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(30-11-25) HT
पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर तनाव तेज़, डूरंड रेखा विवाद फिर उभरा
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। तालिबान प्रशासन ने दावा किया है कि पाकिस्तान ने 24–25 नवम्बर की रात पक्तिका, खोस्त और कुनार (Paktika, Khost, and Kunar) प्रांतों में हवाई हमले किए, जिनमें 10 लोगों की मौत हो गई। हालाँकि पाकिस्तान की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित है, लेकिन सीमा क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं।
विवाद का मुख्य केन्द्र डूरंड रेखा है, जो 1893 में ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी मॉर्टिमर डूरंड और अफ़ग़ान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच हुए समझौते से निर्धारित हुई थी। लगभग 2,600 किमी लंबी यह सीमा पश्तून जनजातियों को दो हिस्सों में बाँटती है और वाखान कॉरिडोर को रूस और ब्रिटेन के बीच बफ़र ज़ोन के रूप में स्थापित करती थी।
1947 के बाद पाकिस्तान ने डूरंड रेखा को अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा माना, जबकि अफ़ग़ानिस्तान ने इसे औपनिवेशिक और अवैध बताते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वर्षों से दोनों देशों के बीच पश्तूनिस्तान की मांग, सीमा पार उग्रवाद और सुरक्षा अभियानों को लेकर तनाव जारी है। पाकिस्तान द्वारा 2017 में सीमा पर बाड़ निर्माण की प्रक्रिया ने भी काबुल की नाराज़गी बढ़ाई।
हाल में क़तर की मध्यस्थता से युद्धविराम की कोशिशें हुईं, लेकिन डूरंड रेखा पर मतभेद अब भी गहरे हैं। ताज़ा घटनाक्रम ने क्षेत्र की नाज़ुक शांति को पुनः संकट में डाल दिया है।
(बफ़र ज़ोन (Buffer Zone) : एक ऐसा क्षेत्र जो दो देशों, दो सेनाओं या दो शक्तियों के बीच दूरी बनाकर रखता है, ताकि सीधा टकराव न हो।)
(1-12-25) IE
भारत की ऊर्जा नीति नई चुनौतियों के मोड़ पर: जलवायु, चीन और AI से जुड़ी दुविधाएँ
भारत की ऊर्जा नीति अब तक तीन बातों पर केंद्रित रही है — सबके लिए ऊर्जा उपलब्ध कराना, सस्ती रखना और आपूर्ति को सुरक्षित रखना। काफी हद तक भारत इन लक्ष्यों को पूरा कर चुका है। सभी गाँव बिजली से जुड़ चुके हैं, गरीब परिवारों को सब्सिडी वाला ईंधन मिलता है, और तेल–गैस का 85% आयात होने के बावजूद भारत अब केवल अस्थिर मध्य-पूर्व पर निर्भर नहीं है। आज अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और जल्द ही गुयाना जैसे सुरक्षित स्रोत भी उपलब्ध हैं।
इस सफलता के पीछे आज़ादी के बाद बनाई गई शासन-व्यवस्था है। नेहरू जी ने ऊर्जा क्षेत्र को सरकारी कंपनियों (PSUs) के हवाले किया था, क्योंकि निजी कंपनियों पर भरोसा कम था। लेकिन बाद में जब सरकारी कंपनियाँ अकेले बढ़ती ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाईं, तो निजी क्षेत्र को भी शामिल किया गया। आज ऊर्जा क्षेत्र सरकारी और निजी निवेश के मिश्रित मॉडल पर चलता है। समस्या यह है कि भारत में एक भी राष्ट्रीय संस्था नहीं है जो पूरी ऊर्जा नीति का समन्वय करे।
अब समय बदल रहा है। वैश्विक तापमान वृद्धि और AI तकनीक के कारण ऊर्जा नीति को नई दिशा देनी होगी। अब उद्देश्य यह होना चाहिए कि विकास और तकनीक बढ़े, लेकिन ऊर्जा की माँग और प्रदूषण कम हों। यह आसान नहीं है, क्योंकि इसमें तीन बड़े टकराव शामिल हैं।
पहला टकराव:
कोयले पर निर्भरता बनाम पर्यावरण।
Coal India में लाखों लोगों(3.5 लाख) की रोज़ी-रोटी जुड़ी है, इसलिए कोयले को कम करना राजनीतिक रूप से कठिन है। लेकिन प्रदूषण भी बहुत बढ़ चुका है।
दूसरा टकराव:
ग्रीन टेक्नोलॉजी के लिए चीन पर निर्भरता।
सोलर और बैटरी उपकरणों का 80–95% उत्पादन चीन में होता है। सवाल यह है कि क्या हमें सस्ता माल लेने के लिए चीन पर निर्भर होना चाहिए या सुरक्षा कारणों से बचना चाहिए?
तीसरा टकराव:
AI डेटा सेंटर्स की भारी बिजली ज़रूरत बनाम नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता।
AI कंपनियाँ नवीकरणीय बिजली से काम चलाने की बात करती हैं, लेकिन इसके लिए ग्रिड, बैटरी स्टोरेज और बड़े निवेश की ज़रूरत है।
इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को नई, समन्वित और एकीकृत ऊर्जा शासन व्यवस्था चाहिए — जो सरकार, कंपनियों और शोध संस्थानों को एक साथ निर्णय लेने में सक्षम बनाए।
(1-12-25) TH
भारत-बांग्लादेश समुद्री सीमा पर ‘ग्रे एरिया’ की चुनौती: विशेषज्ञ
भारत और बांग्लादेश ने समुद्री सीमा विवाद का समाधान कर लिया है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार सीमांकन में मौजूद “ग्रे एरिया” अब भी दोनों देशों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ऑस्ट्रेलियाई समुद्री विशेषज्ञ ज्योशुआ अलेक्ज़ांडर, जिन्होंने बांग्लादेश सरकार को तकनीकी सलाह दी है, ने The Hindu से बातचीत में बताया कि 2014 के UN Tribunal के फैसले से सीमा तय तो हो गई, पर इसका प्रबंधन आसान नहीं है। ट्रिब्यूनल ने बांग्लादेश को बंगाल की खाड़ी के 25,602 वर्ग किमी में से 19,467 वर्ग किमी समुद्री क्षेत्र दिया था।
अलेक्ज़ांडर के अनुसार, ‘ग्रे एरिया’ वह क्षेत्र है जहाँ समुद्र तल (seabed) पर अधिकार बांग्लादेश का है, लेकिन ऊपर के जल-स्तर (water column) पर अधिकार भारत का। ऐसी स्थिति में किसी भी संसाधन—जैसे तेल प्लेटफॉर्म—का उपयोग तभी संभव है जब दोनों देश संयुक्त प्रबंधन पर सहमत हों।
उन्होंने बताया कि बांग्लादेश ने पिछले वर्षों में चटगाँव बंदरगाह के आसपास समुद्री डकैती पर प्रभावी नियंत्रण किया है, जिससे उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी है। वर्तमान अंतरिम सरकार द्वारा चटगाँव के New Mooring Container Terminal को UAE की कंपनी DP World को लीज़ पर देने के फैसले को उन्होंने सकारात्मक बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि हालाँकि शेख हसीना सरकार ने सुरक्षा में सुधार किया, लेकिन वह बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश की सामरिक स्थिति का पूर्ण लाभ नहीं उठा सकी। बांग्लादेश को भविष्य की समुद्री तकनीकों और स्वचालित जहाज़ों के लिए दीर्घकालिक बंदरगाह विकास योजना बनानी होगी।
(1-12-25) IE
असम में छह समुदायों को ST दर्जा देने पर चर्चा तेज, केंद्र और राज्य सरकारें सक्रिय
असम में छह समुदायों—चाय जनजाति, मोरन, मतक, ताई-अहोम, सोनोवाल-कोच, और चुटिया—को अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जा देने का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है। लंबे समय से लंबित इस मांग को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच वार्ता पिछले सप्ताह तेज़ हुई, जिसमें सामाजिक-आर्थिक मानकों और जनसांख्यिकीय प्रभावों पर विस्तृत चर्चा की गई।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव से राज्य की जनजातीय संरचना में व्यापक परिवर्तन आ सकता है, इसलिए विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श को प्राथमिकता दी जा रही है। कई संगठनों ने भी सरकार से मांग की है कि निर्णय लेने से पहले ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधारों को स्पष्ट रूप से परखा जाए।
वहीं, समुदायों का कहना है कि ST दर्जा मिलने से उन्हें शिक्षा, नौकरियों और विकास परियोजनाओं में समान अवसर प्राप्त होंगे। अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की समिति की सिफ़ारिशों पर निर्भर करेगा।
(2-12-25) TH
चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर की योजना
अमेरिका ने हाल ही में घोषणा की है कि वह 2030 के शुरुआती दशक तक चंद्रमा पर एक छोटा परमाणु रिएक्टर स्थापित करना चाहता है। यह कदम अंतरिक्ष में स्थायी ऊर्जा व्यवस्था बनाने की दिशा में पहला बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
अभी चंद्रमा पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर ऊर्जा है, लेकिन वहाँ 14 दिनों की लंबी रातें और ध्रुवीय क्षेत्रों में कम धूप होने से यह पर्याप्त नहीं है। इसलिए चंद्रमा और मंगल जैसी जगहों पर लंबे समय तक मानव मिशन चलाने के लिए न्यूक्लियर ऊर्जा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अब तक अंतरिक्ष में RTG (Radioisotope Thermoelectric Generators) का उपयोग होता रहा है, जो प्लूटोनियम के क्षय से ऊर्जा बनाते हैं। लेकिन ये सिर्फ कुछ सौ वॉट बिजली पैदा कर पाते हैं।
मानव बस्तियों, प्रयोगशालाओं और औद्योगिक गतिविधियों के लिए कई किलोवॉट से मेगावॉट तक ऊर्जा की जरूरत होती है। इसके लिए कॉम्पैक्ट फिशन रिएक्टर(Compact Fission Reactor) सबसे उपयुक्त विकल्प हैं।
ऐसे रिएक्टर चंद्रमा पर बर्फ से पानी निकालने, रॉकेट ईंधन बनाने, सतह वाहनों को चार्ज करने और रहने योग्य तापमान बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। मंगल पर इन्हें जमीन के भीतर रखकर विकिरण से सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है।
समस्या यह है कि अंतरिक्ष में परमाणु तकनीक के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था कमजोर है। 1992 के UN सिद्धांत केवल दिशा-निर्देश हैं—बाध्यकारी नहीं। इनमें न तो तकनीकी मानक हैं, न ही यह परमाणु प्रणोदन (nuclear propulsion) को कवर करते हैं। किसी दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी अस्पष्ट है।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि नए और मजबूत वैश्विक नियम बनना जरूरी है—ताकि अंतरिक्ष में परमाणु ऊर्जा सुरक्षित, पारदर्शी और पर्यावरण-सम्मत ढंग से इस्तेमाल हो सके।
भारत के लिए भी यह एक अवसर है कि वह ISRO और परमाणु विभाग के साथ मिलकर इस क्षेत्र में नेतृत्व दिखाए और सुरक्षित अंतरिक्ष परमाणु तकनीक के वैश्विक मानदंड तय करने में भूमिका निभाए।
(3-12-25) TH
SIR को पूरी तरह से डिजिटाइज़ करने की आवश्यकता और चुनोतियाँ
भारत में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR 2.0) मतदाता सूची को साफ और अद्यतन करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, लेकिन यह प्रयास पुराने और त्रुटिपूर्ण डेटा पर आधारित होने के कारण गंभीर समस्याओं में फंस गया है। वर्तमान SIR अभी भी 2002–2004 की कागज़-आधारित मतदाता सूचियों पर निर्भर है, जिन्हें उस समय मैनुअल और गलती-भरे तरीकों से तैयार किया गया था। इन पुरानी सूचियों में अधूरे नाम, गलत पते, गायब EPIC नंबर और वर्तनी की बड़ी संख्या में गलतियाँ पाई जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये रिकॉर्ड न तो खोजे जा सकते हैं और न ही डिजिटल जांच के योग्य हैं, क्योंकि इनका डिजिटलीकरण नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, लाखों मतदाता अपनी जानकारी खोज नहीं पा रहे हैं। Election Commission का आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet, जो ऑनलाइन फॉर्म भरने, आधार सत्यापन और शिकायत निवारण जैसी सेवाएँ प्रदान करता है, इस प्रक्रिया में पूरी तरह उपयोग नहीं हो रहा।
लोगों से यह उम्मीद करना कि वे 20 साल पुराने बूथ या सीरियल नंबर याद रखें, अव्यवहारिक माना जा रहा है। BLOs भी कागज़ी फॉर्म, फोटो चिपकाने और डेटा एंट्री के बोझ से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि SIR 2026 को पूरी तरह डिजिटल, पेपरलेस और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि मतदाता सूची विश्वसनीय और आधुनिक बन सके।
(3-12-25) IE
साइबर स्लेवरी: दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीयों के शोषण का बढ़ता खतरा
दक्षिण-पूर्व एशिया के म्यांमार, कंबोडिया और लाओस में चल रहे साइबर फ्रॉड नेटवर्क भारतीय युवाओं के लिए गंभीर खतरा बन गए हैं। कोविड-19 के बाद इन देशों में विद्रोही समूहों और आपराधिक गिरोहों ने बंद पड़े कैसिनो और बेटिंग हब को “स्कैम कम्पाउंड्स” में बदल दिया है, जहाँ नौकरी के बहाने लाए गए लोगों से ऑनलाइन ठगी करवाई जाती है।
थाईलैंड में उच्च वेतन वाली आईटी या डेटा एंट्री नौकरियों के विज्ञापन देकर भारतीय नौकरी-प्रार्थियों को आकर्षित किया जाता है। आगमन पर पासपोर्ट जब्त कर लिया जाता है और उन्हें अवैध मार्गों से म्यांमार या कंबोडिया ले जाया जाता है। वहाँ 15–18 घंटे काम, धमकी और शारीरिक उत्पीड़न जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है।
यह मुद्दा पहली बार 2022 में तब सामने आया जब तमिलनाडु के कई आईटी प्रोफेशनल्स फँसे पाए गए। केंद्र सरकार अब तक 1,500 से अधिक भारतीयों को वापस ला चुकी है, जबकि लगभग 20,000 लोगों की repatriation प्रक्रिया जारी है। भारतीय दूतावास और सुरक्षा एजेंसियाँ लगातार इन गिरोहों पर कार्रवाई कर रही हैं।
(5-12-25) ET
इंडस जल संधि विवाद: भारत की गैर-हाज़िरी के बीच न्यूट्रल एक्सपर्ट का एकतरफ़ा आगे बढ़ने का संकेत
इंडस वाटर्स ट्रीटी (IWT) से जुड़े विवाद में भारत द्वारा न्यूट्रल एक्सपर्ट की चौथी बैठक में हिस्सा न लेने के बाद स्थिति और जटिल हो गई है। भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि की प्रक्रियाओं से अपनी भागीदारी रोक रखी है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान द्वारा संधि का राजनीतिक इस्तेमाल और बदलते सुरक्षा हालात सामान्य बातचीत की अनुमति नहीं देते।
1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी इस संधि के तहत इंडस नदी प्रणाली का बंटवारा किया गया है—पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (झेलम, चिनाब, इंडस) पाकिस्तान को मिलीं। हालांकि, भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित जलविद्युत परियोजनाएँ बनाने की अनुमति है। इन्हीं परियोजनाओं से जुड़े तकनीकी विवादों को सुलझाने के लिए विश्व बैंक एक न्यूट्रल एक्सपर्ट नियुक्त करता है।
मौजूदा विवाद भारत की किशनगंगा और रैटल जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा है। पाकिस्तान का आरोप है कि इनकी डिज़ाइन संधि के नियमों का उल्लंघन करती है। भारत इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहता है कि ये परियोजनाएँ “रन-ऑफ-द-रिवर” मानकों के अनुरूप हैं और पाकिस्तान अक्सर भारत की कानूनी परियोजनाओं को रोकने की कोशिश करता है। तनाव तब बढ़ा जब पाकिस्तान ने एक साथ दो मंचों—न्यूट्रल एक्सपर्ट और कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन—का रुख किया, जिसे भारत ने संधि का उल्लंघन बताते हुए विरोध किया और अपनी भागीदारी निलंबित कर दी।
भारत की गैर-हाज़िरी के बीच न्यूट्रल एक्सपर्ट मिशेल लीनो ने दोनों देशों को सूचित किया है कि अगर भारत भाग नहीं लेता, तो वे भारत से अतिरिक्त दस्तावेज़ लिए बिना और भारत में साइट विज़िट किए बिना ही उपलब्ध सामग्री के आधार पर जल्द फैसला देंगे। यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे निर्णय मुख्य रूप से पाकिस्तान की प्रस्तुतियों पर आधारित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एकतरफ़ा निर्णय भारत की पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के भविष्य को प्रभावित कर सकता है और संधि की तकनीकी व्याख्याओं में बदलाव ला सकता है। यह घटनाक्रम संधि के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े करता है, क्योंकि भारत अब यह तय करेगा कि वह दोबारा शामिल हो, संधि की समीक्षा मांगे या निलंबन जारी रखे।
(6-12-25) AIR
भारत–रूस 23वाँ वार्षिक शिखर सम्मेलन: प्रमुख उपलब्धियाँ और रणनीतिक सहयोग का विस्तृत खाका
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान आयोजित 23वें भारत–रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन ने दोनों देशों की विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी को और मज़बूत किया। बैठक में रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, अंतरिक्ष, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्रों में कई महत्त्वपूर्ण समझौते हुए, जिनसे द्विपक्षीय संबंधों की दिशा अगले दशक के लिए स्पष्ट हुई।
दोनों देशों ने 2000 की सामरिक साझेदारी घोषणा की 25वीं वर्षगाँठ पर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और रक्षा सहयोग को महज़ खरीदार–विक्रेता मॉडल से आगे बढ़ाकर संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास और ‘मेक इन इंडिया’ आधारित सह-उत्पादन की दिशा में विस्तार देने पर सहमति जताई। भुगतान प्रणाली, लंबित निवेश मुद्दों और ऊर्जा क्षेत्र को साझेदारी के केंद्रीय स्तंभ के रूप में पुनः स्थापित किया गया। आर्थिक क्षेत्र में कार्यक्रम 2030 अपनाया गया तथा 2030 तक 100 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य तय किया गया।
कनेक्टिविटी पर, भारत–रूस ने अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग और उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR) जैसे नेटवर्कों को गति देने पर जोर दिया, जिससे यूरेशिया और आर्कटिक क्षेत्रों में भारतीय व्यापार के नए अवसर खुलेंगे। रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक में ऊर्जा, खनन और कृषि जैसे क्षेत्रों में 2024–2029 सहयोग ढाँचे के तहत निवेश बढ़ाने पर सहमति बनी।
असैन्य परमाणु सहयोग में कुडनकुलम परियोजना और भारत के 2047 तक 100 गीगावाट लक्ष्य के अनुरूप पूर्ण ईंधन चक्र तक सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया गया। अंतरिक्ष क्षेत्र में मानव उड़ान, उपग्रह नेविगेशन और ग्रह-अन्वेषण में इसरो–रोस्कोस्मोस साझेदारी को और गहरा करने पर जोर दिया गया।
बहुपक्षीय स्तर पर रूस ने भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता का समर्थन किया। दोनों देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध शून्य-सहिष्णुता की आवश्यकता दोहराई।
सहयोग के साथ कई चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आईं—
- यूक्रेन युद्ध के कारण S-400, पनडुब्बियों और अन्य सैन्य प्रणालियों की आपूर्ति में देरी।
- व्यापार संरचना में भारी असंतुलन, जहाँ आयात निर्यात से कई गुना अधिक है।
- रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत की रणनीतिक अपेक्षाओं को सीमित कर सकती है।
- प्रतिबंधों के चलते भुगतान चैनल बाधित हैं।
- रूसी सेना में फर्जी नौकरियों के माध्यम से भारतीय नागरिकों की भर्ती का मुद्दा चिंता बढ़ा रहा है।
इन चुनौतियों के बावजूद, शिखर सम्मेलन ने संबंधों को अगले दशक के लिए मज़बूत आधार प्रदान किया।
