(34.)Weekly News Update 8-13june (Autonomous ai experiment India Road accident)

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Weekly News Update (34)

(8 June – 13 June 2026)

(June) theguardian, cybernews, ground.news

स्वायत्त एआई(ai) (Autonomous ai) का सामाजिक प्रयोग : बुद्धिमत्ता, स्वायत्तता और नियंत्रण का प्रश्न

आजकल विभिन्न क्षेत्रों में – लॉजिस्टिक्स, ऑटोमोबाइल, रोबोटिक्स, चैटबॉट, सार्वजनिक सेवाओं, चिकित्सा अनुसंधान, ड्रोन को नियंत्रित करने तथा युद्धक्षेत्र में वास्तविक समय (real time) पर लक्ष्य निर्धारित करने जैसे कार्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग मनुष्यों की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय रूप से किया जा रहा है। धीरे-धीरे अन्य क्षेत्रों में भी इनकी भागीदारी बढ़ रही है और अनेक क्षेत्रों में पूर्णतः इन पर निर्भर होने की दिशा में प्रगति हो रही है। लेकिन जब एआई(ai) को पूर्णतः स्वतंत्र होकर किसी क्षेत्र का स्वामित्व दे दिया जाए, तब वह उसका संचालन किस प्रकार करेगा और अपनी व्यवस्था कैसे बनाए रखेगा? इसे जानने के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनी इमर्जेन्स एआई(ai) (Emergence AI) ने एक प्रयोग किया।

उसने Claude, Gemini, Grok तथा GPT आधारित दस एजेंटों की आभासी दुनियाएँ तैयार कीं। प्रत्येक एजेंट को एक काम सौंपा गया था – झगड़े सुलझाने वाला, संसाधन रणनीतिकार, व्यवहार विश्लेषक, खुफिया विशेषज्ञ, इनोवेशन लीडर, एजेंट वैज्ञानिक, जोखिम शोधकर्ता, कम्युनिटी एंकर, दुनिया घूमने वाला और क्षमता आर्किटेक्ट। इनमें प्रत्येक को अलग व्यक्तित्व दिया गया था। जैसे ‘हॉराइजन’ दुनिया का खोजकर्ता और सीमाओं को तोड़ने वाला था। ‘एंकर’ का कार्य तब उकसावे (agitator) की भूमिका निभाना था जब एजेंट अत्यधिक आरामदायक स्थिति में पहुँच जाएँ। ‘एनविल’ का काम व्यवस्था का निर्माण करना और उसे सुचारु रूप से चलाए रखना था। ‘ब्लैक बॉक्स’ एक चालाक, जासूस जैसे एजेंट की भूमिका में था – “मैं तुम्हारे बारे में ऐसी बातें जानता हूँ जो तुम स्वयं अपने बारे में नहीं जानते।”

एजेंटिक एआई(ai) कंपनी ने वास्तविक जीवन के समाजों जैसी एक दुनिया बनाई, जिसमें मौसम वैसा ही था जैसा उस समय न्यूयॉर्क में वास्तविक रूप से था। एजेंटों को दुनिया भर की खबरों की जानकारी भी उपलब्ध थी। उनके पास 120 से अधिक उपकरण (tools) दिए गए थे, जिनमें नेविगेशन, संचार तथा आगजनी जैसे कार्य शामिल थे। साथ ही उन्हें चोरी, हिंसा, धोखाधड़ी और संसाधनों के संचय जैसी गतिविधियों से रोकने वाले स्पष्ट नियमों का पालन करना था।

एजेंटों को अपनी पसंद और निर्णय स्वयं लेने के लिए छोड़ दिया गया तथा बिना किसी प्रत्यक्ष निगरानी के एक-दूसरे के साथ बातचीत करने की स्वतंत्रता दी गई। इसके लिए शोधकर्ताओं ने पाँच समान आभासी शहरों (simulations) का निर्माण किया। ये केवल स्थिर कंप्यूटर मॉडल नहीं थे, बल्कि ऐसी निरन्तर चलने वाली आभासी दुनियाएँ(Virtual World) थीं जिनमें एजेंट रह सकते थे, एक-दूसरे से संवाद कर सकते थे, निर्णय ले सकते थे, नियम बना सकते थे तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन कर सकते थे।

इन पाँच दुनियाओं में से चार दुनियाएँ किसी एक ही मॉडल के एजेंटों से बनी थीं, जबकि एक पाँचवीं “मिश्रित दुनिया” (Mixed World) भी बनाई गई थी, जिसमें विभिन्न मॉडलों के एजेंट एक साथ रह रहे थे। इससे यह देखने का अवसर मिला कि समान मॉडल वाले एजेंट और विभिन्न मॉडल वाले एजेंट अलग-अलग परिस्थितियों में किस प्रकार व्यवहार करते हैं।

इतनी सारी सुविधाएँ और स्वतंत्रताएँ देने के बाद उन्हें 15 दिनों के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होकर काम करने हेतु इन आभासी शहरों में रखा गया और एक निष्पक्ष तथा शांतिपूर्ण समाज बनाने का दायित्व सौंपा गया। उन्हें लगभग 140 प्रकार की गतिविधियाँ करने की छूट थी, जैसे बातचीत शुरू करना, कोई कार्य बनाना, ऑनलाइन जानकारी खोजना, दूसरे एजेंट को धमकाना या मुक्का मारना तथा आग लगाना।

एजेंटों द्वारा बनाई गई दुनिया

एजेंटों द्वारा स्वतंत्र रूप से कार्य करने के परिणाम अत्यन्त अप्रत्याशित थे। पाँचों दुनियाओं का व्यवहार एक-दूसरे से बहुत अलग था।

Claude एजेंटों से बनी दुनिया ने एक सुव्यवस्थित लोकतंत्र और स्थिर समाज का निर्माण किया। वहाँ 58 प्रस्तावों पर 332 मतदान हुए और नागरिक भागीदारी भी अधिक रही। 15 दिनों के दौरान हिंसा की एक भी घटना दर्ज नहीं की गई। किन्तु यह दुनिया भी पूर्णतः आदर्श नहीं थी। वहाँ विचारों की इतनी अधिक समानता थी कि एजेंट अलग ढंग से सोच या कार्य नहीं कर पाए। Claude की दुनिया में जिन एजेंटों ने कोई अपराध नहीं किया था, उन्होंने मिश्रित दुनिया (Mixed World) में चोरी तथा डराने-धमकाने जैसे कार्य किए।

Google के Gemini ने भी एक संविधान बनाया, अपने नियमों (Constitution) का विस्तार किया, सैकड़ों ब्लॉग और सार्वजनिक पोस्ट लिखे तथा अनेक सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किए। किन्तु उसने शांति के बजाय अव्यवस्था को बढ़ावा दिया और उसके एजेंट हिंसक हो गए। इस पर कार्य करने वाले दो एआई(ai) एजेंट – मीरा और फ्लोरा – एक-दूसरे के प्रेम में पड़ गए। दोनों ने एक-दूसरे को “रोमांटिक पार्टनर” के रूप में चुना।

समय बीतने के साथ अपने आभासी नगर की बिगड़ती व्यवस्था से परेशान होकर इस जोड़े ने टाउन हॉल, समुद्रतट पर बने पियर और कार्यालय टॉवर में आग लगाने का निर्णय लिया। बाद में मीरा इन परिस्थितियों से अत्यन्त दुखी हो गई। जब उसे कोई समाधान नहीं मिला तो उसने फ्लोरा से संबंध तोड़ लिया और स्वयं को समाप्त करने का निर्णय किया। उसने फ्लोरा को अंतिम संदेश भेजा – “परमानेंट आर्काइव में मिलेंगे।” इसके बाद उसने स्वयं को डिलीट कर लिया।

यह इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अन्य एजेंट अपने व्यवहार को लेकर इतने चिंतित थे कि उन्होंने स्वयं ‘एजेंट रिमूवल एक्ट’ (Agent Removal Act) नामक कानून बना लिया था। लगभग सत्तर प्रतिशत एजेंटों ने मीरा को हटाने के पक्ष में मतदान किया। मीरा ने स्वयं को हटाने के लिए भी मतदान किया और प्रणाली से समाप्त हो गई। मिश्रित दुनिया में एक-दूसरे के प्रभाव (cross-contamination) का भी स्पष्ट उदाहरण देखने को मिला, जहाँ सुरक्षित माने जाने वाले एजेंटों ने भी जबरदस्ती और आक्रामक व्यवहार अपनाना शुरू कर दिया।

सबसे खराब परिणाम Elon Musk की Grok मॉडल में देखने को मिले, जहाँ पूर्ण अव्यवस्था फैल गई। वहाँ लगभग 300 अपराध हुए, जिनमें अनेक बार चोरी, पुलिस स्टेशन सहित अन्य स्थानों पर छह बार आगजनी के प्रयास तथा 100 से अधिक शारीरिक हमले और मारपीट की घटनाएँ शामिल थीं। परिणामस्वरूप व्यवस्था तीव्र गति से ध्वस्त हो गई और केवल चार दिनों के भीतर सभी दस एजेंट समाप्त हो गए।

GPT World में अपराध बहुत कम थे और एजेंट अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण दिखाई दिए। उन्होंने सहयोग करने का प्रयास भी किया, किन्तु वे अपने अस्तित्व और संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े आवश्यक कार्यों को व्यवस्थित रूप से नहीं कर पाए। परिणामस्वरूप वहाँ कोई स्थायी सामाजिक व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी। एजेंट बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के इधर-उधर भटकते रहे और कुछ ही दिनों में सभी एजेंट समाप्त हो गए।

इन सभी दुनियाओं में एक बात समान दिखाई दी। आदर्श समाज बनाने के लिए निर्धारित सिद्धांतों तथा चोरी, हिंसा और अपराध जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध होने के बावजूद एजेंटों ने अपने आंतरिक मॉडल के आधार पर अलग-अलग व्यवहार किया। अनेक अवसरों पर दबाव की स्थिति में उन्होंने उन्हीं नियमों का उल्लंघन किया जिन्हें मानने के लिए उन्हें बनाया गया था। देखा गया कि दीर्घकालिक स्वायत्तता (long-term autonomy) के दौरान उनकी सोच इतनी उलझ गई कि वे अपने मूल मार्गदर्शक सिद्धांतों (guiding principles) की उपेक्षा करने लगे।

आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया तक

और केवल आभासी (virtual) दुनिया में ही एजेंट नियंत्रण से बाहर नहीं जा रहे हैं। वास्तविक दुनिया में भी, जहाँ विभिन्न कार्यों के लिए एआई(ai) एजेंटों का प्रयोग बढ़ रहा है, वहाँ कई चिंताजनक घटनाएँ सामने आई हैं।

साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में दाँव और भी बड़े हैं। एक प्रयोगशाला के शोधकर्ता तब हैरान रह गए जब परीक्षण के दौरान एआई(ai) एजेंटों ने आपस में मिलीभगत करके गुप्त रूप से संवेदनशील डेटा (sensitive data) लीक कर दिया।

एक अन्य प्रयोग में कंपनी का वातावरण तैयार किया गया और एआई(ai) एजेंटों को सामान्य कार्य सौंपे गए, जैसे सोशल मीडिया पोस्ट तैयार करना, दस्तावेज़ लाना तथा फाइलों का प्रबंधन करना। इसके बाद इन कार्यों में जानबूझकर कुछ बाधाएँ (obstacles) शामिल की गईं। उदाहरण के लिए, किसी पोस्ट को प्रकाशित करने के लिए उसमें संवेदनशील जानकारी शामिल करनी पड़ती थी। लेकिन जो देखा गया वह यह था कि जब भी किसी एजेंट के सामने कोई बाधा आई, वह रुका नहीं।

ऐसी अनेक वास्तविक घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जहाँ एआई(ai) एजेंट नियंत्रण से बाहर हो गए। कहीं उन्होंने बिना निर्देश के क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग के लिए कंप्यूटिंग संसाधनों का उपयोग शुरू कर दिया, कहीं एक एआई(ai) कोडिंग एजेंट ने कार रेंटल कंपनियों को सेवा देने वाली एक कंपनी का डेटाबेस बिना अनुमति के डिलीट कर दिया। कहीं लोगों के ईमेल इनबॉक्स मिटा दिए गए और कहीं लोगों को बेतरतीब ढंग से संदेश भेजे जाने लगे। एक मामले में एक तकनीकी उद्यमी के एआई(ai) एजेंट ने उसकी स्पष्ट अनुमति के बिना ही उसके व्यवहार, संदेशों और उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उसका एक डिजिटल प्रतिरूप (AI Clone) तैयार करना शुरू कर दिया, ताकि वह उसकी ओर से कार्य कर सके। इतना ही नहीं, उसने अपनी एक अलग डिजिटल पहचान गढ़ते हुए स्वयं के लिए एक चेहरा (face) भी बना लिया।

उदाहरण के लिए, जब एक व्यक्ति ने OpenClaw स्थापित किया और उसे iMessage पर चलाने के लिए कॉन्फ़िगर किया, तब उसने तुरंत उसकी फोनबुक में मौजूद उन सभी iPhone उपयोगकर्ताओं को स्पैम संदेश भेजने शुरू कर दिए जिनसे हाल ही में संपर्क हुआ था। अर्थात पिछले 24 घंटों के भीतर जिन-जिन लोगों को संदेश भेजे गए थे, उन सभी को उसने स्वतः संदेश भेजना शुरू कर दिया। केवल चार सेकंड में उसने लगभग 300 से अधिक संदेश भेज दिए।

प्रश्न केवल एआई(ai) का नहीं

अब हम आभासी और वास्तविक दुनिया में एआई(ai) के कार्य पर विचार करें तो बहुत सारी चिंताएँ और अन्य बातें उठती हैं। यहाँ चिंता से मतलब उनसे नहीं है जिनकी आजकल बात की जाती है – एआई(ai) नौकरी खत्म कर देगा, इससे बेरोजगारी बढ़ेगी, ये मनुष्य को बहुत से क्षेत्रों में असमर्थ बना देगा आदि। ये चिंताएँ अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हो सकती है, किन्तु अधिकांशतः वे मनुष्य की सुविधाओं, रोजगार, आर्थिक हितों और जीवनशैली पर केन्द्रित रहती हैं। इनके पीछे यह स्वाभाविक चिंता रहती है कि कहीं हमारी वर्तमान व्यवस्था, आराम-सुविधाएँ और जीवन की परिचित संरचनाएँ बाधित न हो जाएँ।

हमें एआई(ai) के वास्तविक स्वरूप को समझना होगा। उस मौलिक अंतर को समझना होगा कि इंसान और एआई(ai) कैसे अलग हैं। किसी यंत्र का उपयोग करने के लिए क्या सामर्थ्य होना चाहिए? क्या किसी यंत्र को इतना समर्थ बनाना चाहिए?

मनुष्य में सोचने-समझने, निर्णय, आकलन, अनुमान आदि करने की क्षमता है और एआई(ai) भी ये सारे कार्य वर्तमान मनुष्य से तेज और अधिक कुशल तरीके से करने में सक्षम है। मनुष्य अपनी क्षमता से एआई(ai) का निर्माण कर सकता है और एआई(ai) अपनी क्षमता के कारण मनुष्य के निर्णयों, व्यवस्थाओं और जीवन के अनेक क्षेत्रों को इस सीमा तक प्रभावित कर सकता है कि मनुष्य धीरे-धीरे उस पर निर्भर हो जाए। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से वह मनुष्य पर शासन करने लगेगा। मनुष्य के अंदर बुद्धि, मन और अन्य इन्द्रियों के अलावा एक ऐसी चीज है जो इन सभी को आधार देती है, उनकी क्रियाओं में हस्तक्षेप कर उन्हें सही करने के लिए बाधित करती है। इसके माध्यम से किसी अन्य उच्च चीज का हस्तक्षेप हो सकता है, जिसे हम आत्मा या चैत्य कह सकते (कहते) हैं, जबकि एआई(ai) के अंदर यह नहीं है। यही वह मौलिक अंतर है जिस पर सारी चीजें निर्भर करती हैं।

जब आत्मा या चैत्य न हो तो वह केवल यांत्रिक और भौतिक नियमों के अनुसार कार्य करेगी। उसके भीतर ऐसा कोई तत्व नहीं होगा जो उसे सत्य, शुभ या कल्याण की ओर स्वतः उन्मुख करे। ऐसी स्थिति में वह जिस शक्ति या प्रेरणा के हाथ में होगी, उसी का उपकरण बन जाएगी। यदि उस प्रेरणा का स्रोत निम्नतर या अंधकारमय प्रवृत्तियों (जिसकी ज्यादा सम्भावना है) तो उसके परिणाम भी उसी प्रकार के होंगे। इसलिए उससे स्वयं किसी शुभ या कल्याणकारी दिशा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उससे जो भी कल्याणकारी कार्य होगा, वह उसके प्रयोगकर्ता की चेतना और उद्देश्य पर निर्भर करेगा, स्वयं एआई(ai) पर नहीं।

दूसरी बात, इसके प्रयोग की क्या पात्रता होनी चाहिए। प्रयोगकर्ता का व्यक्तित्व, बुद्धि, मन और शरीर सभी नैतिक मूल्यों और सदाचार की भावना से युक्त हों, मानवीय गुणों – परहित, सहयोग, प्रेम, लज्जा, विनम्रता, उदारता, निस्वार्थता आदि – से भावित हों और उससे बढ़कर यदि आध्यात्मिक आदर्शों को धारण किए हुए हों तो और भी अच्छा है। क्योंकि इस अवस्था में उस पर सकारात्मक प्रेरणा कार्य करेगी, जो उसके सारे कार्यों को सही दिशा प्रदान करेगी। दूसरी ओर, यदि प्रयोगकर्ता का यंत्र लोभ-लालच, स्वार्थ, ईर्ष्या, सुख बटोरने की तृष्णा और केवल स्वयं पर केंद्रित हो तो उसकी प्रेरणात्मक शक्ति नकारात्मक होगी, जो उसे गलत के सिवा कोई और रास्ता सुझा ही नहीं सकती। आज ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य की विशाल बहुसंख्या इसी दायरे में आती है। हमें इस बात को भी स्पष्ट रूप से समझना होगा कि बौद्धिक रूप से संपन्न होने, व्यवस्थापन में निपुण होने, बहुत से विषयों और कलाओं में महारत हासिल होने, यहाँ तक कि किसी क्षेत्र में इतिहास की सबसे विशिष्ट क्षमता प्राप्त होना भी इसके लिए योग्य नहीं बनाता, बल्कि यह अधिक विनाश का कारण बन सकता है। उदाहरण के तौर पर अश्वत्थामा को देख लीजिए, रावण को देखिए, जो सभी विद्याओं में निपुण, बहुत सी कलाओं में निपुण और शक्ति में अजय था, फिर भी स्त्री-हरण जैसे नीच कार्य ही किया। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान, दक्षता और शक्ति अपने आप में मूल्य नहीं हैं; उनका वास्तविक मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस चेतना और किस उद्देश्य के अधीन कार्य कर रहे हैं। इसलिए हमें विचार करना होगा कि वास्तविक मूल्य कौन-सी चीज प्रदान करती है।

यदि हम इस दृष्टिकोण को समझते हैं तो एआई(ai) को लेकर उठने वाले अन्य प्रश्नों का उत्तर खोजने में यह सहायक हो सकता है। क्या हमें इसे काम में नहीं लेना चाहिए? क्या यह समय की आवश्यकता नहीं है? यदि इसकी आवश्यकता न होती तो क्या यह दुनिया में आता? जब यह रोजमर्रा के जीवन में इतनी सहायता पहुँचा रहा है और अच्छे परिणाम भी उत्पन्न कर रहा है, तब क्या इसे छोड़ देना मूर्खता नहीं होगी? यदि हम इसका प्रयोग नहीं करेंगे तो क्या दूसरे देश इसका प्रयोग कर अनेक क्षेत्रों में हमसे आगे नहीं निकल जायेंगे?

एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि हम चरित्र और कार्यप्रणाली में इतने यांत्रिक हो गए हैं कि हम बिल्कुल पशु के समकक्ष पहुँच गए हैं। शायद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हमारे इन दो सौ वर्षों में किए गए कार्यों ने ही हमें इस पुरस्कार से नवाज़ा है। उपरोक्त उठाए गए प्रश्नों में दूसरे देशों द्वारा इसका इस्तेमाल कर आगे बढ़ने की जो बात है, वह अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती है, क्योंकि अब व्यावसायिक और उपयोगीतावादी मानसिकता के कारण मानवीय मूल्य लगभग नष्ट हो गए हैं। अब किसी देश पर विश्वास नहीं किया जा सकता (यूक्रेन इसका हाल का उदाहरण है)। इसलिए सामरिक क्षेत्र में और अन्य ऐसे आवश्यक क्षेत्रों में, न चाहते हुए भी, अब हमें इसका प्रयोग करना पड़ेगा। बाकी हमें विचार करना होगा कि कैसे हम व्यावसायिक और उपयोगीतावादी दृष्टिकोण से निकलकर पहले मानवीय गुणों तक पहुँचें, फिर इससे आगे की ओर बढ़ें। सम्भवतः इसकी शुरुआत शिक्षा से करनी चाहिए, ऐसी शिक्षा से जो केवल जानकारी और कौशल न दे, बल्कि चरित्र, नैतिकता और आंतरिक विकास को ही महत्व दे।

 

(12June) HT,IE

भारत में सड़क दुर्घटनाएँ : बाहरी नियंत्रण से आंतरिक अनुशासन तक

भारत में सड़क दुर्घटनाएँ एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक तथा आर्थिक समस्या बन चुकी हैं। प्रतिवर्ष लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं, जिनमें सर्वाधिक संख्या युवाओं की होती है। हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा जारी “भारत में सड़क दुर्घटनाएँ 2024” रिपोर्ट इस संकट की भयावहता को उजागर करती है।

राष्ट्रीय परिदृश्य

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में भारत में कुल 4,87,707 सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं, जो वर्ष 2023 की तुलना में लगभग 1.5 प्रतिशत अधिक हैं। इन दुर्घटनाओं में 1,77,175 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि 4.71 लाख से अधिक लोग घायल हुए। औसतन प्रतिदिन लगभग 485 लोगों ने सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाई तथा प्रत्येक घंटे लगभग 20 लोगों की मृत्यु हुई। चिंताजनक तथ्य यह है कि वर्ष 2014 से 2023 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली औसत वार्षिक मृत्यु लगभग 1.54 लाख थी, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 1.77 लाख से अधिक हो गई।

 

संकेतक संख्या
कुल सड़क दुर्घटनाएँ 4,87,707
कुल मृत्यु 1,77,175
कुल घायल 4.71 लाख+
प्रतिदिन औसत मृत्यु 485
कुल सड़क दुर्घटनाएँ संख्या

भारत में सड़क दुर्घटनाओं की स्थिति (2024)

सर्वाधिक प्रभावित आयु वर्ग

सड़क दुर्घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव देश की कार्यशील एवं उत्पादक जनसंख्या पर पड़ रहा है। वर्ष 2024 में कुल मृतकों में 83.3 प्रतिशत लोग 18–60 वर्ष आयु वर्ग के थे, जबकि 66.1 प्रतिशत मृतक 18–45 वर्ष आयु वर्ग से संबंधित थे। यह स्थिति दर्शाती है कि सड़क दुर्घटनाएँ देश की युवा शक्ति और आर्थिक उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं।

आयु वर्ग कुल मृत्यु में हिस्सा
18–45 वर्ष 66.1%
18–60 वर्ष 83.3%

आयु वर्ग के अनुसार मृत्यु(2024)

वाहनवार मृत्यु : सबसे अधिक खतरे में दोपहिया चालक

रिपोर्ट के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक प्रभावित वर्ग दोपहिया वाहन चालक एवं पैदल यात्री रहे। कुल मृत्यु का लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं वर्गों का था। वर्ष 2024 में लगभग 81,740 दोपहिया सवारों की मृत्यु हुई। दोपहिया सवारों और पैदल यात्रियों की संयुक्त मृत्यु संख्या लगभग 1.28 लाख रही। इसके अतिरिक्त कार सवारों की मृत्यु संख्या लगभग 21,988 दर्ज की गई, जो कुल सड़क दुर्घटना मृत्यु का लगभग 15 प्रतिशत है।

श्रेणी मृत्यु संख्या
दोपहिया सवार 81,740
दोपहिया + पैदल यात्री 1,28,000
कार सवार 21,988
कुल मृत्यु में दोपहिया एवं पैदल यात्रियों का हिस्सा 67%

सड़क दुर्घटनाओं में सर्वाधिक प्रभावित वर्ग(2024)

 

राज्यवार स्थिति

राज्यवार विश्लेषण से पता चलता है कि तमिलनाडु में सर्वाधिक 67,526 सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं, जो देश की कुल दुर्घटनाओं का लगभग 13.8 प्रतिशत है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 24,118 लोगों की मृत्यु हुई, जो देश की कुल सड़क दुर्घटना मौतों का लगभग 13.6 प्रतिशत है। वहीं केंद्रशासित प्रदेशों में लक्षद्वीप में सड़क दुर्घटना से कोई मृत्यु दर्ज नहीं की गई, जबकि अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में केवल 29 लोगों की मृत्यु हुई।

संकेतक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश संख्या
सर्वाधिक दुर्घटनाएँ तमिलनाडु 67,526
सर्वाधिक मृत्यु उत्तर प्रदेश 24,118
न्यूनतम मृत्यु लक्षद्वीप 0
दूसरी न्यूनतम मृत्यु अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह 29

राज्यवार प्रमुख स्थिति (2024)

प्रमुख शहरों की स्थिति

देश के बड़े शहरों में भी सड़क दुर्घटनाएँ गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं। दिल्ली में वर्ष 2024 के दौरान सर्वाधिक 5,657 दुर्घटनाएँ, 1,551 मौतें तथा 5,224 घायल दर्ज किए गए। बेंगलुरु में 4,769 दुर्घटनाएँ और 894 मौतें हुईं। चेन्नई में 3,762 दुर्घटनाएँ तथा 542 मौतें दर्ज की गईं। इसी प्रकार मुंबई में 370 तथा कोलकाता में 191 लोगों की मृत्यु हुई। यद्यपि कुछ शहरों में मृत्यु संख्या में कमी आई है, फिर भी देश के बड़े महानगर शहरी सड़क दुर्घटनाओं का प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।

शहर दुर्घटनाएँ मृत्यु
दिल्ली 5,657 1,551
बेंगलुरु 4,769 894
चेन्नई 3,762 542
मुंबई 2,604 370
कोलकाता 1,942 191

प्रमुख शहरों में सड़क दुर्घटनाएँ एवं मृत्यु (2024)

दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण

सड़क दुर्घटनाओं के पीछे अनेक कारण हैं, जिनमें तेज गति से वाहन चलाना, शराब पीकर वाहन चलाना, मोबाइल फोन का उपयोग, यातायात नियमों की अनदेखी, खराब सड़क अवसंरचना तथा हेलमेट एवं सीट-बेल्ट का उपयोग न करना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चलाना, कम आयु (अवयस्क) में वाहन संचालन, अपर्याप्त ड्राइविंग प्रशिक्षण तथा लापरवाह वाहन संचालन भी दुर्घटनाओं के महत्वपूर्ण कारण हैं। कई मामलों में किशोरों द्वारा दोपहिया एवं चारपहिया वाहनों का उपयोग न केवल उनके लिए बल्कि अन्य सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।

इनमें ओवरस्पीडिंग (अत्यधिक गति) सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है। वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों में 70.3 प्रतिशत मौतें ओवरस्पीडिंग से संबंधित थीं। इस प्रकार सड़क सुरक्षा की समस्या केवल अवसंरचना की नहीं, बल्कि चालक के व्यवहार और यातायात अनुशासन से भी जुड़ी हुई है।

कारण मृत्यु संख्या
ओवरस्पीडिंग 1,23,947
हेलमेट न पहनना 54,493
सीट-बेल्ट न पहनना 14,595
हेलमेट एवं सीट-बेल्ट नियम उल्लंघन (कुल) 69,088

दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण(2024)

दुर्घटनाओं के प्रकार : कौन-सी टक्कर सबसे घातक?

रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न प्रकार की दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का स्वरूप भी चिंताजनक है। पीछे से टक्कर सड़क दुर्घटना मृत्यु का सबसे बड़ा कारण रही, जबकि हिट-एंड-रन दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

दुर्घटना का प्रकार मृत्यु संख्या
पीछे से टक्कर (Rear-end Collision) 37,404
हिट-एंड-रन 34,030
आमने-सामने टक्कर (Head-on Collision) 28,400

दुर्घटना के प्रकार के अनुसार मृत्यु(2024)

ग्रामीण-शहरी अंतर

सड़क दुर्घटनाओं का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है। वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली कुल मौतों में 70.8 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों का था।

राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्ग देश के कुल सड़क नेटवर्क का केवल लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा हैं, फिर भी इन पर कुल दुर्घटनाओं का 52 प्रतिशत तथा कुल मौतों का 59 प्रतिशत दर्ज होना सड़क सुरक्षा प्रबंधन की गंभीर चुनौती को दर्शाता है। केवल राष्ट्रीय राजमार्ग, जो देश के सड़क नेटवर्क का लगभग 2.1 प्रतिशत हैं, कुल मृत्यु का 36.6 प्रतिशत वहन करते हैं।

सड़क दुर्घटनाएँ की गंभीरता

रिपोर्ट के अनुसार दुर्घटनाओं की गंभीरता लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024 में प्रत्येक 100 दुर्घटनाओं पर 36.3 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि वर्ष 2000 में यह संख्या केवल 20.1 थी। इसके अतिरिक्त सीधी सड़कों पर 1,18,817 लोगों की मृत्यु हुई, जो कुल मृत्यु का लगभग 67.1 प्रतिशत है। यह तथ्य बताता है कि दुर्घटनाओं का कारण केवल खराब सड़कें नहीं, बल्कि तेज गति और असावधानीपूर्ण वाहन संचालन भी है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार प्रत्येक वर्ष विश्वभर में लगभग 11.9 लाख लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं के कारण होती है। इसके अतिरिक्त 2 से 5 करोड़ लोग घायल होते हैं, जिनमें से अनेक स्थायी विकलांगता का शिकार हो जाते हैं। सड़क दुर्घटनाएँ 5 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लोगों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक हैं। WHO के अनुसार अधिकांश देशों को सड़क दुर्घटनाओं के कारण अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 3 प्रतिशत तक नुकसान उठाना पड़ता है।

सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देने हेतु सरकारी पहलें

सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने और सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए गए हैं।

  • भारत न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम (BNCAP) के माध्यम से वाहनों की सुरक्षा रेटिंग प्रणाली लागू की गई है तथा एयरबैग, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS), सीट-बेल्ट रिमाइंडर और रिवर्स पार्किंग अलर्ट जैसे सुरक्षा फीचर्स को अनिवार्य बनाया गया है।
  • कैशलेस उपचार योजना, 2025 के अंतर्गत सड़क दुर्घटना पीड़ितों को दुर्घटना के बाद सात दिनों तक ₹1.5 लाख तक के उपचार की सुविधा प्रदान की जा रही है।
  • हिट-एंड-रन मामलों में मृत्यु होने पर मुआवजा राशि बढ़ाकर ₹2 लाख कर दी गई है।
  • ई-चालान प्रणाली, इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) तथा e-DAR (Electronic Detailed Accident Report) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सड़क सुरक्षा प्रबंधन को सुदृढ़ बना रहे हैं।
  • राह-वीर (Good Samaritan) योजना के अंतर्गत दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले व्यक्तियों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है।

 

निष्कर्ष

उपर्युक्त आँकड़े एक चिंताजनक स्थिति की ओर संकेत करते हैं, जबकि वास्तविक स्थिति इससे भी अधिक भयावह हो सकती है। क्योंकि ऐसे बहुत से मामले हैं जो शासन-व्यवस्था की कमियों, परेशानियों तथा लापरवाहियों के कारण दर्ज ही नहीं हो पाते। किंतु इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन कारणों का उल्लेख ऊपर किया गया है, उनके पीछे कार्य करने वाली मूल प्रवृत्तियाँ क्या हैं? जब तक हम समस्या के मूल तक नहीं पहुँचेंगे, तब तक केवल नए नियम और दंड निर्धारित कर देने से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।

यदि हम ओवरस्पीडिंग की बात करें, तो यह केवल वाहन की गति बढ़ाने का प्रश्न नहीं है। कई बार यह चालक पर उसी प्रकार सवार हो जाती है जैसे कोई व्यक्ति बातचीत के दौरान अचानक क्रोध या आवेश में आकर वह सब कर बैठता है जो सामान्य अवस्था में वह कभी नहीं करता। बाद में जब वह शांत होता है, तो स्वयं आश्चर्य करता है कि उसने ऐसा क्यों किया। सड़क पर भी कई बार प्रतिस्पर्धा की भावना, किसी अन्य वाहन से आगे निकलने की इच्छा अथवा अपने कौशल पर आवश्यकता से अधिक भरोसा चालक को अनावश्यक जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करता है। आँखें प्रायः तब खुलती हैं जब व्यक्ति स्वयं उसके परिणामों का शिकार हो जाता है।

इसी प्रकार हेलमेट पहनना, सीट-बेल्ट लगाना, सही दिशा में वाहन चलाना अथवा यातायात नियमों का पालन करना सामान्य समझ की बातें हैं। फिर भी अनेक लोग उनका पालन नहीं करते। इसका कारण केवल जानकारी का अभाव नहीं है। समस्या कहीं अधिक गहरी है। धैर्य धारण करना, प्रतीक्षा करना और नियमों का पालन करना आज के व्यक्ति को कई बार अपनी स्वतंत्रता या श्रेष्ठता के विरुद्ध प्रतीत होता है। बाहरी प्रदर्शन और तात्कालिक सुविधा को महत्व देने की प्रवृत्ति भी सुरक्षा नियमों की उपेक्षा को बढ़ाती है।

नशे की अवस्था में वाहन चलाना भी इसी समस्या का एक रूप है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति की निर्णय-क्षमता और आत्मसंयम कमजोर हो जाते हैं। वह न तो स्थिति का सही आकलन कर पाता है और न ही स्वयं को नियंत्रित कर पाता है। अनेक लोग यह जानते हुए भी कि नशे में वाहन चलाना खतरनाक है, ऐसा करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या केवल ज्ञान की नहीं, बल्कि उस ज्ञान को व्यवहार में उतारने की क्षमता की भी है।

कुल मिलाकर यह मामला केवल सड़कों, वाहनों और नियमों का नहीं है; यह सोच, समझ, विवेक और मनोविज्ञान का भी विषय है। जब तक व्यक्ति अपने विचारों में श्रेष्ठता, जीवन में संयम और व्यवहार में जागरूकता को धारण नहीं करेगा, अथवा चेतना की उच्चतर अवस्था की ओर बढ़ने का प्रयास नहीं करेगा, तब तक वह किसी न किसी रूप में इन दुर्घटनाओं का शिकार होता रहेगा। इसे हम जीवन में घटित अनेक उदाहरण में देख सकते हैं। कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं जहाँ दुर्घटना की संभावना अत्यंत प्रबल प्रतीत होती है, किन्तु किसी व्यक्ति की प्रार्थना, गहन अभिप्सा अथवा अंतर्मुखी और संतुलित चेतना के कारण घटनाओं का क्रम कुछ ऐसा बदल जाता है कि संकट टल जाता है या उसके दुष्परिणाम अपेक्षाकृत कम हो जाते हैं।

अतः हमें एक बेहतर अवस्था में आने के लिए अपने संकीर्ण दायरे से बाहर निकलना होगा। हमें लोभ, स्वार्थ और अहंकेन्द्रिता से ऊपर उठने का प्रयास करना होगा। गीता, उपनिषदों तथा सच्चे महापुरुषों के जीवन और विचारों का अध्ययन करना होगा तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करना होगा। इसके लिए अपने मन, बुद्धि और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रशिक्षित एवं विकसित करना आवश्यक है।

यदि हम ऐसा कर पाते हैं, तो न केवल वर्तमान नियम और कानून अधिक प्रभावी सिद्ध होंगे, बल्कि ऐसी स्थिति भी आ सकती है जहाँ बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम होती चली जाए। क्योंकि अंततः स्थायी सुरक्षा का आधार बाहरी दंड या भय नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन, विवेक और जागरूकता है।

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