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- (43.)Weekly News Update 31 Aug (America china ai & economical budget Sanghai Shikhar summit 2026)
- (44.)Weekly News Update 07 September-13September (Iran war-Falklands issue-Brics summit-Boss Scame)
Weekly News Update (35)
(14 June – 20 June 2026)
(14 – 20June) ISW, Reuters, BBC, Euro news
ईरान–अमेरिका समझौता ज्ञापन (MoU) और मध्य-पूर्व की चुनौतियाँ
फरवरी के अंत में आरम्भ हुए ईरान–अमेरिका–इज़राइल संघर्ष को स्थायी रूप से समाप्त करने के प्रयास में इस सप्ताह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल सामने आई। ईरान और अमेरिका के बीच 14 बिंदुओं वाला एक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding – MoU) तैयार किया गया, जिसका उद्देश्य युद्धविराम की वर्तमान स्थिति को एक व्यापक और स्थायी समझौते में परिवर्तित करना है।
यह दस्तावेज़ अभी तक दोनों देशों द्वारा किसी आधिकारिक सरकारी वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है। हालाँकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की ओर से इसका पाठ साझा किया गया, जबकि अमेरिकी प्रशासन ने इस मसौदे (Draft) को अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष विचारार्थ भेजा है। इस कारण यह दस्तावेज़ सार्वजनिक चर्चा का विषय तो बन गया है, किंतु अभी इसे औपचारिक रूप से प्रकाशित (Officially Published) समझौता नहीं कहा जा सकता।
प्रारम्भिक योजना के अनुसार इस समझौते पर शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षर होने थे, किंतु बाद में फ्रांस में आयोजित G7 बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा इस मसौदे पर हस्ताक्षर किया।
इस 14-बिंदु प्रारूप में ईरान ने परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है, जबकि अमेरिका ने ईरान के पुनर्निर्माण (Reconstruction) और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर तक की योजना विकसित करने का आश्वासन दिया है। साथ ही संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार, प्रतिबंधों (Sanctions) की समाप्ति, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की व्यवस्था तथा अंतिम समझौते (Final Deal) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर 60 दिनों के भीतर विस्तृत वार्ता कर निर्णय लेने का लक्ष्य रखा गया है।
नीचे राष्ट्रपति पेज़ेशकियन द्वारा साझा किए गए “इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन” (Islamabad Memorandum of Understanding) का पाठ प्रस्तुत है।
- ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा वर्तमान युद्ध में उनके सहयोगी (Allies), इस समझौता ज्ञापन (MoU – Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर करके सभी मोर्चों पर, जिसमें लेबनान भी सम्मिलित है, सैन्य अभियानों की तत्काल एवं स्थायी समाप्ति की घोषणा करते हैं। वे यह भी वचन देते हैं कि अब से वे एक-दूसरे के विरुद्ध किसी भी युद्ध अथवा सैन्य कार्रवाई का आरम्भ नहीं करेंगे तथा एक-दूसरे के विरुद्ध बल प्रयोग अथवा बल प्रयोग की धमकी से परहेज़ करेंगे। साथ ही वे लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता (Territorial Integrity) और संप्रभुता (Sovereignty) सुनिश्चित करेंगे। अंतिम समझौता इस युद्ध की सभी मोर्चों पर, जिसमें लेबनान भी सम्मिलित है, स्थायी समाप्ति तथा इस अनुच्छेद के अन्य प्रावधानों की पुष्टि करेगा।
- ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका एक-दूसरे की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने तथा एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन देते हैं।
- ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका अधिकतम 60 दिनों की अवधि में, जिसे आपसी सहमति (Mutual Consent) से बढ़ाया जा सकता है, अंतिम समझौते पर वार्ता करने और उसे सम्पन्न करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
- इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होते ही संयुक्त राज्य अमेरिका ईरान के विरुद्ध लागू अपनी नौसैनिक नाकाबंदी तथा अन्य सभी अवरोधों (Impediments) और व्यवधानों (Disturbances) को हटाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करेगा तथा 30 दिनों के भीतर नौसैनिक नाकाबंदी को पूर्णतः समाप्त कर देगा। इस अवधि के दौरान समुद्री जहाजों का आवागमन युद्ध-पूर्व यातायात के अनुपात में ईरान द्वारा पुनर्स्थापित (Restored) किया जाएगा। संयुक्त राज्य अमेरिका यह भी वचन देता है कि अंतिम समझौते के 30 दिनों के भीतर वह अपनी सेनाओं को ईरान के निकटवर्ती क्षेत्रों (Proximity) से हटा लेगा।
- इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने के पश्चात ईरान का इस्लामी गणराज्य अपने सर्वोत्तम प्रयासों का उपयोग करते हुए 60 दिनों तक केवल वाणिज्यिक जहाजों के लिए फ़ारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराएगा, जिस पर कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। वाणिज्यिक जहाजों का आवागमन तत्काल प्रारम्भ होगा तथा तकनीकी और सैन्य बाधाओं को हटाने एवं बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय करने (De-mining) की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 30 दिनों के भीतर पूर्ण रूप से बहाल किया जाएगा। ईरान, ओमान सल्तनत के साथ संवाद करेगा ताकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य के भावी प्रशासन (Future Administration) तथा समुद्री सेवाओं की व्यवस्था निर्धारित की जा सके। यह कार्य फ़ारस की खाड़ी के अन्य तटीय देशों, लागू अंतरराष्ट्रीय विधि (Applicable International Law) तथा तटीय राज्यों के संप्रभु अधिकारों (Sovereign Rights) के अनुरूप किया जाएगा।
- संयुक्त राज्य अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर कम-से-कम 300 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि वाले एक निश्चित एवं पारस्परिक रूप से स्वीकृत (Mutually Agreed) पुनर्निर्माण (Reconstruction) तथा आर्थिक विकास कार्यक्रम को विकसित करने का वचन देता है। इस योजना के क्रियान्वयन की व्यवस्था को अंतिम समझौते के अंतर्गत 60 दिनों के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा। इस योजना से संबंधित सभी वित्तीय लेन-देन के लिए आवश्यक लाइसेंस, छूट और अनुमतियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रदान की जाएँगी।
- संयुक्त राज्य अमेरिका ईरान के इस्लामी गणराज्य के विरुद्ध लगाए गए सभी प्रकार के प्रतिबंधों (Sanctions) को समाप्त करने का वचन देता है। इनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के गवर्नर्स बोर्ड के प्रस्ताव, तथा अमेरिका द्वारा लगाए गए सभी एकपक्षीय (Unilateral), प्राथमिक (Primary) और द्वितीयक (Secondary) प्रतिबंध सम्मिलित होंगे। इन प्रतिबंधों को अंतिम समझौते के अंतर्गत एक सहमत समय-सारिणी (Agreed Schedule) के अनुसार समाप्त किया जाएगा। ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रतिबंधों की समाप्ति (Termination of Sanctions) अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, और वे इस पर शीघ्र वार्ता करके पारस्परिक सहमति (Mutual Agreement) तक पहुँचने की अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं।
- ईरान का इस्लामी गणराज्य पुनः पुष्टि (Reaffirms) करता है कि वह परमाणु हथियारों को न तो प्राप्त करेगा (Procure) और न ही उनका विकास (Develop) करेगा। ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका इस बात पर सहमत हैं कि संवर्धित परमाणु सामग्री (Enriched Material) के मौजूदा भंडार (Stockpiled Material) के निस्तारण (Disposition) का समाधान एक ऐसे तंत्र (Mechanism) के माध्यम से किया जाएगा जिस पर दोनों पक्ष पारस्परिक सहमति (Mutual Agreement) से निर्णय करेंगे। यह प्रक्रिया अनुच्छेद 7 में उल्लिखित समय-सारिणी (Schedule) के अनुरूप होगी। इसका न्यूनतम तरीका (Minimum Methodology) स्थल पर ही (On Site) अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में संवर्धन स्तर को कम करना (Down Blending) होगा। दोनों पक्ष ईरान की परमाणु आवश्यकताओं (Nuclear Needs) से संबंधित यूरेनियम संवर्धन तथा अन्य सहमत विषयों पर भी चर्चा करने के लिए सहमत हैं, बशर्ते कि अंतिम समझौते (Final Deal) में एक संतोषजनक रूपरेखा (Satisfactory Framework) पर सहमति बन जाए। अंतिम समझौता इस अनुच्छेद के प्रावधानों (Provisions) की पुष्टि करेगा। ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका स्वीकार करते हैं कि ऊपर उल्लिखित परमाणु विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं तथा वे इन विषयों पर शीघ्र वार्ता कर पारस्परिक सहमति तक पहुँचने की अपनी मंशा व्यक्त करते हैं।
- अंतिम समझौते के संपन्न होने तक ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने पर सहमत हैं। ईरान अपने वर्तमान परमाणु कार्यक्रम की यथास्थिति बनाए रखेगा, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा तथा क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य बल तैनात नहीं करेगा।
10.संयुक्त राज्य अमेरिका यह वचन देता है कि इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होते ही और प्रतिबंधों की समाप्ति तक अमेरिकी वित्त विभाग ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों, उनसे संबंधित उत्पादों (Derivatives) तथा उनसे जुड़ी सभी सेवाओं के निर्यात के लिए आवश्यक छूट (Waivers) जारी करेगा। इन सेवाओं में बैंकिंग लेन-देन, बीमा, परिवहन तथा अन्य संबद्ध सेवाएँ शामिल होंगी।
11.संयुक्त राज्य अमेरिका ईरान के इस्लामी गणराज्य की सभी जमी हुई (Frozen) अथवा प्रतिबंधित (Restricted) निधियों (Funds) और परिसंपत्तियों (Assets) को पूर्ण रूप से उपयोग हेतु उपलब्ध कराने का वचन देता है। इस समझौता ज्ञापन (MoU) के लागू (Implementation) होने के पश्चात संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान इन निधियों की रिहाई (Release of Funds) से संबंधित प्रक्रियाओं पर पारस्परिक सहमति बनाएँगे। ये निधियाँ, चाहे मूल खाते (Original Account) में रखी गई हों अथवा किसी अन्य खाते में स्थानांतरित की गई हों, ईरान के केंद्रीय बैंक द्वारा नामित किसी भी अंतिम लाभार्थी (Ultimate Beneficiary) को भुगतान के लिए पूर्ण रूप से उपयोग योग्य बनाई जाएँगी। संयुक्त राज्य अमेरिका इस उद्देश्य के लिए आवश्यक सभी लाइसेंस और प्राधिकरण (Authorizations) जारी करने का वचन देता है।
- ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका इस बात पर सहमत हैं कि इस समझौता ज्ञापन (MoU) के सफल क्रियान्वयन (Successful Implementation) तथा भविष्य के अंतिम समझौते के अनुपालन (Compliance) की निगरानी (Monitoring) के लिए एक कार्यकारी तंत्र (Executive Mechanism) स्थापित किया जाएगा।
- इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने के बाद, तथा इसके अनुच्छेद 1, 4, 5, 10 और 11 के कार्यान्वयन के आरम्भ होने और उनके निरंतर पालन (Continuing Implementation) की शर्त पर, ईरान का इस्लामी गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका अंतिम समझौते के संबंध में केवल शेष अनुच्छेदों पर वार्ता प्रारम्भ करेंगे।
14.अंतिम समझौते (Final Deal) का अनुमोदन (Endorsement) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक बाध्यकारी प्रस्ताव (Binding Resolution) द्वारा किया जाएगा।
इस समझौते के ऐसे बहुत से बिंदु हैं जो अस्पष्ट हैं, जिन पर हम विचार करेंगे।
इस समझौते की सबसे कमजोर कड़ी उसका पहला बिंदु प्रतीत होता है। इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की स्थायी समाप्ति की बात कही गई है, जबकि इस व्यवस्था में इज़राइल की सहमति स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती। जिस पक्ष को लेबनान मोर्चे पर अपने सैन्य अभियान को रोकना है, वह न तो इस समझौते का प्रत्यक्ष पक्षकार है और न ही उसने इसके अनुरूप अपने अभियान को समाप्त करने की कोई सार्वजनिक प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
19 जून को इज़राइल और लेबनान के बीच संघर्ष-विराम का समझौता हुआ, लेकिन इसके 24 घंटे के भीतर ही इज़राइल ने उत्तरी लेबनान में हिज़्बुल्लाह के कथित ठिकानों पर हमला किया। इज़राइल का कहना था कि इन्हीं क्षेत्रों से हिज़्बुल्लाह ने उस पर रॉकेट हमला किया था, जिसमें उसके पाँच सैनिक मारे गए थे। इज़राइल पहले ही यह संकेत दे चुका है कि वह आत्मरक्षा के नाम पर हिज़्बुल्लाह के विरुद्ध अपना अभियान तब तक जारी रखेगा जब तक वह हिज़्बुल्लाह को समाप्त न कर दे। इन घटनाओं के बीच 20 जून को ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पुनः बंद करने की घोषणा की, यद्यपि अमेरिका ने इस दावे से इंकार किया है।
इस कमजोर कड़ी को समझने के लिए कुछ आवश्यक बातों पर विचार करना होगा।
1.ईरान, हिज़्बुल्लाह पर हो रहे हमलों को अमेरिका पर दबाव बनाने के एक साधन के रूप में उपयोग कर इज़राइल को रोकने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका भी इस दबाव को महसूस करता दिखाई देता है और अप्रत्यक्ष रूप से अपेक्षाकृत नरम स्वर में इज़राइल से केवल उन ठिकानों पर कार्रवाई करने की अपेक्षा कर रहा है जहाँ हिज़्बुल्लाह की उपस्थिति हो तथा आम नागरिकों (Civilians) को न्यूनतम क्षति पहुँचे।
लेकिन इज़राइल की विपक्षी पार्टियाँ और वहाँ की जनता इस समझौते का बिल्कुल समर्थन नहीं करती। वे इस बात को लेकर कृतसंकल्पित हैं कि अपनी रक्षा के लिए हिज़्बुल्लाह को समाप्त किए बिना हम नहीं रुकेंगे। यह बात मीडिया में चल रही उस धारणा को खारिज करती है कि नेतन्याहू दबाव में हैं। वहाँ सरकार बदलने पर इस मसले का रुख बदल सकता है, लेकिन चाहे जिसकी भी सरकार आए, पूरा इज़राइल अपनी रक्षा के लिए दृढ़निश्चयी है और किसी के दबाव में झुकने वाला नहीं है। इसी कारण यह मान लेना कठिन है कि केवल बाहरी दबाव या किसी समझौते के कारण इज़राइल अपने अभियान को रोक देगा। इससे पहले भी नेतन्याहू के अमेरिकी राष्ट्रपतियों से मतभेद हुए थे, लेकिन उन्होंने अपने सही उद्देश्य से कभी समझौता नहीं किया।
इस प्रकार MoU के प्रथम बिंदु का व्यावहारिक क्रियान्वयन अत्यंत कठिन दिखाई देता है।
- दूसरी आवश्यक बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में वास्तविक समस्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सार्वजनिक चर्चा का केंद्र वही बन रहा है जिसे ईरान प्रमुखता से सामने लाना चाहता है।
अमेरिका और यूरोपीय देशों को इज़राइल के हमले और लेबनान में मरने वाले लोगों की संख्या नजर आ रही है। वे न तो लेबनान की सरकार का पक्ष समझने को तैयार हैं और न ही इज़राइल की समस्या को समझ पा रहे हैं। इससे वास्तविक समस्या की जड़, अर्थात् ईरान समर्थित आतंकवादी संगठन हिज़्बुल्लाह बच निकल रहा है।
लेबनान की सरकार इज़राइल को अपना दुश्मन नहीं मानती, बल्कि ईरान और उसके समर्थित हिज़्बुल्लाह को मानती है। उसका कहना है कि ईरान अपनी मंशा की पूर्ति के लिए लेबनान की धरती का उपयोग हिज़्बुल्लाह के माध्यम से कर रहा है और उसे बर्बाद कर रहा है। इस प्रकार वह देश की इस भयानक अवस्था के लिए हिज़्बुल्लाह और ईरान को जिम्मेदार मानती है। और दबे स्वर में वह इज़राइल की शुक्रगुजार भी है।
इज़राइल की समस्या की बात हम ऊपर कर ही चुके हैं।
लेकिन अमेरिका या यूरोपीय देश ईरान के इस प्रायोजित आतंकवाद (Sponsored Terrorism), अर्थात् हिज़्बुल्लाह, को गलत नहीं ठहरा रहे हैं। यदि ईरान अपने इस एजेंडे में सफल होता है, तो इन देशों द्वारा आतंकवाद का अप्रत्यक्ष समर्थन कहा जाना गलत नहीं होगा।
- समझौते में अमेरिका 300 बिलियन डॉलर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए उपलब्ध कराने की बात कहता है। लेकिन यह राशि कहाँ से आएगी और किसके द्वारा दी जाएगी, यह बिल्कुल अस्पष्ट है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि समझौते में 300 बिलियन डॉलर तत्काल उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि इतनी राशि के पुनर्निर्माण एवं आर्थिक विकास कार्यक्रम को विकसित करने की बात कही गई है। समझौते में केवल इतना कहा गया है कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर इस योजना को विकसित करेगा। किंतु इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस राशि का वास्तविक स्रोत कौन होगा और इसका वित्तीय भार कौन वहन करेगा।
अमेरिका तो यह कर नहीं सकता, क्योंकि वह स्वयं इस युद्ध में खर्च हुई राशि को मध्य-पूर्व से लेने पर तत्पर है। इसलिए अधिक संभावना यही है कि यह राशि मध्य-पूर्व के देशों को ही वहन करनी पड़े।
इसके अतिरिक्त यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि यदि इस योजना का वित्तीय भार वास्तव में मध्य-पूर्व के देशों को उठाना है, तो क्या वे इसके लिए तैयार होंगे। युद्ध के दौरान अनेक क्षेत्रीय देशों ने ईरान की नीतियों और उसके समर्थित संगठनों को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि वे ईरान के पुनर्निर्माण के लिए इतनी बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी स्वीकार करने को कितने इच्छुक होंगे।
इस प्रकार 300 बिलियन डॉलर की घोषणा जितनी प्रभावशाली दिखाई देती है, उसके वित्तीय स्रोत, क्रियान्वयन और राजनीतिक स्वीकार्यता को लेकर उतने ही प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं।
- MoU का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ईरान परमाणु हथियार (Nuclear Weapon) प्राप्त या विकसित नहीं करेगा। साथ ही उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम के भंडार के निस्तारण (Disposition) के लिए दोनों पक्षों द्वारा एक सहमत तंत्र (Agreed Mechanism) विकसित किया जाएगा।
इन 60 दिनों के दौरान यह तय किया जाएगा कि ईरान के वर्तमान संवर्धित यूरेनियम भंडार का निस्तारण किस प्रकार किया जाएगा और यह प्रक्रिया कितने समय में पूरी होगी। MoU में केवल इतना कहा गया है कि न्यूनतम स्तर पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में उसके संवर्धन स्तर को कम किया जा सकता है।
लेकिन 2015 में लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद ईरान द्वारा परमाणु क्षमता प्राप्त करने के निरंतर प्रयास उस पर अविश्वास उत्पन्न करते हैं।
वास्तविक समाधान क्या हो सकता है?
यह समझौता कुछ समय के लिए राहत दे सकता है, लेकिन इससे मूल समस्या समाप्त होती नहीं दिखाई देती।
ईरान पर लगी पाबंदियाँ (Restrictions) हटने और उसकी फ्रीज़ की गई संपत्तियाँ वापस मिलने के बाद वह उनका उपयोग किस प्रकार करेगा, यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न बना हुआ है। उसने हिज़्बुल्लाह को संकेत दिया है कि संसाधन उपलब्ध होने पर उसकी फंडिंग (Funding) बढ़ाएगा। इसके अतिरिक्त इराक में उसके प्रभाव वाले नए मिलिशिया समूह सक्रिय बताए जाते हैं, जो क्षेत्र में उसके हितों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। साथ ही हूती समूह को मिलने वाले समर्थन में भी वृद्धि की संभावना व्यक्त की जाती रही है।
यदि ऐसा होता है, तो पूरे क्षेत्र में अस्थिरता, प्रॉक्सी संघर्ष और आतंकवादी गतिविधियों के विस्तार की संभावना बढ़ सकती है। इसी कारण यह आशंका व्यक्त की जा सकती है कि MoU के बिंदु 2 की भावना का दुरुपयोग किया जा सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की भविष्य की व्यवस्था से जुड़ा है।
समझौते में संकेत दिया गया है कि आगामी 60 दिनों की वार्ता के दौरान इसके प्रशासन और संचालन की रूपरेखा पर विचार किया जाएगा। इस बीच होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर भविष्य में शुल्क (Toll) लगाए जाने की चर्चा भी सामने आई है।
इस विषय पर ट्रम्प की प्रतिक्रिया भी समाधान से अधिक अमेरिकी हितों पर केंद्रित दिखाई देती है। उनका कहना है कि यदि कोई शुल्क लगाया जाता है, तो उसकी व्यवस्था अमेरिका की शर्तों के अनुरूप होनी चाहिए और उसका लाभ भी अमेरिका को प्राप्त होना चाहिए, क्योंकि अमेरिका स्वयं को मध्य-पूर्व की सुरक्षा का “गार्डियन एंजेल” (Guardian Angel) मानता है।
इस प्रकार अमेरिका एक ओर स्वयं को समाधानकर्ता और मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि दूसरी ओर वह इस व्यवस्था में अपने आर्थिक और सामरिक हितों को भी सुरक्षित रखना चाहता है।
यदि हम इस युद्ध का वास्तविक समाधान सभी पक्षों के हित में देखना चाहते हैं, तो पूरे विश्व को इस बात पर एकमत होना होगा कि यदि किसी की मंशा (Intentions) गलत है, तो उसके पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। इसी प्रकार किसी भी प्रकार के आतंकवाद अथवा प्रॉक्सी युद्ध को राजनीतिक साधन के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे प्रयासों के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई आवश्यक है।
विशेषकर यदि चीन और रूस इस विषय पर स्पष्ट और सक्रिय भूमिका निभाएँ, तो ईरान को मिलने वाला नैतिक समर्थन (Moral Support) सीमित हो सकता है। ऐसी स्थिति में उसके व्यवहार पर अंकुश लगाने और क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करने की संभावना बढ़ सकती है।
अंततः यह समझौता युद्ध को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम अवश्य है, किंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह केवल अस्थायी शांति स्थापित करता है, या वास्तव में उन कारणों का समाधान कर पाता है जिन्होंने इस पूरे संघर्ष को जन्म दिया है।
(18June) consilium.europa.eu, PIB
G7 शिखर सम्मेलन 2026: प्रमुख घोषणाएँ और भारत की भूमिका
फ्राँस के एवियाँ (Evian) में 52वें G7 शिखर सम्मेलन 2026 का आयोजन “नई साझेदारियों का निर्माण और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता को पुनर्जीवित करना” (Forging New Partnerships and Rebuilding International Solidarity) विषय के अंतर्गत किया गया। सम्मेलन के आउटरीच सत्रों (Outreach Sessions) में G7 देशों के अतिरिक्त भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका तथा अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी आमंत्रित किया गया, ताकि विश्व के सामने उपस्थित प्रमुख चुनौतियों पर व्यापक चर्चा की जा सके।
इस सम्मेलन के महत्व को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि G7 क्या है और वैश्विक राजनीति तथा अर्थव्यवस्था में इसकी क्या भूमिका है।
G7 क्या है?
G7 कोई विश्व सरकार नहीं है और न ही यह संयुक्त राष्ट्र की तरह कोई औपचारिक संस्था है। यह किसी संधि पर आधारित संगठन नहीं है तथा इसका कोई स्थायी सचिवालय या औपचारिक प्रशासनिक मुख्यालय भी नहीं है। बल्कि यह दुनिया की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जिसमें फ्राँस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा शामिल हैं।
हालाँकि G7 देश विश्व की केवल लगभग 10% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी वे वैश्विक नाममात्र GDP का लगभग 43% तथा वैश्विक संपत्ति का एक बड़ा भाग नियंत्रित करते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों (Sanctions), व्यापारिक नीतियों तथा वैश्विक आर्थिक व्यवस्थाओं को प्रभावित करने की उनकी क्षमता के कारण इनके निर्णय पूरी दुनिया पर प्रभाव डाल सकते हैं।
G7 के प्रमुख उद्देश्य वैश्विक आर्थिक स्थिरता, व्यापार और निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, स्वास्थ्य संकटों का सामना तथा नई प्रौद्योगिकियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे विषयों पर सहयोग बढ़ाना हैं।
G7 की स्थापना वर्ष 1975 में 1973 के तेल संकट के बाद एक अनौपचारिक मंच के रूप में हुई थी। प्रारम्भ में इसमें छह औद्योगिक लोकतंत्र शामिल थे और इसे G6 कहा जाता था। वर्ष 1976 में कनाडा के शामिल होने के बाद यह G7 बन गया। वर्ष 1998 में रूस को शामिल कर इसे G8 बनाया गया, किंतु वर्ष 2014 में क्रीमिया के विलय के बाद रूस को समूह से बाहर कर दिया गया।
यूरोपीय संघ (European Union) भी एक ‘गैर-सूचीबद्ध सदस्य’ (Non-enumerated Member) के रूप में इसमें सक्रिय भागीदारी करता है। उसका प्रतिनिधित्व यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष करते हैं।
विकासशील देशों की अनदेखी करने वाले एक विशेष क्लब के रूप में होने वाली आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए मेज़बान देश नियमित रूप से भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों को आउटरीच सत्रों में आमंत्रित करता है। इसके बावजूद अनेक अवसरों पर G7 पश्चिमी देशों के हितों का मंच प्रतीत होता है। इसके निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी भी नहीं होते। यही कारण है कि पिछले वर्षों में G20 का महत्व लगातार बढ़ा है।
वैश्विक चुनौतियों पर G7 का दृष्टिकोण
सम्मेलन के अंत में नेताओं ने विश्व की प्रमुख चुनौतियों पर एक संयुक्त घोषणा जारी की, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे—
- यूक्रेन के समर्थन की पुनर्पुष्टि
G7 नेताओं ने यूक्रेन की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन में अपनी एकजुटता दोहराई। उन्होंने यूक्रेन को अतिरिक्त वायु-रक्षा प्रणालियाँ, मिसाइल अवरोधक तथा अन्य सैन्य क्षमताएँ उपलब्ध कराने और रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की बात कही।
- मध्य-पूर्व (ईरान, लेबनान और गाज़ा)
नेताओं ने अमेरिका–ईरान समझौते का स्वागत किया और कहा कि ईरान को कभी परमाणु हथियार प्राप्त नहीं होने चाहिए। उन्होंने लेबनान में हथियारों पर राज्य के नियंत्रण का समर्थन किया तथा गाज़ा के लिए मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण प्रयासों को तेज करने का आह्वान किया।
- इंडो-पैसिफिक और ताइवान
G7 ने पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर तथा ताइवान जलडमरूमध्य में बलपूर्वक यथास्थिति बदलने के किसी भी प्रयास का विरोध किया। साथ ही उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता व्यक्त की।
- वैश्विक अर्थव्यवस्था
नेताओं ने कहा कि विश्व ऊर्जा, खाद, कृषि आपूर्ति शृंखलाओं और व्यापारिक तनावों से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सुरक्षित व्यापार, खुली आपूर्ति शृंखलाओं और वैश्विक आर्थिक संतुलन को बढ़ावा देने पर बल दिया।
- महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals)
बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा क्षेत्र के लिए आवश्यक खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित रखने हेतु G7 ने Critical Minerals Resilience and Production Alliance के गठन की घोषणा की, ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा
G7 ने बच्चों और युवाओं के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित करने, बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार को रोकने तथा ऑनलाइन उग्रवाद से उनकी रक्षा करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
- अंतरराष्ट्रीय विकास और साझेदारी
G7 ने विकासशील देशों के साथ “दाता-प्राप्तकर्ता” संबंधों के बजाय समान साझेदारी (Partnership of Equals) पर आधारित सहयोग को बढ़ावा देने की बात कही।
- कैंसर से लड़ाई
कैंसर के शोध, प्रारम्भिक पहचान और उपचार तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया गया।
- प्रवासी तस्करी और ड्रग तस्करी
मानव तस्करी, अवैध प्रवासन नेटवर्क तथा अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी के विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई को मजबूत करने की घोषणा की गई।
- इबोला प्रकोप
कांगो और युगांडा में फैले Bundibugyo Ebola प्रकोप से निपटने के लिए वैक्सीन, निदान और उपचार के विकास तथा वितरण में सहयोग का वचन दिया गया।
भारत की भूमिका
भारत ने इस सम्मेलन का उपयोग ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को सामने रखने, वैश्विक विश्वास-अभाव (Trust Deficit) के प्रश्न को उठाने तथा विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए किया।
G7 आउटरीच सत्र में भारत का मुख्य संदेश इस विचार पर आधारित था कि आज विश्व की अनेक समस्याएँ संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि विश्वास की कमी से उत्पन्न हो रही हैं। भारत ने इस बात पर बल दिया कि पारस्परिक विश्वास (Mutual Trust) विश्व का सबसे महत्त्वपूर्ण रणनीतिक संसाधन है और इसके अभाव में किसी भी वैश्विक व्यवस्था को स्थायी आधार नहीं मिल सकता।
भारत ने पारंपरिक दाता-ग्राही (Donor–Recipient) मॉडल से आगे बढ़कर समानता, पारस्परिक सम्मान और साझा उत्तरदायित्व पर आधारित साझेदारियों का समर्थन किया। उसने यह भी स्पष्ट किया कि विकासशील और मध्यम-आय वाले देश केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था में समान और न्यायसंगत भागीदारी चाहते हैं।
भारत ने ग्लोबल साउथ की चिंताओं को सामने रखते हुए इस बात पर बल दिया कि विकासशील देशों की आवाज़ को वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक प्रभावी स्थान मिलना चाहिए। भारत का मत था कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब नीति-निर्माण की प्रक्रिया में सभी देशों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
इसके साथ ही भारत ने अफ्रीका के साथ अपनी विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण (Capacity Building), डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) तथा दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) के अनुभवों को भी रेखांकित किया। भारत ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि विकास सहयोग केवल सहायता प्रदान करने का विषय नहीं है, बल्कि साझा अनुभवों, तकनीकी सहयोग और पारस्परिक विकास का माध्यम भी हो सकता है।
सम्मेलन के दौरान भारत ने कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) और संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) सहित कई देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ताएँ भी कीं। इन बैठकों का उद्देश्य व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा तथा अन्य पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाना और रणनीतिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करना था।