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नेपाल के हालिया चुनाव: जनआकांक्षाएँ, चुनौतियाँ और क्षेत्रीय प्रभाव
नेपाल की आधुनिक राजनीति पिछले तीन दशकों में गहरे परिवर्तन से गुज़री है। राजशाही से गणतंत्र तक का संक्रमण, आंतरिक संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से होकर गुज़रा है, जिसने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को लगातार पुनर्गठित किया है।
सितम्बर 2025 में भ्रष्टाचार, कमजोर शासन व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध में व्यापक जनआंदोलन प्रारम्भ हुआ। सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध से शुरू हुआ यह आंदोलन शीघ्र ही व्यापक जन असंतोष का रूप ले बैठा। विशेष रूप से युवाओं और नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी ने इसे एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की मांग में बदल दिया, जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन सरकार को पद छोड़ना पड़ा।
इस राजनीतिक पृष्ठभूमि में 5 मार्च 2026 में सम्पन्न आम चुनावों ने नेपाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ प्रस्तुत किया। इन चुनावों में हाल ही में उभरी एक नई राजनीतिक शक्ति ने पारंपरिक दलों को चुनौती देते हुए स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, जो नेपाली मतदाताओं की परिवर्तन की आकांक्षा को दर्शाता है। इसे नेपाल की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के एक नए चरण के रूप में भी देखा जा रहा है, जहाँ वैकल्पिक नेतृत्व और युवा राजनीति का प्रभाव बढ़ता दिखाई देता है।
नेपाल की राजनीतिक दिशा का महत्व केवल उसकी आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है। देश की आर्थिक संरचना, व्यापार और अवसंरचनात्मक विकास का गहरा संबंध भारत और चीन दोनों से जुड़ा हुआ है, जबकि चीन की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएँ भी नेपाल में चल रही हैं। इसलिए नई सरकार की नीतियाँ न केवल नेपाल की घरेलू स्थिरता बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीतिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकती हैं।
राजनितिक पृष्ठभूमि
नेपाल में राजशाही से संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य तक : प्रमुख ऐतिहासिक पड़ाव
नेपाल की आधुनिक राजनीतिक यात्रा धीरे-धीरे विकसित हुई एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें परंपरागत सत्ता संरचनाएँ, लोकतांत्रिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन लगातार एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक नेपाल ने राजशाही से लोकतांत्रिक गणराज्य तक का महत्वपूर्ण राजनीतिक संक्रमण अनुभव किया।
शाह वंश का उदय और नेपाल का एकीकरण (18वीं शताब्दी)
नेपाल में आधुनिक राज्य व्यवस्था की शुरुआत शाह वंश के उदय से जुड़ी हुई है। इस वंश के संस्थापक पृथ्वीनारायण शाह थे, जो गोरखा राज्य के राजा थे। उस समय वर्तमान नेपाल का क्षेत्र कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, जिन्हें सामूहिक रूप से बाइसे–चौबिसे राज्य कहा जाता था।
पृथ्वीनारायण शाह ने इन बिखरे हुए राज्यों को एकीकृत करने के उद्देश्य से सैन्य और राजनीतिक अभियान शुरू किया। 1768–1769 में काठमांडू घाटी के प्रमुख नगरों — काठमांडू, पाटन और भक्तपुर पर अधिकार करने के बाद उन्होंने एक एकीकृत नेपाली राज्य की स्थापना की। इसी के साथ नेपाल में शाह वंश की राजशाही की नींव पड़ी और नेपाल एक केंद्रीकृत राजतंत्र के रूप में विकसित हुआ।
1846 – कोत पर्व और राणा शासन की स्थापना
19वीं शताब्दी के मध्य तक नेपाल के दरबार में विभिन्न कुलीन परिवारों और सैन्य नेताओं के बीच सत्ता संघर्ष बढ़ गया था। इसी पृष्ठभूमि में 14 सितम्बर 1846 को काठमांडू दरबार परिसर में स्थित कोत (शाही शस्त्रागार) में एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसे इतिहास में कोत पर्व (Kot Massacre) के नाम से जाना जाता है।
यह घटना उस समय हुई जब दरबार के प्रभावशाली अधिकारी गगन सिंह खवास की हत्या कर दी गई। उनकी हत्या से क्रोधित होकर रानी राज्यलक्ष्मी देवी ने तत्काल दरबार के सभी प्रमुख सैन्य और राजनीतिक अधिकारियों को कोत में उपस्थित होने का आदेश दिया। सभा के दौरान अचानक तनाव और हिंसा भड़क उठी।
सैनिक कमांडर जंग बहादुर कुँवर (जो बाद में जंग बहादुर राणा कहलाए) और उनके समर्थकों ने दरबार के कई शक्तिशाली सरदारों और सैन्य अधिकारियों की हत्या कर दी। इस घटना के बाद जंग बहादुर नेपाल की सत्ता के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे।
इसके बाद उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री का पद अपने हाथ में ले लिया और बाद में इसे अपने परिवार के लिए वंशानुगत बना दिया। परिणामस्वरूप नेपाल में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हुई जिसमें शाह वंश के राजा औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष बने रहे, जबकि वास्तविक राजनीतिक सत्ता राणा वंश के वंशानुगत प्रधानमंत्रियों के हाथों में केंद्रित हो गई। यह व्यवस्था लगभग 1846 से 1951 तक चली।
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध का दौर (1914–1945)
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में नेपाल राणा शासकों के अधीन था, जिनके हाथों में वास्तविक राजनीतिक सत्ता केंद्रित थी। इस अवधि में नेपाल के ब्रिटेन के साथ घनिष्ठ सैन्य और कूटनीतिक संबंध विकसित हुए। परिणामस्वरूप हजारों नेपाली सैनिकों ने ब्रिटिश भारतीय सेना के साथ मिलकर प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) में भाग लिया। इन युद्धों के अनुभवों और बाहरी दुनिया से संपर्क ने नेपाली समाज में नई राजनीतिक चेतना को जन्म दिया। धीरे-धीरे यह विचार मजबूत होने लगा कि देश में भी प्रतिनिधिक शासन और आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना होनी चाहिए। हालांकि राणा शासन ने ऐसे विचारों के प्रसार को राजनीतिक नियंत्रण और दमन के माध्यम से सीमित रखने का प्रयास किया।
निर्वासन की राजनीति और लोकतांत्रिक चेतना (1940 का दशक)
इसी पृष्ठभूमि में कई नेपाली राजनीतिक नेता भारत में निर्वासन में रहने लगे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और वहाँ उपलब्ध अपेक्षाकृत अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता ने उन्हें संगठित राजनीतिक गतिविधियों के लिए प्रेरित किया। निर्वासन में रहते हुए इन नेताओं ने विभिन्न संगठनों की स्थापना की और लोकतांत्रिक परिवर्तन की मांग को व्यवस्थित रूप दिया। इन संगठनों के एकीकरण से आगे चलकर नेपाली कांग्रेस पार्टी का गठन हुआ, जिसने नेपाल में लोकतांत्रिक आंदोलन को संगठित नेतृत्व प्रदान किया।
1948 – नेपाल का प्रथम संविधान
लोकतांत्रिक दबाव और बदलते अंतरराष्ट्रीय वातावरण को देखते हुए प्रधानमंत्री पद्म शमशेर राणा ने 1948 में नेपाल का पहला संविधान घोषित किया। यद्यपि संविधान में कुछ संस्थागत सुधारों का उल्लेख था, फिर भी वास्तविक राजनीतिक शक्ति राणा वंश के प्रधानमंत्री के हाथों में ही केंद्रित रही, जबकि शाह वंश के राजा केवल औपचारिक भूमिका तक सीमित थे। राणा परिवार के भीतर मौजूद रूढ़िवादी वर्ग के विरोध के कारण यह संविधान प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सका।
1950–1951 – क्रांति और अंतरिम संविधान
इन सीमित सुधारों से असंतोष समाप्त नहीं हुआ और 1950 तक आते-आते राणा शासन के विरुद्ध आंदोलन अधिक तीव्र हो गया। 11 नवम्बर 1950 को नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ। इसी समय राजा त्रिभुवन भारत चले गए और वहाँ से लोकतांत्रिक शक्तियों का समर्थन किया। अंततः 1951 में एक राजनीतिक समझौता हुआ जिसके परिणामस्वरूप राणा शासन का अंत हुआ। नेपाली कांग्रेस और राजशाही के सहयोग से एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया तथा एक अंतरिम संविधान लागू किया गया, जिसने नेपाल में संवैधानिक शासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।
1959 – प्रथम संसदीय चुनाव
1950 के दशक के अंत तक जनता में लोकतांत्रिक शासन की अपेक्षाएँ और अधिक स्पष्ट हो चुकी थीं। इसी पृष्ठभूमि में राजा महेन्द्र वीर विक्रम शाह ने 1959 में नेपाल के पहले आम संसदीय चुनाव आयोजित करवाए। इन चुनावों में नेपाली कांग्रेस को विजय मिली और उसके नेता बी. पी. कोइराला प्रधानमंत्री बने। यह नेपाल के इतिहास में पहली बार था जब एक निर्वाचित सरकार ने संसदीय प्रणाली के अंतर्गत शासन संभाला। हालांकि संविधान के अंतर्गत राजा के पास अभी भी महत्वपूर्ण कार्यकारी अधिकार बने रहे, जिससे राजनीतिक सत्ता का संतुलन पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाया।
1962 – पंचायती व्यवस्था की स्थापना
राजा और निर्वाचित सरकार के बीच बढ़ते राजनीतिक तनाव ने अंततः 1960 में एक निर्णायक मोड़ लिया, जब राजा महेन्द्र ने संसद को भंग कर दिया और लोकतांत्रिक सरकार को समाप्त कर दिया। इसके बाद 1962 में पंचायत प्रणाली लागू की गई। इसे “पार्टीविहीन लोकतंत्र” के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसमें राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध था और शासन पंचायतों की बहुस्तरीय संरचना के माध्यम से संचालित होता था। व्यवहार में इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रमुख राजनीतिक निर्णयों पर अंतिम नियंत्रण राजा के पास ही बना रहा।
1979–1980 – जनमत संग्रह और संवैधानिक सुधार
पंचायती व्यवस्था के लंबे काल के दौरान भी लोकतांत्रिक असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। 1970 के दशक के अंत में छात्र आंदोलनों और राजनीतिक विरोध के कारण इस व्यवस्था की वैधता पर प्रश्न उठने लगे। इस परिस्थिति में राजा वीरेन्द्र ने 1979 में एक जनमत संग्रह आयोजित किया, जिसमें जनता को पंचायती व्यवस्था और बहुदलीय लोकतंत्र के बीच चयन करने का अवसर दिया गया। परिणामस्वरूप पंचायती व्यवस्था को संकीर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। इसके बाद 1980 में संविधान में संशोधन कर कुछ सीमित सुधार किए गए।
1990 – लोकतांत्रिक जनआंदोलन (जनआंदोलन–I)
हालांकि इन सुधारों के बावजूद लोकतंत्र की मांग समाप्त नहीं हुई। 1980 के दशक के अंत तक विभिन्न राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों ने मिलकर एक व्यापक आंदोलन प्रारंभ किया। 1990 में हुए इस आंदोलन को जनआंदोलन–I के रूप में जाना जाता है। व्यापक जनदबाव के परिणामस्वरूप राजा वीरेन्द्र को नया संविधान स्वीकार करना पड़ा, जिसने नेपाल में बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया और राजशाही की शक्तियों को संवैधानिक सीमाओं के भीतर निर्धारित किया।
1996–2006 – माओवादी विद्रोह / नेपाल का गृहयुद्ध
हालांकि 1990 के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हो गई, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के प्रश्न बने रहे। इसी पृष्ठभूमि में 1996 में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राज्य के विरुद्ध सशस्त्र आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन धीरे-धीरे नेपाल के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में फैल गया और अगले दस वर्षों तक राज्य तथा माओवादी विद्रोहियों के बीच संघर्ष चलता रहा। इस गृहयुद्ध में लगभग 16,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई और देश की राजनीतिक व्यवस्था गंभीर संकट में पड़ गई।
2001 – राजमहल हत्याकांड और राजा ज्ञानेन्द्र का सत्ता ग्रहण
इस राजनीतिक संकट के बीच जून 2001 में नेपाल के शाही महल में एक त्रासद घटना घटी, जिसे राजमहल हत्याकांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना में राजा वीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्या तथा शाही परिवार के कई सदस्य मारे गए। इसके बाद उनके भाई ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाह नेपाल के नए राजा बने। यह घटना ऐसे समय में हुई जब देश पहले से ही माओवादी विद्रोह और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा था।
2005–2006 – राजनीतिक संकट, जनआंदोलन–II और व्यापक शांति समझौता
माओवादी विद्रोह और लगातार बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता के बीच राजा ज्ञानेंद्र शाह ने फरवरी 2005 में संसद को भंग कर दिया और आपातकाल घोषित करते हुए शासन की पूर्ण सत्ता अपने हाथों में ले ली। इस निर्णय के विरोध में प्रमुख राजनीतिक दलों, माओवादी समूहों तथा नागरिक समाज के संगठनों ने व्यापक विरोध आंदोलन शुरू किया।
2006 में हुआ यह आंदोलन जनआंदोलन–II के नाम से जाना जाता है। देशव्यापी प्रदर्शनों और व्यापक जनदबाव के परिणामस्वरूप अंततः राजा को संसद बहाल करनी पड़ी और प्रत्यक्ष शासन समाप्त करना पड़ा। इसके बाद राजनीतिक दलों और माओवादी नेतृत्व के बीच वार्ताएँ शुरू हुईं।
इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप नवंबर 2006 में सरकार और माओवादी विद्रोहियों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे Comprehensive Peace Accord के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के साथ ही लगभग दस वर्षों तक चला सशस्त्र संघर्ष औपचारिक रूप से समाप्त हो गया और माओवादी आंदोलन को लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने का मार्ग मिला। इस घटना ने नेपाल के राजनीतिक संक्रमण को नई दिशा प्रदान की और आगे चलकर संविधान सभा के चुनाव तथा गणराज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
10 अप्रैल 2008 – संविधान सभा का चुनाव और राजशाही का अंत
नेपाल में राजनीतिक संक्रमण की प्रक्रिया के अंतर्गत 10 अप्रैल 2008 को संविधान सभा के चुनाव आयोजित किए गए। उस समय अंतरिम सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला कर रहे थे।
इन चुनावों का उद्देश्य एक ऐसी संविधान सभा का गठन करना था जो देश के लिए नया संविधान तैयार करे और लंबे समय से चल रहे राजनीतिक संक्रमण को संस्थागत रूप दे। चुनावों के बाद गठित संविधान सभा ने अपने पहले अधिवेशन (28 मई 2008) में एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया।
इस निर्णय के साथ ही लगभग 240 वर्ष पुरानी शाह वंश की राजशाही का औपचारिक अंत हो गया। इसके बाद जुलाई 2008 में राम बरन यादव नेपाल के पहले राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए, जिससे देश में गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की औपचारिक स्थापना हुई।
20 सितम्बर 2015 – नेपाल के नए संविधान की घोषणा
20 सितम्बर 2015 को नेपाल का नया संविधान आधिकारिक रूप से लागू किया गया। उस समय नेपाल के राष्ट्रपति रामबरन यादव थे और सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री सुशील कोइराला कर रहे थे।
इस संविधान ने नेपाल को औपचारिक रूप से संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में पुनर्गठित किया तथा देश को सात प्रांतों में विभाजित करते हुए संघीय शासन व्यवस्था स्थापित की।
2017 – संघीय ढाँचे के अंतर्गत प्रथम आम चुनाव
2015 में नए संविधान के लागू होने के बाद नेपाल में संघीय शासन व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी क्रम में 2017 में संघीय संसद, प्रांतीय विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों के लिए पहली बार चुनाव आयोजित किए गए।
इन चुनावों में Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) के नेता के.पी. शर्मा ओली और Communist Party of Nepal (Maoist Centre) के नेता पुष्प कमल दहल के नेतृत्व में बने वामपंथी गठबंधन को उल्लेखनीय सफलता मिली। इस गठबंधन की विजय के परिणामस्वरूप के. पी. शर्मा ओली प्रधानमंत्री बने और 2015 के संविधान द्वारा स्थापित संघीय व्यवस्था को पहली बार व्यावहारिक रूप से लागू किया गया।
सितम्बर 2025 – युवा नेतृत्व वाला विरोध आंदोलन
सितम्बर 2025 में नेपाल में भ्रष्टाचार, आर्थिक कठिनाइयों और शासन व्यवस्था की कमजोरियों के विरोध में युवाओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। उस समय नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल थे और सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली कर रहे थे।
इन प्रदर्शनों में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधारों की मांग उठाई गई। आंदोलन को शहरी युवाओं, नागरिक समाज और विभिन्न सामाजिक समूहों का व्यापक समर्थन मिला। बढ़ते जनदबाव और राजनीतिक संकट के कारण अंततः सरकार को पद छोड़ना पड़ा, जिससे देश में नई राजनीतिक प्रक्रिया और चुनावों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
मार्च 2026 – आम चुनाव और नई राजनीतिक शक्ति का उदय
सितम्बर 2025 के राजनीतिक संकट और प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली के पद छोड़ने के बाद नेपाल में अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की गई। उस समय नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल थे। राजनीतिक दलों की सहमति से चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से संचालित करने के लिए एक पूर्व न्यायाधीश को अंतरिम सरकार का नेतृत्व सौंपा गया, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी देश में आम चुनाव आयोजित कराना था।
इसी प्रक्रिया के अंतर्गत मार्च 2026 में नेपाल में आम चुनाव आयोजित किए गए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (Rastriya Swatantra Party, 2022) ने पारंपरिक राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ते हुए उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की और स्पष्ट बहुमत के साथ उभरी।
इस चुनाव परिणाम को नेपाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा गया, क्योंकि इससे लंबे समय से प्रभावी रहे पारंपरिक दलों की राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई और देश की लोकतांत्रिक राजनीति में नई राजनीतिक शक्तियों के उदय का संकेत मिला।
चुनाव प्रक्रिया और प्रमुख राजनीतिक दल
नेपाल की संघीय संसद द्विसदनीय है, जिसमें प्रतिनिधि सभा(House of Representatives of Nepal) और राष्ट्रीय सभा(National Assembly of Nepal) शामिल हैं। प्रतिनिधि सभा प्रमुख विधायी सदन है और सरकार का गठन इसी सदन में बहुमत प्राप्त करने वाले दल या गठबंधन द्वारा किया जाता है। प्रतिनिधि सभा में कुल 275 सदस्य होते हैं और इनका चुनाव दो अलग-अलग प्रणालियों के माध्यम से किया जाता है:
- 165 सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली (First Past the Post) के माध्यम से चुने जाते हैं, जिसमें प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी होता है।
- 110 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) के आधार पर चुने जाते हैं, जिसमें राजनीतिक दलों को प्राप्त कुल मतों के अनुपात में सीटें आवंटित की जाती हैं।
नेपाल में चुनावों का संचालन स्वतंत्र संवैधानिक संस्था Election Commission of Nepal द्वारा किया जाता है, जो चुनाव प्रक्रिया की निगरानी, मतदान की व्यवस्था और परिणामों की घोषणा के लिए जिम्मेदार होती है।
प्रमुख राजनीतिक दल
नेपाल की राजनीति में लंबे समय से कुछ प्रमुख दलों का प्रभाव रहा है, जिन्होंने देश की राजनीतिक दिशा और नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सबसे प्रमुख दलों में से एक है Nepali Congress, जो ऐतिहासिक रूप से लोकतांत्रिक आंदोलन और बहुदलीय प्रणाली के समर्थन के लिए जाना जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण दल है Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist), जिसने विशेष रूप से 21वीं सदी में नेपाल की राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव स्थापित किया है।
इसके अतिरिक्त Communist Party of Nepal (Maoist Centre) भी एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति है, जो 1996–2006 के माओवादी आंदोलन के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बनी।
हाल के वर्षों में नेपाल की राजनीति में नई राजनीतिक शक्तियों का भी उदय हुआ है। इनमें विशेष रूप से Rastriya Swatantra Party का उल्लेख किया जा सकता है, जिसने पारंपरिक दलों के विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हुए शहरी मतदाताओं और युवाओं के बीच समर्थन प्राप्त किया है।
चुनाव परिणाम
हाल ही में सम्पन्न आम चुनावों के परिणाम आधिकारिक रूप से घोषित किए जा चुके हैं। उम्मीदवार बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (Rastriya Swatantra Party) ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए चुनाव में स्पष्ट बढ़त हासिल की।
पार्टी ने House of Representatives of Nepal (प्रतिनिधि सभा) में बहुमत प्राप्त किया और लगभग 47.8% अनुपातिक मत हासिल किए। प्रतिनिधि सभा की कुल 275 सीटों में से सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को कम से कम 138 सीटों का समर्थन आवश्यक होता है।
चुनाव परिणामों के अनुसार RSP को प्रतिनिधि सभा में 182 सीटें प्राप्त हुईं। हालांकि यह संख्या संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (184 सीटें) से दो सीट कम है।
इसके विपरीत Nepali Congress को 38 सीटें तथा लगभग 19.1% अनुपातिक मत प्राप्त हुए।
अन्य प्रमुख दलों में Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) को 25 सीटें (लगभग 13.4% मत) तथा Communist Party of Nepal (Maoist Centre) को 17 सीटें (लगभग 7.5% मत) प्राप्त हुए।
इस चुनाव में लगभग 1.89 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे तथा 68 राजनीतिक दलों के 3,400 से अधिक उम्मीदवारों ने चुनाव में भाग लिया।
Seat Distribution (House of Representatives)
| Party | Seats |
| Nepali Congress | 165 |
| Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) | 164 |
| Communist Party of Nepal (Maoist Centre) | 164 |
| Rastriya Swatantra Party | 163 |
Vote Share
| Party | Vote Share (%) |
| Nepali Congress | 19.1 |
| CPN-UML | 13.4 |
| Communist Party of Nepal (Maoist Centre) | 7.5 |
| RSP | 47.8 |
Strike Rate Chart
यह चुनाव में पार्टी की electoral efficiency को दर्शाता है।
Strike Rate = (जीती सीटें ÷ लड़ी सीटें) × 100
| Party | Contested | Won | Strike Rate % |
| Nepali Congress | 165 | 18 | 10.90 |
| CPN-UML | 164 | 9 | 5.48 |
| Communist Party of Nepal (Maoist Centre) | 164 | 8 | 4.87 |
| RSP | 163 | 125 | 76.68 |
Region-wise Voting Pattern
प्रांतीय स्तर पर मतदान के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि RSP को देश के अधिकांश प्रांतों में व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। विशेष रूप से Madhesh Province, Bagmati Province तथा Gandaki Province में पार्टी को 50 प्रतिशत से अधिक अनुपातिक मत प्राप्त हुए।
इसके विपरीत Nepali Congress का प्रदर्शन अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्रों में ही मजबूत दिखाई देता है, विशेषकर Karnali Province में।
प्रांतीय परिणाम यह भी संकेत देते हैं कि पारंपरिक वाम दलों — Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) और Communist Party of Nepal (Maoist Centre) — का प्रभाव कई क्षेत्रों में घटता हुआ दिखाई देता है।
Party-wise Vote Share Swing (Compared to Previous Election)
Swing = वर्तमान चुनाव का वोट प्रतिशत − पिछले चुनाव का वोट प्रतिशत
| Party | 2022 Vote % | 2026 Vote % | Swing |
| Nepali Congress | 25.71 | 19.1 | – 6.61 |
| CPN-UML | 26.95 | 13.4 | – 13.55 |
| Communist Party of Nepal (Maoist Centre) | 11.13 | 7.5 | – 3.63 |
| RSP | 10.70 | 47.8 | 37.1 |
चुनावी रुझान और मतदाता व्यवहा (Electoral Trends and Voter Behaviour)
हाल ही में सम्पन्न प्रतिनिधि सभा चुनावों के परिणाम केवल राजनीतिक दलों की जीत-हार को ही नहीं दर्शाते, बल्कि नेपाल के मतदाताओं की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करते हैं। उपलब्ध चुनावी आँकड़ों, प्रांतीय मतदान पैटर्न और सीट परिणामों के विश्लेषण से कुछ महत्वपूर्ण चुनावी रुझान सामने आते हैं।
- पारंपरिक दलों के समर्थन में गिरावट
चुनाव परिणामों से स्पष्ट होता है कि लंबे समय से नेपाल की राजनीति में प्रभावी रहे दल — जैसे Nepali Congress, Communist Party of Nepal (UML) तथा Communist Party of Nepal (Maoist Centre) — के समर्थन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। उदाहरण के लिए, Nepali Congress को केवल 38 सीटें और लगभग 19.1% अनुपातिक वोट शेयर प्राप्त हुए। इसी प्रकार अन्य प्रमुख वामपंथी दलों का प्रदर्शन भी अपेक्षाकृत कमजोर रहा। यह परिणाम मतदाताओं के बीच पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व के प्रति बढ़ती असंतुष्टि का संकेत देता है।
- मतदाताओं में परिवर्तन की स्पष्ट आकांक्षा
चुनाव परिणामों का समग्र विश्लेषण यह दर्शाता है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन की अपेक्षा कर रहा था। लंबे समय से सत्ता में बने हुए दलों और नेताओं के प्रति असंतोष ने मतदाताओं को नए विकल्पों की ओर झुकने के लिए प्रेरित किया। यह रुझान इस बात का संकेत देता है कि नेपाल की लोकतांत्रिक राजनीति में मतदाता अब अधिक सक्रिय और परिवर्तन के प्रति सजग भूमिका निभा रहे हैं।
- युवा मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी
इस चुनाव की एक महत्वपूर्ण विशेषता युवा मतदाताओं की उल्लेखनीय भागीदारी रही। अनुमानतः लगभग 10 लाख नए युवा मतदाताओं ने पहली बार मतदान किया। यह नई मतदाता आबादी चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल हुई और पारदर्शिता, सुशासन तथा भ्रष्टाचार-विरोध जैसे मुद्दों को प्रमुख चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने में योगदान दिया। युवा मतदाताओं की यह बढ़ती भागीदारी नेपाल की राजनीति में उभर रहे नए राजनीतिक रुझानों और सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता को भी दर्शाती है।
- क्षेत्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन
प्रांतीय मतदान पैटर्न के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि चुनावी समर्थन देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षाकृत व्यापक रूप से फैला हुआ था। मधेश, बागमती और गंडकी जैसे प्रांतों में उच्च वोट प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि अन्य प्रांतों में भी उल्लेखनीय समर्थन देखने को मिला। यह संकेत देता है कि मतदाताओं की राजनीतिक प्राथमिकताएँ केवल किसी एक क्षेत्र या सामाजिक समूह तक सीमित नहीं थीं।
- मतदाताओं की असंतुष्टि और विरोध का लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति
इन चुनावों को मतदाताओं द्वारा अपनी असंतुष्टि व्यक्त करने के एक लोकतांत्रिक माध्यम के रूप में भी देखा जा सकता है। भ्रष्टाचार, आर्थिक अवसरों की कमी और राजनीतिक अस्थिरता जैसे मुद्दों ने मतदाताओं को नए राजनीतिक विकल्पों की ओर झुकने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार चुनाव परिणामों ने नेपाल की लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और जवाबदेही की मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य (International Perspective)
नेपाल में हुए हालिया राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव केवल उसकी आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पर भी पड़ सकता है। भारत और चीन के बीच स्थित होने के कारण नेपाल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
नेपाल की व्यापारिक संरचना (Nepal’s Trade Structure)
आर्थिक दृष्टि से नेपाल की अर्थव्यवस्था अत्यधिक आयात-निर्भर है। नेपाल के सीमा शुल्क विभाग (Department of Customs) के आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024–25 में नेपाल ने अपने 164 व्यापारिक साझेदारों में से केवल 37 देशों के साथ ही व्यापार अधिशेष दर्ज किया, जबकि अधिकांश देशों के साथ उसे व्यापार घाटे का सामना करना पड़ा। इसी अवधि में नेपाल का कुल व्यापार घाटा लगभग INR 1,527.09 अरब रहा, जो उसकी आयात-प्रधान आर्थिक संरचना को दर्शाता है।
भारत–नेपाल व्यापारिक संबंध (India–Nepal Trade Relations)
भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देश लगभग 1750 किलोमीटर लंबी खुली सीमा साझा करते हैं। सितंबर 2025 के व्यापारिक आँकड़ों के अनुसार नेपाल के कुल निर्यात का लगभग 71.9 प्रतिशत भारत को जाता है, जिसकी कुल राशि लगभग 136 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। इसके विपरीत नेपाल ने भारत से लगभग 516 मिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात किया, जिससे दोनों देशों के बीच उल्लेखनीय व्यापार घाटा बना रहता है।
भारत-नेपाल संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ 2015–16 के दौरान देखने को मिला, जब नेपाल के नए संविधान के विरोध में मधेशी आंदोलन के बीच सीमा पर आपूर्ति बाधित हो गई। नेपाल में इसे “नाकेबंदी” के रूप में देखा गया, जिससे ईंधन और आवश्यक वस्तुओं का गंभीर संकट उत्पन्न हुआ और नेपाल के एक हिस्से, विशेषकर युवाओं के बीच भारत के प्रति असंतोष की भावना भी उभरी।
चीन की बढ़ती भूमिका (China’s Expanding Role)
चीन नेपाल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, किंतु यहाँ भी व्यापार संतुलन नेपाल के विरुद्ध है। नेपाल ने चीन से लगभग 185 मिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात किया, जबकि उसका निर्यात केवल 4.05 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जिसके कारण लगभग 181 मिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार घाटा दर्ज किया गया।
चीन नेपाल को अपनी Belt and Road Initiative (BRI) परियोजना के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखता है, जिसके अंतर्गत सड़क, रेल और संचार अवसंरचना से जुड़ी कई परियोजनाएँ प्रस्तावित की गई हैं। साथ ही चीन की एक प्रमुख चिंता तिब्बत से जुड़ी है, क्योंकि नेपाल में लगभग 15,000 तिब्बती शरणार्थी रहते हैं। चीन चाहता है कि नेपाल “One China Policy” का पालन करते हुए तिब्बत से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों को सीमित रखे।
अमेरिका और संस्थागत समर्थन (United States and Institutional Support)
अमेरिका भी लंबे समय से नेपाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं और शासन व्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभाता रहा है। USAID जैसी एजेंसियों के माध्यम से अमेरिका ने स्थानीय शासन, पारदर्शिता, नागरिक समाज और विकास कार्यक्रमों को समर्थन दिया है। हालांकि हाल के वर्षों में अमेरिकी सहायता में कुछ कमी और कई कार्यक्रमों के बंद होने से नेपाल में एक प्रकार का institutional gap उत्पन्न हुआ है, जिसे अभी तक कोई अन्य शक्ति पूरी तरह भर नहीं पाई है।
नेपाल का रणनीतिक महत्व (Strategic Importance of Nepal)
नेपाल का महत्व केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिमालय क्षेत्र दक्षिण एशिया की प्रमुख नदियों का स्रोत है और इसमें विशाल जलविद्युत क्षमता निहित है। इसलिए नेपाल की नीतियाँ पूरे क्षेत्र के जल संसाधनों, पर्यावरण और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
सामाजिक-आर्थिक मुद्दे (Socio-Economic Issues)
हालिया चुनाव में नेपाली मतदाताओं ने देश में एक बड़े बदलाव की उम्मीद के साथ नई राजनीतिक शक्तियों को समर्थन दिया। लंबे समय से नेपाल भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, युवाओं के पलायन, भाई-भतीजावाद की राजनीति और आर्थिक असमानता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नई सरकार ने प्रतिवर्ष लगभग 12 लाख रोजगार सृजित करने, अगले पाँच वर्षों में लगभग 7 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने तथा प्रति व्यक्ति आय को लगभग 3,000 अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है।
हालाँकि इन लक्ष्यों को प्राप्त करना आसान नहीं होगा। पिछले तीन दशकों में नेपाल ने लगभग 27 बार सरकार परिवर्तन देखा है, जिनमें से कई सरकारें एक वर्ष से अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकीं। इस बार सरकार का एक सकारात्मक पहलू यह है कि वह गठबंधन पर निर्भर नहीं है, जिससे नीति-निर्माण में कुछ स्थिरता की उम्मीद की जा सकती है। दूसरी ओर, लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक मजबूत विपक्ष की कमी भी एक चुनौती बन सकती है।
नेपाल की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा विदेशी रोजगार पर निर्भर है। लगभग 17 लाख नेपाली नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं और वहाँ से आने वाली धनराशि देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय तनाव या युद्ध की स्थिति में यदि इन प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा प्रभावित होती है या उन्हें वापस लौटना पड़ता है, तो इससे नेपाल की अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऐसे हालात में यदि सरकार समय रहते समाधान नहीं खोज पाती, तो बदलाव की उम्मीद रखने वाली Gen-Z पीढ़ी की धैर्य की एक और परीक्षा हो सकती है।
इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसी समस्याओं से निपटना अपने आप में अत्यंत कठिन कार्य है। आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयास में सरकार बुनियादी ढाँचे, उद्योगों और विदेशी निवेश को बढ़ावा दे सकती है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं, आय में वृद्धि हो सकती है और लोगों की जीवन-सुविधाओं तक पहुँच आसान हो सकती है। लेकिन इसके साथ एक दूसरी चुनौती भी जुड़ी हुई है। तीव्र विकास की प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो सकता है, जिससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और खाद्य-सुरक्षा से जुड़ी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। यह विकास की एक ऐसी कीमत होगी जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, पलायन और भाई-भतीजावाद जैसी समस्याओं को केवल नियमों या प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से सीमित हद तक ही नियंत्रित किया जा सकता है। जब तक समाज में व्यापक स्तर पर नैतिक और सामाजिक चेतना विकसित नहीं होती, तब तक इन समस्याओं का स्थायी समाधान कठिन है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति केवल अपने निजी हितों और भौतिक सुखों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज और राष्ट्र की व्यापक भलाई को ही महत्व दे। हालांकि वर्तमान समय की परिस्थितियों में इस परिवर्तन की अपेक्षा करना आसान नहीं है।
निष्कर्ष
नेपाल में हुआ यह परिवर्तन विश्व के अन्य भागों में दिखाई दे रहे Gen-Z राजनीतिक परिवर्तनों से कई दृष्टियों से भिन्न है। फिर भी इन सभी आंदोलनों में एक समान तत्व दिखाई देता है—भ्रष्टाचार, हिंसा, असमानता और अन्य सामाजिक कष्टों से मुक्ति की आकांक्षा। नए परिवर्तन की यह इच्छा दरअसल मनुष्य के भीतर छिपी उस मूल प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है जो बेहतर और अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की तलाश करती है। किंतु जैसा कि श्री अरविन्द कहते हैं— “सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बन्धनों को प्यार करता है। यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है।”
संदर्भ (references) :
- https://www.britannica.com/topic/history-of-Nepal
- https://constitutionnet.org/country/nepal?utm_source
- https://www.reuters.com/article/world/timeline-nepals-rocky-road-from-monarchy-to-democracy-idUSKBN1DQ02T/?utm_source
- https://result.election.gov.np/#
- https://www.csis.org/analysis/nepals-election-marks-generational-break-and-new-strategic-moment-himalayas
- https://theglobalangle.com/nepal-election-results-2026-india-relations/
- https://www.nepalisoch.com/analysis/2026-election-data-briefing
- https://frontline.thehindu.com/world-affairs/nepal-election-2026-political-shift/article70743008.ece
- https://en.wikipedia.org/wiki/2026_Nepalese_general_election#cite_note-NepalElectionCommissionFPTP-103
- Nepal’s Gen Z Uprising: A New Test for India–China Dynamics

