020 और Atal Innovation Mission की संयुक्त पहल

भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) को शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE), शिक्षा मंत्रालय, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) तथा नीति आयोग के Atal Innovation Mission (AIM) के माध्यम से छात्रों को भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए तैयार किया जा रहा है।

माध्यमिक स्तर पर AI विषय पहले से लागू

CBSE ने AI (Subject Code 417) को कक्षा 9 और 10 में स्किल विषय के रूप में लागू किया है। इस पाठ्यक्रम में छात्रों को AI की मूल अवधारणाएँ, डेटा साक्षरता, मशीन लर्निंग का परिचय तथा वास्तविक जीवन में AI के उपयोग से परिचित कराया जाता है। कक्षा 11 और 12 के लिए AI विषय को और सुदृढ़ बनाने हेतु पाठ्यपुस्तकों के विकास पर भी कार्य जारी है।

प्रारंभिक कक्षाओं में AI शामिल करने की तैयारी

शिक्षा मंत्रालय की योजनाओं के अनुसार, 2026-27 तक कक्षा 3 से AI और computational thinking को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य छात्रों में प्रारंभिक स्तर से तार्किक सोच, समस्या-समाधान क्षमता और डिजिटल साक्षरता विकसित करना है।

Atal Innovation Mission: स्कूल स्तर पर नवाचार की आधारशिला

नीति आयोग के अंतर्गत Atal Innovation Mission (AIM) स्कूलों में नवाचार संस्कृति विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। AIM के तहत स्थापित Atal Tinkering Labs (ATL) में छात्रों को निम्न क्षेत्रों में प्रयोगात्मक सीखने का अवसर दिया जा रहा है:

  • रोबोटिक्स
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)
  • 3D प्रिंटिंग
  • सेंसर आधारित परियोजनाएँ

इन प्रयोगशालाओं का उद्देश्य छात्रों में रचनात्मकता, समस्या-समाधान क्षमता और तकनीकी समझ विकसित करना है।

शिक्षक प्रशिक्षण और AI बूटकैंप

CBSE द्वारा छात्रों और शिक्षकों के लिए AI बूटकैंप तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि विद्यालयों में AI शिक्षा को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। यह पहल सुनिश्चित करती है कि केवल पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि शिक्षण क्षमता भी विकसित हो।

नीति स्तर पर समर्थन: NEP 2020 और भविष्य कौशल

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भविष्य कौशल (Future Skills) पर विशेष जोर दिया गया है, जिसमें कोडिंग, डेटा विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों को प्रारंभिक स्तर से शामिल करने की अनुशंसा की गई है। नीति का उद्देश्य छात्रों को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल प्रदान करना है।

भारत की यह पहल वैश्विक रुझानों के अनुरूप है। अमेरिका, चीन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी स्कूल स्तर पर AI शिक्षा को बढ़ावा दिया है, जिससे छात्रों को उभरती तकनीकों के लिए तैयार किया जा सके।

(20 Feb) EN

EU में प्लांट-आधारित खाद्य नीति की मांग: कृषि सब्सिडी और जलवायु प्रभाव पर रिपोर्ट

यूरोपीय संघ में टिकाऊ आहार को बढ़ावा देने और किसानों को मांस एवं डेयरी उत्पादन से पौध-आधारित कृषि की ओर स्थानांतरित करने के लिए एक Plant-Based Action Plan लागू करने की मांग तेज हुई है। खाद्य नीति पर कार्यरत संस्था Foodrise की एक नई रिपोर्ट में EU की कृषि सब्सिडी संरचना और उसके पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में यूरोपीय संघ की Common Agricultural Policy (CAP) के तहत वितरित कुल €51 अरब की सब्सिडी में से लगभग €39 अरब, यानी करीब 77 प्रतिशत, पशु-आधारित खाद्य उत्पादन को मिले। विश्लेषण में यह भी पाया गया कि बीफ और भेड़ के मांस को दालों की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक समर्थन मिला, जबकि डेयरी क्षेत्र को मेवे और बीजों की तुलना में अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त हुई। मांस और डेयरी को संयुक्त रूप से फल और सब्ज़ियों की तुलना में दस गुना से अधिक वित्तीय समर्थन दिया गया।

रिपोर्ट में पशु-आधारित खाद्य के पर्यावरणीय प्रभाव पर भी प्रकाश डाला गया है। अनुमान के अनुसार, यूरोपीय संघ में खाद्य उत्पादन से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 81 से 86 प्रतिशत हिस्सा पशु-आधारित खाद्य से जुड़ा है, जबकि ये कुल कैलोरी का लगभग 32 प्रतिशत ही प्रदान करते हैं। वैश्विक स्तर पर खाद्य और कृषि क्षेत्र कुल उत्सर्जन का लगभग एक-तिहाई योगदान करते हैं।

अध्ययनों में यह भी उल्लेख किया गया है कि विश्व के लगभग 60 प्रतिशत स्तनधारी पशुधन हैं और केवल चार प्रतिशत जंगली प्रजातियाँ बची हैं। सोयाबीन उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पशुओं के चारे के रूप में उपयोग होता है, जिससे भूमि उपयोग और वनों की कटाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। संसाधन दक्षता के संदर्भ में, 100 कैलोरी फसल पशुओं को खिलाने पर औसतन 40 कैलोरी दूध, 12 कैलोरी चिकन और केवल 3 कैलोरी बीफ प्राप्त होती है। कार्बन फुटप्रिंट आकलनों के अनुसार, 100 ग्राम बीफ के उत्पादन से होने वाला उत्सर्जन लगभग 78 किलोमीटर कार चलाने के बराबर माना जाता है।

Foodrise और अन्य संगठनों ने EU नीति निर्माताओं से पौध-आधारित खाद्य उत्पादन को अधिक समर्थन देने, आपूर्ति श्रृंखला में ऐसे विकल्पों को बढ़ावा देने तथा पशुपालन से पौध-आधारित खेती की ओर किसानों के संक्रमण के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है। 2024 में यूरोपीय आयोग की कृषि संबंधी रणनीतिक रिपोर्ट में भी उपभोक्ताओं को पौध-आधारित आहार अपनाने में सहायता को महत्वपूर्ण बताया गया और 2026 तक इस दिशा में कार्ययोजना विकसित करने की सिफारिश की गई।

(20 Feb) EN

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के वैश्विक टैरिफ़ अवैध ठहराए, नई दरों की घोषणा से अनिश्चितता जारी

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से निर्णय देते हुए डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ़ को अवैध ठहराया है। अदालत ने कहा कि इतने बड़े स्तर पर टैरिफ़ लागू करने के लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति आवश्यक है। इस निर्णय के साथ ही कई देशों पर लागू सामान्य टैरिफ़ अमान्य हो गए, जिनमें मेक्सिको, कनाडा और चीन से जुड़े कुछ शुल्क भी शामिल हैं।

अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पहले से वसूले गए टैरिफ़ राजस्व को वापस किया जाएगा या नहीं। इस मुद्दे पर निर्णय निचली अदालतों पर छोड़ दिया गया है, जिससे आयातकों और व्यापारिक कंपनियों के सामने नई अनिश्चितता बनी हुई है। अनुमान है कि संभावित रिफंड राशि 170 अरब डॉलर तक पहुँच सकती है।

फैसले के कुछ घंटों के भीतर ट्रंप ने सभी आयातों पर 10 प्रतिशत का नया टैरिफ़ लगाने की घोषणा की, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया। प्रशासन ने संकेत दिया है कि अन्य उपायों के माध्यम से टैरिफ़ व्यवस्था जारी रखी जाएगी और हाल के महीनों में लगभग 20 देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों को प्रभावी बनाए रखा जाएगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार व्यवस्था पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत के साथ समझौते के बाद व्यवस्था “निष्पक्ष” हुई है और “भारत टैरिफ़ का भुगतान करेगा, अमेरिका नहीं।” उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संबंधों को सकारात्मक बताया।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद टैरिफ़ से जुड़े राजस्व, संभावित रिफंड, नए शुल्कों की वैधता और व्यापार समझौतों की स्थिति को लेकर प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाएँ जारी हैं। विभिन्न देश इस फैसले और अमेरिकी कदमों की समीक्षा कर रहे हैं, जिससे वैश्विक व्यापार वातावरण में अनिश्चितता बनी हुई है।

(21 Feb) IE

वॉशिंगटन में ‘Board of Peace’ की पहली बैठक, भारत ने पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया

डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर गठित ‘Board of Peace’ की पहली बैठक गुरुवार को वॉशिंगटन में हुई, जिसमें गाज़ा के पुनर्निर्माण और व्यापक वैश्विक संघर्षों पर चर्चा की गई। भारत ने बैठक में सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि “पर्यवेक्षक” के रूप में भाग लिया। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने UNSC प्रस्ताव 2803 के अनुरूप गाज़ा शांति पहल का समर्थन किया है। बोर्ड में इज़राइल, सऊदी अरब, यूएई, तुर्किये और पाकिस्तान सहित 27 देश सदस्य हैं, जबकि यूरोपीय देशों और जापान सहित 22 देश पर्यवेक्षक रहे। बैठक में गाज़ा राहत के लिए 7 अरब डॉलर की प्रतिबद्धताएँ घोषित की गईं, जबकि अमेरिका ने 10 अरब डॉलर देने की घोषणा की।

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