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- (30.)Weekly News Update 10 – 16 may 2026( iran war, Pathfinder mission, sir, Taiwan issue)
- (31).Weekly News Update 17-23 may 2026 vaishvik sankat, Cuba crisis
- (32).Weekly News Update 24-30 may (Russia ukrain war update, Manipur dispute)
- (33).Weekly News Update 1june-6 june (iran war update, niger oil spoil, Quad, Mayanmar venezuela india visit)
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- (36.)Weekly News Update 21-28 june (iran -russia-ukrain war, biochar)
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- (38.)Weekly News Update 13 -19 JULY (iran war update)
- (39.)Weekly News Update 20 – 26 JULY (CJP protest- WAICO china- AI security-Hugging Face)
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- (41.)Weekly News Update 2 August- 9 August Makka agreement, FCRA, AI race
- (42.)Weekly News Update 10- 30 (August, mindnubming drugs education, Gorkhaland dispute, Ai news, east asia Diplomacy )
- (43.)Weekly News Update 31 Aug (America china ai & economical budget Sanghai Shikhar summit 2026)
- (44.)Weekly News Update 07 September-13September (Iran war-Falklands issue-Brics summit-Boss Scame)
Weekly News Update (32)
(24 May – 30 May 2026)
(May) ISW, Al Jazeera, EN
रूस-यूक्रेन युद्ध अपडेट
यूक्रेन की अपने लक्ष्य और देश के प्रति दृढ़ता ने उसे आर्थिक, सैन्य और मनोवैज्ञानिक स्तर पर लगातार मज़बूती प्रदान की है। वहीं रूस को इन सभी स्तरों पर बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
रूस से यूक्रेन ने लगभग 400 वर्ग किमी क्षेत्र वापस लेने का दावा किया है। वहीं रूस ने 1 जनवरी से 26 मई 2026 के बीच लगभग 104 वर्ग किमी क्षेत्र पर बढ़त बनाई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में उसने लगभग 1619 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्ज़ा किया था।
यूक्रेन और पश्चिमी आकलनों के अनुसार, इस वर्ष रूस को लगभग 1,45,000 सैनिक क्षति हुई है, जिनमें 86,000 सैनिक मारे गए तथा 59,000 गंभीर रूप से घायल हुए। अर्थात 1 वर्ग किमी पर बढ़त हासिल करने के लिए 179 सैनिकों का नुकसान उठाना पड़ा, जबकि पिछले साल यह आँकड़ा 67 था।
आर्थिक मोर्चे पर भी रूस पर दबाव बढ़ता जा रहा है। अप्रैल 2026 में बजट घाटे की सीमा पार कर जाने और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आने के बाद रूस अपने स्वर्ण भंडार का भी तीव्र गति से उपयोग कर रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार रूस ने इस वर्ष अपने स्वर्ण भंडार में से लगभग 27.9 टन सोना बेचा है, जिससे उसका भंडार युद्ध आरम्भ होने के बाद के सबसे निम्न स्तरों में पहुँच गया है।
यूक्रेन की बढ़ती क्षमता के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं — पश्चिमी देशों की सैन्य सहायता, सैटेलाइट सेवाओं तक पहुँच, तकनीकी प्रगति तथा अपेक्षाकृत लचीली युद्ध रणनीति। हाल के महीनों में यूक्रेन ने लगभग 2000 किमी तक मार करने वाले ड्रोन विकसित किए हैं। इससे युद्ध केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रूस के आंतरिक सैन्य आपूर्ति ठिकानों, तेल संयंत्रों और परिवहन मार्गों तक पहुँच गया है।
यूक्रेन ने काला सागर क्षेत्र में स्थित दो तेल संयंत्रों पर हमले किये, जो रूस की अर्थव्यवस्था और सैन्य आपूर्ति को प्रभावित करने की रणनीति के हिस्से के रूप में था। इसके अतिरिक्त मॉस्को के निकट ड्रोन हमलों ने रूस की जनता के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चिंता उत्पन्न की है। पिछले वर्ष रूस द्वारा यूक्रेन के ऊर्जा संयंत्रों पर किए गए हमलों के कारण यूक्रेन के बड़े क्षेत्रों में लंबे समय तक बिजली संकट उत्पन्न हुआ था।
28 मई को स्वीडन ने घोषणा की कि वह यूक्रेन को 16 ‘ग्रिपेन’ लड़ाकू विमान देगा। इसके अतिरिक्त यूक्रेन यूरोपीय संघ की सहायता योजना के माध्यम से 20 अतिरिक्त विमान खरीदने की प्रक्रिया में है। यह सौदा लगभग 2.9 अरब डॉलर का होगा।
हालाँकि यूक्रेन अब भी कुछ महत्वपूर्ण कमज़ोरियों से जूझ रहा है। विशेष रूप से सुपरसोनिक मिसाइलों को रोकने की उसकी क्षमता सीमित मानी जाती है। दूसरी ओर रूस ने बड़े पैमाने पर एक साथ ड्रोन और मिसाइल हमले करने की रणनीति को अधिक आक्रामक रूप से अपनाना शुरू किया है। साथ ही यूक्रेनी प्रशासनिक और सरकारी इमारतों पर हमले भी बढ़े हैं।
लगातार वर्षों से चल रहे इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रूस के लिए अपने मूल महत्वाकांक्षी उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त करना असंभव सा हो गया है। वहीं प्रतिष्ठा, राजनीतिक दबाव और सामरिक स्थिति के कारण उसके लिए पीछे हटना भी आसान नहीं रह गया है। यह युद्ध अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि आर्थिक सहनशक्ति, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की लंबी परीक्षा बन चुका है।
(May)
भारत की समस्याएँ : मूल कारणों की खोज
भारत एक जीवित राष्ट्र है, जो महान कार्य के लिए दिव्य विधान द्वारा चयनित है। इसका जीवन सदा ही मानव जाति के लिए रहा है। इसी कारण भारत में पृथ्वी की लगभग सभी प्रमुख चुनौतियाँ – जातीय, जनजातीय, भाषाई, सांस्कृतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सीमाई तथा राजनीतिक आदि विभिन्न रूपों में एक साथ उपस्थित दिखाई देती हैं।
देश के विभिन्न भाग अलग-अलग प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में जातीय, जनजातीय, प्रवासन, शरणार्थी तथा सीमा संबंधी प्रश्न प्रमुख हैं। मध्य और पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में नक्सलवाद, आदिवासी विस्थापन तथा खनन संबंधी संघर्ष दिखाई देते हैं। पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई राज्य जल संकट तथा पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र भूस्खलन, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याओं से प्रभावित हैं। इसके अतिरिक्त सीमा सुरक्षा, कृषि संकट, बेरोज़गारी, पलायन, शहरी असमानता, भाषाई पहचान तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी समस्याएँ भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में उपस्थित हैं।
इनमें से अनेक समस्याएँ नई नहीं हैं। इनमें से बहुत-सी समस्याएँ पहले से मौजूद रही हैं। समय के साथ उनके स्वरूप, कारणों और अभिव्यक्तियों में परिवर्तन अवश्य हुआ है, किन्तु उनका मूल प्रश्न आज भी अनेक रूपों में विद्यमान है।
सामान्यतः इन समस्याओं का अध्ययन उनके तात्कालिक कारणों, राजनीतिक घटनाओं या प्रशासनिक पक्षों के आधार पर किया जाता है। परंतु किसी भी समस्या को वास्तव में समझने के लिए उसके ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक आधारों की भी पड़ताल आवश्यक है। यह भी विचारणीय प्रश्न है कि क्या अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वास्तविकता से क्रमशः दूर होते जाना तथा दूसरों का अनुकरण करने के प्रयास में अपनी वास्तविक सोच-विचार, समझने और कार्य करने के तरीकों को खो देना या निकृष्ट समझना इन समस्याओं के निर्माण या विस्तार का एक महत्वपूर्ण कारण रहा है।
यहाँ हम भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विद्यमान समस्याओं की पृष्ठभूमि, उनके विकासक्रम तथा उनके मूल कारणों को समझने का प्रयास करेंगे। इस प्रयास का प्रारंभ पूर्वोत्तर भारत की जातीय एवं जनजातीय समस्याओं से शुरू करते हैं।
पूर्वोत्तर भारत : भूगोल, जातीय – जनजातियाँ और पहचान का प्रश्न
सेवन सिस्टर्स कहे जाने वाले पूर्वोत्तर भारत के सात राज्य – असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा सुंदर पहाड़ियों, घाटियों, नदियों, झीलों और विविध स्थलाकृतियों से घिरे हुए हैं। बोडो (असम), न्यीशी (अरुणाचल प्रदेश), खासी (मेघालय), नागा (नागालैंड), मैतेई एवं कुकी (मणिपुर), लुशाई (मिजोरम) तथा त्रिपुरी (त्रिपुरा) जैसी प्रमुख जनजातियाँ यहाँ निवास करती हैं।
प्राचीन काल से ये समुदाय अपनी-अपनी भौगोलिक सीमाओं में रहते हुए भी एक-दूसरे के संपर्क में थे। उनके बीच व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामाजिक संबंध बने रहते थे। वे एक-दूसरे की परंपराओं, आस्थाओं और जीवन-पद्धतियों का सम्मान करते थे। संघर्ष भी होते थे, किन्तु वे प्रायः सीमित स्वरूप के होते थे और सामाजिक परंपराओं द्वारा नियंत्रित किए जाते थे।
भारतीय समाज की एक विशेषता यह रही है कि समय-समय पर उत्पन्न होने वाली सामाजिक और सांस्कृतिक विकृतियों के निराकरण हेतु संतों, भक्तों और योगपरायण शासकों का प्रादुर्भाव होता रहा है। उन्होंने जनमानस को उसकी मूल सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हुए समाज को संतुलित दिशा प्रदान करने का प्रयास किया।
किन्तु समय के साथ इस क्षेत्र का संपर्क बाहरी शक्तियों, विचारधाराओं और नई प्रशासनिक व्यवस्थाओं से बढ़ने लगा। औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, मिशनरी गतिविधियों तथा धर्म परिवर्तन ने यहाँ के समाज में अनेक परिवर्तन उत्पन्न किए। वर्तमान में नागालैंड (87.93%), मिजोरम (87.16%) और मेघालय (74.59%) में ईसाई बहुसंख्यक हैं। मणिपुर में ईसाई (41.29%) और हिन्दू (41.39%) लगभग समान संख्या में हैं। अरुणाचल प्रदेश में ईसाई (30.26%) और हिन्दू (29.04%) का अनुपात भी निकट है। त्रिपुरा में हिन्दू (83.40%) तथा असम में हिन्दू (61.47%) बहुसंख्यक हैं। असम (34.22%), त्रिपुरा (8.60%) और मणिपुर (8.40%) में मुस्लिम जनसंख्या अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की तुलना में अधिक है। बौद्ध धर्म को मानने वालों की सर्वाधिक संख्या अरुणाचल प्रदेश (11.77%) में है।
पूर्वोत्तर के अनेक समुदाय पहले सामुदायिक जीवन-पद्धति के अनुसार रहते थे। भूमि, वन, चरागाह और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग प्रायः सामूहिक परंपराओं के आधार पर होता था। सीमाएँ अपेक्षाकृत लचीली थीं और आज की तरह स्पष्ट प्रशासनिक रेखाओं में बँधी हुई नहीं थीं।
इसके बाद आधुनिक राज्य व्यवस्था का विस्तार हुआ। नक्शे बने, सीमाएँ निर्धारित हुईं, जिले बनाए गए और भूमि स्वामित्व को कानूनी रूप दिया गया। इसके साथ ही विभिन्न जनजातियों और समुदायों में अपनी भूमि, अपने पूर्वजों, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान के प्रति नया आग्रह विकसित होने लगा।
आधुनिकता के प्रभाव के साथ अनेक समुदायों के सोचने और अपने को देखने के तरीके में भी परिवर्तन आया। अब वे स्वयं को केवल एक स्थानीय समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि एक अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के रूप में देखने लगे, इस प्रकार उनकी केन्द्रिता स्वयं पर होने लगी। परिणामस्वरूप असुरक्षा, पहचान खोने का भय, सांस्कृतिक संकट, बाहरी लोगों के आगमन की चिंता तथा “हम कौन हैं?” और “यह भूमि किसकी है?” जैसे प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण होते गए। आगे चलकर यही प्रश्न पूर्वोत्तर भारत के अनेक संघर्षों की पृष्ठभूमि बने।
मणिपुर : पहचान, भूमि और संघर्ष
मणिपुर वर्तमान समय में पूर्वोत्तर भारत के उन राज्यों में से है जो जातीय संघर्षों से सबसे अधिक प्रभावित हैं। यहाँ मुख्य रूप से मैतेई, कुकी और नागा समुदाय निवास करते हैं। मैतेई समुदाय राज्य की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है और मुख्यतः इम्फाल घाटी में रहता है। दूसरी ओर कुकी(25%) और नागा(10%) समुदाय मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं, जो मणिपुर के लगभग 90 प्रतिशत भू-भाग में फैले हुए हैं।
यद्यपि आज ये समुदाय अलग-अलग पहचान रखते हैं, फिर भी इनके बीच किसी साझा मूल की स्मृति अनेक लोककथाओं और किंवदन्तियों में दिखाई देती है। ऐसी ही एक कथा खोंगजाई (कुकी) समुदाय में प्रचलित है:
“पुराने ज़माने में हमारे पुरखे हमें बताया करते थे कि इंसान पहले धरती के गर्भ में (अर्थात गुफाओं में) रहा करते थे। खोंगजाई और मैतेई आपस में भाई थे। एक दिन कपड़ों को लेकर दोनों भाइयों में झगड़ा हो गया। उनकी माँ ने एक चाकू निकाला और कपड़े को दो हिस्सों में काट दिया, लेकिन छोटे भाई मैतेई की अधिक सहायता की। इसी कारण मैतेई लोग खोंगजाई लोगों (जिन्हें बाद में कुकी कहा गया) की तुलना में अधिक कपड़े पहनने लगे।”
इसी प्रकार माओ नागाओं की एक किंवदन्ती भी इन समुदायों के बीच किसी प्राचीन संबंध की ओर संकेत करती है:
“एक समय एक ही पूर्वज के तीन पुत्रों के बीच नदी पार करने की प्रतियोगिता हुई। सबसे बड़ा पुत्र नदी पार कर पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी तक पहुँच गया। दूसरा पुत्र नदी पार तो कर गया, लेकिन उसका पैर फिसल गया और वह पहाड़ी की ढलान पर जा गिरा। सबसे छोटा पुत्र नदी में ही गिर गया। सबसे बड़ा पुत्र नागा बना, दूसरा कुकी बना और तीसरा मैतेई बना। यही कारण है कि नागा लोग पहाड़ियों की ऊँची चोटियों पर, कुकी लोग पहाड़ियों के मध्य भाग में और मैतेई लोग घाटियों में बसे हुए दिखाई देते हैं।”
ऐसी अनेक लोककथाएँ और परम्पराएँ मिलती हैं जो यह संकेत देती हैं कि आज अलग-अलग पहचान रखने वाले ये समुदाय किसी समय सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे के अधिक निकट रहे होंगे।
समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती गईं। औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, मिशनरी गतिविधियाँ, धर्म परिवर्तन और नई प्रशासनिक व्यवस्थाओं ने पूर्वोत्तर भारत के समाजों में व्यापक परिवर्तन उत्पन्न किए। धर्म परिवर्तन, आधुनिक शिक्षा, औपनिवेशिक प्रशासन और नई राजनीतिक संस्थाओं ने पारंपरिक जनजातीय समाजों की पहचान को नए रूप में ढाला। इससे जहाँ वे अपनी मौलिक सोच-समझ और अपनी सांस्कृतिक शक्ति व चेतना को खोकर आत्मकेंद्रित सोच और अनुकरणीय चेतना विकसित हुई, परिणामस्वरूप अपनी अलग पहचान, भूमि और राजनीतिक अधिकारों के प्रति आग्रह भी बढ़ा।
इसके साथ ही आधुनिक राज्य व्यवस्था ने नक्शे बनाए, सीमाएँ निर्धारित कीं, जिले बनाए और भूमि स्वामित्व को कानूनी रूप दिया। जिन क्षेत्रों में पहले सीमाएँ अपेक्षाकृत लचीली थीं, वहाँ अब भूमि, प्रशासन और राजनीतिक अधिकारों का महत्व बढ़ने लगा। धीरे-धीरे “हम कौन हैं?” और “यह भूमि किसकी है?” जैसे प्रश्न प्रमुख होते गए।
मणिपुर के वर्तमान संघर्ष को समझने के लिए मैतेई समुदाय की ST (अनुसूचित जनजाति) की माँग को समझना आवश्यक है। 1948 में मणिपुर के भारत में विलय से पहले मैतेई समुदाय को आदिवासी मूल का माना जाता था। किन्तु हिन्दू धर्म को बहुत पहले स्वीकार कर लेने के कारण उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं किया गया। बाद में मंडल आयोग आने के बाद उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का दर्जा मिला। 2012 में मैतेई समुदाय ने ST दर्जे की माँग को लेकर न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और तब से यह प्रश्न लगातार राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
मैतेई समुदाय का तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में उनके साथ भूमि के प्रश्न पर असमान व्यवहार होता है। मणिपुर में कोई भी गैर-जनजातीय व्यक्ति पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि नहीं खरीद सकता, जबकि कुकी और नागा समुदाय के लोग इम्फाल घाटी सहित राज्य के अन्य भागों में भूमि खरीद सकते हैं। मैतेई समुदाय का एक वर्ग यह भी मानता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्रशासनिक संरक्षण के कारण जनसंख्या संरचना में परिवर्तन हो रहा है, जबकि उन्हें उन क्षेत्रों में बसने या भूमि खरीदने का अधिकार नहीं है। इसलिए वे ST दर्जे को भूमि और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न मानते हैं।
दूसरी ओर कुकी और नागा समुदायों की चिंताएँ भी कम नहीं हैं। मणिपुर की राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, व्यापार और राज्य की राजधानी इम्फाल पर मैतेई समुदाय का प्रभाव पहले से ही अधिक माना जाता है। 60 सदस्यीय विधानसभा में भी लगभग 40 सीटें घाटी क्षेत्र में हैं, जहाँ मैतेई समुदाय का प्रभाव प्रमुख है। ऐसे में कुकी और नागा समुदायों को आशंका है कि यदि मैतेई समुदाय को ST का दर्जा मिल गया, तो वह पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि खरीद सकेगा और पहले से मौजूद आर्थिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक बढ़त के कारण उनकी भूमि, संसाधनों और अवसरों पर दबाव बढ़ सकता है। इस प्रकार ST का प्रश्न केवल आरक्षण का विषय न रहकर अस्तित्व, पहचान और भविष्य की चिंता से जुड़ गया।
मणिपुर की स्थिति को जटिल बनाने में कुछ सरकारी निर्णयों की भी भूमिका रही है। वर्ष 2001 में भारत सरकार ने NSCN-IM (नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालिम–इसाक-मुइवाह) के साथ युद्धविराम समझौते का विस्तार नागालैंड से बाहर नागा-बहुल क्षेत्रों तक करने का प्रयास किया। मणिपुर में इसका व्यापक विरोध हुआ। मैतेई समुदाय ने इसे “वृहत्तर नागालिम” की माँग की दिशा में एक कदम माना। उन्हें भय था कि इससे मणिपुर के कुछ क्षेत्र भविष्य में नागालिम की अवधारणा के अंतर्गत शामिल किए जा सकते हैं। यहाँ भूमि, प्रशासनिक सीमाओं और राजनीतिक पहचान का प्रश्न फिर से सामने आ गया।
इसी प्रकार छठी अनुसूची का प्रश्न भी मणिपुर में एक महत्वपूर्ण विवाद का विषय रहा है। पहाड़ी जनजातियाँ इसे अधिक स्वायत्तता और अपने क्षेत्रों पर अधिक नियंत्रण का माध्यम मानती हैं। दूसरी ओर मैतेई समुदाय को आशंका है कि इससे राज्य का अधिकांश भू-भाग स्वायत्त परिषदों के अधीन चला जाएगा। स्थिति और जटिल तब हो जाती है जब नागा और कुकी समुदायों के बीच भी परिषदों की संख्या, सीमाओं और अधिकार क्षेत्रों को लेकर मतभेद सामने आते हैं। इस प्रकार स्थानीय स्वशासन का प्रश्न भी भूमि, पहचान और राजनीतिक प्रभाव के संघर्ष से जुड़ जाता है।
म्यांमार से लगी सीमा भी इस पूरे विवाद को प्रभावित करती है। सीमा के दोनों ओर रहने वाले अनेक समुदायों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं। म्यांमार की अस्थिर परिस्थितियों और वहाँ से होने वाले विस्थापन ने भी मणिपुर में जनसंख्या, सुरक्षा और पहचान से जुड़ी चिंताओं को बढ़ाया है।
इस प्रकार मणिपुर का वर्तमान संघर्ष केवल मैतेई और कुकी समुदायों के बीच का संघर्ष नहीं है। इसके पीछे भूमि, पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक सीमाएँ, स्वायत्तता की माँग, जनसांख्यिकीय परिवर्तन की आशंकाएँ और आधुनिक राज्य व्यवस्था से उत्पन्न नई आकांक्षाएँ एक साथ कार्य करती दिखाई देती हैं। यही कारण है कि मणिपुर की समस्या को समझने के लिए केवल वर्तमान हिंसा को नहीं, बल्कि उसके पीछे के ऐतिहासिक और सामाजिक व मनोवैज्ञानिक कारणों को भी समझना आवश्यक है।
(S: ORF, www.thehillsjournal.com, ET, www.imphaltimes.com, BBC
Further R: Manna, S. (2020). The emergence of Gaudiya Vaishnavism in Manipur and its impact on Nat Sankirtana. International Journal of Research – GRANTHAALAYAH, 8(7), 130–136. https://doi.org/10.29121/granthaalayah.v8.i7.2020.620)
असम : प्रवासन, पहचान और अस्मिता का संघर्ष
