(36.)Weekly News Update 21-28 june (iran -russia-ukrain war, biochar)

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Weekly News Update (36)

(21 June – 28 June 2026)

 (21 – 28June) ISW, Reuters, Times of Israel

ईरान–अमेरिका समझौता ज्ञापन : इस सप्ताह की प्रगति और उभरती चुनौतियाँ

इस सप्ताह ईरान–अमेरिका समझौता ज्ञापन को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में दो महत्वपूर्ण घटनाएँ सामने आईं। पहली, इज़राइल–लेबनान के बीच युद्धविराम एवं स्थायी शांति की दिशा में हुआ रूपरेखा समझौता (Framework Agreement); तथा दूसरी, ईरान के परमाणु कार्यक्रम के निरीक्षण को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच हुई बातचीत तथा उससे संबंधित घटनाक्रम। इन्हीं दोनों घटनाओं ने इस सप्ताह की सामरिक एवं कूटनीतिक गतिविधियों को प्रमुख रूप से प्रभावित किया।

इज़राइल–लेबनान रूपरेखा समझौता (Framework Agreement)

अमेरिका की मध्यस्थता में इज़राइल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष को स्थायी रूप से समाप्त करने के उद्देश्य से एक रूपरेखा समझौते (Framework Agreement) पर सहमति बनी। इस समझौते में 14 बिंदुओं पर सहमति बनी है, जिनकी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं –

समझौते के मुख्य बिंदु

  • दोनों देश युद्ध की स्थिति समाप्त कर स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमत हुए हैं। पूरे लेबनान पर केवल लेबनानी सरकार का अधिकार होगा। केवल लेबनानी राज्य और उसकी सेना को हथियार रखने (Monopoly of Arms) तथा बल प्रयोग का अधिकार होगा। हिज़्बुल्लाह सहित सभी गैर-सरकारी सशस्त्र संगठनों के हथियार हटाए जाएंगे और उनकी सैन्य संरचना समाप्त की जाएगी। लेबनानी सशस्त्र बल (LAF) चरणबद्ध रूप से पूरे देश, विशेषकर दक्षिणी लेबनान, की सुरक्षा का दायित्व संभालेंगे। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने पर इज़राइल रक्षा बल (IDF) क्रमिक रूप से लेबनान से वापस लौटेंगे।
  • समझौते के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए अमेरिका की सहायता से एक त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह (Trilateral Military Coordination Group) का गठन किया जाएगा।
  • लेबनानी सशस्त्र बल (LAF) को प्रशिक्षण, संसाधन तथा अंतरराष्ट्रीय सहायता उपलब्ध कराकर पूरे देश की सुरक्षा संभालने में सक्षम बनाया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लेबनान के पुनर्निर्माण, आर्थिक सुधार तथा मानवीय सहायता में सहयोग करेगा। गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों तक धन, पुनर्निर्माण सहायता अथवा अन्य संसाधनों की पहुँच रोकी जाएगी। इसी रूपरेखा के आधार पर भविष्य में एक व्यापक शांति एवं सुरक्षा समझौता (Comprehensive Peace and Security Agreement) तैयार किया जाएगा। दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शत्रुतापूर्ण गतिविधियों को कम करेंगे तथा बंदियों की रिहाई और मृतकों के अवशेषों की वापसी जैसे मानवीय विषयों पर सहयोग करेंगे।

(औपचारिक सहमति के 14 बिंदुओं का मूल विवरण:-

  1. इज़राइल और लेबनान प्रत्येक राज्य के शांति के साथ अस्तित्व में रहने के अधिकार तथा पड़ोसी संप्रभु राज्यों के रूप में सुरक्षा के साथ रहने की अपनी पारस्परिक इच्छा की पुष्टि करते हैं। इज़राइल और लेबनान इसके द्वारा यह घोषणा करते हैं कि उनका उद्देश्य अपने बीच के संघर्ष को निर्णायक रूप से समाप्त करना, उसके मूल कारणों का समाधान करना तथा इसके परिणामस्वरूप अपने बीच विद्यमान किसी भी युद्ध की स्थिति का औपचारिक रूप से अंत करना है। यह रूपरेखा, जो दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष वार्ताओं के अनेक दौरों के बाद तैयार हुई है, पूर्व में हुए सफल समझौतों और आपसी समझ पर आधारित है तथा दोनों देशों के बीच सभी लंबित मुद्दों के व्यापक समाधान की दिशा में अपरिवर्तनीय प्रगति करने के दृढ़ संकल्प को व्यक्त करती है। दोनों देश इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे इन सभी मुद्दों का समाधान संप्रभु राज्यों के रूप में, संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता और सहयोग से, प्रत्यक्ष द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से करेंगे।
  2. इज़राइल सरकार और लेबनान सरकार एक आपसी और क्रमबद्ध प्रक्रिया के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिसमें स्पष्ट शर्तें होंगी। इसके तहत लेबनानी सशस्त्र बल (एलएएफ) पूरे लेबनानी क्षेत्र पर प्रभावी संप्रभु अधिकार बहाल करेंगे। यह प्रक्रिया तब तक चलेगी, जब तक गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के हथियार हटाने और उनसे जुड़े बुनियादी ढाँचे को समाप्त करने की पुष्टि नहीं हो जाती, जिससे इज़राइल रक्षा बल (आईडीएफ) धीरे-धीरे लेबनानी क्षेत्र से हट सकें। इस प्रक्रिया का विवरण एक सुरक्षा परिशिष्ट में दिया जाएगा, जिसे अमेरिका के पूर्ण समर्थन से तैयार किया जाएगा और जो इस रूपरेखा का पूरक होगा। यह रूपरेखा इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक उपाय, सुरक्षा व्यवस्था और सत्यापन तंत्र निर्धारित करेगी। इस रूपरेखा के सफल कार्यान्वयन से दोनों देशों के बीच स्थिर और शांतिपूर्ण संबंधों का मार्ग प्रशस्त होगा तथा आईडीएफ को लेबनानी क्षेत्र से हटने में सहायता मिलेगी।
  3. सुरक्षा परिशिष्ट के अनुसार तथा लेबनानी सरकार की हथियारों पर एकाधिकार और पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने के व्यापक प्रयास के अंतर्गत, लेबनानी सशस्त्र बल (एलएएफ) चरणबद्ध रूप से पायलट क्षेत्रों में पूर्ण और प्रभावी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे। यह आईडीएफ और एलएएफ की चरणबद्ध तथा सत्यापित पुनर्तैनाती की प्रक्रिया होगी। आईडीएफ और एलएएफ दो प्रारंभिक क्षेत्रों पर सहमत हो चुके हैं तथा भविष्य के पायलट क्षेत्रों पर भी आपसी सहमति से निर्णय लिया जाएगा। इन क्षेत्रों में गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के सफल निरस्त्रीकरण तथा उनके ढाँचे के समाप्त होने की पुष्टि के बाद एलएएफ वहाँ पूर्ण और प्रभावी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे। अंतरराष्ट्रीय समर्थन से पुनर्निर्माण कार्य आरम्भ होंगे तथा लेबनानी नागरिक सरकारी अधिकारियों के नियंत्रण में सुरक्षित रूप से अपने क्षेत्रों में लौट सकेंगे। संयुक्त राज्य अमेरिका इस पूरी प्रक्रिया के सत्यापन और सहयोग के लिए दोनों देशों के साथ कार्य करने का इरादा रखता है।
  4. लेबनान सरकार अपने पूरे क्षेत्र पर पूर्ण संप्रभु अधिकार पुनः स्थापित करने और उसका प्रयोग करने के अपने दृढ़ संकल्प की पुनः पुष्टि करती है। लेबनान सरकार बल प्रयोग पर सरकार के एकाधिकार को पुनः स्थापित करेगी, सभी गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों का पूर्ण तथा सत्यापित निरस्त्रीकरण करेगी तथा यह सुनिश्चित करेगी कि ऐसे समूहों की लेबनान में कहीं भी कोई सैन्य अथवा सुरक्षा संबंधी भूमिका और कोई सशस्त्र क्षमता न रहे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए लेबनान सरकार अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय तथा विशेष रूप से अरब देशों से सहायता का अनुरोध करती है।
  5. इज़राइल सरकार इस बात पर बल देती है कि लेबनान में उसकी सैन्य कार्रवाई पूरी तरह गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों, विशेषकर हिज़्बुल्लाह, के हमलों, उनके द्वारा उत्पन्न खतरे तथा उनके शत्रुतापूर्ण इरादों का परिणाम है। इज़राइल सरकार का कहना है कि पूरे लेबनान में ऐसे समूहों के निरस्त्रीकरण और उन्हें समाप्त करने तथा दोनों देशों के बीच सहमत अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्थाओं के माध्यम से इस खतरे को समाप्त कर दिया जाएगा। इसके बाद लेबनान में इज़राइल रक्षा बलों (आईडीएफ) की भविष्य की किसी भी सैन्य कार्रवाई अथवा उपस्थिति की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। उपर्युक्त तथ्यों के अनुसार इज़राइल सरकार यह घोषणा करती है कि लेबनान में उसका कोई क्षेत्रीय उद्देश्य नहीं है।
  6. लेबनान सरकार संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार तथा अपने संप्रभु अधिकार का प्रयोग करते हुए पुनः पुष्टि करती है कि लेबनान की सुरक्षा और रक्षा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उसके सुरक्षा बलों की है तथा युद्ध अथवा शांति स्थापित करने का पूर्ण संप्रभु अधिकार केवल लेबनान सरकार के पास है। लेबनान सरकार किसी भी देश अथवा गैर-सरकारी समूह द्वारा उसकी स्पष्ट स्वीकृति के बिना उसकी ओर से बल प्रयोग करने के किसी भी दावे को अस्वीकार करती है तथा पुनः दोहराती है कि किसी भी देश अथवा गैर-सरकारी समूह द्वारा सैन्य अथवा सुरक्षा संबंधी भूमिका निभाने का कोई भी दावा लेबनान सरकार के निर्णयों के अनुसार अवैध तथा लेबनान के राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध है।
  7. लेबनान सरकार और इज़राइल सरकार पुष्टि करती हैं कि इस रूपरेखा में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उन्हें संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा लागू अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार आत्मरक्षा के अपने स्वाभाविक अधिकार का प्रयोग करने से रोके। दोनों यह भी पुनः पुष्टि करते हैं कि कोई तीसरा पक्ष उनकी ओर से इस अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। दोनों सरकारें इस रूपरेखा को पूर्ण रूप से लागू करने के लिए अमेरिकी सहयोग और भागीदारी के साथ एक सैन्य समन्वय समूह स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
  8. दोनों देश पुष्टि करते हैं कि वे सम्पूर्ण लेबनान राज्य की संप्रभुता के अंतर्गत एक सुरक्षित और पुनर्निर्मित लेबनान का साझा लक्ष्य रखते हैं, जहाँ कोई भी गैर-सरकारी सशस्त्र समूह इज़राइल, लेबनान अथवा किसी अन्य देश के नागरिकों के लिए खतरा उत्पन्न न करे। इसके अतिरिक्त दोनों देश स्वीकार करते हैं कि लेबनानी सशस्त्र बलों (एलएएफ) की तैनाती के माध्यम से दक्षिणी लेबनान में सुरक्षा की पुनर्स्थापना, वहाँ की नागरिक आबादी की सुरक्षित वापसी तथा इज़राइल के उत्तरी क्षेत्रों की सुरक्षा, दीर्घकालिक स्थिरता और शांति के लिए आवश्यक है।
  9. लेबनान सरकार एक कठोर और प्रदर्शन-आधारित कार्यक्रम के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे लेबनानी सशस्त्र बलों (एलएएफ) की क्षमता इस स्तर तक विकसित की जा सके कि वे वार्ता की रूपरेखा के अंतर्गत सहमत सुरक्षा व्यवस्थाओं के अनुसार पूरे लेबनान में पूर्ण सैन्य और सुरक्षा नियंत्रण स्थापित कर सकें, सभी गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों का निरस्त्रीकरण लागू कर सकें तथा पूरे लेबनान में प्रभावी अधिकार का प्रयोग कर सकें। लेबनान सरकार ऐसे प्रयासों के समर्थन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की तत्परता का स्वागत करती है। अमेरिका की कोई भी नई सहायता पूर्णतः सत्यापन योग्य उपलब्धियों, पारदर्शिता, प्रदर्शित परिणामों तथा निरंतर निगरानी पर आधारित होगी। यह प्रयास लेबनान की संप्रभुता की सुरक्षित और व्यवस्थित पुनर्स्थापना के साथ-साथ पूरे मध्य-पूर्व की व्यापक स्थिरता और सुरक्षा में भी योगदान देगा।
  10. इसके साथ ही अमेरिका अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को लेबनान सरकार की सहायता के लिए एकजुट करेगा, ताकि देश का पुनर्निर्माण हो सके, आधारभूत संरचना की मरम्मत हो, अर्थव्यवस्था पुनः पटरी पर लौट सके तथा समृद्धि के अवसर उत्पन्न हों। इसमें लेबनान के लिए बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण एवं मानवीय सहायता, आर्थिक सुधार कार्यक्रम तथा निवेश की पहल शामिल होगी, जिससे लेबनान वर्षों के संघर्ष से उबरकर अपने सभी नागरिकों के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण कर सके।
  11. लेबनान और अमेरिका इस बात का संकल्प लेते हैं कि वे गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों से जुड़े किसी भी संगठन अथवा व्यक्ति तक धन नहीं पहुँचने देंगे तथा ऐसे किसी भी संगठन अथवा व्यक्ति की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कानूनी कदम उठाएंगे। लेबनान सरकार स्पष्ट रूप से यह वचन देती है कि वह पुनर्निर्माण के लिए प्राप्त धनराशि को गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों और उनसे जुड़े संगठनों तक नहीं पहुँचने देगी।
  12. इस रूपरेखा पर हस्ताक्षर होने के बाद दोनों देश शांति और सुरक्षा के लिए एक व्यापक समझौते का मसौदा तैयार करने हेतु कार्यदल (वर्किंग ग्रुप) बनाएंगे। साथ ही, रूपरेखा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए दोनों सरकारें अमेरिका की सहायता से तत्काल प्रत्यक्ष वार्ता के अतिरिक्त मार्ग स्थापित करेंगी। दोनों सरकारें पूर्ण निष्ठा के साथ तब तक आगे बढ़ने का संकल्प लेती हैं, जब तक कि पूर्ण एवं स्थायी शांति स्थापित न हो जाए, जिससे इज़राइल और लेबनान के लोगों के लिए सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित हो सके।
  13. स्थिर एवं शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करने के अपने साझा उद्देश्य के अंतर्गत इज़राइल और लेबनान सद्भावपूर्वक ऐसे कदम उठाने का संकल्प लेते हैं, जो सकारात्मक इरादों को प्रदर्शित करें। इनमें अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अथवा कानूनी मंचों पर सभी प्रकार की शत्रुतापूर्ण गतिविधियों को रोकना तथा मारे गए लोगों के अवशेषों की खोज एवं वापसी तथा हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की रिहाई के लिए कार्य करना सम्मिलित है।
  14. दोनों सरकारें दशकों से चले आ रहे संघर्ष को समाप्त करने तथा दोनों देशों के बीच स्थायी स्थिरता और व्यापक शांति स्थापित करने के प्रयासों में अमेरिका की भूमिका को स्वीकार करती हैं तथा राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप की दूरदर्शिता और नेतृत्व के प्रति गहरी सराहना व्यक्त करती हैं।)

इस रूपरेखा समझौते को हिज़्बुल्लाह के नेता नईम क़ासिम ने स्वीकार करने से इनकार करते हुए इसे बेरूत के लिए “अपमानजनक, शर्मनाक तथा संप्रभुता का समर्पण” बताया। दूसरी ओर, समझौते के बाद इज़राइल ने पुनः लेबनान पर हमला किया, जिसे इस रूपरेखा समझौते के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में ईरान दबाव की राजनीति अपनाते हुए होर्मुज़ जलडमरूमध्य तथा परमाणु वार्ता से जुड़े मुद्दों पर विलंब की रणनीति अपनाने का प्रयास करता दिखाई देता है।

यदि इस रूपरेखा समझौते की मूल भावना पर ध्यान दें, तो स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य पूरे लेबनान पर लेबनानी सरकार का प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है, जो उसका वैधानिक एवं संप्रभु अधिकार है। दूसरी ओर, इज़राइल का तर्क यह है कि लेबनान में उसकी सैन्य उपस्थिति केवल गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों, विशेषकर हिज़्बुल्लाह, से उत्पन्न सुरक्षा-चिंताओं के कारण है।

इस दृष्टि से देखें तो इस रूपरेखा समझौते में पहली बार हिज़्बुल्लाह तथा अन्य गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण और उनकी सैन्य संरचना को समाप्त करने का स्पष्ट प्रारूप सामने आया है। यद्यपि समझौते में प्रयुक्त शब्द “गैर-सरकारी सशस्त्र समूह” हैं, किंतु व्यवहारिक रूप से उनका मुख्य संकेत हिज़्बुल्लाह की ओर है। इस संदर्भ में हिज़्बुल्लाह की स्थिति उस खरपतवार के समान प्रतीत होती है, जो स्वयं उगकर अंततः पूरी फसल को अपने घेरे में लेकर उसे नष्ट करने लगता है।

स्वाभाविक रूप से यह संभावना दिखाई देती है कि हिज़्बुल्लाह और ईरान इस रूपरेखा समझौते को लागू होने से रोकने के लिए इज़राइल पर हमलों की तीव्रता बढ़ा सकते हैं अथवा अन्य उपायों का सहारा ले सकते हैं, ताकि इज़राइल की किसी भी त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया को उसके विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिल सके। दूसरी ओर, इस रूपरेखा समझौते के माध्यम से लेबनान सरकार भी पहली बार अपना दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से सामने रख चुकी है।

अब यदि लेबनान अपनी सैन्य क्षमता को सुदृढ़ और प्रभावी बनाता है तथा आवश्यकता पड़ने पर विकसित देशों से प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग प्राप्त करता है अथवा उनसे औपचारिक सहायता का अनुरोध करता है, तो इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। वहीं, इज़राइल से प्रत्यक्ष सैन्य सहायता न माँगने के पीछे लेबनान में संभावित गृहयुद्ध की आशंका भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है।

इसी कारण हिज़्बुल्लाह, लेबनान सरकार के उसे निहत्था करने के प्रयासों को कमजोर करने के उद्देश्य से एक व्यापक सूचना अभियान चला रहा है। वह लगातार यह चेतावनी दे रहा है कि यदि सरकार इस रूपरेखा समझौते को लागू करने का प्रयास करती है, तो लेबनान में पुनः गृहयुद्ध भड़क सकता है। हिज़्बुल्लाह लंबे समय से गृहयुद्ध की आशंका का उपयोग लेबनान सरकार को अपने निरस्त्रीकरण के प्रयासों से रोकने के साधन के रूप में करता रहा है।

शुक्रवार को हिज़्बुल्लाह समर्थकों ने इस रूपरेखा समझौते के विरोध में प्रदर्शन भी किया। उल्लेखनीय है कि दक्षिणी लेबनान, जिसे हिज़्बुल्लाह का प्रमुख गढ़ माना जाता है, शिया मुसलमानों की बहुलता वाला क्षेत्र है।

ईरान–अमेरिका समझौता ज्ञापन के क्रियान्वयन की चुनौतियाँ

इस सप्ताह ईरान–अमेरिका समझौता ज्ञापन (MoU) को लेकर हुई वार्ता के संबंध में अमेरिका ने दावा किया कि ईरान ने अपने परमाणु स्थलों के निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की है। किंतु ईरान ने इस दावे का खंडन कर दिया। आधिकारिक रूप से इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है।

इसके अतिरिक्त, ईरान अमेरिका द्वारा समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर को अपनी कूटनीतिक विजय के रूप में प्रस्तुत कर रहा है तथा इसे अपने देश के भीतर तथा समुदाय में जनसमर्थन और सहानुभूति प्राप्त करने के माध्यम के रूप में भी उपयोग कर रहा है। ईरानी अधिकारियों ने लगातार इस बात से इनकार किया है कि अमेरिका–ईरान समझौता ज्ञापन (MoU) के अंतर्गत मिलने वाले धन के उपयोग पर अमेरिका का किसी प्रकार का नियंत्रण होगा।

दूसरी ओर, ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए वह खाड़ी देशों को अपने पक्ष में करने हेतु सैन्य दबाव और आर्थिक प्रलोभनों दोनों का प्रयोग कर रहा है। किंतु वर्तमान में अधिकांश खाड़ी देश ईरान के इस दबाव का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं। इसी के साथ ईरानी अधिकारी और सरकारी मीडिया अपनी अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण खाड़ी देशों के प्रति अधिक आक्रामक रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं।

इसी क्रम में ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक जहाज़ पर ड्रोन से हमला किया। ईरान का दावा था कि वह जहाज़ उसकी अनुमति के बिना जलडमरूमध्य से गुजरने का प्रयास कर रहा था।

किंतु इसके पीछे वास्तविक विवाद मार्ग के चयन को लेकर है। अमेरिका ओमान के तट के निकट स्थित दक्षिणी समुद्री मार्ग के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है, जबकि तेहरान जो भविष्य में इस जलडमरूमध्य के उपयोग पर शुल्क व्यवस्था लागू करना चाहता है यह चाहता है कि जहाज़ उसके जलक्षेत्र तथा उसके नियंत्रण वाले उत्तरी मार्ग का उपयोग करें। समझौता ज्ञापन (MoU) के संबंधित प्रावधान में यह स्पष्ट किया गया था कि ईरान और ओमान इस जलमार्ग के “भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं” का निर्धारण करेंगे।

ईरान का मत है कि उसे उन व्यावसायिक जहाज़ों की आवाजाही रोकने का अधिकार होना चाहिए, जिनके पास जलडमरूमध्य से गुजरने की स्वीकृति नहीं है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, समझौता ज्ञापन (MoU) का अनुच्छेद पाँच स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी जहाज़ को चाहे वह ईरानी क्षेत्रीय जल से गुजर रहा हो अथवा ओमान के क्षेत्रीय जल से ईरानी अधिकारियों के साथ पूर्ण समन्वय बनाए रखना होगा। इसके विपरीत अमेरिका की व्याख्या भिन्न है। उसका कहना है कि यदि कोई जहाज़ ओमान के क्षेत्रीय जल से गुजर रहा है, तो उसे ईरानी अधिकारियों के साथ समन्वय बनाए रखने की आवश्यकता नहीं है।

इसी विवाद की पृष्ठभूमि में अमेरिका ने शुक्रवार से रविवार के बीच ईरान के दस सैन्य ठिकानों पर हमला किया। इसके प्रत्युत्तर में ईरान ने बहरीन और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर जवाबी कार्रवाई की।

समग्र घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान संघर्ष केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण, आर्थिक हित तथा समझौता ज्ञापन की अलग-अलग व्याख्याएँ अब इस विवाद के प्रमुख आयाम बन चुकी हैं। जब तक इन मूल प्रश्नों पर दोनों पक्षों के बीच स्पष्ट सहमति नहीं बनती, तब तक समझौता ज्ञापन का प्रभावी क्रियान्वयन कठिन प्रतीत होता है।

(22June) mdpi.com, The Hindu

बायोचार : भारतीय कृषि के लिए एक संभावनाशील समाधान

भारत में हरित क्रांति के परिणामस्वरूप फसल उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। किंतु इसके साथ ही एक दीर्घकालिक समस्या भी व्यापक रूप से सामने आई—मृदा की उर्वरता में लगातार कमी तथा पेयजल की उपलब्धता पर बढ़ता दबाव। इसके अतिरिक्त, भारत में प्रतिवर्ष 500 मिलियन टन से अधिक फसल अवशेष (कृषि अपशिष्ट) का उत्पादन होता है, जिनमें से अधिकांश को खेतों में जलाकर नष्ट कर दिया जाता है। इससे न केवल मृदा की उर्वरता और नमी प्रभावित होती है, बल्कि वायु प्रदूषण तथा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।

इन चुनौतियों के समाधान के रूप में हाल के वर्षों में बायोचार भारतीय कृषि के लिए एक संभावनाशील विकल्प बनकर उभरा है। भारत जलवायु-अनुकूल एवं सतत कृषि पद्धतियों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में कृषि एवं जैविक अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधन में परिवर्तित करने की क्षमता के कारण बायोचार विशेष रूप से ध्यान आकर्षित कर रहा है। यह न केवल मृदा की गुणवत्ता में सुधार करता है, बल्कि कार्बन-संचयन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बायोचार

बायोचार (Biochar) एक अत्यधिक छिद्रपूर्ण, कार्बन-समृद्ध पदार्थ है, जो देखने में चारकोल (कोयले) के समान होता है। इसका उत्पादन जैविक बायोमास, जैसे कृषि अपशिष्ट, वानिकी अवशेष तथा खाद्य प्रसंस्करण अपशिष्ट, के ताप-अपघटन द्वारा किया जाता है। बायोचार का निर्माण पायरोलिसिस (Pyrolysis) नामक प्रक्रिया द्वारा होता है, जिसमें ऑक्सीजन-रहित वातावरण में 300°C से 700°C के बीच के उच्च तापमान पर बायोमास को गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया से ठोस बायोचार के साथ-साथ सिनगैस (Syngas) तथा बायो-ऑयल (Bio-oil) जैसे मूल्यवान सह-उत्पाद भी प्राप्त होते हैं, जिनका उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के रूप में किया जा सकता है।

बायोचार की अत्यधिक छिद्रपूर्ण संरचना मिट्टी के कणों को आपस में बाँधने में सहायक होती है। इसके कारण मिट्टी की जल-धारण क्षमता बढ़ती है तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है, जिससे मृदा की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार होता है।

बायोचार के अनुप्रयोग एवं लाभ

खराब हो चुकी मिट्टी में बायोचार मिलाने से फसलों की पैदावार में 10% से 30% तक वृद्धि देखी गई है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ पोषक तत्त्वों की कमी है। साथ ही, यह मिट्टी की जल-धारण क्षमता को 10% से 25% तक बढ़ा देता है, जिससे सूखे और हीट वेव जैसी परिस्थितियों में फसलों को नमी की कमी का सामना करने में सहायता मिलती है।

बायोचार शहरी अपशिष्ट प्रबंधन के लिए भी एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से जैव-अपघटनीय नगरीय ठोस अपशिष्ट(Biodegradable municipal solid waste), जो भारत में प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले लगभग 62 मिलियन टन शहरी कचरे का 50 प्रतिशत से अधिक है, तथा Sewage sludge (मल-कीचड़) का रूपांतरण किया जा सकता है। इससे इन अपशिष्टों को लैंडफिल (Waste dumping sites) में जाने से रोका जा सकता है।

बायोचार वायुमंडलीय कार्बन को एक स्थिर रूप में मृदा में सुरक्षित कर देता है, जहाँ यह सदियों तक बना रह सकता है। इससे कार्बन के मीथेन अथवा CO₂ के रूप में पुनः वायुमंडल में उत्सर्जित होने की संभावना कम हो जाती है। एक टन बायोचार 2.5 से 3 टन CO₂ के बराबर कार्बन का स्थिरीकरण कर सकता है, जिससे यह प्रकृति-आधारित एक प्रभावी जलवायु समाधान के रूप में उभरता है।

भारत में पायरोलिसिस के माध्यम से बायोचार के उत्पादन से सह-उत्पाद के रूप में प्रतिवर्ष लगभग 20–30 मिलियन टन सिनगैस तथा 24–40 मिलियन टन बायो-ऑयल प्राप्त होने की संभावना है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन हैं। इनमें से सिनगैस से प्रतिवर्ष लगभग 8–13 टेरावाट-घंटे (TWh) विद्युत का उत्पादन किया जा सकता है, जबकि बायो-ऑयल 12–19 मिलियन टन डीज़ल अथवा केरोसीन के विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आने के साथ-साथ जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन में 2% से अधिक की कमी लाने में भी सहायता मिल सकती है।बायोचार का उपयोग जल शुद्धिकरण के क्षेत्र में भी किया जा सकता है। रासायनिक रूप से संशोधित प्रिस्टीन बायोचार अपशिष्ट जल के उपचार में क्रोमियम, आर्सेनिक तथा सीसा जैसी विषैली भारी धातुओं को प्रभावी रूप से अवशोषित एवं फिल्टर करने में सक्षम है।

निर्माण क्षेत्र में भी बायोचार का उपयोग संभावनाशील है। कंक्रीट में 2% से 5% तक बायोचार मिलाने से उसकी यांत्रिक शक्ति में सुधार होता है, ऊष्मा प्रतिरोध लगभग 20% तक बढ़ जाता है तथा प्रति घन मीटर कंक्रीट में लगभग 115 किलोग्राम CO₂ का स्थिरीकरण किया जा सकता है।

बायोचार से जुड़े कुछ विचारणीय प्रश्न

अब तक प्रस्तुत जानकारी बायोचार के सकारात्मक पक्ष को सामने लाती है। किंतु किसी भी तकनीक अथवा समाधान को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले उसके व्यवहारिक पक्ष पर विचार करना भी आवश्यक है। तभी उसके वास्तविक स्वरूप और उपयोगिता का सही आकलन किया जा सकता है। इस संदर्भ में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं –

  • बायोचार के उत्पादन के लिए कितनी ऊर्जा और पानी की आवश्यकता होती है? क्या इसकी ऊर्जा आवश्यकता इसके सह-उत्पादों से पूरी की जा सकती है, अथवा इसके लिए बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है?
  • बायोचार के उत्पादन के दौरान उत्पन्न होने वाले सभी सह-उत्पाद और अपशिष्ट क्या उपयोगी होते हैं? यदि नहीं, तो उनका सुरक्षित निस्तारण किस प्रकार किया जाएगा?
  • क्या बायोचार का व्यापक उपयोग भविष्य में किसी नई पर्यावरणीय अथवा कृषि संबंधी समस्या को जन्म दे सकता है, जैसा कि हरित क्रांति के बाद मृदा की उर्वरता और भूजल के अत्यधिक दोहन जैसी समस्याएँ सामने आईं?
  • क्या भारत में उपलब्ध सभी प्रकार के कृषि अवशेषों से समान गुणवत्ता का बायोचार बनाया जा सकता है, अथवा प्रत्येक फसल के लिए अलग तकनीक और अलग मानकों की आवश्यकता होगी?
  • यदि कृषि अवशेषों का उपयोग बड़े पैमाने पर बायोचार उत्पादन में होने लगे, तो क्या पशुओं के चारे, कम्पोस्ट तथा अन्य पारंपरिक उपयोगों पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा?
  • क्या बायोचार का उपयोग सामान्य किसान व्यवहारिक रूप से कर सकता है, अथवा इसका प्रयोग मुख्यतः बड़े औद्योगिक अथवा सामुदायिक स्तर के संयंत्रों तक ही सीमित रहेगा?

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर यह निर्धारित करेंगे कि बायोचार केवल एक संभावनाशील तकनीक है या वास्तव में भारतीय कृषि और पर्यावरण के लिए एक दीर्घकालिक एवं व्यवहारिक समाधान बन सकता है।

अगले अंक में इन्हीं प्रश्नों के आधार पर बायोचार की चुनौतियों, व्यवहारिक पक्ष, भारत में इसकी वर्तमान स्थिति तथा भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से विचार करने का प्रयास किया जाएगा।

 

(22June) csis, businessinsider, papers.ssrn.com, aljazeera

रूस–यूक्रेन युद्ध : बदलती युद्धनीति और रूस पर बढ़ता दबाव

यूक्रेन समय के साथ अपनी युद्धनीति में तेजी से परिवर्तन करते हुए नवीनतम तकनीकों का प्रभावी समायोजन कर रहा है। इसी कारण वह रूस–यूक्रेन युद्ध में रूस पर निरंतर दबाव बनाए रखने में सफल हो रहा है। इसका संकेत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस वक्तव्य से भी मिलता है, जिसमें उन्होंने कहा कि “रूस 2022 के इस्तांबुल समझौतों के आधार पर पुनः शांति वार्ता के लिए तैयार है।”

पहले यह माना जाता था कि उरल पर्वत (Ural Mountains) के पूर्व का क्षेत्र विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहता है। 1812 में नेपोलियन के आक्रमण तथा 1941 में नाज़ी जर्मनी के आक्रमण के समय रूस अपने उद्योगों और नागरिकों को उरल पर्वत के पार स्थानांतरित कर देता था, क्योंकि वहाँ तक शत्रु की पहुँच संभव नहीं थी।

किन्तु अब यह स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। यूक्रेन के ड्रोन रूस के भीतर बहुत दूर तक पहुँचने लगे हैं। अप्रैल 2026 में यूक्रेन ने येकातेरिनबर्ग (Yekaterinburg) पर ड्रोन हमला किया। यह शहर यूक्रेन की सीमा से लगभग 1800 किलोमीटर दूर स्थित रूस के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में से एक है। यूक्रेन का लक्ष्य वहाँ स्थित उस कारखाने को निशाना बनाना था, जहाँ वायु रक्षा प्रणाली (Air Defence System) के पुर्जे निर्मित किए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, हाल ही में रूस की राजधानी में एक महत्त्वपूर्ण बैठक से पूर्व हुए ड्रोन हमले ने भी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी। यूक्रेन रूस के औद्योगिक क्षेत्रों, रक्षा अवसंरचना तथा अन्य महत्त्वपूर्ण संसाधनों को निशाना बनाकर उसे आर्थिक और सामरिक दोनों स्तरों पर कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप वहाँ का सामान्य जनजीवन भी प्रभावित होता दिखाई दे रहा है। युद्ध आरम्भ होने के बाद पहली बार रूस के भीतर इस प्रकार का व्यापक प्रभाव दिखाई दे रहा है। वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो रही है, अनेक दुकानें बंद हो रही हैं, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं, लोग आवश्यक खाद्य सामग्री का भंडारण कर रहे हैं तथा भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंता का वातावरण बढ़ता दिखाई दे रहा है।

रूस ने वर्ष 2026 में एक व्यापक सैन्य अभियान प्रारम्भ किया था, जिसका उद्देश्य डोनबास के शेष भाग पर नियंत्रण स्थापित करना तथा उत्तर और दक्षिण यूक्रेन में आगे बढ़ना था। किंतु यह अभियान अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि “रूस 2022 के इस्तांबुल समझौतों के आधार पर पुनः शांति वार्ता के लिए तैयार है।”

इसके अतिरिक्त, कुछ रिपोर्टों के अनुसार रूस सैन्य स्तर पर भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। बड़ी संख्या में सैनिक सेना छोड़ने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। इसके पीछे अपेक्षित सफलता का अभाव तथा युद्ध के लंबे और अनिश्चित होते जाने से सैनिकों के मनोबल में आई गिरावट को एक कारण माना जा रहा है।

किएल संस्थान (Kiel Institute) तथा स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (Stockholm International Peace Research Institute) से संबंधित आकलनों के अनुसार रूस की अर्थव्यवस्था अभी गहरे संकट में नहीं पहुँची है, किंतु उसकी संरचनात्मक नींव (Structural Foundation) लगातार कमजोर होती जा रही है। पहले यह धारणा थी कि ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर लोग अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं। किंतु अब ड्रोन हमले गाँवों तक भी पहुँचने लगे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध की बदलती प्रकृति के कारण रूस का आंतरिक क्षेत्र भी पहले की भाँति सुरक्षित नहीं रह गया है।

आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप

रूस–यूक्रेन युद्ध यह संकेत देता है कि आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों, टैंकों और मिसाइलों के बल पर नहीं लड़े जा रहे हैं। कम लागत वाले ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, लंबी दूरी तक सटीक प्रहार करने की क्षमता तथा औद्योगिक एवं रसद संरचना को लक्ष्य बनाने जैसी नई रणनीतियाँ युद्ध की प्रकृति को तेजी से बदल रही हैं। यूक्रेन द्वारा अपनाई जा रही युद्धनीति इसी परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

ड्रोन बनाम वायु रक्षा की लागत

आधुनिक युद्ध में एक बड़ा परिवर्तन लागत के स्तर पर भी दिखाई देता है। लंबी दूरी के एकतरफा आक्रमण (One-way Attack) ड्रोन, जैसे शहेद (Shahed) श्रेणी के ड्रोन, की अनुमानित लागत लगभग 20,000 से 50,000 अमेरिकी डॉलर होती है। इसके विपरीत, उन्हें मार गिराने के लिए प्रयुक्त आधुनिक वायु रक्षा मिसाइलों की लागत 10 लाख से 40 लाख अमेरिकी डॉलर तक हो सकती है। उदाहरण के लिए, NASAMS प्रणाली की एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर, जबकि Patriot PAC-3 मिसाइल की कीमत 30 से 40 लाख अमेरिकी डॉलर तक बताई जाती है। परिणामस्वरूप, अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन को नष्ट करने के लिए अत्यधिक महँगे हथियारों का प्रयोग करना पड़ता है। इस प्रकार यूक्रेन रूस पर केवल सैन्य ही नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव भी बना रहा है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध में लागत का असंतुलन (Cost Asymmetry) भी एक महत्त्वपूर्ण सामरिक हथियार बन गया है।

स्वॉर्म (Swarm) ड्रोन रणनीति

यूक्रेन अब बड़ी संख्या में ड्रोन तथा छलावा (Decoy) ड्रोन का एक साथ उपयोग करने की रणनीति अपना रहा है। इस प्रकार के हमलों का उद्देश्य केवल लक्ष्य पर प्रहार करना नहीं, बल्कि रूस की वायु रक्षा प्रणाली को एक साथ अनेक दिशाओं से आने वाले लक्ष्यों में उलझाकर उसकी क्षमता पर दबाव डालना भी है। इस प्रकार के Swarm Attack से वायु रक्षा प्रणाली पर अत्यधिक दबाव (Air Defence Saturation) उत्पन्न होता है, जिससे कुछ ड्रोन सुरक्षा घेरा भेदने में सफल हो सकते हैं।

ड्रोन बनाम टैंक

रूस–यूक्रेन युद्ध यह भी संकेत देता है कि आधुनिक युद्ध में कम लागत वाले ड्रोन अत्यधिक महँगे सैन्य उपकरणों के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। एक साधारण FPV (First Person View) ड्रोन की लागत प्रायः 500 से 1,500 अमेरिकी डॉलर के बीच होती है, जबकि आधुनिक मुख्य युद्धक टैंक (Main Battle Tank) की कीमत 20 लाख से 50 लाख अमेरिकी डॉलर या उससे अधिक हो सकती है। इस प्रकार कुछ सौ डॉलर की लागत वाला ड्रोन कई मिलियन डॉलर मूल्य के सैन्य उपकरण को निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है। इससे युद्ध का आर्थिक संतुलन भी बदल रहा है।

युद्ध का नया लक्ष्य : सप्लाई चेन

यूक्रेन की रणनीति अब केवल अग्रिम मोर्चे पर रूसी सेना का सामना करने तक सीमित नहीं रही है। वह रूस की औद्योगिक आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) को भी निशाना बना रहा है। इसके अंतर्गत रक्षा कारखाने, तेल भंडारण केंद्र, गोला-बारूद भंडार, रेलवे नेटवर्क, पुल, हवाई अड्डे तथा अन्य महत्त्वपूर्ण सैन्य एवं औद्योगिक अवसंरचना को लक्ष्य बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल तत्काल सैन्य क्षति पहुँचाना नहीं, बल्कि रूस की दीर्घकालिक युद्ध क्षमता, रसद व्यवस्था तथा औद्योगिक उत्पादन को प्रभावित करना है।

अब तक के घटनाक्रम से इतना स्पष्ट दिखाई देता है कि यूक्रेन आधुनिक तकनीकों के प्रभावी उपयोग द्वारा रूस पर लगातार दबाव बनाए रखने में सफल हो रहा है। इसके कारण रूस को अब केवल युद्ध के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक क्षेत्रों, औद्योगिक ढाँचे और अर्थव्यवस्था की सुरक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना पड़ रहा है।

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