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- (24) Weekly News Update 22 March – 5 April (Water Crisis | Iran War | Russia–Ukraine War)
- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
(21 Jan)
सरसों की फसल पर ओरोबैंकी का बढ़ता असर, पुरानी समस्या नई परिस्थितियों में गंभीर
भारत की सरसों की फसल पर ओरोबैंकी एजिप्टियाका (Orobanche aegyptiaca) नामक परजीवी खरपतवार का असर हाल के वर्षों में तेज़ी से बढ़ा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्था (FAO) के अनुसार यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि लंबे समय से मौजूद एक इनवेसिव परजीवी पौधा है, जिसकी तीव्रता बदली हुई कृषि परिस्थितियों के कारण बढ़ी है।
FAO के दस्तावेज़ों के मुताबिक ओरोबैंकी का मूल क्षेत्र पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र है और इसे भारत का स्वदेशी पौधा नहीं माना जाता। ICAR के अनुसार भारत में इसका वैज्ञानिक उल्लेख 1960–70 के दशक से मिलता है, हालांकि उस समय इसका प्रभाव सीमित इलाकों तक था।
ICAR–डायरेक्टोरेट ऑफ़ वीड रिसर्च का कहना है कि हाल के वर्षों में सरसों की लगातार खेती, सिंचाई आधारित कृषि और मिट्टी में बढ़ी नमी ने ओरोबैंकी के प्रसार को अनुकूल परिस्थितियाँ दी हैं। यह खरपतवार भूमिगत रूप से सरसों की जड़ों से जुड़कर पौधे से पानी, पोषक तत्व और कार्बन चूस लेती है, जिससे फसल की वृद्धि रुक जाती है और बीज उत्पादन घटता है। ICAR के अनुसार इसके बीज मिट्टी में 15–20 वर्षों तक सक्रिय रह सकते हैं, जिससे इसका नियंत्रण और कठिन हो जाता है।
सरकारी फील्ड सर्वे और राज्य कृषि विभागों की रिपोर्टों में ओरोबैंकी का प्रभाव मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में दर्ज किया गया है, जहाँ सरसों की खेती बड़े पैमाने पर होती है।
ओरोबैंकी नियंत्रण को लेकर कृषि मंत्रालय और ICAR का कहना है कि इसका पूर्ण और स्थायी समाधान फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हालांकि, फसल चक्र अपनाने, समय पर संक्रमित पौधों को हटाने, मिट्टी सोलराइजेशन और सीमित परिस्थितियों में अनुशंसित रसायनों के प्रयोग जैसे उपाय सुझाए गए हैं। साथ ही, ओरोबैंकी-सहिष्णु किस्मों और दीर्घकालिक प्रबंधन रणनीतियों पर शोध जारी है।
इस संबंध में ICAR और कृषि मंत्रालय की एडवाइजरी राज्यों के कृषि विभागों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के माध्यम से किसानों तक पहुँचाई जा रही है।
(25 Jan) EN
अल्बानिया में गहराता राजनीतिक संकट
अल्बानिया की राजधानी टिराना में विपक्षी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री साली बेरिशा के नेतृत्व में प्रधानमंत्री एडी रामा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। हजारों प्रदर्शनकारियों ने सरकारी भवन के सामने रामा से इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें मोलोटोव कॉकटेल, आँसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल हुआ। यह विरोध ऐसे समय हुआ है जब उपप्रधानमंत्री बेलिंडा बल्लुकु को कथित रिश्वत मामले में भ्रष्टाचार मामलों की विशेष अदालत द्वारा निलंबित किया गया था, हालांकि बाद में एडी रामा के हस्तक्षेप से संवैधानिक न्यायालय ने उन्हें अस्थायी राहत दी। सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार और संगठित अपराध से जुड़े होने के आरोप लगा रहे हैं, जिससे देश में राजनीतिक संकट और गहरा गया है।
(25 – 31 Jan) EN, Aljazeera
ईरान में जारी भीषण राजनीतिक संकट: इस सप्ताह की प्रमुख घटनाएँ
अमेरिका–ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ने क्षेत्र में युद्धपोत “एहतियातन” तैनात किए हैं और ज़रूरत पड़ने पर कार्रवाई की जा सकती है। इसके जवाब में ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि उसकी सेनाएँ “पहले से कहीं अधिक तैयार हैं और उंगली ट्रिगर पर है।” तेहरान में लगाए गए एक सरकारी बिलबोर्ड के ज़रिये अमेरिका को चेतावनी भी दी गई। दोनों देशों के तीखे बयानों से पश्चिम एशिया में सैन्य टकराव की आशंका बढ़ गई है।
हालाँकि इस बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार है, बशर्ते उसकी सामरिक और मिसाइल क्षमताओं को वार्ता से बाहर रखा जाए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, धमकी और सैन्य दबाव के माहौल में किसी भी प्रकार की बातचीत संभव नहीं है। दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि बातचीत से समाधान नहीं निकलता तो सैन्य विकल्प खुले रहेंगे। इसी पृष्ठभूमि में तुर्की ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश की है। तुर्की के राष्ट्रपति ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से बातचीत कर टकराव को युद्ध में बदलने से रोकने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
उधर ईरान में हालिया जन-आंदोलनों पर हुई हिंसक सरकारी कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी तेज़ हो गया है। इटली के विदेश मंत्री ने यूरोपीय संघ से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को आतंकी संगठन घोषित करने की मांग की है। यह प्रस्ताव यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की ब्रुसेल्स बैठक में रखा जाना है। EU पहले ही सैकड़ों ईरानी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा चुका है और ड्रोन व मिसाइल से जुड़े उपकरणों तथा तकनीक हस्तांतरण पर रोक लगा चुका है। यूरोपीय आयोग प्रमुख ने और कड़े प्रतिबंधों की घोषणा की है। हालाँकि IRGC को आतंकी सूची में डालने के लिए EU देशों की सर्वसम्मति आवश्यक है, जो फिलहाल नहीं बन पाई है। ऐसा होने पर IRGC पर यात्रा प्रतिबंध, संपत्ति जब्ती (asset freeze) और किसी भी प्रकार के आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने पर पूर्ण रोक लागू होगी। अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया पहले ही IRGC को आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं।
मानवाधिकार संगठनों द्वारा जारी आँकड़े स्थिति की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं। HRANA के अनुसार लगभग 6,000 मौतों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 17,000 संभावित मौतों की जाँच जारी है। ईरान सरकार का आधिकारिक आँकड़ा 3,117 मौतों का है। टाइम मैगज़ीन ने ईरानी स्वास्थ्य मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से कम से कम 30,000 मौतों की बात कही है। गार्डियन ने 7 जनवरी को 30,000 मौतों और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दी। फ्रांस में रहने वाले सर्जन डॉ. हाशिम के अनुसार फॉरेंसिक केंद्रों में 22,000 से अधिक मौतों का रिकॉर्ड मौजूद है।
रिपोर्टों के अनुसार कई शवों को बिना पहचान के जल्दबाज़ी में दफनाया गया और परिवारों को बाद में सूचना दी गई। कई मामलों में शव सौंपने के लिए परिवारों से 5,000 से 7,000 डॉलर तक की राशि माँगी गई और बदले में सरकारी कहानी स्वीकार करने का दबाव बनाया गया। घायल प्रदर्शनकारियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की गिरफ्तारियाँ हुईं, जबकि कुछ मामलों में अस्पताल में इलाज के बाद घायलों की हत्या किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। ईरान के न्यायपालिका प्रमुख मोहसनी-एजेई ने त्वरित सुनवाई और सख़्त सज़ा पर ज़ोर दिया है।
(28 Jan) EN
इराक में सरकार गठन पर संकट: मालिकी की वापसी की संभावना पर अमेरिका–इराक टकराव
इराक़ में नवंबर 2025 में हुए संसदीय चुनावों के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया जारी है और प्रधानमंत्री पद के लिए नूरी अल-मालिकी का नाम एक प्रमुख दावेदार के रूप में सामने आ रहा है। इराक़ के सबसे बड़े शिया राजनीतिक गठबंधन Coordination Framework के भीतर बहुमत समर्थन के आधार पर मालिकी को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनाए जाने की जानकारी सामने आई है, हालांकि गठबंधन के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद भी बताए जा रहे हैं। मालिकी इससे पहले 2006 से 2014 तक दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि मालिकी दोबारा प्रधानमंत्री चुने जाते हैं, तो इराक को दी जा रही मदद रोक दी जायेगी। ट्रंप के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए मालिकी ने अमेरिका पर इराक के आंतरिक मामलों में “खुला और अनुचित हस्तक्षेप” करने का आरोप लगाया और इसे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लंघन बताया। ट्रंप के बयान के बाद बगदाद में अमेरिकी दूतावास के पास सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने मालिकी के समर्थन में नारे लगाए और ट्रंप की तस्वीर तथा अमेरिकी ध्वज जलाए जाने की भी खबरें सामने आईं। अमेरिका और मालिकी के संबंध पहले भी तनावपूर्ण रहे हैं, विशेषकर ईरान से उनकी नज़दीकी और उन पर लगाए जाने वाले सांप्रदायिक राजनीति के आरोपों को लेकर।
इराक लंबे समय से अमेरिका, ईरान और तुर्की के बीच प्रतिस्पर्धी हितों का क्षेत्र बना हुआ है, जिससे वह एक प्रकार के प्रॉक्सी संघर्ष का मंच बन गया है। ऐसे समय में, जब ईरान की क्षेत्रीय स्थिति दबाव में बताई जा रही है और अमेरिका उसके खिलाफ सख़्त रुख अपनाए हुए है, इराक की राजनीतिक स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई है।
हाल के वर्षों में लंबे संघर्ष और अस्थिरता के बाद इराक में कुछ हद तक स्थिरता ज़रूर लौटी है, लेकिन देश की आर्थिक स्थिति अब भी कमज़ोर बनी हुई है। ऐसे में अमेरिका द्वारा संभावित आर्थिक दबाव या प्रतिबंधों को झेलने की इराक की क्षमता सीमित मानी जा रही है। (लंबे संघर्ष और अस्थिरता की पृष्ठभूमि के बारे में पृष्ट सं. 11 पर देखे)
(31 Jan) Aljazeera
रूस–यूक्रेन युद्ध: प्रमुख घटनाक्रम, दिन 1,437
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने बताया कि भीषण सर्दी के बीच यूक्रेन और रूस ने एक-दूसरे की ऊर्जा अवसंरचना (बिजली और गैस) पर हमले रोकने पर सहमति जताई है। उनके अनुसार शुक्रवार रात से अधिकांश क्षेत्रों में ऊर्जा ठिकानों पर हमले नहीं हुए, सिवाय डोनेत्स्क (Donetsk) क्षेत्र के, जहाँ गैस अवसंरचना पर एक हवाई बम गिरा।
वहीं रूस का कहना है कि हमले रोकने पर सहमति केवल रविवार तक के लिए दी गई है। इस बीच ट्रंप ने पुतिन से अनुरोध किया है कि 1 फरवरी तक हमले न किए जाएँ, ताकि बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बन सके।
राजधानी कीव (Kyiv) में इस सप्ताह तापमान –23 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है और शहर की 253 अपार्टमेंट इमारतें अब भी बिना हीटिंग के हैं। इसी दौरान रूस ने नोवोओसिनोवे (Novoosinove) गाँव के पास हमला किया तथा खेरसॉन (Kherson) क्षेत्र में यात्रियों से भरी एक मिनीबस को निशाना बनाया।
यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार रूस ने इस्कंदर-M (Iskander-M) बैलिस्टिक मिसाइल दागी और 111 ड्रोन लॉन्च किए, जिनमें से यूक्रेनी वायु रक्षा ने लगभग 80 ड्रोन मार गिराए। पिछले 24 घंटों में यूक्रेन की रेलवे अवसंरचना पर 7 हमले किए गए।
रूस के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया है कि उसकी सेनाओं ने ज़ापोरिज़िया (Zaporizhzhia) क्षेत्र में तेर्नुवाते (Ternuvate) गाँव पर कब्ज़ा कर लिया है। रूसी मीडिया के अनुसार रिचने (Richne – Zaporizhzhia) और बेरेस्तोक (Berestok – Donetsk) पर भी कब्ज़ा किया गया है। वहीं यूक्रेनी मॉनिटरिंग साइट DeepState के अनुसार रूस ने द्नीप्रोपेत्रोव्स्क (Dnipropetrovsk) क्षेत्र में ज़लाहोदा (Zlahoda) पर कब्ज़ा किया है तथा सुमी (Sumy) और ज़ापोरिज़िया (Zaporizhzhia) क्षेत्रों में आगे बढ़त बनाई है।
राजनीतिक स्तर पर राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा कि उन्होंने पुतिन को कीव आकर बातचीत का निमंत्रण दिया है — “अगर उनमें हिम्मत हो।” उन्होंने स्पष्ट किया कि वे मॉस्को या बेलारूस नहीं जाएँगे, लेकिन अन्य किसी भी प्रारूप में बातचीत के लिए तैयार हैं। दूसरी ओर रूस की संसद के अध्यक्ष ने कहा कि सांसद युद्ध लक्ष्यों को हासिल करने के लिए और अधिक शक्तिशाली हथियारों के इस्तेमाल की माँग कर रहे हैं।
रूस के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि वह रूसी झंडे वाले जहाज़ों की रक्षा के लिए “सभी उपलब्ध साधनों” का इस्तेमाल करेगा। यह बयान फ्रांस द्वारा एक संदिग्ध रूसी “शैडो फ्लीट” तेल टैंकर ग्रिंच (Grinch) को ज़ब्त किए जाने के बाद आया है।
इसी बीच यूरोपीय संघ (EU) ने रूस को मनी लॉन्ड्रिंग के उच्च जोखिम वाले देशों की सूची (ब्लैकलिस्ट) में डाल दिया है। इसका अर्थ यह है कि रूसी बैंकों के साथ किसी भी प्रकार के वित्तीय लेन-देन पर अब कड़ी जाँच, अधिक समय और अधिक लागत लगेगी। EU की विदेश नीति प्रमुख के अनुसार, इससे रूसी वित्तीय प्रणाली पर दबाव बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन और कठिन हो जाएगा।
(31 Jan) Aljazeera
म्यांमार में आम चुनाव: सैन्य समर्थित पार्टी को भारी जीत
म्यांमार में तीन चरणों में हुए आम चुनाव में सैन्य समर्थित यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) ने भारी बहुमत हासिल किया है। यह चुनाव 28 दिसंबर से शुरू होकर पिछले सप्ताह संपन्न हुआ, जो 2021 के सैन्य तख्तापलट के चार वर्ष बाद कराया गया। उस तख्तापलट में आंग सान सू ची (Aung San Suu Kyi) की निर्वाचित सरकार को सत्ता से हटा दिया गया था।
सरकारी नतीजों के अनुसार, USDP ने निचले सदन की 263 में से 232 सीटें जीतीं, जबकि ऊपरी सदन की घोषित 157 में से 109 सीटों पर भी जीत दर्ज की। सैन्य शासन के प्रवक्ता ज़ॉ मिन टुन के अनुसार संसद की बैठक मार्च में होगी और राष्ट्रपति चुनाव के बाद अप्रैल में नई सरकार बनेगी।
देश में 2021 से राजनीतिक अस्थिरता और सशस्त्र संघर्ष जारी है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अब तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है और लगभग 36 लाख लोग विस्थापित हुए हैं।
दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान (ASEAN) ने म्यांमार की चुनावी प्रक्रिया को मान्यता नहीं देने की बात कही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार रोहिंग्या सहित बड़ी आबादी को मतदान से बाहर रखा गया। चुनाव अवधि के दौरान हवाई हमलों में कम से कम 170 नागरिक मारे गए और लगभग 400 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने कहा कि कई लोगों ने डर के कारण मतदान किया या मतदान से दूर रहे। सैन्य सरकार ने चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष बताया है। इस बीच अमेरिका के विदेश विभाग ने कहा है कि वह सैन्य शासन के अगले कदमों पर नज़र बनाए हुए है।
आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को दर्जनों अन्य दलों के साथ भंग कर दिया गया था, जबकि कुछ दलों ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। म्यांमार की राजनीतिक व्यवस्था के तहत सेना को संसद की 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रूप से प्राप्त हैं।
(30 Jan) Aljazeera
दक्षिण अफ्रीका–इज़राइल कूटनीतिक टकराव
दक्षिण अफ्रीका ने इज़राइल के दूत एरियल साइडमैन को persona non grata घोषित करते हुए 72 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया है। विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि साइडमैन ने कूटनीतिक मानदंडों का उल्लंघन किया, जिनमें राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ और वरिष्ठ इज़राइली अधिकारियों की यात्राओं की जानकारी न देना शामिल है।
मंत्रालय ने कहा कि ये कदम वियना कन्वेंशन का उल्लंघन हैं और द्विपक्षीय संबंधों के लिए आवश्यक भरोसे को नुकसान पहुँचाते हैं। इसके जवाब में इज़राइल ने दक्षिण अफ्रीकी राजनयिक शॉन एडवर्ड बाइनवेल्ड्ट, जो फिलिस्तीन के लिए राजदूत हैं, को persona non grata घोषित कर 72 घंटे में देश छोड़ने को कहा।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब ग़ाज़ा युद्ध को लेकर दक्षिण अफ्रीका और इज़राइल के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। दिसंबर 2023 में दक्षिण अफ्रीका ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इज़राइल के खिलाफ नरसंहार का मामला दायर किया था।
(30 Jan) Aljazeera
पाकिस्तान का दावा: बलोचिस्तान में भारत-समर्थित बताए गए 41 लड़ाके मारे गए
पाकिस्तान की सुरक्षा बलों ने देश के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलोचिस्तान (Balochistan) में अलग-अलग छापों में कम से कम 41 सशस्त्र लड़ाकों को मारने का दावा किया है। सेना ने कहा कि ये मुठभेड़ें गुरुवार को हुईं और मारे गए लड़ाके भारत-समर्थित बताए गए।
सेना के अनुसार, पहला छापा हरनाई (Harnai) ज़िले के बाहरी इलाके में पड़ा, जहाँ 30 लड़ाके मारे गए। सेना ने इन्हें फ़ितना-अल-ख़वारिज बताया, जिसे सरकार प्रतिबंधित पाकिस्तान तालिबान (TTP) के लिए इस्तेमाल करती है। दूसरे अभियान में पंजगुर (Panjgur) ज़िले में 11 लड़ाके मारे गए, जिन्हें सेना ने फ़ितना-अल-हिंदुस्तान से जुड़ा और भारत-समर्थित बताया। सेना का कहना है कि इनसे हथियार, गोला-बारूद और दिसंबर में हुई एक बैंक लूट से जुड़ी नक़दी बरामद की गई।
सेना ने कहा कि दोनों ज़िलों में “सैनिटाइज़ेशन ऑपरेशन” जारी हैं और किसी सैनिक की मौत नहीं हुई। भारत ने आरोपों पर अभी प्रतिक्रिया नहीं दी है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने अभियान का समर्थन किया है।
( इराक : लंबे संघर्ष और अस्थिरता की पृष्ठभूमि )
इराक में लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता की जड़ें कई दशकों में फैली हुई हैं। 1979 में सद्दाम हुसैन के सत्ता में आने के बाद इराक ने एक केंद्रीकृत और मजबूत राज्य का रूप लिया। सद्दाम ने सैन्य शक्ति का विस्तार किया, कठोर कानून व्यवस्था लागू की और सेना, खुफिया तंत्र तथा प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया। 1980 के दशक तक इराक अरब दुनिया के अपेक्षाकृत विकसित देशों में गिना जाने लगा। इस दौर में साक्षरता अभियान चलाए गए और विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा तथा देश के प्रशासनिक और सामाजिक जीवन में उनकी भागीदारी बढ़ी।
इसी बीच 1979 में ईरान में आयतुल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति हुई। इराक में शिया आबादी बहुसंख्यक थी, जिससे सद्दाम को यह भय था कि ईरानी क्रांति की विचारधारा इराक में भी विद्रोह का रूप ले सकती है। इसके साथ ही शत्त अल-अरब जलमार्ग को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद भी एक महत्वपूर्ण कारण था, जिसे सद्दाम 1975 के समझौते के बावजूद दोबारा अपने नियंत्रण में लेना चाहता था। स्वयं को अरब दुनिया का प्रमुख नेता मानने और ईरान को क्षेत्रीय रूप से संतुलित करने की महत्वाकांक्षा के चलते सद्दाम ने 1980 में ईरान पर हमला कर दिया।
source: researchgate
यह युद्ध आठ वर्षों तक चला, लेकिन किसी भी देश को स्पष्ट जीत नहीं मिली। इसके विपरीत, यह युद्ध दोनों देशों के लिए भीषण मानवीय, आर्थिक और राजनीतिक विनाश लेकर आया। क्षेत्रीय सीमाओं में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, लेकिन अनुमानतः दस लाख से अधिक लोग मारे गए या घायल हुए। दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई।
युद्ध के बाद इराक भारी कर्ज़ में डूब गया। उसे विशेष रूप से कुवैत से लिए गए अरब ऋण को माफ़ कराए जाने की उम्मीद थी, जिसे कुवैत ने स्वीकार नहीं किया। इसके साथ ही इराक ने आरोप लगाया कि कुवैत सीमा के पास तेल क्षेत्रों से “स्लांट ड्रिलिंग” के माध्यम से इराकी तेल चुराता रहा और जानबूझकर अधिक तेल उत्पादन कर कीमतें गिराता रहा, जिससे इराक की अर्थव्यवस्था और कमजोर हुई। ऐतिहासिक रूप से सद्दाम कुवैत को इराक का एक “कृत्रिम राज्य” मानता था और फारस की खाड़ी में इराक की रणनीतिक पहुँच बढ़ाना चाहता था। इन आर्थिक दबावों, क्षेत्रीय प्रभुत्व की चाह और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया को कम आँकने के कारण अगस्त 1990 में इराक ने कुवैत पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हमले को अस्वीकार्य आक्रमण माना और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में इराक के विरुद्ध कड़े प्रतिबंध लगाए गए। जनवरी 1991 में अमेरिका के नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय गठबंधन ने सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसे खाड़ी युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध का तत्काल परिणाम यह हुआ कि इराकी सेना को कुवैत से बाहर खदेड़ दिया गया और कुवैत की संप्रभुता बहाल हो गई। हालांकि पीछे हटते समय इराकी बलों ने कुवैत के तेल कुओं में आग लगा दी, जिससे भारी पर्यावरणीय और आर्थिक नुकसान हुआ।
खाड़ी युद्ध के दीर्घकालिक परिणाम इराक के लिए अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुए। इराक की सैन्य शक्ति लगभग नष्ट हो गई, उस पर वर्षों तक कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और उसकी अर्थव्यवस्था तथा आम नागरिकों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। 1990 के दशक में दवाइयों, भोजन और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण आम जनता को भारी कष्ट सहना पड़ा। इसके साथ ही इराक पर नो-फ्लाई ज़ोन और अंतरराष्ट्रीय निगरानी लागू हुई, जिससे उसकी संप्रभुता सीमित हो गई। राजनीतिक रूप से सद्दाम हुसैन सत्ता में बना रहा, लेकिन इराक एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में टूट गया।
इसके बाद अमेरिका ने इराक पर विनाशकारी हथियार (WMD) रखने का आरोप लगाया और 2003 में सैन्य आक्रमण कर सद्दाम शासन का अंत कर दिया। हालांकि बाद में जाँच में यह आरोप प्रमाणित नहीं हो सका। सत्ता परिवर्तन तो हुआ, लेकिन इसके साथ ही इराक की पूरी राज्य व्यवस्था—सेना, पुलिस और प्रशासन—लगभग ध्वस्त कर दी गई। इससे देश में सुरक्षा का गहरा शून्य पैदा हुआ, लूटपाट बढ़ी और सांप्रदायिक तनाव तथा सशस्त्र गुटों का उभार शुरू हुआ।
2004 से 2007 के बीच इराक सुन्नी–शिया संघर्ष के गंभीर दौर में फँस गया। अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन सक्रिय हो गए, आत्मघाती हमले आम हो गए और आम नागरिक सबसे बड़े शिकार बने। इन गुटों ने सरकार और विदेशी सेनाओं—दोनों को निशाना बनाया। बगदाद जैसे शहर सांप्रदायिक रूप से बँटने लगे। यह समय इराक के सामाजिक ताने-बाने के टूटने का सबसे भयावह चरण माना जाता है।
2008 के बाद अमेरिका की “सर्ज नीति” और स्थानीय सुन्नी कबीलों के सहयोग से हिंसा में कुछ कमी आई। 2010–11 तक राजनीतिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और अंततः 2011 में अमेरिकी सेनाएँ औपचारिक रूप से इराक से हट गईं। लेकिन यह स्थिरता ऊपरी और अस्थायी थी। राज्य संस्थाएँ कमजोर बनी रहीं और सत्ता पर शिया प्रभुत्व को लेकर सुन्नी समुदाय में गहरी असंतुष्टि बनी रही।
2014 में इराक ने अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट देखा, जब ISIS ने मोसुल सहित बड़े इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया। इराकी सेना कई स्थानों पर बिना लड़े पीछे हट गई। ISIS ने अत्यंत क्रूर शासन लागू किया—हत्या, नरसंहार और सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश। इसके बाद अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बना और ईरान समर्थित शिया मिलिशियाओं ने भी इसमें भूमिका निभाई। 2017 तक ISIS को क्षेत्रीय रूप से पराजित कर दिया गया, लेकिन उसकी जड़ें पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।
इसके बाद कुछ हद तक स्थिरता लौटी, जिसके परिणामस्वरूप जनता ने बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, बिजली-पानी की कमी और राजनीतिक वर्ग की अक्षमता के खिलाफ आंदोलन किए। इन आंदोलनों में सांप्रदायिक राजनीति से हटकर एक लोकतांत्रिक और नागरिक राज्य की माँग सामने आई। हालांकि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में सैकड़ों प्रदर्शनकारी मारे गए, जिससे शासन की वैधता और कमजोर हुई।
2020 से 2022 के बीच इराक ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष संघर्ष का मैदान बन गया। ईरान समर्थित मिलिशियाएँ अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाती रहीं, जबकि अमेरिका ने ड्रोन हमलों और दबाव की नीति अपनाई। इराक की सरकार इन दोनों शक्तियों के बीच संतुलन साधने में अक्सर असहाय दिखाई दी।
वहीं तुर्की की भूमिका सत्ता संघर्ष से अधिक सुरक्षा-केंद्रित रही है। PKK जैसे कुर्द सशस्त्र समूह, जो तुर्की में कुर्द स्वायत्तता या अलग राज्य की माँग करते हैं और जिन्हें तुर्की, अमेरिका तथा यूरोपीय संघ ने आतंकी संगठन घोषित किया है, उत्तरी इराक—विशेषकर कुर्द क्षेत्र और कंदील पहाड़ियों—का उपयोग अपने ठिकानों, प्रशिक्षण शिविरों और हथियार डिपो के लिए करते रहे हैं। तुर्की ने PKK के खिलाफ उत्तरी इराक में सैन्य अभियान चलाए हैं। इसके साथ ही तुर्की इराकी कुर्द क्षेत्र से कच्चा तेल पाइपलाइन के माध्यम से अपने बंदरगाह जिहान (Ceyhan) तक लाता है और उसे यूरोपीय बाज़ार में भेजता है। तुर्की KRG को एक स्वतंत्र राज्य की सुरक्षा गारंटी तो नहीं देता, लेकिन PKK के खिलाफ उसके हितों की रक्षा करता रहा है।

