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Weekly News Update (31)
(17 May – 23 May 2026)
(May) reuters, bbc, Wpost, GRFC 2026 ….
वैश्विक संकट : भुखमरी, युद्ध, आर्थिक अस्थिरता एवं पर्यावरणीय प्रभाव
फरवरी माह के अंत में प्रारंभ हुए ईरान-अमेरिका-इज़राइल युद्ध के कारण विश्व ऊर्जा संकट की स्थिति का सामना कर रहा है, विशेषकर वे देश जो तेल के लिए पूर्णतः उत्पादक देशों पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त भुखमरी, अकाल, युद्ध, गृहयुद्ध, आर्थिक पतन, विस्थापन, महामारी, अराजकता, जलवायु संकट तथा मानवीय आपदाओं जैसे अनेक कारकों ने विश्व के अधिकांश देशों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इन संकटों का प्रभाव केवल मानव समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक सम्पदा, वन्यजीवों और पर्यावरणीय संतुलन पर भी गहराई से पड़ा है।
भुखमरी से ग्रस्त देश
वर्ष 2025 में विश्व के अनेक देशों में करोड़ों लोग पर्याप्त एवं सुरक्षित भोजन प्राप्त करने में असमर्थ हैं। वर्तमान समय में वैश्विक खाद्य संकट मानवता के सामने सबसे बड़ी भौतिक चुनौतियों में से एक बन चुका है। विश्व स्तर पर 47 देशों एवं क्षेत्रों में लगभग 26.6 करोड़ (266 million) लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं। यह इन देशों की कुल आबादी का लगभग 22.9% है, अर्थात प्रत्येक पाँच व्यक्तियों में से लगभग एक व्यक्ति गंभीर भूख और खाद्य असुरक्षा से प्रभावित है।
पिछले एक दशक में खाद्य संकट झेलने वाले लोगों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। विशेष रूप से 2020 के बाद से प्रत्येक वर्ष प्रभावित आबादी का प्रतिशत 20% से अधिक बना हुआ है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लगभग 14 लाख लोग “Catastrophic” अथवा अकाल जैसी स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जबकि लगभग 3.9 करोड़ लोग “Emergency” (IPC Phase 4) स्तर के संकट का सामना कर रहे हैं।
दुनिया के कुल खाद्य संकटग्रस्त लोगों में से लगभग दो-तिहाई केवल 10 देशों में केंद्रित हैं। सबसे अधिक प्रभावित देशों में नाइजीरिया, लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो तथा सूडान प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान तथा यमन भी अत्यंत गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहे हैं।
47 संकटग्रस्त देशों में से 33 देश लंबे समय से संघर्ष, गरीबी, कमजोर शासन व्यवस्था तथा प्राकृतिक आपदाओं के कारण लगातार खाद्य संकट में फँसे हुए हैं। मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) हेतु उपलब्ध वैश्विक वित्तीय सहयोग में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर लगभग 2016–17 के स्तर तक पहुँच गया है।
इस संकट का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों और महिलाओं पर पड़ा है। लगभग 3.55 करोड़ बच्चे “Acute Malnutrition” अर्थात तीव्र कुपोषण से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 1 करोड़ बच्चे “Severe Acute Malnutrition” जैसी जानलेवा स्थिति का सामना कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 92 लाख गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाएँ भी कुपोषण से प्रभावित हैं।
युद्ध और संघर्षों के कारण लगभग 8.51 करोड़ लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इनमें से लगभग 74% लोग अपने ही देश के भीतर विस्थापित हुए हैं।
धरातलीय स्तर पर स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि अफगानिस्तान जैसे देशों में अनेक परिवार जीवित रहने के लिए अपनी बेटियों को बेचने, बाल विवाह कराने तथा अन्य अत्यंत दुखद उपायों का सहारा लेने के लिए विवश हो रहे हैं।
युद्धग्रस्त देश : एक वैश्विक मानवीय संकट
संयुक्त राष्ट्र तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुसार वर्तमान दशक विश्व के सबसे अस्थिर और हिंसक कालों में से एक बनता जा रहा है। आज विश्व के प्रमुख युद्धग्रस्त देशों में यूक्रेन, ईरान, सूडान, यमन, सीरिया, म्यांमार, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान तथा लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो प्रमुख हैं। इन देशों में लंबे समय से जारी संघर्षों ने सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
सूडान वर्तमान समय के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है। वर्ष 2023 में आरम्भ हुए गृहयुद्ध ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया है। भोजन, चिकित्सा और स्वच्छ जल जैसी आवश्यक सुविधाएँ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। अनेक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार सूडान आज विश्व का सबसे बड़ा विस्थापन संकट बन चुका है। (UNRIC)
यूक्रेन-रूस तथा ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्षों ने क्रमशः यूरोप, खाड़ी क्षेत्र तथा वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति को प्रभावित किया है। लगातार मिसाइल एवं ड्रोन हमलों के कारण हजारों नागरिक मारे गए हैं और करोड़ों लोग विस्थापित हुए हैं।
यमन कई वर्षों से गृहयुद्ध और विदेशी हस्तक्षेप का सामना कर रहा है। वहाँ की बड़ी आबादी मानवीय सहायता पर निर्भर है। स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। (crisisresponse.iom.int)
सीरिया में एक दशक से अधिक समय से जारी गृहयुद्ध ने लाखों लोगों को शरणार्थी बनने पर मजबूर किया है। म्यांमार में सैन्य शासन और विद्रोही समूहों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है, जबकि दक्षिण सूडान में जातीय हिंसा और राजनीतिक संघर्ष के कारण स्थिति अस्थिर बनी हुई है।
इसी प्रकार लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो में पूर्वी क्षेत्रों में सशस्त्र विद्रोह, M23 और अन्य समूहों की सक्रियता, सोमालिया में अल-शबाब आतंकवाद और आंतरिक संघर्ष, नाइजीरिया में बोको हराम और आतंकी हिंसा, माली में जिहादी संगठन और सैन्य संघर्ष, कैमरून में अलगाववादी संघर्ष और हिंसा, लीबिया में विभिन्न सशस्त्र गुटों के बीच संघर्ष, हैती में गैंग हिंसा और अराजकता जैसी स्थिति, इथियोपिया में क्षेत्रीय संघर्ष और जातीय हिंसा, नाइजर में विद्रोह, सैन्य शासन और आतंकी गतिविधियाँ, पाकिस्तान में सीमा आतंकवाद और आंतरिक उग्रवाद, अफगानिस्तान में आतंकवाद, ISKP गतिविधियाँ और राजनीतिक अस्थिरता तथा बुर्किना फासो में आतंकवादी हमले और राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनी हुई है।
युद्धग्रस्त क्षेत्रों में खाद्य संकट, विस्थापन, बेरोजगारी तथा कुपोषण की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। बड़ी संख्या में लोग अपने ही देशों के भीतर अथवा अन्य देशों में शरण लेने के लिए मजबूर हुए हैं। मानवीय सहायता के लिए उपलब्ध वैश्विक वित्तीय सहयोग में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
आर्थिक संकट से ग्रस्त देश
वर्तमान समय में विश्व के अनेक देश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। बढ़ती महँगाई, बेरोजगारी, विदेशी ऋण, मुद्रा अवमूल्यन तथा राजनीतिक अस्थिरता के कारण करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।
लेबनान, वेनेजुएला, क्यूबा, श्रीलंका तथा अर्जेंटीना जैसे देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इन देशों में मुद्रा का मूल्य तेजी से गिरा है तथा रोजगार के अवसरों में भारी कमी आई है।
लेबनान में बैंकिंग व्यवस्था कमजोर हो चुकी है और बड़ी संख्या में लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। वेनेजुएला में अत्यधिक महँगाई (Hyperinflation) ने सामान्य आर्थिक व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
क्यूबा में आर्थिक प्रतिबंध, ऊर्जा संकट तथा उत्पादन में गिरावट के कारण लगातार बिजली कटौती और आवश्यक वस्तुओं की कमी दर्ज की गई है।
श्रीलंका ने हाल के वर्षों में गंभीर विदेशी ऋण संकट का सामना किया, जबकि पाकिस्तान बढ़ती महँगाई, ऊर्जा संकट तथा बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।
अर्जेंटीना और ज़िम्बाब्वे जैसे देशों में मुद्रा अवमूल्यन और अत्यधिक महँगाई के कारण लोगों की क्रय-शक्ति कमजोर हुई है।
यूक्रेन, ईरान, सूडान, सीरिया तथा म्यांमार जैसे देशों में युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता ने उद्योग, व्यापार और कृषि को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
प्राकृतिक सम्पदा, पर्यावरण और जीव-जंतुओं पर वैश्विक संकट का प्रभाव
जंगलों का विनाश
विश्व के अनेक संघर्षग्रस्त और आर्थिक संकट से प्रभावित क्षेत्रों में जंगलों का विनाश तेजी से बढ़ रहा है। लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो स्थित Congo Basin विश्व का दूसरा सबसे बड़ा वर्षावन क्षेत्र है, किन्तु वहाँ जारी संघर्षों, अवैध कटाई तथा गरीबी के कारण वनों पर गंभीर दबाव बढ़ा है। (WWF Congo Basin Forest Report, 2024)
इसी प्रकार ब्राज़ील के अमेजन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वन विनाश दर्ज किया गया। ब्राज़ील की राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था (INPE) के अनुसार हाल के वर्षों में Amazon के हजारों वर्ग किलोमीटर वन नष्ट हुए हैं। (INPE Amazon Monitoring Report, 2024)
वन्यजीवों पर संकट
युद्ध, जंगलों की कटाई तथा खाद्य संकट के कारण अनेक वन्यजीव प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में पहुँच रही हैं। मध्य अफ्रीका के संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में हाथियों, गोरिल्लाओं तथा अन्य दुर्लभ जीवों के अवैध शिकार में वृद्धि हुई है।
IUCN की 2024 Red List के अनुसार विश्व की 44,000 से अधिक प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे (Threatened Species) की श्रेणी में हैं।
जल एवं पशुधन संकट
सोमालिया, इथियोपिया तथा केन्या सहित Horn of Africa क्षेत्र ने 2020–2023 के दौरान पिछले 40 वर्षों के सबसे गंभीर सूखों में से एक का सामना किया। FAO के अनुसार इस बहुवर्षीय सूखे के कारण पूरे क्षेत्र में 1.3 करोड़ (13.2 million) से अधिक पशुधन नष्ट हुए। (FAO Horn of Africa Drought Report, 2023)
विशेष रूप से सोमालिया में 2025 के दौरान लगभग 14 लाख (1.4 million) पशुधन की मृत्यु दर्ज की गई। पानी और चारे की भारी कमी के कारण पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हुई। (Oxfam Drought Crisis Report, 2026)
अफगानिस्तान तथा ईरान में भूजल स्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है, जिससे कृषि और पेयजल आपूर्ति प्रभावित हुई है।
कृषि भूमि का विनाश
युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं ने विश्व के अनेक देशों की कृषि व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यूक्रेन विश्व के प्रमुख गेहूँ उत्पादक देशों में से एक है, किन्तु युद्ध के कारण वहाँ की कृषि भूमि, सिंचाई व्यवस्था तथा खाद्य उत्पादन को भारी क्षति पहुँची। UNEP के अनुसार युद्ध के कारण यूक्रेन के बड़े कृषि क्षेत्रों में बारूदी सुरंगें, रासायनिक प्रदूषण तथा भूमि क्षरण की समस्या उत्पन्न हुई। (UNEP Ukraine Environmental Assessment, 2024)
पाकिस्तान की 2022 की बाढ़ में लगभग 40 लाख एकड़ कृषि भूमि प्रभावित हुई तथा 80 लाख से अधिक लोग कृषि क्षति से प्रभावित हुए। (UNDP Pakistan Flood Assessment)
समुद्री जीवन और जैव विविधता पर प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे Coral Reefs तेजी से नष्ट हो रहे हैं। हाल के वर्षों में Coral Bleaching की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। (NOAA Coral Reef Watch Report, 2024)
इसके अतिरिक्त अत्यधिक मछली पकड़ने (Overfishing) और समुद्री प्रदूषण के कारण समुद्री जैव विविधता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
(May) reuters, ACAPS
ट्रम्प प्रशासन की “Maximum Pressure” नीति और क्यूबा का वर्तमान संकट
ट्रम्प ने अपने प्रथम राष्ट्रपति कार्यकाल (2017–2021) के दौरान क्यूबा के विरुद्ध “maximum pressure” नीति अपनाई थी, जिसे 2025–26 में पुनः अधिक कठोर रूप में आगे बढ़ाया गया। इस नीति का उद्देश्य क्यूबा की communist सरकार पर आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव बढ़ाना था।
इसी क्रम में अमेरिका ने क्यूबा को पुनः “State Sponsor of Terrorism” सूची में शामिल किया, डॉलर-आधारित लेन-देन तक उसकी पहुँच सीमित की, वीज़ा प्रतिबंध कठोर किए तथा विदेशी कंपनियों पर क्यूबा के साथ व्यापारिक गतिविधियाँ सीमित करने हेतु दबाव बढ़ाया। अमेरिका इन प्रतिबंधों को “economic embargo” की संज्ञा देता है, जबकि क्यूबा तथा उसके समर्थक इन्हें “economic blockade” के रूप में वर्णित करते हैं।
मई 2025 में ट्रम्प प्रशासन ने क्यूबा से जुड़े समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति तथा वित्तीय लेन-देन पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों के अंतर्गत क्यूबा को ईंधन, तेल तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने वाले जहाजों और विदेशी कंपनियों पर निगरानी तथा कार्रवाई बढ़ाई गई। इसके साथ ही क्यूबा से जुड़े बैंकिंग लेन-देन और विदेशी निवेश पर भी दबाव बढ़ाया गया। इसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने क्यूबा के साथ व्यापारिक गतिविधियाँ सीमित करनी प्रारंभ कर दीं।
मई 2026 में अमेरिका ने एक नया Executive Order जारी किया, जिसके अंतर्गत ऊर्जा, वित्त, खनन तथा रक्षा क्षेत्रों पर अतिरिक्त secondary sanctions लगाए गए। CMA CGM और Hapag-Lloyd जैसी प्रमुख shipping कंपनियों ने क्यूबा के लिए bookings अस्थायी रूप से निलंबित कर दीं। इससे क्यूबा की समुद्री आपूर्ति और व्यापारिक मार्ग और अधिक प्रभावित हुए।
क्यूबा लंबे समय से वेनेजुएला से रियायती दरों पर तेल प्राप्त करता रहा है, जो उसकी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में अत्यंत महत्वपूर्ण था। किंतु वेनेजुएला पर अमेरिकी दबाव और तेल आपूर्ति में गिरावट के कारण क्यूबा में ईंधन संकट लगातार गहराता गया। दिसंबर 2025 में वेनेजुएला से क्यूबा जा रहे एक तेल टैंकर को अमेरिकी कार्रवाई के तहत जब्त किए जाने की रिपोर्टें भी सामने आईं, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।
2025–26 के दौरान क्यूबा में ऊर्जा संकट अत्यंत गंभीर रूप ले चुका था। कई क्षेत्रों में प्रतिदिन 15 से 20 घंटे तक बिजली कटौती दर्ज की गई। राष्ट्रीय विद्युत व्यवस्था बार-बार बाधित हुई, जिससे अस्पतालों, जल आपूर्ति, परिवहन तथा खाद्य वितरण प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ा। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार इस बिजली संकट से एक करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए।
ईंधन संकट के कारण सार्वजनिक परिवहन, कृषि उत्पादन तथा औद्योगिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं। देश में डीज़ल और ईंधन तेल के भंडार अत्यंत कम हो गए, जिसके कारण बड़े पैमाने पर बिजली आपूर्ति बाधित हुई और सार्वजनिक असंतोष बढ़ा। राजधानी हवाना सहित अनेक क्षेत्रों में बिजली कटौती और खाद्य कमी के विरोध में प्रदर्शन हुए।
ऊर्जा संकट का प्रभाव सामान्य जीवन पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगा। अनेक परिवार भोजन पकाने के लिए लकड़ी और कोयले का उपयोग करने को मजबूर हुए। लगातार बिजली कटौती के कारण भोजन खराब होना, जल संकट, संचार सेवाओं में बाधा तथा दवाइयों के संरक्षण में कठिनाइयाँ जैसी समस्याएँ बढ़ीं। खाद्य आयात और वित्तीय लेन-देन पर प्रतिबंधों के कारण राशन संकट और महँगाई भी बढ़ती गई।
इसी अवधि में अमेरिका ने क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति Raul Castro के विरुद्ध 1996 में नागरिक विमानों को गिराने की घटना से जुड़े आरोपों के आधार पर कानूनी कार्रवाई और प्रत्यर्पण की मांग को आगे बढ़ाया। क्यूबा सरकार ने इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए अस्वीकार किया।