(41.)Weekly News Update 2 August- 9 August Makka agreement, FCRA, AI race

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 Weekly News Update (41)

(3 August – 9 August 2026)

 (7 August) TOI, Reuters, APnews

मक्का समझौता : सामूहिक सुरक्षा की नई पहल

तीन सुन्नी देश सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच 7 अगस्त को मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौता हुआ। इसका उद्देश्य तीनों देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा, रक्षा सहयोग और निवारक क्षमता (deterrence) को मजबूत करना है। समझौते के मुख्य बिंदु हैं —

  • तीनों सहयोगी देशों में से किसी भी एक पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा।
  • तीनों देश अपनी संयुक्त सुरक्षा क्षमता और deterrence को मजबूत करेंगे, ताकि संभावित हमले को पहले ही हतोत्साहित किया जा सके।
  • तीनों देशों के बीच रक्षा और विदेश नीति के स्तर पर नियमित consultation और coordination के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाई जाएगी। इसके लिए सऊदी अरब में सचिवालय स्थापित किया जाएगा।
  • यह समझौता केवल इन तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में अन्य देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मिस्र को संभावित भविष्य के सदस्य के रूप में भी उल्लेख किया है।

समझौते का उद्देश्य किसी भी प्रकार की आक्रामकता के विरुद्ध सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना है। तीनों देशों ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि तीनों सहयोगियों की सुरक्षा के लिए एक साझा प्रतिबद्धता है। तुर्की ने विशेष रूप से कहा है कि इसका लक्ष्य ईरान या किसी अन्य देश को बनाना नहीं है।

यह समझौता किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक अथवा धार्मिक गुट के निर्माण की दिशा में भी नहीं बताया गया है। इसी प्रकार इसे परमाणु हथियारों या हथियारों की होड़ से जोड़ने से भी इनकार किया गया है। इसके बजाय तीनों देशों ने टिकाऊ और आत्मनिर्भर रक्षा क्षमताएँ विकसित करने पर जोर दिया है।

हालांकि, समझौते की व्यावहारिक व्यवस्थाएँ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। मसलन, किसी सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में अन्य दो देश किस स्तर पर और किस रूप में सहायता देंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इस संबंध में विस्तृत व्यवस्था आगे होने वाली बैठकों और आपसी बातचीत के माध्यम से तय की जानी है। इसलिए “एक पर हमला, सभी पर हमला” का सिद्धांत राजनीतिक रूप से स्पष्ट होने के बावजूद उसकी वास्तविक सैन्य परिणति अभी देखी जानी बाकी है।

इस समझौते के पीछे तीनों देशों की अपनी-अपनी रणनीतिक आवश्यकताएँ हैं। सऊदी अरब के लिए अपनी महत्वपूर्ण ऊर्जा और आर्थिक अवसंरचना तथा क्षेत्रीय सुरक्षा की रक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है। हाल के क्षेत्रीय संघर्षों और हमलों ने उसकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को और बढ़ाया है। दूसरी ओर तुर्की के पास NATO की दूसरी बड़ी सैन्य शक्ति होने के साथ तेजी से विकसित होता हुआ रक्षा उद्योग है। पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता और बैलिस्टिक मिसाइलों सहित महत्वपूर्ण सैन्य क्षमताएँ हैं, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था गंभीर आर्थिक सीमाओं से जूझ रही है। इस प्रकार तीनों देशों की क्षमताएँ और आवश्यकताएँ अलग-अलग होते हुए भी कुछ क्षेत्रों में एक-दूसरे की पूरक दिखाई देती हैं।

इस समझौते का दायरा भविष्य में कितना बढ़ता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि मिस्र या अन्य देश इसमें शामिल होते हैं तो यह तीन देशों के सीमित रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का रूप ले सकता है।

इस नए समझौते की वास्तविक प्रभावशीलता पर प्रश्न भी उठते हैं। सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच Strategic Mutual Defence Agreement हुआ था। उसमें भी दोनों देशों पर होने वाले आक्रमण को एक-दूसरे पर आक्रमण माना गया था और संयुक्त deterrence को मजबूत करने की बात कही गई थी।

इसके बावजूद बाद में क्षेत्रीय संघर्षों और सऊदी अरब पर होने वाले हमलों के दौरान इस समझौते के आधार पर किसी व्यापक संयुक्त सैन्य कार्रवाई का उदाहरण सामने नहीं आया। इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है — किसी समझौते में सामूहिक रक्षा का सिद्धांत शामिल होना और उस सिद्धांत के आधार पर वास्तविक सैन्य कार्रवाई होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

यही प्रश्न मक्का समझौते के सामने भी रहेगा। किसी सदस्य देश पर भविष्य में गंभीर हमला होने की स्थिति में क्या अन्य दोनों देश वास्तव में सैन्य सहायता देंगे? यदि देंगे तो उसका स्वरूप क्या होगा — सैनिक, हथियार, वायु रक्षा, खुफिया सहायता या केवल राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन? इन प्रश्नों के उत्तर ही यह तय करेंगे कि मक्का समझौता केवल रणनीतिक संदेश और deterrence का साधन बनकर रह जाता है या वास्तव में एक प्रभावी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का रूप लेता है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व में बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के बीच सऊदी अरब अब अपनी सुरक्षा को केवल बाहरी शक्तियों पर निर्भर रखने के बजाय क्षेत्रीय साझेदारों के साथ अपनी स्वतंत्र और सामूहिक सुरक्षा क्षमता विकसित करना चाहता है। मक्का समझौता इसी बदलती हुई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण संकेत है।

 

(8 August) Indian express, PIB

FCRA विधेयक और इसके प्रावधान

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम(Foreign Contribution (Regulation) Amendment), 2010 यानी FCRA, भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन, वस्तुओं या अन्य अंशदान (foreign contribution) को नियंत्रित करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी अंशदान का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार हो और उसका प्रयोग भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के प्रतिकूल गतिविधियों में न किया जाए। किसी भी पात्र संगठन को विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए FCRA के तहत पंजीकरण (registration) या पूर्व अनुमति (prior permission) लेनी होती है।

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 मुख्य रूप से उन स्थितियों से संबंधित है जब किसी संगठन का FCRA पंजीकरण समाप्त (cancelled/expired) हो जाता है। यह स्थिति रद्दीकरण (cancellation), नवीनीकरण न होने (non-renewal) या स्वेच्छा से पंजीकरण वापस लेने (voluntary surrender) जैसी परिस्थितियों में उत्पन्न हो सकती है।

ऐसे मामलों में विदेशी अंशदान से बनी परिसंपत्तियों (assets) की देखरेख के लिए एक निर्दिष्ट प्राधिकरण (Designated Authority) की व्यवस्था प्रस्तावित है। पंजीकरण समाप्त होने पर ये परिसंपत्तियाँ अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण के नियंत्रण (control) में रहेंगी। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल (restored) हो जाता है, तो परिसंपत्तियाँ और अप्रयुक्त धन वापस कर दिया जाएगा। अन्यथा, उनका उपयोग सार्वजनिक प्रयोजन (public purpose) में या निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।

यदि इनमें कोई पूजा स्थल शामिल है, तो उसका धार्मिक स्वरूप (religious character) बनाए रखने का प्रावधान किया गया है।

विधेयक में FCRA उल्लंघन (violation) के लिए अधिकतम सजा (punishment) को पाँच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी है। साथ ही, प्रभावित संगठन को 90 दिनों के भीतर पुनर्विचार (review) का अनुरोध करने और उसके बाद जिला न्यायालय (District Court) में अपील (appeal) करने का अधिकार दिया गया है।

सरकार का कहना है कि मौजूदा कानून में पंजीकरण रद्द होने पर परिसंपत्तियों के निपटारे (disposal of assets) का प्रावधान तो है, लेकिन उनकी देखरेख और प्रक्रिया स्पष्ट नहीं थी। यह विधेयक उसी प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास करता है।

विधेयक को लेकर चिंताएँ

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और अब 12 अगस्त को इस पर चर्चा प्रस्तावित है। विधेयक के प्रावधानों को लेकर विपक्ष और कई ईसाई संगठनों ने चिंता व्यक्त की है। विपक्ष की मुख्य चिंता यह है कि FCRA पंजीकरण समाप्त होने की स्थिति में विदेशी अंशदान से बनी परिसंपत्तियों पर सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण का नियंत्रण हो सकता है और कुछ परिस्थितियों में ये परिसंपत्तियाँ स्थायी रूप से उसके पास जा सकती हैं। इसे लेकर केंद्र सरकार को संस्थाओं की परिसंपत्तियों पर व्यापक अधिकार मिलने और न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित होने की आशंका व्यक्त की गई है।

ईसाई संगठनों की विशेष चिंता चर्च और धार्मिक संस्थाओं की परिसंपत्तियों को लेकर है। उनका कहना है कि विधेयक और उससे जुड़े नियमों को व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए तथा इन्हें भविष्य से लागू किया जाना चाहिए। उन्हें आशंका है कि यदि प्रावधानों का पूर्व प्रभाव हुआ तो पुराने प्रक्रियागत मामलों के कारण ईमानदारी से काम करने वाले संगठनों को भी परेशानी या दंड का सामना करना पड़ सकता है। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी विधेयक के संभावित पूर्व प्रभाव को लेकर अपनी आशंका गृह मंत्री अमित शाह के सामने रखी। शाह ने उन्हें आश्वासन दिया कि विधेयक में कोई retrospective प्रावधान नहीं होगा।

सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य विदेशी अंशदान और उससे बनी परिसंपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ी मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक कमियों को दूर करना है।

 

(6 August) TOI, Reuters, pib.gov.in, news.un.org

AI की दौड़: विज्ञान, प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन

भूमिका

विज्ञान की प्रगति और तकनीक का विकास आज मानव सभ्यता को एक नई दिशा और अभूतपूर्व गति दे रहा है। मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को समझने और उसकी शक्तियों का उपयोग करने की अपनी क्षमता को जिस तेजी से विकसित किया है, वह मानव इतिहास में पहले कभी नहीं दिखाई दी। क्वांटम भौतिकी और उससे विकसित हो रही नई प्रौद्योगिकियाँ तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) इस परिवर्तन को और तीव्र गति दे रही हैं।

लेकिन इस तीव्र गति का एक दूसरा पक्ष भी है। प्रकृति का संतुलन (वायु, जल, मिट्टी और जीव-जगत) जिस गति से मनुष्य की तकनीकी शक्ति बढ़ रही है, उसी गति से उसके दबाव में आता दिखाई दे रहा है। तकनीक का यह पहिया इतनी तेजी से घूम रहा है कि मानव के विकास को गति देने वाली अन्य धाराएँ भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं रह गई हैं। योग, आध्यात्मिकता और मनुष्य के आंतरिक विकास की प्रक्रियाएँ, जो प्रारंभ से ही मानव जीवन को एक दूसरी दिशा में विकसित करने का प्रयास करती रही हैं, आज इस तीव्र तकनीकी परिवर्तन के सामने अपेक्षाकृत धीमी दिखाई देती हैं। बल्कि वे भी कहीं न कहीं इसी बदलती हुई तकनीकी सभ्यता के प्रभाव में आकर उसके साथ बहती प्रतीत होती हैं।

आज इस व्यापक तकनीकी परिवर्तन के सबसे प्रभावशाली रूपों में से एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI) हमारे सामने है। हम AI को प्रायः एक डिजिटल तकनीक के रूप में देखते हैं, लेकिन उसके पीछे एक विशाल भौतिक आधार काम करता है। AI को चलाने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटरों की आवश्यकता होती है और इन डेटा सेंटरों के निर्माण तथा संचालन के लिए भूमि, बिजली और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी मात्रा में आवश्यकता होती है।

भारत भी AI के विकास को बढ़ावा देने के लिए डेटा सेंटर के बुनियादी ढाँचे का तेजी से विस्तार कर रहा है। देश में डेटा सेंटरों की क्षमता पिछले कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ी है और आने वाले समय में इसके और तेजी से बढ़ने की संभावना है। इसके आलावा विश्व के अनेक देशों में AI के लिए आवश्यक डेटा सेंटरों का निर्माण तेजी से हो रहा है और इसके साथ ही उनके पर्यावरणीय तथा सामाजिक प्रभावों को लेकर प्रश्न भी उठने लगे हैं।

यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आता है: क्या तकनीकी विकास की इस तीव्र गति को रोका जा सकता है? और यदि नहीं, तो क्या हमें इसके हर विस्तार का विरोध करना चाहिए? या फिर आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान और तकनीक की बढ़ती शक्ति को प्रकृति तथा मनुष्य के आंतरिक विकास के साथ एक उचित संतुलन में रखा जाए?

AI और डेटा सेंटरों के विस्तार को लेकर उठ रही वर्तमान चिंताएँ इसी बड़े प्रश्न का एक व्यावहारिक रूप प्रतीत होता है।

भारत में AI और डेटा सेंटरों का विस्तार

भारत में AI के विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार डेटा सेंटर उद्योग के विस्तार को भी प्रोत्साहित कर रही है। देश में कुल डेटा सेंटर क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1500 मेगावाट हो गई है। मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, नोएडा और जामनगर जैसे प्रमुख केंद्रों के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी डेटा सेंटर के बुनियादी ढाँचे का विस्तार किया जा रहा है।

इस विस्तार का एक उदाहरण विशाखापत्तनम में सामने आता है। कंबालाकोंडा वन्यजीव अभयारण्य से लगभग 860 मीटर की दूरी पर स्थित तरलुवाडा गाँव में Google, Adani Group के साथ मिलकर 15 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजना का निर्माण कर रही है। इस परियोजना के लिए 266.6 एकड़ भूमि आवंटित की गई है। जिस क्षेत्र में यह परियोजना प्रस्तावित है, वहाँ लगभग 25 लाख लोगों की आबादी है। वहीं, इस जिले में पानी की कुल आवश्यकता लगभग 480 मिलियन लीटर है, जबकि उपलब्धता लगभग 410 मिलियन लीटर ही है।

इसी गाँव में अगस्त में प्रधानमंत्री ने ASIP Technologies की सेमीकंडक्टर विनिर्माण सुविधा की आधारशिला भी रखी। इसके लिए 30 एकड़ भूमि आवंटित की गई है। इस प्रकार, इस क्षेत्र में डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर विनिर्माण जैसी अत्याधुनिक तकनीकी परियोजनाओं का एक साथ विस्तार हो रहा है।

इन परियोजनाओं के साथ डेटा सेंटर इकोसिस्टम के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे विशेषकर बिजली और पानी को लेकर भी चिंताएँ सामने आ रही हैं। स्थानीय जनता और विभिन्न समूह इन मुद्दों को लेकर विरोध और आंदोलन कर रहे हैं।

यह चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में डेटा सेंटरों के तेजी से विस्तार और उनसे जुड़े पर्यावरणीय तथा संसाधन संबंधी प्रश्नों को लेकर विरोध देखने को मिल रहा है। अमेरिका में 18 जुलाई को 42 राज्यों में 142 विरोध-प्रदर्शन हुए। ब्रिटेन, कनाडा, आयरलैंड, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड में भी डेटा सेंटरों के विस्तार को लेकर विरोध और चिंताएँ सामने आई हैं।

इस प्रकार, AI के विकास के लिए आवश्यक डेटा सेंटरों का विस्तार एक ओर तकनीकी प्रगति की गति को आगे बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर यह बिजली, पानी, भूमि और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर नए प्रश्न भी खड़े कर रहा है। इन्हीं प्रश्नों को समझने के लिए डेटा सेंटरों के वास्तविक पर्यावरणीय प्रभावों पर विचार करना आवश्यक है। 

AI के पर्यावरणीय प्रभाव

AI का उपयोग मुख्यतः चार प्रकार के पर्यावरणीय प्रभाव उत्पन्न कर रहा है — कार्बन फुटप्रिंट, वाटर फुटप्रिंट, लैंड(land) फुटप्रिंट और ई-कचरा। डेटा सेंटरों को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का चिंताजनक मात्रा में उत्सर्जन होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर, जो AI को चलाने वाला वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर हैं, वर्ष 2030 तक हर साल 945 टेरावाट-घंटे बिजली की खपत कर सकते हैं। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल वार्षिक बिजली खपत का लगभग तीन गुना है; इन देशों में कुल मिलाकर 65 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं।

लेकिन डेटा सेंटरों का प्रभाव केवल कार्बन उत्सर्जन तक सीमित नहीं है। डेटा सेंटरों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बिजली के साथ कूलिंग और ऊर्जा उत्पादन के लिए वाटर फुटप्रिंट तथा बिजली उत्पादन और सप्लाई चेन से जुड़े लैंड फुटप्रिंट भी जुड़े होते हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) की एक नई अध्ययन के अनुसार, इस दशक के अंत तक AI से जुड़ी पानी की खपत 1.3 अरब लोगों की बुनियादी सालाना घरेलू जरूरतों के बराबर हो सकती है, जबकि इसका लैंड फुटप्रिंट 14,500 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो सकता है जो जकार्ता महानगरीय क्षेत्र के आकार का लगभग दोगुना है।

इन प्रभावों को कम करने के समाधान के रूप में अक्सर renewable energy के स्रोतों की ओर जाने की बात की जाती है। लेकिन जो समाधान एक दृष्टिकोण से “ग्रीन” यानी पर्यावरण के अनुकूल दिखाई देता है, वह दूसरे स्तर पर दबाव बढ़ा सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ संसाधन पहले से ही सीमित हैं। उदाहरण के लिए, कुछ renewable energy sources को अपनाने से कार्बन उत्सर्जन कम हो सकता है, लेकिन इसके साथ पानी की खपत और भूमि के उपयोग में काफी वृद्धि भी हो सकती है। यानी एक पर्यावरणीय समस्या को कम करने का प्रयास दूसरे संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकता है।

AI का पर्यावरणीय प्रभाव केवल उसके infrastructure के निर्माण और संचालन तक सीमित नहीं है। AI के लगातार बढ़ते उपयोग के साथ उसकी ऊर्जा की माँग भी बढ़ रही है। AI को train करने में बड़ी मात्रा में ऊर्जा लगती है, लेकिन बड़े पैमाने पर दैनिक उपयोग के दौरान prompts को process करने में भी लगातार ऊर्जा खर्च होती है। अध्ययनों के अनुसार, रोजाना के उपयोग से कुल ऊर्जा माँग का लगभग 80–90 प्रतिशत हिस्सा खर्च हो सकता है। अनुमान है कि बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली एक AI service हर दिन लगभग 2.5 अरब prompts process करती है, जिससे हर वर्ष सैकड़ों गीगावाट-घंटे बिजली की खपत होती है। अलग-अलग कार्यों में ऊर्जा की खपत भी अलग होती है; उदाहरण के लिए, video बनाने में image बनाने की तुलना में अधिक ऊर्जा खर्च होती है।

इसलिए केवल AI की efficiency बढ़ाते जाना भी बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। यहाँ ‘rebound effect’ की समस्या सामने आती है। बेहतर efficiency और कम लागत से AI का उपयोग और अधिक बढ़ सकता है और अंततः कुल संसाधनों की खपत भी बढ़ सकती है।

इसके अलावा, AI infrastructure का पर्यावरणीय प्रभाव हर जगह समान नहीं होता। जहाँ डेटा सेंटर और उससे जुड़ा infrastructure स्थापित होता है, वहाँ जल, भूमि और अन्य स्थानीय संसाधनों पर दबाव पड़ता है, जबकि उससे मिलने वाला लाभ कहीं अधिक व्यापक और वैश्विक हो सकता है। इस असमानता के साथ ई-कचरे की समस्या भी एक बड़ी चुनौती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक AI infrastructure से हर साल 25 लाख टन तक ई-कचरा पैदा हो सकता है। इस बोझ का बड़ा हिस्सा कम आय वाले देशों पर पड़ने की संभावना है, जिनके पास इसे सुरक्षित रूप से निपटाने की क्षमता सीमित है।

AI के लाभ और उसकी पर्यावरणीय लागत के इस असमान वितरण का एक दूसरा पहलू AI infrastructure की वैश्विक असमानता है। रिपोर्ट के अनुसार, AI-specialized computing capacity का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल दो देशों अमेरिका और चीन में केंद्रित है। वहीं, 150 से अधिक देशों में कोई महत्वपूर्ण घरेलू AI infrastructure नहीं है। इसका अर्थ यह है कि कुछ देश AI आधारित विकास का अधिक लाभ उठा रहे हैं, जबकि दूसरे देश इसके प्रत्यक्ष लाभ से दूर रहते हुए भी इसकी पर्यावरणीय लागत का कुछ हिस्सा उठाना पड़ रहा है।

समाधान की दिशा

AI और डेटा सेंटरों के विस्तार को लेकर उठ रही पर्यावरणीय चिंताएँ निश्चित रूप से गंभीर हैं। कार्बन उत्सर्जन, पानी, भूमि, ऊर्जा और ई-कचरे पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन प्रभावों को कम करने के लिए तकनीकी सुधार, बेहतर नियोजन और अधिक टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता होगी। लेकिन केवल इन उपायों से समस्या का अंतिम समाधान हो जाएगा, ऐसा मानना भी कठिन है।

तो इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए दो प्रमुख दिशाएँ नजर आती हैं — एक बाह्य, जो विज्ञान और तकनीक के माध्यम से प्रकृति पर कार्य करती है, और दूसरी आंतरिक, जो मनुष्य की चेतना को बदलने के माध्यम से जीवन को बदलने का प्रयास करती है। पहली दिशा आधुनिक पश्चिमी विज्ञान में विशेष रूप से विकसित हुई है, जबकि दूसरी की गहरी परंपरा एशिया, विशेषकर भारत में रही है।

विज्ञान और तकनीक का विकास, AI,  विशेषकर क्वांटम विज्ञान आने वाले समय में अनेक नई संभावनाएँ खोल सकता है। प्रकृति के जिन रहस्यों को आज हम पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं, उनके खुलने के साथ ऐसी तकनीकें विकसित हो सकती हैं जो वर्तमान में दिखाई देने वाली अनेक समस्याओं के समाधान में सहायक हों। उदाहरण के लिए, परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सकने वाले या प्रदूषण को कम करने में सक्षम पौधों और जीवों का निर्माण, ऐसे जैविक तंत्रों का विकास जो कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकें, अथवा ऐसे उपाय जिनसे ई-कचरे का पुनः उपयोग संभव हो सके। इन दिशाओं में विज्ञान आगे बढ़ सकता है।

इसी प्रकार सूक्ष्म स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा को सुरक्षित और सरल ढंग से उपयोग में लाकर ऊर्जा की बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने वाली नई प्रणालियाँ विकसित हो सकती हैं। genetic therapy के माध्यम से मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने की संभावनाएँ भी सामने आ रही हैं। AI और विज्ञान मिलकर ऐसे उपायों की खोज में भी सहायता कर सकते हैं जिनसे पर्यावरण में मौजूद विभिन्न प्रकार की अशुद्धियों को कम या समाप्त किया जा सके।

लेकिन इसके साथ एक दूसरी दिशा भी आवश्यक है। यदि विज्ञान और तकनीक को हम एक शक्तिशाली घोड़े के रूप में देखें, तो उसे दिशा देने वाले सारथी की भी आवश्यकता होगी। एशियाई, विशेषकर भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि इस भूमिका को निभा सकती है। योग और आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य केवल मनुष्य के भीतर संयम, निग्रह और समर्पण का विकास करते हुए सत्य से जुड़कर आत्मलाभ करना नहीं बल्कि बाहरी परिस्थितियों को बदलना है।

आज पहली दिशा की गति हमें अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। विज्ञान के परिणाम दिखाई देते हैं, उन्हें मापा जा सकता है और उनकी गति को तकनीकी उपलब्धियों के रूप में देखा जा सकता है। इसके विपरीत, आंतरिक विकास की प्रक्रिया धीमी और सूक्ष्म होती है; इसलिए उसकी गति और उसके परिणाम उतने स्पष्ट दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि तकनीकी विकास के सामने आध्यात्मिक विकास की गति कम दिखाई देती है।

लेकिन यदि विज्ञान को बिना दिशा के आगे बढ़ने दिया जाए और मनुष्य की चेतना उसी अनुपात में विकसित न हो, तो बढ़ती हुई वैज्ञानिक शक्ति स्वयं नई समस्याओं को जन्म दे सकती है। इसलिए आवश्यकता विज्ञान को रोकने की नहीं, बल्कि उसकी शक्ति को सही दिशा देने की है। विज्ञान का घोड़ा जितनी तेजी से आगे बढ़ेगा, उसे दिशा देने वाले सारथी की आवश्यकता भी उतनी ही अधिक होगी।

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