(38.)Weekly News Update 13 -19 JULY (iran war update)

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Weekly News Update (38)

(13 July – 19 July 2026)

 (13 – 20 July) ISW, Reuters, Apnews, Aljazeera

ईरान–अमेरिका–इस्रायल युद्ध अपडेट

अमेरिका

इस सप्ताह अमेरिका ने ईरान पर अपने हमले लगातार जारी रखे तथा पुनः नौसैनिक नाकाबंदी लागू कर दी। अमेरिकी हमलों का प्रमुख केंद्र ईरान का दक्षिणी तटीय क्षेत्र रहा। अमेरिका विशेष रूप से उन क्षेत्रों को निशाना बना रहा है, जहाँ से ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण स्थापित या सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है। इन हमलों में मुख्य रूप से ऊर्जा संयंत्र, निगरानी केंद्र, सैन्य लॉजिस्टिक्स, भूमिगत हथियार भंडार, नौसैनिक एवं समुद्री क्षमताएँ, रडार एवं ड्रोन साइटें, संचार सुविधाएँ तथा पुल एवं सैन्य उपयोग वाले परिवहन ढाँचे को लक्ष्य बनाया गया। प्रमुख हमलों का विवरण निम्नलिखित सारणी में दिया गया है-

स्थान महत्व रिपोर्ट के अनुसार निशाना
बंदर अब्बास (Bandar Abbas) ईरान का प्रमुख नौसैनिक और बंदरगाह क्षेत्र सैन्य लॉजिस्टिक्स और समुद्री क्षमताएँ
क़ेश्म द्वीप (Qeshm Island) होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास सामरिक द्वीप निगरानी एवं सैन्य सुविधाएँ
जास्क (Jask) नौसैनिक अड्डा और तेल निर्यात क्षेत्र सैन्य प्रतिष्ठान, जल व बिजली संयंत्र
सीरिक (Sirik) होर्मुज़ के निकट तटीय क्षेत्र सैन्य एवं रडार सुविधाएँ
बुशेहर (Bushehr) दक्षिणी तटीय क्षेत्र सैन्य अवसंरचना पर हमले की रिपोर्ट
अहवाज़ (Ahvaz) दक्षिण-पश्चिमी सैन्य क्षेत्र सैन्य ठिकानों पर हमले
यज़्द (Yazd) मध्य ईरान सैन्य लक्ष्यों पर हमले

 

15 जुलाई को अमेरिकी सेना ने सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत के ईरानशहर में ‘आर्तेश ग्राउंड फोर्सेज’ की 388वीं मैकेनाइज्ड असॉल्ट ब्रिगेड की बैरक पर हमला किया। यह हमला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि 388वीं ब्रिगेड ईरान के तट से लगभग 200 किलोमीटर दूर स्थित है, जबकि जुलाई में अमेरिका के अधिकांश हवाई हमले दक्षिणी तटीय क्षेत्रों तक ही सीमित रहे हैं। उल्लेखनीय है कि ‘आर्तेश’ ने युद्ध के दौरान अनेक सैन्य अभियान संचालित किए हैं तथा 15 जुलाई को ही दावा किया कि उसने जॉर्डन के अज़राक स्थित मुवाफ़्फ़क साल्टी एयरबेस पर तैनात अमेरिकी सेना को ड्रोन हमलों के माध्यम से निशाना बनाया। सेंटकॉम (CENTCOM) के अनुसार, इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास उसकी सामरिक गतिविधियों को सीमित करना है।

ईरान

ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण एवं प्रभुत्व बनाए रखने की नीति पर अड़ा हुआ है। अपने इस रुख को उचित ठहराने के लिए वह धार्मिक आधार का भी सहारा ले रहा है, जिसकी झलक इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के एक बयान में देखने को मिलती है—

“चूँकि अमेरिकी सेना की बर्बरता को रोकने के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं है, इसलिए हमारे पास क़ुरआन के इस आदेश के अलावा कोई रास्ता नहीं है— ‘जो तुम पर हमला करे, तुम भी उस पर उसी प्रकार हमला करो।'”

ईरान ने जवाबी कार्रवाई के तहत अमेरिका तथा उसके सहयोगी देशों से जुड़े सैन्य ठिकानों और रणनीतिक परिसंपत्तियों को निशाना बनाया। इनमें मुख्य रूप से अमेरिकी सैन्य एयर बेस, अमेरिकी नौसेना की सुविधाएँ, रडार एवं निगरानी प्रणाली, ईंधन भंडार, गोला-बारूद डिपो, अमेरिकी सहयोगी देशों की सैन्य अवसंरचना तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संचालित जहाजों और तेल परिवहन को लक्ष्य बनाया गया। प्रमुख हमलों का विवरण निम्नलिखित सारणी में दिया गया है –

स्थान देश लक्ष्य
1 अली अल सलेम एयर बेस (Ali Al Salem Air Base) कुवैत अमेरिकी वायुसेना का अड्डा
2 अमेरिकी पाँचवें बेड़े का मुख्यालय (US Fifth Fleet Headquarters) बहरीन अमेरिकी नौसेना का मुख्यालय
3 अल उदीद एयर बेस (Al Udeid Air Base) क़तर मध्य-पूर्व का सबसे बड़ा अमेरिकी एयर बेस
4 अल धफ़रा एयर बेस (Al Dhafra Air Base) संयुक्त अरब अमीरात अमेरिकी लड़ाकू विमान एवं ड्रोन बेस
5 प्रिंस सुल्तान एयर बेस (Prince Sultan Air Base) सऊदी अरब अमेरिकी सैन्य उपस्थिति वाला एयर बेस
6 प्रिंस हसन एयर बेस (Prince Hassan Air Base) जॉर्डन अमेरिकी सहयोगी सैन्य अड्डा
7 होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) समुद्री क्षेत्र व्यापारी जहाज एवं तेल टैंकर

 

इसके अतिरिक्त, ईरान ने कुवैत में बिजली और पानी के एक संयंत्र पर हमला किया, जिससे विद्युत उत्पादन की कई इकाइयों को नुकसान पहुँचा।

आईआरजीसी (IRGC) के एक सैन्य सलाहकार ने शुक्रवार को चेतावनी दी कि यदि अमेरिका अगले तीन-चार दिनों तक अपने हमले जारी रखता है, तो ईरान अपनी पूरी सैन्य क्षमता के साथ पूरे खाड़ी क्षेत्र में व्यापक कार्रवाई करेगा, जिसमें किसी भी राजनीतिक सीमा का ध्यान नहीं रखा जाएगा। उसने अपने सहयोगी संगठनों के माध्यम से बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को भी अवरुद्ध करने की चेतावनी दी। वहीं, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईरान ने हूती बलों को नई ड्रोन प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराई है तथा उन्हें उसका प्रशिक्षण भी दिया है।

इज़रायल–लेबनान

इज़रायल और लेबनान के बीच 26 जून को हुए रूपरेखा समझौते (Framework Agreement) को क्रियान्वित करने की दिशा में 15–16 जुलाई को रोम में अमेरिका की मध्यस्थता में पुनः वार्ता हुई। चर्चा का मुख्य विषय दक्षिणी लेबनान से इज़रायली सेना की चरणबद्ध वापसी, पायलट ज़ोन (Pilot Zones) का निर्माण, जहाँ लेबनानी सशस्त्र बल (LAF) सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालें, हिज़्बुल्लाह को उन क्षेत्रों से हटाना तथा उसके निरस्त्रीकरण (Disarmament) की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना रहा।

इसके अतिरिक्त हिज़्बुल्लाह लेबनान सरकार के निरस्त्रीकरण संबंधी प्रयासों में विलंब उत्पन्न करने के उद्देश्य से एक सूचना अभियान चला रहा है। इसके माध्यम से वह लेबनान सरकार को यह विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहा है कि वह लेबनानी सशस्त्र बलों (LAF) के साथ सहयोग करेगा तथा हथियार छोड़ने की प्रक्रिया प्रारंभ होने से पहले सरकार को लेबनान से इज़रायली सेना की पूर्ण वापसी सुनिश्चित करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

इन वार्ताओं के दौरान भी इज़रायल ने दक्षिणी लेबनान में अपने सैन्य अभियान जारी रखे। विशेष रूप से नबातियेह (Nabatieh), बिंत जुबैल (Bint Jbeil) तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हवाई हमले किए गए। 18 जुलाई को इज़रायली सेना ने तेबनीत (Tebnit) के निकट हिज़्बुल्लाह के लड़ाकों द्वारा किए गए ड्रोन हमले के प्रयास को विफल करने का दावा करते हुए संबंधित ठिकानों पर हमला किया।

इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शारा को हिज़्बुल्लाह से “निपटने” के लिए लेबनान में सेना भेजने का प्रस्ताव दोहराया। ट्रंप के अनुसार, अल-शारा यह कार्य इज़रायल की तुलना में “अधिक सटीक” ढंग से कर सकते हैं। इसके विपरीत, अहमद अल-शारा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर चुके हैं कि वे सीरिया को क्षेत्रीय युद्ध से दूर रखना चाहते हैं तथा लेबनान में किसी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप करने की उनकी कोई इच्छा नहीं है।

निष्कर्ष

ईरान को परमाणु हथियार प्राप्त न हों, इस उद्देश्य से प्रारंभ हुआ युद्ध अब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के प्रश्न पर आकर केंद्रित हो गया है। पूरे घटनाक्रम पर दृष्टि डालने से कुछ बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं –

  1. युद्धविराम के बाद हुए शांति समझौते के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर जो प्रतिबद्धता व्यक्त की थी, वर्तमान में होर्मुज़ जलडमरूमध्य के संबंध में अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों की अनदेखी तथा उस पर नियंत्रण स्थापित करने की उसकी नीति को देखते हुए उसकी प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। भविष्य में भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बनाए रखने तथा वहाँ से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क (टोल) वसूलने की उसकी जिद इसी दिशा की ओर संकेत करती है।
  2. ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसके हमलों का उद्देश्य केवल अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना है। किंतु कुवैत और सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अतिरिक्त ऊर्जा एवं जल अवसंरचना पर किए गए हमले उसके दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि संघर्ष बढ़ने पर ईरान सैन्य और सार्वजनिक उपयोग के स्थलों में अधिक भेद नहीं करेगा।
  3. जून 2026 के दौरान युद्ध जारी रखने की ईरान की क्षमता पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का प्रभाव सीमित अवश्य था, किंतु महत्वपूर्ण था। समाचारों के अनुसार, अमेरिकी नाकेबंदी तथा ईरान की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई से 18 जून के समझौता ज्ञापन (MoU) को स्वीकार करने का आग्रह किया, जबकि सर्वोच्च नेता होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के पक्ष में थे। हालाँकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ईरानी शासन के सभी अंग नाकेबंदी के समान दबाव में थे। अमेरिका यदि अपनी वर्तमान रणनीति के तहत नौसैनिक नाकेबंदी तथा ऊर्जा एवं जल अवसंरचना पर योजनाबद्ध हमले जारी रखता है, तो ईरान पहले की तुलना में अधिक व्यापक प्रतिक्रिया दे सकता है। ऐसी स्थिति में वह खाड़ी देशों की ऊर्जा एवं जल अवसंरचना पर बड़े पैमाने पर हमले कर सकता है तथा बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को बाधित कर वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न करने का प्रयास कर सकता है। इस प्रकार, परमाणु कार्यक्रम से प्रारंभ हुआ यह संघर्ष अब वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है।
  4. राष्ट्रपति ट्रंप के सामने मध्यावधि चुनाव तथा तेल की बढ़ती कीमतें दो प्रमुख चुनौतियाँ हैं, जिनसे वे शीघ्र निकलना चाहते हैं। साथ ही, शनिवार को दो अमेरिकी सैनिकों की मौत और एक सैनिक के लापता होने की खबर भी सरकार पर बहुत बड़ा दबाव बना रही है। इसके लिए वे ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियान को और तेज़ कर सकते हैं, जिससे पूर्ण युद्ध छिड़ने की आशंका बढ़ सकती है। किंतु ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इससे समस्या का कोई स्थायी समाधान निकल सकेगा। वर्तमान में ईरान के विरुद्ध युद्ध का मुख्य भार अमेरिका ही उठा रहा है। इज़रायल और यूक्रेन को छोड़कर अधिकांश देशों की प्रमुख चिंता होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति है। यदि ऊर्जा आपूर्ति बाधित न होती, तो संभवतः अधिकांश देशों की सक्रियता केवल औपचारिक समर्थन तक ही सीमित रहती। यह भी एक विचित्र स्थिति है कि अधिकांश देश इस बात पर सहमत हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए, किंतु उसके विरुद्ध आवश्यक कदम उठाने को तैयार नहीं हैं। यदि ट्रंप अन्य देशों को अपने साथ जोड़ने में सफल होते हैं, तो इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि अन्य देश समय की आवश्यकता को देखते हुए ट्रंप के व्यक्तित्व को एक ओर रखकर सामूहिक रूप से सहयोग करें, तो समाधान की संभावना बढ़ सकती है। फिलहाल इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है।
  5. अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि यदि ईरान इस युद्ध में इतने दृढ़ रुख पर कायम है, तो क्या वह केवल अपनी सैन्य शक्ति के बल पर ऐसा कर पा रहा है, या इसके पीछे अन्य कारण भी हैं? इसी प्रकार, खाड़ी के देश आज तक किसी साझा रणनीति पर एकमत होकर निर्णायक कदम क्यों नहीं उठा सके? ईरान की नीतियों के पीछे केवल सामरिक और राजनीतिक कारण ही नहीं, बल्कि धर्म के प्रति उसका गहरा विश्वास भी प्रमुख भूमिका निभाता है। लेख में उद्धृत IRGC के बयानों से भी यह स्पष्ट होता है कि उसकी रणनीतिक सोच धार्मिक मान्यताओं से गहराई से प्रभावित है। धार्मिक ग्रंथों की शाब्दिक व्याख्या भी इसका एक प्रमुख कारण है, जबकि ऐसे ग्रंथों को उनके व्यापक संदर्भ और सांकेतिक अर्थों के साथ समझना अधिक उपयुक्त माना जाता है। दूसरी ओर, खाड़ी देशों की सामरिक क्षमता ईरान की तुलना में सीमित है। इसी कारण वे अकेले उसके विरुद्ध निर्णायक सैन्य कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं हैं। फिर भी यदि खाड़ी के सात देश सामूहिक रूप से कार्य करें, तो उनकी संयुक्त शक्ति अधिक प्रभावी हो सकती है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि वे अब भी सामूहिक सुरक्षा की अपेक्षा अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
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