- (01) Weekly News 6 – 9 october 2025
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- (20) Weekly News 22 Feb – 28 Feb
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- (22) News Update 8 March – 14 March (Nepal Election 2026)
- (23) Weekly News Update 15 March – 21 March (Global E-waste report, Iran war update)
- (24) Weekly News Update 22 March – 5 April (Water Crisis | Iran War | Russia–Ukraine War)
- (25)Weekly News Update 6 April – 12 April (Iran war Update, various research)
- (26)Weekly News Update (13 April – 18 April) Iran Ukrain war, ken-betwa Pariyojana, Hungary election
- (27)Weekly News Update 20 April – 25 April(Iran war Update,SIR,Bulgaria election etc)
- (28)Weekly News Update 26 April – 2 May 2026 (Iran war, ACR SMART TV,Cyborg Botany,Methanol-Ethanol Production)
- (29)Weekly News Update 4 May – 9 May 2026 (Iran war, Metamaterials, Claude Mythos, Dual-Use Satellites)
- (30.)Weekly News Update 10 – 16 may 2026( iran war, Pathfinder mission, sir, Taiwan issue)
- (31).Weekly News Update 17-23 may 2026 vaishvik sankat, Cuba crisis
- (32).Weekly News Update 24-30 may (Russia ukrain war update, Manipur dispute)
- (33).Weekly News Update 1june-6 june (iran war update, niger oil spoil, Quad, Mayanmar venezuela india visit)
- (34.)Weekly News Update 8-13june (Autonomous ai experiment India Road accident)
- (35.)Weekly News Update 14-20 june (iran war update(MOU SIGN), G7 summit)
- (36.)Weekly News Update 21-28 june (iran -russia-ukrain war, biochar)
- (37.)Weekly News Update 29 june -11 JULY (Qick Commerce, Synthetic cell, Ai UN report, Iran war)
- (38.)Weekly News Update 13 -19 JULY (iran war update)
- (39.)Weekly News Update 20 – 26 JULY (CJP protest- WAICO china- AI security-Hugging Face)
- (40.)Weekly News Update 27July – 2 August Rome decleration-BOB cyber attack- Iran war- Google earth ai
- (41.)Weekly News Update 2 August- 9 August Makka agreement, FCRA, AI race
- (42.)Weekly News Update 10- 30 (August, mindnubming drugs education, Gorkhaland dispute, Ai news, east asia Diplomacy )
- (43.)Weekly News Update 31 Aug (America china ai & economical budget Sanghai Shikhar summit 2026)
- (44.)Weekly News Update 07 September-13September (Iran war-Falklands issue-Brics summit-Boss Scame)
- (45.)Weekly News Update (14 September-20 September) Saudi economy, RUPP donation, UK division and Gemenai hack, Anthropic bio lab
- (46.)Weekly News Update (21 September-27 September) Middle east conflict russia ukrain conflict US china meet Denmark agreement AI WORK
(9 Jan) TH
रेयर अर्थ की दौड़: जापान ने समुद्र की गहराई में बढ़ाया कदम
जापान दुर्लभ मृदा खनिजों में आत्मनिर्भर बनने और चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। जापानी वैज्ञानिक ड्रिलिंग पोत चिक्यू प्रशांत महासागर में स्थित मिनामी तोरिशिमा क्षेत्र में 6,000 मीटर की गहराई से रेयर अर्थ निकालने के परीक्षण मिशन पर रवाना हुआ है। इस क्षेत्र में 16 मिलियन टन से अधिक दुर्लभ खनिज होने का अनुमान है, जिसे निक्केई बिजनेस डेली ने विश्व का तीसरा सबसे बड़ा भंडार बताया है।
ताइवान मुद्दे को लेकर हालिया तनाव के बीच चीन ने जापान को दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति में देरी की है और कई “डुअल-यूज़” वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगा दी है, जिनका उपयोग रक्षा क्षेत्र में हो सकता है। वर्तमान में जापान लगभग 70% रेयर अर्थ चीन से आयात करता है।
हालाँकि यह पहल जापान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, परन्तु गहरे समुद्र में खनन से समुद्री पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान होने की संभावना है।
(13 Jan) FE
शक्सगाम घाटी में चीन की गतिविधियों पर भारत का कड़ा विरोध
भारत ने शक्सगाम घाटी (ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट) में चीन की अवसंरचना गतिविधियों का कड़ा विरोध करते हुए चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत चल रही परियोजनाओं को अवैध बताया है और दोहराया है कि यह क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है। शक्सगाम घाटी काराकोरम पर्वतमाला में सियाचिन के उत्तर में स्थित रणनीतिक क्षेत्र है, जो पूर्व में जम्मू-कश्मीर रियासत का भाग था। 1947–48 के युद्ध के बाद पाकिस्तान ने इस पर कब्जा किया और 1963 में चीन को सौंप दिया, जिसे भारत गैरकानूनी मानता है। वर्तमान में चीन इसे शिनजियांग के अंतर्गत प्रशासित कर रहा है और यहाँ सड़क व अन्य ढाँचागत विकास कर रहा है। यह क्षेत्र सियाचिन व काराकोरम दर्रे के निकट होने के कारण भारत के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(15 Jan) TOI
आइस मेमोरी सैंक्चुअरी
अंटार्कटिका के कॉनकॉर्डिया अनुसंधान स्टेशन में हाल ही में विश्व का पहला आइस मेमोरी सैंक्चुअरी स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग से तेजी से पिघलते ग्लेशियरों में छिपे जलवायु रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना है।
यह परियोजना आइस मेमोरी फाउंडेशन द्वारा शुरू की गई है, जिसमें फ्राँस, इटली और स्विट्ज़रलैंड के वैज्ञानिक संस्थान शामिल हैं। इस सैंक्चुअरी को बर्फ के भीतर बनी एक गुफा में रखा गया है, जहाँ तापमान लगभग –52 डिग्री सेल्सियस रहता है।
यहाँ विभिन्न पर्वतीय ग्लेशियरों से निकाले गए हिम-कोर सुरक्षित रखे जाते हैं। हिम-कोर बर्फ की परतों से बने ऐसे नमूने होते हैं जिनमें प्राचीन वायुमंडलीय गैसें, धूल और प्रदूषण के कण सुरक्षित रहते हैं। इन्हें वायुमंडलीय टाइम कैप्सूल माना जाता है। इस सैंक्चुअरी में रखे गए पहले हिम-कोर फ्राँस के माउन्ट ब्लैक और स्विट्ज़रलैंड के ग्रैंड कैम्बियन ग्लेशियर से लाए गए हैं। अब तक दुनिया के 10 ग्लेशियर क्षेत्रों से हिम-कोर एकत्र किए जा चुके हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पहल भविष्य की पीढ़ियों के लिए पृथ्वी के जलवायु इतिहास को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
(17 Jan) EN
ग्रीनलैंड की संप्रभुता के समर्थन में कोपेनहेगन में विशाल प्रदर्शन
डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन सहित कई शहरों में शनिवार को हजारों लोगों ने ग्रीनलैंड की संप्रभुता के समर्थन में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। यह विरोध ट्रंप द्वारा खनिज-समृद्ध ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जताने और विरोध करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी के बाद हुआ। प्रदर्शनकारियों ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के झंडे लहराते हुए “Kalaallit Nunaat” के नारे लगाए और कोपेनहेगन स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर मार्च निकाला।
ग्रीनलैंडिक संगठनों ने इसे लोकतंत्र, आत्मनिर्णय और मानवाधिकारों की रक्षा का प्रतीक बताया। ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में भी अमेरिका की “अवैध योजनाओं” के खिलाफ समान प्रदर्शन आयोजित किए गए। जनवरी 2025 के एक सर्वेक्षण के अनुसार 85 प्रतिशत ग्रीनलैंडवासी अमेरिका में शामिल होने के खिलाफ हैं, केवल छह प्रतिशत इसके पक्ष में थे। इस बीच अमेरिकी कांग्रेस के द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल ने कोपेनहेगन में स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड पर कोई तात्कालिक सुरक्षा खतरा नहीं है। वहीं, यूरोपीय नाटो देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य अभ्यास की तैयारी कर संप्रभुता की रक्षा का संकेत दिया।
(12-17 Jan) Various source
ईरान में जारी भीषण राजनीतिक संकट: इस सप्ताह की प्रमुख घटनाएँ
ईरान में जारी भीषण राजनीतिक संकट के बीच सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई ने देशव्यापी प्रदर्शनों और हिंसा के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सीधे जिम्मेदार ठहराया है। राज्य मीडिया के अनुसार ख़ामेनेई ने अमेरिका और इज़राइल पर ईरान में अस्थिरता फैलाने की साज़िश का आरोप लगाया। प्रदर्शन 28 दिसंबर को आर्थिक कठिनाइयों को लेकर शुरू हुए और इस्लामिक गणराज्य में मौलवी शासन को खत्म करने की मांग करने वाले व्यापक प्रदर्शनों में बदल गए।
HRANA के अनुसार 3,090 लोगों की मौत और 22,000 से अधिक गिरफ्तारियाँ हुई हैं। न्यायपालिका ने प्रदर्शनकारियों को “मोहारेब” घोषित कर मृत्युदंड की चेतावनी दी है(ईरानी कानून के तहत मोहारेब, यानी “ईश्वर के विरुद्ध युद्ध छेड़ने वाला”, मृत्युदंड का पात्र हो सकता है।)। ट्रंप ने संभावित फाँसी पर कड़े कदम की बात कही, जबकि तेहरान ने सामूहिक फाँसी की योजना से इनकार किया। 200 घंटे के इंटरनेट ब्लैकआउट के बाद आंशिक सेवाएँ बहाल हुईं और हजारों लोगों की गिरफ्तारी का दावा किया गया। इज़राइल द्वारा ईरान में एजेंटों की मौजूदगी स्वीकार करने से तनाव और बढ़ा।
इस बीच चाबहार पोर्ट पर भी दबाव बढ़ गया है। अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लागू किया है, जिससे भारत के लिए ईरान में चाबहार रणनीतिक परियोजना पर कूटनीतिक चुनौतियाँ बढ़ीं। भारत विदेश मंत्रालय के अनुसार अमेरिका और ईरान के साथ बातचीत में छूट (sanctions waiver) को अप्रैल 2026 तक लागू रखने पर काम कर रहा है, क्योंकि चाबहार भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच प्रदान करता है और इसका छोड़े जाना भारत के भू-राजनीतिक हितों के विपरीत होगा।
इस संकट ने मुस्लिम देशों की वास्तविक राजनीतिक दूरी उजागर कर दी है। सऊदी अरब, यूएई, क़तर, बहरीन, कुवैत और अन्य खाड़ी देशों ने ईरान के पक्ष में खुलकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। ये देश अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी हैं और कई के इसराइल से भी संबंध हैं, इसलिए धार्मिक पहचान के बावजूद वे दूरी बनाए हुए हैं। चीन और रूस ईरान के करीबी हैं, लेकिन प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बच रहे हैं। तुर्की समर्थन के बयान देता है, पर NATO सदस्य होने के कारण उसकी भूमिका सीमित है। ओमान ने तटस्थ रुख़ अपनाते हुए मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, जबकि पाकिस्तान भी संतुलन बनाए रखते हुए क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर चिंतित है। कुल मिलाकर मुस्लिम दुनिया ईरान के साथ एकजुट नहीं दिख रही।
(17 Jan) reuters
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेज़ुएला में सत्ता संघर्ष
अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेने के बाद अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ ने तेज़ी से सत्ता को अपने नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पूर्व उपराष्ट्रपति और तेल मंत्री रोड्रिगेज़ ने आर्थिक व प्रशासनिक पदों पर अपने वफादार अधिकारियों की नियुक्ति की और सैन्य खुफिया एजेंसी DGCIM का नेतृत्व मेजर जनरल गुस्तावो गोंज़ालेज़ को सौंपा। यह कदम शक्तिशाली गृह मंत्री दियोसदादो काबेलो के प्रभाव को संतुलित करने के लिए उठाया गया, जिन्हें शासन के भीतर उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। काबेलो सत्तारूढ़ पार्टी PSUV और सुरक्षा तंत्र पर गहरी पकड़ रखते हैं और उन पर अमेरिका में अभियोग व 25 मिलियन डॉलर का इनाम घोषित है। मादुरो की गिरफ्तारी के बाद देश में भय और अस्थिरता का माहौल है, कीमतें बढ़ी हैं और सुरक्षा बलों की गतिविधियाँ तेज हुई हैं। रोड्रिगेज़ पर अमेरिकी दबाव है कि वे तेल उत्पादन बढ़ाएँ और राजनीतिक बंदियों की रिहाई सुनिश्चित करें, जिससे सत्ता संतुलन नाज़ुक बना हुआ है।
(17 Jan) downtoearth
रिपोर्ट: भूजल के अति दोहन से भारत के ज्यादातर डेल्टा धँस रहे
भारत के कई प्रमुख नदी डेल्टा तेज़ी से धँस रहे हैं, जिससे करोड़ों जीवो पर बाढ़ और समुद्री जल के अतिक्रमण का खतरा बढ़ गया है। Nature पत्रिका में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार गंगा, ब्रह्मपुत्र, ब्राह्मणी, महानदी, गोदावरी, कावेरी और कबानी डेल्टा में भूमि धँसाव चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है। शोध में बताया गया कि अत्यधिक भूजल दोहन इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा कारण है, जबकि समुद्र-स्तर वृद्धि और नदियों में तलछट (sediment) की कमी स्थिति को और गंभीर बना रही है।
अध्ययन ने 29 देशों के 40 बड़े डेल्टा का विश्लेषण किया, जहाँ 23.6 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं। 2014-2023 के बीच आधे से अधिक डेल्टा में धँसाव की दर 3 मिमी प्रति वर्ष से अधिक रही। ब्राह्मणी और महानदी डेल्टा विश्व के सबसे तेज़ धँसने वाले क्षेत्रों में शामिल पाए गए, जहाँ बड़ी भूमि 5 मिमी प्रति वर्ष से अधिक गति से नीचे जा रही है। भारत के गंगा-ब्रह्मपुत्र, ब्राह्मणी और महानदी डेल्टा के 90% से अधिक हिस्सों में धँसाव दर्ज हुआ।
डेल्टा प्राकृतिक रूप से नदियों द्वारा लाई गई गाद से अपनी ऊँचाई बनाए रखते हैं, पर बाँधों और तटबंधों के कारण यह आपूर्ति घट गई है। भूजल के अत्यधिक उपयोग से भूमिगत परतें सिकुड़ रही हैं, जिससे सतह स्थायी रूप से नीचे जा रही है। कोलकाता जैसे शहर भी इसी कारण तेजी से धँस रहे हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि भारतीय डेल्टा “अपर्याप्त रूप से तैयार(unprepared divers)” श्रेणी में हैं — जहाँ जोखिम अधिक और अनुकूलन क्षमता कम है। इससे कृषि, पेयजल, आजीविका और तटीय आबादी का भविष्य गंभीर संकट में है।
(10 Dec) IE
भारत में असमानता: आय से आगे, संरचना की समस्या
हाल ही में प्रकाशित World Inequality Report 2026 भारत के विकास मॉडल पर एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। यह रिपोर्ट केवल यह नहीं बताती कि भारत में असमानता बढ़ी है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि यह असमानता अब संरचनात्मक रूप ले चुकी है — यानी विकास की दिशा और उसकी संस्थागत बनावट से जुड़ी हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय समाज को यदि आय के आधार पर तीन हिस्सों में बाँटा जाए, तो नीचे के 50 प्रतिशत लोग, बीच के 40 प्रतिशत लोग और ऊपर के 10 प्रतिशत लोग — यही मुख्य ढाँचा उभरता है। इन 10 प्रतिशत लोगों के भीतर भी शीर्ष 1 प्रतिशत ऐसा वर्ग है, जिसके पास कुल राष्ट्रीय आय का लगभग 22–23 प्रतिशत हिस्सा संकेंद्रित है। यह आय-संकेंद्रण का स्तर उन देशों के समान है जिन्हें अर्थशास्त्र में अत्यधिक असमान समाज माना जाता है, जैसे ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका। इस तुलना का अर्थ यह नहीं है कि भारत वही देश बन गया है, बल्कि यह चेतावनी है कि आय का केंद्रीकरण अब भारत में भी उसी खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है।
इस तस्वीर का दूसरा पक्ष और भी चिंताजनक है। भारत के निचले 50 प्रतिशत लोग कुल राष्ट्रीय आय का केवल 13–14 प्रतिशत ही अर्जित करते हैं, जो वैश्विक औसत (लगभग 18–19 प्रतिशत) से भी कम है। इसका अर्थ यह है कि भारत का बड़ा हिस्सा न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि वैश्विक तुलना में भी अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में है। यह केवल गरीबी का नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों के सीमित होने का संकेत है।
इन दोनों के बीच स्थित है भारत का मध्य वर्ग — वह 40 प्रतिशत आबादी, जिसे सामान्यतः किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। किंतु WIR जिस सबसे बड़े संरचनात्मक खतरे की ओर इशारा करती है, वह है मध्य वर्ग का खोखला होना। भारत में यह वर्ग कुल आय का केवल लगभग 30 प्रतिशत ही प्राप्त करता है, जबकि अपेक्षाकृत अधिक समान अर्थव्यवस्थाओं में यही वर्ग 40–45 प्रतिशत तक आय साझा करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि मध्य वर्ग संख्या में छोटा हो गया है, बल्कि यह कि उसकी आर्थिक शक्ति कमजोर हो गई है। वह न तो पर्याप्त उपभोग कर पा रहा है, न ही भविष्य को लेकर सुरक्षित महसूस कर रहा है।
इस स्थिति का परिणाम यह है कि भारत एक व्यापक, सशक्त उपभोक्ता समाज नहीं बना पा रहा। इसके स्थान पर एक दोहरी अर्थव्यवस्था उभर रही है — ऊपर एक छोटा, अत्यधिक समृद्ध अभिजात वर्ग और नीचे एक विशाल बहुसंख्यक समाज, जो लगातार दबाव में है। यह असंतुलन केवल आय का नहीं, बल्कि विकास की गुणवत्ता का प्रश्न बन जाता है।
हालाँकि, आय और संपत्ति जैसे आँकड़े केवल यह बताते हैं कि क्या हुआ। वे यह नहीं समझा पाते कि अवसर इतने सीमित क्यों बने हुए हैं। इसी बिंदु पर Access (In)Equality Index (AEI) 2025 हमारी समझ को आगे बढ़ाता है। AEI आय से आगे बढ़कर यह देखता है कि लोगों को जीवन की बुनियादी सुविधाओं तक वास्तविक पहुँच है या नहीं।
AEI “एक्सेस” को चार आयामों — उपलब्धता(availability), सामर्थ्य(affordability), पहुँच(approachability) और उपयुक्तता(appropriateness) — के माध्यम से समझता है। किसी स्कूल या अस्पताल का अस्तित्व होना पर्याप्त नहीं है; यह भी आवश्यक है कि वह आर्थिक रूप से वहनीय हो, सामाजिक व भौगोलिक रूप से सुलभ हो और गुणवत्ता के लिहाज़ से उपयोगी हो। AEI का निष्कर्ष यह है कि भारत में समस्या सुविधाओं की पूर्ण अनुपस्थिति नहीं, बल्कि संरचनात्मक एक्सेस राशनिंग(Structural Access Rationing) की है — जहाँ संस्थागत व्यवस्थाएँ ऐसी हैं कि बड़ी आबादी स्वाभाविक रूप से बाहर रह जाती है।
यही वह बिंदु है जहाँ विकास मानव क्षमताओं में बदलने में विफल हो जाता है। सड़कें, पुल और भौतिक ढाँचा तो बनता है, पर शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएँ पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं हो पातीं। परिणामस्वरूप, विकास GDP में तो दिखता है, लेकिन लोगों के जीवन में उसकी छाप सीमित रह जाती है।
यह स्थिति किसी एक वर्ष या किसी आकस्मिक नीति का परिणाम नहीं है। यह दशकों से अपनाई गई उन प्राथमिकताओं का नतीजा है, जिनमें भौतिक पूँजी को तो महत्व मिला, लेकिन मानव विकास पूँजी को अपेक्षित निवेश नहीं मिला। इसी कारण असमानता केवल बढ़ी नहीं, बल्कि स्थायी होती चली गई।
इसलिए भारत की असमानता की समस्या को केवल पुनर्वितरण या सब्सिडी के प्रश्न तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह मूलतः राज्य की क्षमता, संस्थागत मज़बूती और विकास की दिशा का प्रश्न है।
