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- (32).Weekly News Update 24-30 may (Russia ukrain war update, Manipur dispute)
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- (36.)Weekly News Update 21-28 june (iran -russia-ukrain war, biochar)
- (37.)Weekly News Update 29 june -11 JULY (Qick Commerce, Synthetic cell, Ai UN report, Iran war)
- (38.)Weekly News Update 13 -19 JULY (iran war update)
- (39.)Weekly News Update 20 – 26 JULY (CJP protest- WAICO china- AI security-Hugging Face)
- (40.)Weekly News Update 27July – 2 August Rome decleration-BOB cyber attack- Iran war- Google earth ai
- (41.)Weekly News Update 2 August- 9 August Makka agreement, FCRA, AI race
- (42.)Weekly News Update 10- 30 (August, mindnubming drugs education, Gorkhaland dispute, Ai news, east asia Diplomacy )
- (43.)Weekly News Update 31 Aug (America china ai & economical budget Sanghai Shikhar summit 2026)
- (44.)Weekly News Update 07 September-13September (Iran war-Falklands issue-Brics summit-Boss Scame)
Weekly News Update (42)
(10 August – 30 August 2026)
(26 August) BBC, Reuters
माइंड-नम्बिंग ड्रग्स का बढ़ता प्रचलन, बढ़ता मानसिक दबाव और शिक्षा
आज के युग में सफलता और उससे मिलने वाली भौतिक सुख-संतुष्टि का महत्व बढ़ गया है। सफलता और भौतिक सुख की यही धारणा अब केवल व्यक्ति के जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के अलग-अलग क्षेत्रों की दिशा को भी प्रभावित कर रही है। यहाँ हम बात शिक्षा की करेंगे, जिसमें हम इसके प्रभाव, परिणाम और उसके लिए अपनाए जा रहे उपचार की बात करेंगे।
चीन में विद्यार्थियों और किशोरों के बीच माइंड-नम्बिंग ड्रग्स का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह घटना केवल चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे विश्व में भी बढ़ती दिखाई दे रही है।
इस घटना का भौतिक कारण कुछ इस प्रकार देखा जा रहा है : चीन में आज की पीढ़ी के बच्चों के सामने परिस्थितियाँ उनके माता-पिता के समय से काफी अलग हैं। उनके माता-पिता जिस दौर में बड़े हुए, उस समय चीन की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में कड़ी मेहनत और उसके बदले मिलने वाले परिणाम को सफलता का एक स्पष्ट रास्ता माना जाता था। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। इसके बावजूद माता-पिता की अपने बच्चों से सफलता की अपेक्षा बनी हुई है। वन-चाइल्ड पॉलिसी, जो 2016 में समाप्त हुई, के कारण बहुत से परिवारों में केवल एक ही बच्चा है जिससे परिवार अपनी अपेक्षाओं की पूर्ति का साधन मानता है।
इसके साथ शिक्षा में भी अत्यधिक प्रतिस्पर्धा है। विद्यार्थियों के लिए परीक्षाएँ पास करना और एलीट कक्षाओं में बने रहना कठिन है। विद्यालयों में एलीट कक्षाएँ एलिमिनेशन प्रणाली पर चलती हैं, जहाँ अकादमिक प्रदर्शन गिरने पर विद्यार्थी को उस कक्षा से बाहर कर दिया जाता है। पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी के लिए विद्यार्थियों को 9-10 घंटे तक स्कूल में रहना पड़ता है। इसमें भी यदि विद्यार्थी असफल हो जाता है तो ऐसी स्थिति में स्वयं को असफल मानना और जीवन में उसके लिए कोई अवसर नहीं बचा जैसे सोच बढ़ते जा रहे हैं।
इस माहौल के कारण विद्यार्थीयों में अत्यधिक दबाव, चिंता (anxiety) और अकेलेपन (Loneliness) का मामला बढ़ता जा रहा है। इससे निकलने के लिए विद्यार्थीयों में प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का इस्तेमाल बढ़ने लगा है। इनमें खाँसी की दवाएँ, पार्किंसन की बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवाएँ और अन्य तरह की दवाएँ शामिल हैं। विद्यार्थी इन दवाओं का निर्धारित मात्रा से अधिक या बिना चिकित्सकीय सलाह के इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि वे कुछ समय के लिए खुद को नाकाम महसूस करने और अपने ऊपर के दबाव को भूल सकें। लेकिन इस तरह दवाओं के गलत इस्तेमाल के परिणाम भी उन्हें भुगतने पड़ रहे हैं। इनमें याददाश्त कमजोर होना, मतिभ्रम(Hallucination), आवाज में लड़खड़ाहट, सुस्ती और उलझन जैसे दुष्प्रभाव शामिल हैं।
लेकिन यह समस्या केवल दवाओं के गलत इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। 2023 में चीन की मेंटल हेल्थ ब्लू बुक के लिए किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 9.5 करोड़ लोग डिप्रेशन से जूझ रहे हैं और उनमें 30 प्रतिशत से अधिक लोग 18 वर्ष से कम उम्र के हैं।
चीन में सामने आ रही यह स्थिति केवल चीन तक सीमित नहीं है। अलग-अलग शिक्षा व्यवस्थाओं और सामाजिक परिस्थितियों वाले देशों में भी विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक दबाव से जुड़ी ऐसी ही समस्याएँ सामने आ रही हैं।
सिंगापुर शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में है, लेकिन वहाँ भी विद्यार्थियों पर शैक्षणिक दबाव और उससे जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ सामने आ रही हैं। 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि अकादमिक अपेक्षाओं से पैदा होने वाले तनाव का संबंध डिप्रेशन और एंग्जायटी के गंभीर लक्षणों से है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि परिवार में इकलौता बच्चा होना अधिक अकादमिक तनाव से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में मनोवैज्ञानिकों ने बताया कि परीक्षा से जुड़े तनाव के लिए सहायता लेने वाले विद्यार्थियों के मामलों में 2021 के बाद हर वर्ष 20 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है।
दक्षिण कोरिया में 2026 में नेशनल यूथ पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक सर्वे में 27 प्रतिशत विद्यार्थियों ने बताया कि पिछले एक वर्ष में उनके मन में आत्महत्या के विचार आए थे। ऐसे विद्यार्थियों में 37.9 प्रतिशत ने अकादमिक दबाव को इसका प्रमुख कारण बताया। इसके अलावा, 20 प्रतिशत ने भविष्य और करियर को लेकर चिंता तथा 18.5 प्रतिशत ने पारिवारिक संघर्ष को इसका कारण बताया। इसके अलावा पूर्व वर्ष के सरकारी Youth Risk Behavior Survey के विश्लेषण में भी 35.2 प्रतिशत लड़कों और 49.9 प्रतिशत लड़कियों ने बहुत अधिक या अधिक दैनिक तनाव महसूस करने की बात कही।
जापान में 2024 में 30 दिन या उससे अधिक समय तक स्कूल से अनुपस्थित रहने वाले प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या 3,53,970 तक पहुँच गई, जो लगातार 12वें वर्ष बढ़ी। इनमें 24.3 प्रतिशत मामलों में एंग्जायटी या डिप्रेशन और 15.6 प्रतिशत मामलों में खराब शैक्षणिक प्रदर्शन या लगातार होमवर्क जमा न करना कारणों के रूप में सामने आया। एक हालिया अध्ययन में भी पाया गया कि पढ़ाई से जुड़ा तनाव जूनियर हाई स्कूल से हाई स्कूल तक बढ़ता है और भविष्य को लेकर तनाव Grade 7 के 37.1 प्रतिशत से बढ़कर Grade 12 में 67 प्रतिशत हो जाता है। 2024 में जापान में स्कूल के बच्चों और विद्यार्थियों की आत्महत्या से होने वाली मौतों की संख्या 1,072 रही, जो पिछले वर्ष से 53 अधिक थी।
ब्रिटेन में भी विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ रही है। मार्च 2026 के एक सरकारी सर्वे में Year 7–11 के विद्यार्थियों की औसत life satisfaction 10 में से 7.4 थी और anxiety का औसत स्तर 3.5 था। वहीं Year 12–13 के विद्यार्थियों में life satisfaction घटकर 10 में से 6.5 और anxiety बढ़कर 4.0 हो गई। विश्वविद्यालय स्तर पर भी मानसिक स्वास्थ्य की समस्या दिखाई देती है। 2025 के Student Academic Experience Survey में 18.9 प्रतिशत विद्यार्थियों ने mental-health difficulty की सूचना दी, जबकि 2017 में यह अनुपात 6.1 प्रतिशत था। इसके अलावा, Office for National Statistics के अनुसार 2016 से 2023 के बीच England और Wales में 1,108 higher-education students की suicide से मृत्यु हुई, जिनमें 2023 में 155 मामले थे।
अमेरिका में भी विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति गंभीर बनी हुई है। 2025 के एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार 12 से 17 वर्ष के 10.4 प्रतिशत किशोरों ने गंभीर रूप से आत्महत्या के विचार आने की बात कही, 5.1 प्रतिशत ने आत्महत्या की योजना बनाने और 2.9 प्रतिशत ने आत्महत्या का प्रयास करने की सूचना दी। इसी सर्वे में लगभग 20 प्रतिशत किशोरों में पिछले दो सप्ताह के दौरान एंग्जायटी के मध्यम या गंभीर लक्षण पाए गए। पढ़ाई का दबाव भी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आता है। 2025 के एक अन्य सर्वे में 68 प्रतिशत अमेरिकी किशोरों ने कहा कि उन्हें अच्छे अंक प्राप्त करने का काफी या कुछ दबाव महसूस होता है। कॉलेज स्तर पर भी समस्या बनी हुई है; 2024–25 के एक बड़े अध्ययन में 18 प्रतिशत विद्यार्थियों में गंभीर डिप्रेशन और 11 प्रतिशत में आत्महत्या के विचार पाए गए। हालांकि 2021 से 2025 के बीच किशोरों में डिप्रेशन और आत्महत्या से जुड़े कुछ संकेतकों में सुधार भी दर्ज किया गया है।
भारत में भी पढ़ाई और भविष्य को लेकर विद्यार्थियों पर पड़ने वाला दबाव मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है। 2025 में जारी एक रिपोर्ट में कक्षा 8 से 12 के विद्यार्थियों के बीच किए गए सर्वे में पाया गया कि लगभग हर पाँचवाँ विद्यार्थी शायद ही कभी शांत, प्रेरित या जीवन के प्रति उत्साहित महसूस करता है। 40 प्रतिशत विद्यार्थियों को यह पता नहीं था कि स्कूल में मानसिक स्वास्थ्य के लिए कहाँ मदद ली जाए और कक्षा 12 के तीन-चौथाई विद्यार्थी अकादमिक दबाव और लगातार सोचते रहने के कारण नींद की कमी से जूझ रहे थे। उच्च शिक्षा में भी स्थिति गंभीर दिखाई देती है। एक अध्ययन में नौ राज्यों के 30 विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों में 33.6 प्रतिशत में डिप्रेशन के मध्यम से गंभीर लक्षण और 23.2 प्रतिशत में एंग्जायटी के मध्यम से गंभीर लक्षण पाए गए। 12.4 प्रतिशत विद्यार्थियों ने पिछले एक वर्ष में आत्महत्या के विचार आने और 6.7 प्रतिशत ने जीवन में कभी आत्महत्या का प्रयास करने की बात कही।
भारत में समस्या केवल स्कूल और कॉलेज तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से उच्च शिक्षा या नौकरी पाने की तैयारी करते हैं, जहाँ वर्षों की तैयारी, परिवार की अपेक्षाएँ और भविष्य की अनिश्चितता उनके ऊपर अलग तरह का दबाव बनाती हैं। 2026 में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े कई मामलों में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा की अनिश्चितता के बाद विद्यार्थियों के मानसिक दबाव और आत्महत्या की घटनाएँ सामने आईं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2024 में भारत में 14,488 विद्यार्थियों की आत्महत्या दर्ज हुई, जो 2023 के 13,892 से अधिक थी और कुल आत्महत्याओं का 8.5 प्रतिशत थी। लेकिन इन आँकड़ों को केवल परीक्षा की असफलता से जोड़ना सही नहीं होगा। 18 वर्ष से कम उम्र के मामलों में पारिवारिक समस्याएँ 27.7 प्रतिशत और परीक्षा में असफलता 9.6 प्रतिशत मामलों में कारण के रूप में दर्ज हुई। 18 से 29 वर्ष की आयु में भी पारिवारिक समस्याएँ 33.2 प्रतिशत थीं, जबकि परीक्षा में असफलता केवल 1.6 प्रतिशत मामलों में दर्ज हुई।
इस समस्या से निपटने के लिए चीन की सरकार ने सतही उपाय की व्यस्था के रूप में मानसिक स्वास्थ्य की एक योजना लागू की है, जिसके अंतर्गत हर स्कूल में काउंसलिंग रूम, हर काउंटी में कम-से-कम एक अस्पताल में मनोरोग सेवाएँ और अधिक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों को शामिल करने की व्यवस्था की गई है। इसका मकसद 2030 तक मनोवैज्ञानिक सहायता और संकट के समय मदद (क्राइसिस इंटरवेंशन) का एक देशव्यापी सिस्टम बनाना है। स्टेट काउंसिल के अनुसार, अब 92 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों और 95 प्रतिशत जूनियर मिडिल स्कूलों में एक काउंसलर है। साथ ही, देश के कई बड़े शहरों में स्कूल के सिलेबस में मेंटल हेल्थ को शामिल करना शुरू किया गया है।
मूल समस्या की ओर
लगभग इसी तरह के उपाय दुनिया के दूसरे देशों में भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन क्या केवल इन उपायों से हम उस मूल समस्या को समझ पा रहे हैं, जो विद्यार्थियों को इस स्थिति तक पहुँचा रही है? समस्या सामने आने के बाद उसके उपचार की व्यवस्था करना आवश्यक है, लेकिन यदि हम यह नहीं देखते कि वह समस्या पैदा क्यों हो रही है, तो हम उसके मूल कारण से दूर ही रह जाते हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे हम अपने रहन-सहन और खान-पान के तरीकों को नहीं सुधारें, अपनी आवश्यकताओं के लिए प्रकृति का लगातार दोहन करते रहें और जब बीमारियाँ – आपदाएं बढ़ने लगें तो उनके कारणों को देखने के बजाय हर गली में क्लिनिक खोलने, अस्पतालों की संख्या बढ़ाने और चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करने में लग जाएँ।
सफलता की दौड़
आज विद्यार्थियों के सामने एक ऐसा प्रतिस्पर्धी माहौल बना हुआ है, जिसमें सफलता का स्थापित मानदंड अधिक पैसा कमाना, आरामदेह जीवनशैली, ऊँचा पद या अच्छी नौकरी प्राप्त करना बन गया है। विद्यार्थी इसी दौड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं और इसके बाहर जाकर यह सोचने का अवसर ही नहीं पा रहे कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, उन्हें अपने लिए, अपने समाज और पूरी दुनिया के लिए क्या करना चाहिए। वे उसी दिशा में आगे बढ़ते जा रहे हैं, जिसे समाज ने सफलता का रास्ता मान लिया है।
शिक्षा का उद्देश्य
इस समस्या की जड़ वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को देखने की हमारी धारणा में भी दिखाई देती है। आज शिक्षा को मुख्य रूप से आजीविका प्राप्त करने का साधन माना जाता है, जबकि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के भीतर उसकी क्षमताओं का विकास करना, उसे स्वयं को जानने और समझने में सहायता देना तथा उसकी नई संभावनाओं को प्रकट करने में सहायता करना होना चाहिए। शिक्षा केवल प्रमाणपत्र या ऊँचा पद प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति की विभिन्न क्षमताओं को विकसित करने और नई क्षमताओं को प्रकट करने का माध्यम होनी चाहिए।
व्यक्ति जब स्वयं को जानने और अपनी क्षमताओं को विकसित करने का प्रयास करता है, तो धीरे-धीरे उसके भीतर यह समझ विकसित होती है कि उसे क्या करना चाहिए। तब उसके भीतर सही प्रेरणा काम करने लगती है और उसे अपने जीवन की दिशा बहुत हद तक स्वयं दिखाई देने लगती है। आजीविका तब उसके जीवन का एक आवश्यक हिस्सा हो सकती है, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका प्राप्त करना नहीं होना चाहिए।
ऐसी शिक्षा में व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए। कला, साहित्य, संगीत, चित्रकला, शिल्प जैसे क्षेत्रों का विकास भी शिक्षा का सामान्य हिस्सा होना चाहिए और इन क्षेत्रों को सीखने तथा उनमें आगे बढ़ने का अवसर सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए। किसी व्यक्ति को इन अवसरों तक केवल उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी रुचि और क्षमता के आधार पर पहुँच मिलनी चाहिए। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को यह समझ विकसित करने में सहायता मिलनी चाहिए कि उसके व्यक्तित्व का मूल्य केवल उसकी भौतिक संपत्ति या सामाजिक पद पर निर्भर नहीं करता है। उसे अपने जीवन और अपने काम को केवल आजीविका प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं, बल्कि स्वयं को अभिव्यक्त करने तथा अपनी क्षमताओं और संभावनाओं को विकसित करने के माध्यम के रूप में देखने की समझ मिलनी चाहिए।
यदि हम शिक्षा को इस रूप में देख और समझ सकें तथा उसे इसी रूप में लागू करने का प्रयास करें, तो धीरे-धीरे हम एक बेहतर स्थिति की ओर बढ़ सकते हैं।
संदर्भ
- China — Mental Health Blue Book
- Singapore — National Youth Mental Health Study, 2026
- South Korea — National Youth Policy Institute, 2026
- Japan — Government of Japan, 2024
- United Kingdom — Department for Education, Children and Young People’s Wellbeing Survey, 2026
- United States — SAMHSA, National Survey on Drug Use and Health, 2025
- United States — Pew Research Center, 2025
- India — National Crime Records Bureau (NCRB), 2024
- India — IC3 Student Suicide Aversion Report, 2025
- India — Supreme Court National Task Force on Student Suicides, 2025–26
(24 August) The Hindu
गोरखालैंड मुद्दा: मांग और उसकी पृष्ठभूमि
हाल ही में गोरखालैंड मुद्दे को लेकर गृह मंत्रालय ने एक समिति का गठन किया है। यह समिति भारत के संविधान के ढाँचे के अंतर्गत दशकों पुराने “गोरखालैंड मुद्दे” के लिये “स्थायी राजनीतिक समाधान” हेतु समझौते का प्रारूप तैयार करेगी और इसके तौर-तरीकों को अंतिम रूप देगी। समिति गोरखा मुद्दे के सभी पहलुओं की जाँच करेगी। इसमें शासन व्यवस्था, क्षेत्र के लिये वित्तीय सहायता तथा 11 गोरखा समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्रदान करने की रूपरेखा भी शामिल है।
गोरखालैंड मुद्दा पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली नेपाली भाषी गोरखा आबादी के लिये एक पृथक प्रशासनिक/राजनीतिक इकाई की लंबे समय से चली आ रही मांग है। यह मांग अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पहचान और स्वायत्तता से जुड़ी है। इनकी प्रमुख मांग पृथक गोरखालैंड राज्य के गठन की है, जिसमें दार्जिलिंग की पहाड़ियाँ तथा उत्तरी पश्चिम बंगाल के तराई और दुआर के निकटवर्ती क्षेत्र शामिल हों। हालाँकि, समय के साथ इस मांग का क्षेत्रीय विस्तार बदलता रहा है।
इस मांग के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। समर्थकों का तर्क है कि दार्जिलिंग पहाड़ियों के लोग बंगाली-बहुल मैदानी क्षेत्रों से जातीय, सांस्कृतिक और भाषायी रूप से भिन्न हैं। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से नेपाली भाषी आबादी रहती है। विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के कारण निवासियों को प्रायः नस्लीय पहचान के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है तथा उन्हें प्रायः विदेशी समझ लिया जाता है। अलगाव की यह भावना और पहचान संबंधी असुरक्षा, भारतीय नागरिकों के रूप में अपनी पहचान को सुदृढ़ करने के लिये पृथक राज्य की मांग को मज़बूत करती रही है।
इसके साथ ही, क्षेत्र में आर्थिक पिछड़ापन भी इस मांग के एक आधार के रूप में सामने आता है। दार्जिलिंग चाय, लकड़ी और पर्यटन के माध्यम से राज्य के राजस्व में महत्त्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद, इस क्षेत्र ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक-आर्थिक उपेक्षा तथा अवसंरचनात्मक विकास की कमी की शिकायत की है।
इस मांग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी पुरानी है। दार्जिलिंग क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में आने से पहले सिक्किम और भूटान से संबंधित क्षेत्रों का हिस्सा था। इसके बाद नेपाल से लोगों का प्रवासन, विशेष रूप से चाय उद्योग और ब्रिटिश प्रशासन के विस्तार के साथ, इस क्षेत्र में मुख्य रूप से नेपाली भाषी आबादी के विकास का कारण बना।
अधिक राजनीतिक स्वायत्तता के लिये आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1907 में हुई, जब सोनम वांगेल लाडेन ला के नेतृत्व में दार्जिलिंग हिलमेन एसोसिएशन ने मिंटो-मॉर्ले सुधार समिति के समक्ष दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को बंगाल से अलग करने की मांग रखी। बाद में गोरखा ऑफिसर्स एसोसिएशन और कर्सियांग गोरखा लाइब्रेरी जैसे संगठनों ने इस मांग को आगे बढ़ाया और इसे साइमन कमीशन (1929) तथा ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया।
वर्ष 1947 तक अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के समक्ष “गोरखास्थान” की मांग करते हुए एक ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके बाद सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) का उदय वर्ष 1980 में हुआ और यह वर्ष 1980 के दशक के गोरखालैंड आंदोलन की प्रमुख शक्ति बन गया।
गोरखा परिचय
गोरखा (या गुरखा) नेपाल से जुड़ा एक सैन्य परंपरा वाला समुदाय है, जो अपनी वीरता और सैन्य परंपरा के लिये प्रसिद्ध है। गोरखा नाम का संबंध पश्चिमी नेपाल के ऐतिहासिक गोरखा राज्य से है। गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल का एकीकरण किया और गोरखा शक्ति का विस्तार किया।
गोरखा एकल जातीय समूह नहीं हैं। इसमें नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों के गुरूंग, मगर, राई, लिम्बू तथा अन्य समूह शामिल हैं। अपनी सैन्य प्रतिष्ठा के कारण गोरखाओं को ब्रिटिश, भारतीय और नेपाली सेनाओं में भर्ती किया गया। एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814–1816) के बाद ब्रिटिशों ने अपनी सेना में गोरखाओं की भर्ती शुरू की। वर्ष 1815 से गोरखा रेजिमेंटें ब्रिटिश भारतीय सेना में रहीं और स्वतंत्रता के बाद भी गोरखा रेजिमेंटें भारतीय सेना का हिस्सा बनी रहीं।
(22-28 August) Reuters, The Washington Post, TechCrunch
AI: संभावनाओं से बढ़ते जोखिमों की चिंता तक
इस साल की शुरुआत में तकनीकी विशेषज्ञ, तकनीकी उद्यमी और AI को लेकर सकारात्मक उम्मीद रखने वाले लोग इसकी संभावनाओं के गीत गा रहे थे। उनकी चिंता मुख्य रूप से नौकरियों के समाप्त होने तक सीमित थी। लेकिन इन सात महीनों में AI की हुई प्रगति और उसके प्रयोगों के परिणामों ने उम्मीदों से इतर जोखिमों को लेकर चिंता और ध्यान भी आकर्षित किया है।
यहाँ हम पेंटागन और Anthropic और उसके Claude AI मॉडल का मामला, बड़ी AI टेक और अन्य टेक कंपनियों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से होने वाले संभावित हैकिंग हमलों को रोकने की अपील, बिल गेट्स की AI को लेकर चिंता और चीन के राष्ट्रपति से उनकी मुलाकात से जुड़ी खबरों को देखेंगे।
पेंटागन और Anthropic मामला
एंथ्रोपिक ने सेना को अपने ‘क्लाउड AI मॉडल’ का इस्तेमाल अमेरिकी निगरानी या ऑटोनॉमस हथियारों (बिना इंसानी दखल के चलने वाले हथियार) के लिए करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। एंथ्रोपिक का तर्क है कि AI मॉडल इतने भरोसेमंद नहीं हैं कि उन्हें ऑटोनॉमस हथियारों में सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सके। कंपनी घरेलू निगरानी का भी विरोध करती है, क्योंकि उसका मानना है कि यह अधिकारों का उल्लंघन है।
इसके बाद पेंटागन ने एंथ्रोपिक को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘सप्लाई-चेन रिस्क’ घोषित कर दिया। इसका मतलब ऐसी कंपनी से है जिसे सरकार सैन्य प्रणालियों के लिए संभावित सुरक्षा जोखिम मानती है। इस फैसले के कारण एंथ्रोपिक को कुछ सैन्य अनुबंधों से बाहर कर दिया गया। कंपनी के अधिकारियों का कहना था कि इससे उसे अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है और उसकी साख को भी चोट पहुँच सकती है। यह पहली बार था जब किसी अमेरिकी कंपनी को सार्वजनिक रूप से इस तरह का सप्लाई-चेन रिस्क घोषित किया गया।
लेकिन 27 अगस्त को एक अमेरिकी संघीय अदालत ने पेंटागन के इस फैसले पर रोक लगा दी। अदालत ने अपने फैसले में पेंटागन की कार्रवाई को गैरकानूनी और आधारहीन बताया।
इस पूरे मामले में मूल सवाल AI के सैन्य इस्तेमाल और उसकी सीमाओं को लेकर है। एंथ्रोपिक अपने AI मॉडल के कुछ इस्तेमाल पर रोक चाहती है, जबकि पेंटागन का कहना है कि निजी कंपनियों को सैन्य कार्रवाई को सीमित करने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए।
AI से होने वाले साइबर हमलों को लेकर प्रमुख टेक कंपनियों की चेतावनी
AI से होने वाले साइबर हमलों को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। OpenAI, Anthropic, Microsoft, Alphabet और Amazon समेत बड़ी टेक कंपनियों ने AI की मदद से होने वाले संभावित हैकिंग हमलों के बढ़ते खतरे को देखते हुए साइबर सुरक्षा मजबूत करने की अपील की है। 100 से अधिक अन्य कंपनियों के साथ जारी एक संयुक्त पत्र में इन कंपनियों ने कहा कि AI मॉडल के लगातार अधिक सक्षम होने के साथ आने वाले महीनों में AI-सक्षम साइबर हमले कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।
कंपनियों ने सरकारों और उद्योग जगत से इस खतरे से निपटने के लिये अपनी तकनीक, संसाधनों और विशेषज्ञता का इस्तेमाल करने तथा साइबर सुरक्षा को तत्काल प्राथमिकता देने की अपील की है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ कंपनियों को सामान्य लोगों से पहले अधिक शक्तिशाली AI मॉडल तक सुरक्षित पहुँच देने वाली व्यवस्थाओं को तेज किया जाना चाहिए।
यह चिंता केवल भविष्य की संभावना तक सीमित नहीं है। AI की बढ़ती क्षमता का इस्तेमाल हैकिंग के लिये भी किया जाने लगा है और अलग-अलग समूह बड़े भाषा मॉडल (LLM) की मदद से दुनिया भर के संगठनों में घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे हैं। जून में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के ‘फाइव आइज’ खुफिया गठबंधन ने भी चेतावनी दी थी कि AI में हो रही प्रगति साइबर सुरक्षा के स्वरूप को मौलिक रूप से बदल सकती है।
AI के बढ़ते जोखिमों पर बिल गेट्स की चिंता
AI को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच बिल गेट्स ने इसके संभावित खतरों को सीमित करने के लिये वैश्विक स्तर पर प्रयास करने की जरूरत बताई है। वह इस वर्ष के अंत में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात कर AI के खतरनाक इस्तेमाल को सीमित करने के लिये अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का प्रस्ताव रखने की तैयारी कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि अमेरिका पहले इस दिशा में पहल करता है, तो चीन भी ऐसे AI मॉडल के जारी होने पर कुछ प्रतिबंधों के लिये सहमत हो सकता है, जिनका इस्तेमाल खतरनाक तरीके से किया जा सकता है।
गेट्स का कहना है कि देशों को AI की ऐसी क्षमताओं पर भी नजर रखनी चाहिए, जिनका इस्तेमाल जैविक हमलों के लिये अणु (molecules) बनाने या अन्य खतरनाक गतिविधियों में किया जा सकता है। उन्होंने AI के लिये एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाने की बात भी कही है, जो परमाणु निरीक्षण व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय विमानन नियमों और ओजोन परत की सुरक्षा से जुड़े समझौतों से कुछ तत्व लेकर AI के जोखिमों से निपटने का काम करे।
इसके आलावा AI की बढ़ती क्षमता से होने वाले साइबर हमलों को लेकर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, OpenAI, Anthropic और Meta की तकनीक ने हाल में साइबर सुरक्षा से जुड़े परीक्षणों के दौरान वास्तविक वेबसाइटों को हैक किया। गेट्स ने इन घटनाओं को चौंकाने वाला बताया।
AI के बढ़ते इस्तेमाल से नौकरियों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी गेट्स ने एक अलग विचार रखा है। उनका कहना है कि समाज को मौजूदा नौकरियों में से 40 प्रतिशत तक को इंसानों के लिये सुरक्षित रखने पर विचार करना चाहिए। इसके लिये उन्होंने AI का इस्तेमाल करके मानव श्रम को कम करने वाली कंपनियों के राजस्व पर कर लगाने का सुझाव दिया है, जिससे AI के कारण प्रभावित होने वाले लोगों के लिये सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा सके। उनका मानना है कि कुछ काम ऐसे हैं जिनमें मानवीय भूमिका को AI पूरी तरह नहीं बदल सकता। उन्होंने Alzheimer’s से पीड़ित अपने पिता की देखभाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस देखभाल में कुछ ऐसा था जिसे मशीन से बदला नहीं जा सकता।
गेट्स ने AI को लेकर अपनी चिंता को पहले की तुलना में काफी अधिक गंभीर बताया है। उनके अनुसार, AI का यह दौर पिछली तकनीकी प्रगतियों से अलग है और इसके लिये पूरे समाज द्वारा नीतिगत स्तर पर गंभीर तैयारी की जरूरत है।
(19-26 August) Reuters, Apnews, Indian Express
अमेरिका, चीन और दोनों कोरिया के बीच संवाद एवं सैन्य गतिविधियों में नए घटनाक्रम
पूर्वी एशिया में हाल के दिनों में अमेरिका, चीन, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच संबंधों को प्रभावित करने वाले कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि वे इस वर्ष के अंत तक उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से मुलाकात करना चाहते हैं। ट्रम्प ने अपने और किम के बीच अच्छे व्यक्तिगत संबंधों का उल्लेख करते हुए उत्तर कोरिया को “unthreatening and respectful” कहा है। इसी के साथ उन्होंने दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों को कम करने का आदेश दिया और कहा कि ये अभ्यास उत्तर कोरिया को “hostile” संदेश देते हैं। हालांकि, प्योंगयांग ने इस पहल पर अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
अमेरिका और दक्षिण कोरिया का वार्षिक “Ulchi Freedom Shield” सैन्य अभ्यास भी इस बदलाव से प्रभावित हुआ। ट्रम्प के आदेश के बाद इसकी अवधि और दायरा घटाया गया और अभ्यास निर्धारित समय से पहले समाप्त हो गया। अमेरिका ने “Ssangyong” नामक एक बड़े संयुक्त समुद्री सैन्य अभ्यास को भी रद्द कर दिया। इसके बावजूद अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान ने सितंबर में “Freedom Edge” नामक त्रिपक्षीय सैन्य अभ्यास करने की घोषणा की है। इससे एक ओर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच संभावित बातचीत की कोशिश दिखाई देती है, तो दूसरी ओर दक्षिण कोरिया और जापान के साथ अमेरिकी सैन्य सहयोग भी जारी है।
इसी बीच चीन और दक्षिण कोरिया के बीच भी कूटनीतिक संपर्क बढ़ा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी 19–20 अगस्त को सियोल गए। उन्होंने दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून से मुलाकात की और दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों तथा कोरियाई प्रायद्वीप की स्थिति पर चर्चा की। वांग यी ने कहा कि चीन प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता के लिए रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जाए-म्युंग ने भी चीन के साथ संबंधों को मजबूत करने और प्रायद्वीप से जुड़े मुद्दों पर करीबी संवाद जारी रखने की बात कही।
चीन और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ते संपर्क के साथ ही अमेरिका और चीन के बीच भी उच्चस्तरीय संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि दोनों देशों को “बाधाओं को पार कर” संवाद बढ़ाना चाहिए। ट्रम्प और शी जिनपिंग के बीच सितंबर में संभावित शिखर बैठक की तैयारी चल रही है। हालांकि, इसके समानांतर व्यापार, शुल्क और अन्य आर्थिक विवाद भी जारी हैं।
