(33).Weekly News Update 1june-6 june (iran war update, niger oil spoil, Quad, Mayanmar venezuela india visit)

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Weekly News Update (33)

(1 June – 6 June 2026)

 (June) ISW, Reuters, BBC

ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध अपडेट

ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष समझौते के मोड़ पर आकर रुका हुआ है। दोनों पक्षों की ओर से, विशेषकर अमेरिका की ओर से, बयान आता रहा है कि अब हम समझौते के बिल्कुल करीब हैं। यह दावा लगभग एक माह से किया जा रहा है। परंतु क्या आंतरिक बातें हो रही हैं, वह आधिकारिक रूप से बाहर नहीं आ रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, वार्ता मुख्यतः ईरान के परमाणु बम बनाने के सभी प्रयासों को बंद करने, आरक्षित यूरेनियम को सौंपने या नष्ट करने तथा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को बिना शर्त-शुल्क के सभी के लिए खोलने जैसे विषयों पर सहमति नहीं बना पा रही है। दूसरी ओर ईरान अपनी पूर्व मांगों पर भी अड़ा हुआ है। उसकी प्रमुख मांगों में युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई, फ्रीज़ की गई ईरानी संपत्तियों पर लगी पाबंदियों को हटाना तथा भविष्य में ईरान पर दोबारा किसी प्रकार का हमला न करने का आश्वासन शामिल है।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच ईरान ने इज़राइल द्वारा लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ जारी हमलों को भी वार्ता में बाधक तत्व बताते हुए 1 जून को बातचीत बंद कर दी। ईरान और उसके समर्थित हिज़्बुल्लाह की मांग है कि इज़राइल लेबनान में अपने सभी हमले तत्काल रोके, हार स्वीकार करे, अपनी पूरी सेना हटाए और लेबनान के क्षेत्र को छोड़कर चला जाए। इसी मुद्दे को लेकर ईरान ने अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश की, जिसे ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच हुई गरम बातचीत के रूप में देखा गया।

इस बीच अमेरिका इज़राइल और लेबनान के बीच युद्धविराम कराने की बार-बार कोशिश कर रहा है। इस संबंध में इज़राइल की शर्त है कि हिज़्बुल्लाह की गोलीबारी और रॉकेट हमले पूरी तरह बंद हों। हिज़्बुल्लाह दक्षिण लेबनान से हटे, विशेष रूप से लितानी नदी के दक्षिण वाले क्षेत्र से उसके लड़ाके और हथियार हटाए जाएँ। लेबनानी सेना सीमा क्षेत्र का नियंत्रण संभाले। अमेरिका की योजना में ऐसे “पायलट ज़ोन” बनाए जाने की बात है जहाँ केवल लेबनानी सेना रहे और कोई गैर-राज्य मिलिशिया न हो। साथ ही इज़राइल चाहता है कि यदि हिज़्बुल्लाह फिर हमला करे तो उसे जवाबी कार्रवाई की स्वतंत्रता प्राप्त रहे।

उधर युद्धविराम के इन प्रयासों के समानांतर क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ भी जारी रहीं। इसी दौरान अमेरिका ने समुद्री यातायात तथा अमेरिकी सेनाओं की आत्मरक्षा के लिए क़ेश्म द्वीप और गोरुक क्षेत्र में स्थित रडार एवं सैन्य ठिकानों पर “आत्मरक्षा हमले” किए। इसके जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन की दिशा में बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले किए। इन घटनाओं ने केवल क्षेत्रीय तनाव ही नहीं बढ़ाया, बल्कि अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक बहस को तेज कर दिया। इसके बाद अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) ने एक War Powers Resolution पारित किया, जिसका उद्देश्य ट्रम्प प्रशासन को कांग्रेस की अनुमति के बिना ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई जारी रखने से रोकना है। युद्ध जारी रखने के लिए पेंटागन और व्हाइट हाउस द्वारा लगभग 200 अरब डॉलर की अतिरिक्त सैन्य फंडिंग की मांगों को लेकर भी विवाद उत्पन्न हुआ है। इसके साथ ही कुछ प्रश्न प्रमुखता से सामने आ रहे हैं—युद्ध का स्पष्ट लक्ष्य क्या है? इसका कुल खर्च कितना होगा? और क्या अमेरिका एक लंबे मध्य-पूर्वी युद्ध में फँस रहा है? इसके अलावा तेल की बढ़ती कीमतें, महँगाई तथा जनता में बढ़ता विरोध भी ट्रम्प के लिए नई कठिनाइयाँ खड़ी कर रहे हैं। अब अमेरिका में कुछ प्रश्न चर्चा के केंद्र में हैं—राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियाँ कितनी होनी चाहिए? क्या यह युद्ध अमेरिका के लिए आर्थिक बोझ बन रहा है? क्या अमेरिका पुनः “फॉरएवर वॉर्स” में फँस रहा है? और क्या कांग्रेस को दरकिनार किया गया है?

अब तक की स्थितियों से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह युद्ध लंबी अवधि तक चल सकता है। यदि इसमें शामिल देशों की मंशा पर ध्यान दिया जाए तो पता चलेगा कि वे अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इतने विवश क्यों दिखाई दे रहे हैं।

इज़राइल अपनी आत्मरक्षा तथा अपने अस्तित्व के प्रश्न को लेकर इस संघर्ष में शामिल है। वह चारों ओर से ऐसे सेमेटिक धर्म वाले देशों से घिरा है जिनमें से अनेक उसे समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। लेकिन इज़राइल अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट और दृढ़ दिखाई देता है। इसी कारण छोटे क्षेत्र और सीमित जनसंख्या होने के बावजूद वह किसी भय, किसी शक्तिशाली संगठन, मंच या समूह के दबाव अथवा अपने विचार में निरर्थक तर्कों के सामने झुकने, मानने या समझौता करने को तैयार नहीं हुआ। जैसे स्पार्टा ने अपने से कहीं बड़ी शक्तियों के सामने आत्मसमर्पण करने से इनकार किया था।

यद्यपि इस प्रसंग का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आत्मरक्षा के नाम पर दूसरे को हानि पहुँचाने से कभी सभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। इसके विपरीत दूसरे पक्ष में घृणा, वैमनस्य, प्रतिशोध और बदले की भावना घर कर जाती है। इसलिए अंततः प्रश्न केवल शक्ति का नहीं बल्कि परिवर्तन का भी है। अब देखना होगा कि मूसा के वंशजों में क्या सिद्धार्थ जैसा कोई आएगा जो अंगुलिमाल जैसी मिलिशियाओं को परिवर्तित कर सके।

दूसरी ओर अमेरिका है, जो श्री बड़बोल (ट्रम्प) की महत्वाकांक्षी व्यापारिक संकल्पनाओं से संचालित होता दिखाई देता है। ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न होने से रोकना, शासन परिवर्तन के माध्यम से स्वतंत्रता बहाल करने का दावा करना, अपने कार्यकाल को सुनिश्चित करना, एक शक्तिशाली व्यक्ति का दर्जा प्राप्त करना तथा आर्थिक हितों की पूर्ति जैसी मंशाओं ने उसे होर्मुज़ में फँसा दिया है। किंतु यदि उद्देश्य और मंशा सही न हों, तो व्यक्ति अथवा राष्ट्र कितना भी शक्तिशाली और आर्थिक रूप से संपन्न क्यों न हो, उसकी शक्ति और सामर्थ्य भी व्यर्थ हो जाती है।

ईरान, जो प्रभुत्व संपन्न होने का हवाला देते हुए अपनी सेमेटिक मानसिकता को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति प्राप्त करना चाहता है, अपने इस उद्देश्य को लेकर काफी स्पष्ट रहा है और लगातार प्रयास करता रहा है। पूरे मध्य-पूर्व को एकीकृत कर उसका नेतृत्व प्राप्त करने की मंशा में वह आतंक के प्रसार का भी सहारा लेता रहा है। परंतु ज़रथुस्त्र की भूमि पर वह वहाँ की असंतुष्ट जनता को कब तक शक्ति और बल प्रयोग के माध्यम से दबाकर रख सकता है, यह भविष्य के गर्भ में है।

इस युद्ध से खाड़ी देशों में एक अलग प्रकार का परिवर्तन देखने को मिल सकता है, जो भविष्यगामी होगा। खाड़ी देश, जहाँ लंबे समय से राजशाही शासन चलता आया है, अपनी राजसत्ता के समाप्त हो जाने तथा अपनी सुरक्षा के भय से अमेरिका पर निर्भर रहे हैं। उन्हें लगता था कि वे सबसे अधिक सुरक्षित हैं, लेकिन ईरान के हमलों ने उनके इस मिथक को काफी हद तक तोड़ दिया है। अब वे अपनी सुरक्षा के लिए अन्य शक्तियों, विशेषकर यूरोपीय देशों, की ओर भी देख रहे हैं। आगे जैसे-जैसे इस विषय में उनकी निर्भरता बढ़ेगी, वैसे-वैसे उन्हें भी बाहरी देशों के उस दबाव का अनुभव करना पड़ सकता है, जिसे वे अब तक अपने देशों में विभिन्न प्रकार की पाबंदियों के माध्यम से टालते रहे हैं। संभव है कि इसके परिणामस्वरूप वहाँ कुछ अधिक खुलापन दिखाई दे।

ये सारी बातें केवल एक पक्ष हैं। किंतु वास्तव में यह पूरी चल रही घटना पृथ्वी के विकासक्रम में किस प्रकार सहायक हो रही है, इसे तो आत्मजागृत आँखें ही देख और बता सकती हैं।

(3 June) amnesty.org, BBC, theguardian

नाइजर डेल्टा : विकास का भ्रम, प्रदूषण और सभ्यता का संकट

हाल के वर्षों में नाइजीरिया के नाइजर डेल्टा क्षेत्र में फैले तेल प्रदुषण को लेकर ब्रिटिश oil company Shell plc के विरुद्ध कानूनी संघर्ष फिर तेज हो गया है। नाइजर डेल्टा की कई स्थानीय समुदायों ने UK courts में लगभग 1 billion dollar compensation और environmental cleanup की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया है। उनका आरोप है कि दशकों तक हुए तेल रिसाव (oil spills) ने उनकी नदियों, आद्र्भूमि (wetlands), खेती, fishing economy और स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जबकि कंपनी को इन खतरों की जानकारी होने के बावजूद उत्पादन जारी रखा गया। इसी चल रही कानूनी लड़ाई ने एक बार फिर नाइजर डेल्टा oil pollution crisis को वैश्विक चर्चा का विषय बना दिया है।

नाइजीरिया पश्चिमी अफ्रीका का एक प्रमुख देश है और पूरे अफ्रीका महाद्वीप में इसकी जनसंख्या सबसे अधिक है। इसकी सीमाएँ पश्चिम में बेनिन, पूर्व में चाड और कैमरून तथा दक्षिण में Gulf of Guinea से लगती हैं। देश का दक्षिणी भाग विशाल दलदली wetlands, creeks और mangrove forests से बने नाइजर डेल्टा क्षेत्र से मिलकर बना है, जबकि मध्य क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊँचा और पठारी स्वरूप का है। भूमध्य रेखा के निकट होने के कारण यहाँ उष्णकटिबंधीय जलवायु पाई जाती है।

नाइजर डेल्टा दुनिया के सबसे समृद्ध wetland ecosystems में से एक माना जाता था। यहाँ की स्थानीय आबादी मुख्यतः fishing, periwinkle (sea snails) harvesting और छोटे स्तर की खेती पर निर्भर थी। उस समय क्षेत्र की नदियाँ, जलस्रोत और जैव विविधता काफी समृद्ध और अपेक्षाकृत स्वच्छ मानी जाती थीं। लेकिन इसी क्षेत्र की भूमि के नीचे विशाल petroleum reserves मौजूद थे, जिसने बाद में इसे “black gold” का क्षेत्र बना दिया। आज oil industry नाइजीरिया की economy और government revenue का प्रमुख आधार है।

1950s में ब्रिटिश multinational company Shell ने यहाँ oil exploration शुरू किया और 1958 में commercial oil export आरंभ हुआ। इसके बाद pipelines, flow stations और export terminals का विशाल network तैयार किया गया, जो हजारों किलोमीटर तक फैला हुआ था। Nembe Creek Trunk Line जैसी pipelines प्रतिदिन लगभग 150,000 barrels crude oil transport कर सकती थीं।

लेकिन समय के साथ यही आधारभूत संरचना (infrastructure) बड़े environmental crisis का कारण बनने लगा। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला, aging pipelines — कई pipelines 30–40 वर्ष पुरानी हो चुकी थीं। Corrosion, poor maintenance और infrastructure failure के कारण उनमें लगातार leakage होने लगा। Internal reports में कुछ pipelines को “end of life” तक बताया गया था और engineers ने इनके बारे में चेतावनी भी दी थी।

दूसरा कारण तेल चोरी और “bunkering” था। नाइजर डेल्टा में उग्रवादी समूहों और संगठित आपराधिक गिरोह ने pipelines में छेद करके crude oil चोरी करना शुरू कर दिया। चोरी किया गया तेल स्थानीय black market, illegal refineries और international smuggling networks के माध्यम से बेचा जाता था। उस समय क्षेत्र में लगभग 100 अवैध रिफाइनरियां सक्रिय बताई जाती थीं।

2000s तक आते-आते नाइजर डेल्टा में armed militancy भी तेज हो गई। Militants pipelines और oil installations पर हमले करने लगे तथा foreign workers के अपहरण की घटनाएँ बढ़ने लगीं। उनका आरोप था कि क्षेत्र से निकलने वाली अपार oil wealth का लाभ स्थानीय समुदायों तक नहीं पहुँच रहा, जबकि प्रदुषण और गरीबी उन्हीं को झेलनी पड़ रही है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1958 से अब तक नाइजर डेल्टा में कम से कम 7,000 तेल रिसाव(oil spills) की घटनाओं के कारण लगभग 13 million barrels कच्चा तेल नदियों, wetlands और भूमि में फैल चुका है। इसके परिणामस्वरूप mangrove forests काले और toxic हो गए, wetlands crude oil और contaminated sediment से भर गए तथा groundwater कई क्षेत्रों में अनुपयोगी हो गया। अनेक स्थानों पर नदी का पानी पीने योग्य नहीं रहा, हवा में crude oil और gas flaring की दुर्गंध फैल गई तथा farming और fishing लगभग समाप्त हो गई। Periwinkle harvesting, जो स्थानीय आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी, वह भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

Source:amnesty.org

अदालत में प्रस्तुत आंतरिक दस्तावेज़ के अनुसार Shell के senior executives को इन खतरों की जानकारी थी। 2008 में pipeline के कुछ sections को “RED” category में रखा गया था, जिसका अर्थ company standards के अनुसार immediate shutdown या major corrective action था। इसके बावजूद उत्पादन जारी रखा गया और कंपनी ने पर्यावरण संबंधी सुरक्षा की तुलना में तेल उत्पादन और लाभ को प्राथमिकता दी।

इस बढ़ते प्रदुषण और स्थानीय असंतोष ने अनेक सामाजिक आंदोलनों को जन्म दिया। इसी पृष्ठभूमि में नाइजीरिया के प्रसिद्ध लेखक और पर्यावरण कार्यकर्ता Ken Saro-Wiwa ने Shell और Nigerian government दोनों का विरोध किया। उनका कहना था कि नाइजर डेल्टा की oil wealth बाहर जा रही है, जबकि प्रदुषण, गरीबी और बीमारी स्थानीय लोगों के हिस्से में आ रही है। लेकिन 1995 में नाइजीरिया की सैन्य समर्थित सरकार ने उन्हें फाँसी दे दी, जिसकी विश्वभर में आलोचना हुई।

आज नाइजर डेल्टा केवल एक polluted oil region नहीं, बल्कि आधुनिक commercial development model की सीमाओं और विफलताओं का प्रतीक बन चुका है। हालांकि Shell का कहना है कि प्रदुषण का मुख्य कारण sabotage, illegal bunkering और organized oil theft है तथा कंपनी ने cleanup और security पर भारी खर्च किया है।

किन्तु नाइजर डेल्टा का मामला कोई अकेली घटना नहीं है। यदि हम विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यकता, विकास और प्रगति के नाम पर कंपनियों द्वारा किए गए प्रयासों पर ध्यान दें, तो वे अल्पकालिक लाभ पहुँचाने के साथ-साथ दीर्घकालिक गंभीर पर्यावरण संकट को भी जन्म देते रहे हैं। इनका प्रभाव अब पृथ्वी को धीरे-धीरे रहने योग्य परिस्थितियों से दूर ले जाता दिखाई दे रहा है।

Commercialization अर्थात प्रकृति और समाज को मुख्यतः आर्थिक लाभ की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति और अत्यधिक उपयोगितावादी दृष्टिकोण (utilitarian) ने प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में देखना शुरू कर दिया, परिणामस्वरूप पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन (ecological balance) निरंतर कमजोर होता गया। जब तक यह दृष्टिकोण बना रहेगा, तब तक किसी वास्तविक परिवर्तन की अधिक आशा नहीं की जा सकती। साथ ही यह प्रश्न बना रहता है कि यदि विकास और आर्थिक प्रगति की परियोजनाएँ अंततः जल, भूमि, वनस्पति, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के जीवन को ही नष्ट कर दें, तो ऐसे विकास का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है।

यदि भारत के संदर्भ में देखें, तो आज यहाँ भी इसी प्रकार industries और बड़े विकास कार्यों को बढ़ाने की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके बदले जीवन के मूल सहायक तत्व – जल, वायु, भूमि और भोजन – को भी दाँव पर लगाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ये सभी तत्व पहले से ही गंभीर रूप से प्रभावित हो चुके हैं और अनेक क्षेत्र इसके दुष्परिणाम भी झेल रहे हैं।

लेकिन हमारी बुद्धि भौतिकता और उपभोक्तावादी दृष्टि के कारण इतनी यांत्रिक हो चुकी है कि हम इस तथ्यात्मक सत्य को भी ठीक से देख और समझ नहीं पा रहे हैं। संभव है कि जिस सत्य को हम स्वेच्छा से देखने और समझने को तैयार नहीं हैं, उसे अंततः प्रकृति अपने कठोर रूप के माध्यम से दिखाने के लिए विवश हो जाए।

 

(June) Indianexpress, firstpost

म्यांमार–वेनेज़ुएला : भारत के आदर्श और राष्ट्रीय हित

हाल ही में म्यांमार और वेनेज़ुएला के राष्ट्रप्रमुखों का भारत दौरा सुर्खियों में रहा। यदि हम इन देशों की पृष्ठभूमि को देखें, तो दोनों ही स्थानों पर लोकतांत्रिक और नैतिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है।

म्यांमार:
कहने को म्यांमार एक संगठित राष्ट्र है, किन्तु वहाँ लंबे समय से सत्ता और जनता की आकांक्षाओं के बीच संघर्ष बना हुआ है। वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद सेना ने देश की राजनीतिक दिशा पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची को विभिन्न आरोपों में नजरबंद रखा गया तथा अनेक असहमति रखने वाले समूहों और समुदायों के विरुद्ध दमनात्मक नीतियों के आरोप भी लगते रहे हैं। हाल में हुए चुनाव पूर्णतः स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं था, क्योंकि राजनीतिक प्रक्रिया पर सेना का प्रभाव बना रहा। आज म्यांमार सैन्य शासन, लोकतंत्र समर्थक प्रतिरोध समूहों तथा विभिन्न जातीय मिलिशियाओं के बीच चल रहे बहु-मोर्चीय संघर्ष और गृहयुद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है।

वेनेज़ुएला:
दूसरी ओर, वेनेज़ुएला भी लंबे समय से सत्ता, वैधता और जन-इच्छा के संकट से गुजर रहा है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और सत्ता संघर्षों के बीच विपक्षी समूहों द्वारा राष्ट्रपति से जुड़े विवादास्पद घटनाओं तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। सरकार पर विरोधी आवाज़ों को दबाने तथा राजनीतिक असहमति पर नियंत्रण रखने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं वेनेज़ुएला की राजनीति पर बाहरी शक्तियों, विशेषकर अमेरिका, के आर्थिक और राजनीतिक हस्तक्षेप का भी प्रभाव पड़ा है। इन परिस्थितियों के बीच देश की जनता लंबे समय से आर्थिक संकट, महँगाई, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक कठिनाइयों का सामना कर रही है।

भारत–म्यांमार समझौता : सुरक्षा और सामरिक आवश्यकता

इस अशांत पृष्ठभूमि के बावजूद भारत और म्यांमार के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए, जो भारत की सामरिक आवश्यकताओं को स्पष्ट करते हैं।

सुरक्षा और सीमा प्रबधन: म्यांमार ने भारत को आश्वासन दिया है कि उसकी भूमि का उपयोग भारत-विरोधी विद्रोही संगठनों (जैसे NSCN-K और ULFA) द्वारा नहीं किया जाएगा, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से सीमा क्षेत्रों में अपने ठिकाने बना रखे थे।

व्यापार और आर्थिक एकीकरण: दोनों देश वर्ष 2024 से संचालित ‘रुपया–क्यात निपटान तंत्र’ के माध्यम से द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने तथा कृषि-प्रसंस्करण, पेट्रोलियम, ऊर्जा और खनन क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करने पर सहमत हुए हैं।

Connectivity और Strategic Policy: कलादान Multi-Modal Transit Transport Project तथा भारत–म्यांमार–थाईलैंड (IMT) Trilateral Highway को गति देने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। भारत ने इस अवसर पर अपनी ‘Neighbourhood First’, ‘Act East’ और ‘महासागर’ (SAGAR) नीतियों के महत्व को भी रेखांकित किया।

सांस्कृतिक और खनिज सहयोग: दोनों देशों ने Rare Earth Elements (दुर्लभ मृदा तत्वों) तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के महत्व को स्वीकार किया। साथ ही, लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से भारत ने म्यांमार के छात्रों के लिए ‘Mekong Ganga ICCR Scholarship’ की संख्या 36 से बढ़ाकर 100 कर दी है।

वेनेज़ुएला : ऊर्जा सुरक्षा, US Sanctions और बदलती वैश्विक परिस्थितियाँ

म्यांमार की तरह ही वेनेज़ुएला के साथ भारत की बातचीत भी मुख्यतः व्यावहारिक आवश्यकताओं पर आधारित दिखाई देती है। विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

वेनेज़ुएला की Acting/Interim President Delcy Rodríguez ने जून 2026 में भारत का दौरा किया। इस यात्रा में हुई चर्चाएँ भारत की ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

Spot से Long-Term Crude Oil Contract की ओर: वेनेज़ुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा कच्चे तेल (Crude Oil) का भंडार है, जो वैश्विक भंडार का लगभग 17% माना जाता है। हाल ही में (अप्रैल–मई 2026) वेनेज़ुएला रूस और UAE के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। अब दोनों देशों के बीच तत्काल खरीद (Spot Purchases) से आगे बढ़कर Long-Term Crude Oil Supply Contracts पर चर्चा चल रही है, जिससे भारत को दीर्घकालिक और अपेक्षाकृत स्थिर तेल आपूर्ति मिल सके।

Upstream और Downstream Investment: भारत की सरकारी तेल कंपनियाँ, विशेषकर ONGC Videsh, वर्ष 2008 से वेनेज़ुएला के Upstream Sector (तेल उत्पादन) में निवेश कर रही हैं। अब दोनों देशों ने नए Oil Blocks तथा Refineries के विकास में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की है।

Critical Minerals और Mining: तेल के अतिरिक्त दोनों देशों के बीच Critical Minerals की खोज, उत्पादन और Supply Chain को लेकर भी चर्चा हुई है, जो Clean Energy Technologies तथा EV Batteries के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

Pharmaceuticals और Automobiles: भारत की कम लागत वाली Generic Medicines को वेनेज़ुएला की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुँचाने तथा भारतीय Automobile Sector, कृषि उपकरणों और संबंधित उद्योगों में निवेश की संभावनाओं पर भी विस्तृत चर्चा हुई।

इन सभी समझौतों को देखने पर एक प्रश्न मन में उठता है। भारत हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम्, विश्व कल्याण और सत्य के पक्ष में खड़े होने की बात करता रहा है। यही उसकी पहचान भी रही है। फिर जब किसी देश में ऐसी परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं जहाँ जनता की इच्छा, लोकतंत्र या मानवीय मूल्यों पर प्रश्न उठ रहे हों, तब भारत का व्यवहार कैसा होना चाहिए?

यह सही है कि हर राष्ट्र की अपनी सुरक्षा, ऊर्जा और व्यापारिक आवश्यकताएँ होती हैं। भारत की भी हैं। लेकिन क्या केवल आवश्यकता ही पर्याप्त है? या फिर किसी राष्ट्र को अपने स्वभाव और आदर्शों को भी ध्यान में रखना चाहिए?

यदि भारत केवल अपने लाभ, सुरक्षा और सामरिक हितों को देखकर संबंध बनाता है, तो फिर उसमें और अन्य शक्तिशाली देशों में क्या अंतर रह जाता है, जो वर्षों से यही करते आए हैं? और यदि भारत वास्तव में एक ऐसी सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है जो सत्य और विश्व कल्याण की बात करती है, तो क्या उसे उन बातों पर भी अपनी स्पष्ट राय नहीं रखनी चाहिए जिन्हें वह गलत मानता है?

संभव है कि इन प्रश्नों का उत्तर सरल न हो। लेकिन इतना अवश्य है कि किसी राष्ट्र की महानता केवल उसकी शक्ति, संपत्ति या प्रभाव से नहीं मापी जाती। अंततः उसे इस बात से भी आँका जाता है कि उसने सुविधा और सत्य में से किसे अधिक महत्व दिया।

शायद यही प्रश्न आज भारत के सामने भी खड़ा है।

 

(June) mea.gov.in,Indianexpress, usnews, ET

क्वाड(Quad) : प्रतिस्पर्धा, सुरक्षा और विश्व एकता का प्रश्न

हाल ही में Quadrilateral Security Dialogue (Quad) देशों  भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों एवं शीर्ष प्रतिनिधियों की बैठक चर्चा का विषय रही। बैठक मुख्यतः Indo-Pacific क्षेत्र की सुरक्षा, चीन की बढ़ती सक्रियता, supply chains, technology cooperation तथा maritime security पर केंद्रित रही। पिछले कुछ वर्षों में Quad का महत्व लगातार बढ़ा है और अब इसे केवल एक सुरक्षा मंच के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी सहयोग के माध्यम के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि Quad क्या है और इसकी भूमिका क्या है।

क्वाड क्या है?

दिसंबर 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के बाद भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका आपदा राहत अभियानों के समन्वय के लिए एक अनौपचारिक व्यवस्था के अंतर्गत साथ आए थे। वर्ष 2007 में Quadrilateral Security Dialogue (Quad) की औपचारिक शुरुआत हुई। प्रारंभिक वर्षों में यह पहल अधिक गति नहीं पकड़ सकी, किंतु वर्ष 2017 में इसे पुनः सक्रिय किया गया। तब से Quad धीरे-धीरे Indo-Pacific क्षेत्र से जुड़े विभिन्न रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा विषयों पर सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच बनता गया है।

क्वाड प्लस क्या है?

Quadrilateral Security Dialogue (Quad Plus), Quad framework का विस्तारित और अधिक लचीला स्वरूप है, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया विशेष रणनीतिक, आर्थिक अथवा सुरक्षा विषयों पर अन्य देशों को भी सहयोग और संवाद के लिए शामिल करते हैं।

यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि Indo-Pacific क्षेत्र में व्यापक साझेदारी, समन्वय और सहयोग का एक flexible platform माना जाता है।

Quad बैठक की प्रमुख बातें

Indo-Pacific Security: सदस्यों ने कहा कि समुद्री मार्ग खुले और सुरक्षित रहने चाहिए, international law का पालन होना चाहिए तथा किसी भी देश द्वारा coercion या unilateral actions नहीं होने चाहिए। इसे मुख्यतः South China Sea और चीन की maritime activities के संदर्भ में देखा जा रहा है।

Maritime Cooperation: बैठक में joint naval coordination, maritime domain awareness, coast guard cooperation, piracy तथा illegal fishing पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही Indian Ocean और Pacific Ocean दोनों क्षेत्रों में समन्वय बढ़ाने की बात कही गई।

Critical Minerals और Supply Chains: Quad देशों ने rare earths, lithium तथा semiconductor materials जैसे strategic resources की secure supply chains विकसित करने पर चर्चा की। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में दुनिया का बड़ा हिस्सा इन संसाधनों की processing के लिए चीन पर निर्भर है। भारत स्वयं को इस क्षेत्र में एक alternative manufacturing hub के रूप में विकसित करना चाहता है।

Technology Cooperation: बैठक में AI, cyber security, 5G/6G तथा semiconductor cooperation जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। इससे स्पष्ट है कि Quad अब केवल security grouping तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि technology partnership की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।

बैठक में उठाए गए विषयों पर ध्यान दें तो ऐसा प्रतीत होता है कि Quad का एक प्रमुख उद्देश्य चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना लगता है। चाहे वह South China Sea हो, Indian Ocean हो, Critical Minerals की supply chains हों या फिर तकनीकी और सामरिक क्षमता का प्रश्न, लगभग हर क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति Quad देशों की चिंता का विषय दिखाई देती है।

भारत के लिए यह चिंता सीमा विवाद, हिंद महासागर तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी है। अमेरिका अपनी वैश्विक स्थिति के लिए चीन को सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखता है, जबकि जापान और ऑस्ट्रेलिया भी क्षेत्र में चीन की बढ़ती शक्ति को लेकर चिंतित हैं।

निस्संदेह इसका एक दूसरा पक्ष भी है। यदि कोई राष्ट्र या शक्ति इतनी प्रभावशाली हो जाए कि अन्य देशों को अपनी सुरक्षा, स्वतंत्र निर्णय क्षमता अथवा क्षेत्रीय संतुलन पर खतरा दिखाई देने लगे, तो उनके लिए परस्पर सहयोग और संतुलन स्थापित करने का प्रयास स्वाभाविक माना जा सकता है। इस दृष्टि से Quad को एक देश के विरोध के बजाय Indo-Pacific क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के प्रयास के रूप में भी देख सकते हैं।

किन्तु यहाँ एक व्यापक प्रश्न भी उठता है। यदि किसी समूह का प्रमुख उद्देश्य किसी अन्य शक्ति के प्रभाव को सीमित करना हो, तो क्या वह अपने लक्ष्य को सही दिशा दे सकता है? क्योंकि भय, संदेह और प्रतिस्पर्धा के आधार पर बने समूह अल्पकाल में संतुलन तो बना सकते हैं, किन्तु वे स्थायी विश्वास और सहयोग का आधार कम ही बन सकते हैं।

यदि प्रत्येक राष्ट्र दूसरे की शक्ति से भयभीत होकर नए समूह बनाता रहेगा, तो फिर पारस्परिक सहयोग, विश्वास और साझा विकास की संभावना कहाँ बचेगी? तब विश्व धीरे-धीरे ऐसे गुटों में विभाजित हो सकता है जहाँ प्रत्येक पक्ष अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा, लेकिन इससे दूसरे पक्ष के भीतर असुरक्षा की भावना भी बढ़ सकती हैं।

संभव है कि वर्तमान परिस्थितियों में Quad जैसे मंचों की आवश्यकता हो। किन्तु दीर्घकाल में किसी भी व्यवस्था की सफलता केवल शक्ति संतुलन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आत्मकेंद्रिता से ऊपर उठकर विश्व बंधुत्व की भावना में निहित होती है। शायद वास्तविक चुनौती केवल किसी एक शक्ति को संतुलित करने की नहीं, बल्कि ऐसी विश्व व्यवस्था बनाने की है जिसमें प्रत्येक राष्ट्र अपनी आत्मा की पुकार और अपनी नियति के प्रति सचेत रहते हुए विश्व एकता की दिशा में आगे बढ़े।

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