(37.)Weekly News Update 29 june -11 JULY (Qick Commerce, Synthetic cell, Ai UN report, Iran war)

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Weekly News Update (37)

(29 June – 11 July 2026)

 (29June) Business Standard

क्विक कॉमर्स : प्रौद्योगिकी, उपभोक्तावाद और बदलती मानव चेतना

क्रमविकास की प्रक्रिया में जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि का विकास होता गया, वैसे-वैसे वह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग दिशाओं में प्रवृत्त होती गई। एशिया महाद्वीप में मनुष्य का स्वभाव अपेक्षाकृत अंतर्मुखी होने के कारण उसकी बुद्धि धर्म से आगे बढ़कर अध्यात्म की ओर अग्रसर हुई। वहीं पश्चिम का स्वभाव अपेक्षाकृत बहिर्मुखी होने के कारण उसने भौतिक प्रकृति के रहस्यों की खोज को अपना प्रमुख विषय बनाया। अपनी प्रारंभिक अवस्था में विज्ञान का उद्देश्य प्रकृति के नियमों को जानना, समझना और उन्हें मानव जीवन के कल्याण में उपयोग करना था। किन्तु जैसे-जैसे वैज्ञानिक और तकनीकी विकास आगे बढ़ा, वैसे-वैसे मानवीय स्वभाव की दुर्बलताएँ जैसे लोभ, लालच, स्वार्थ और महत्त्वाकांक्षा भी उस पर प्रभाव डालने लगीं। परिणामस्वरूप विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक बड़ा भाग ज्ञानार्जन और मानव सहायता के साथ-साथ आर्थिक हितों, बाज़ार के विस्तार और उपभोग को बढ़ाने का साधन भी बनता गया। आज तकनीकी विकास ऐसे चरण में पहुँच चुका है जहाँ वह केवल मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उसके व्यवहार, पसंद और उपभोग संबंधी निर्णयों को भी प्रभावित एवं संचालित करने वाली शक्ति के रूप में उभर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और एल्गोरिद्म (Algorithm) आधारित प्रणालियाँ लोगों की रुचियों, आदतों और आवश्यकताओं का निरंतर विश्लेषण करती हैं। इतना ही नहीं, वे व्यक्तिगत अनुशंसाओं, लक्षित विज्ञापनों और आकर्षक प्रस्तावों के माध्यम से नई-नई उपभोग आवश्यकताओं का भी निर्माण करती हैं।

इसी तकनीकी और बाज़ारोन्मुखी विकास की नवीनतम अभिव्यक्तियों में ई-कॉमर्स तथा उससे आगे विकसित हुआ क्विक कॉमर्स प्रमुख हैं। विशेष रूप से क्विक कॉमर्स का विस्तार विश्वभर में तीव्र गति से हो रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश में क्विक कॉमर्स के तीव्र विस्तार ने एक ओर उपभोक्ताओं की खरीदारी की आदतों में उल्लेखनीय परिवर्तन किए हैं, तो दूसरी ओर पारंपरिक बाज़ार व्यवस्था, विशेषकर किराना दुकानों और छोटे खुदरा व्यापारियों के सामने गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी हैं।

क्विक कॉमर्स क्या है?

इस प्रौद्योगिकी-संचालित, उपभोक्तावादी और एल्गोरिद्म-आधारित व्यवस्था का सबसे प्रभावशाली रूप है—क्विक कॉमर्स। इसे समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि क्विक कॉमर्स वास्तव में क्या है और यह किस प्रकार कार्य करता है।

क्विक कॉमर्स (Quick Commerce), जिसे प्रायः क्यू-कॉमर्स (Q-Commerce) भी कहा जाता है, ई-कॉमर्स का तीव्र गति से विकसित हो रहा व्यवसाय मॉडल है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं तक 10 से 30 मिनट के भीतर सीमित मात्रा में आवश्यक वस्तुओं की डिलीवरी करना है। प्रारंभ में इसका दायरा मुख्यतः किराने के सामान, घरेलू उपयोग की वस्तुओं तथा ताज़े फल एवं सब्ज़ियों तक सीमित था, किंतु अब इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, दवाइयाँ तथा अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी तेजी से शामिल होती जा रही हैं।

इस मॉडल की पूरी व्यवस्था अति-स्थानीय (Hyperlocal) लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पर आधारित होती है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में डार्क स्टोर्स (Dark Stores) अथवा माइक्रो-फुलफिलमेंट सेंटर स्थापित किए जाते हैं, जहाँ से आसपास के सीमित क्षेत्र में त्वरित आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है।

इन डार्क स्टोर्स में भंडारण की क्षमता सीमित होने के कारण कंपनियाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत एल्गोरिद्म की सहायता से स्थानीय उपभोक्ताओं की मांग का निरंतर विश्लेषण करती हैं। इसी विश्लेषण के आधार पर आवश्यक वस्तुओं का भंडारण, ऑर्डरों की शीघ्र पैकिंग तथा त्वरित वितरण सुनिश्चित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, क्विक कॉमर्स की संपूर्ण व्यवस्था डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एल्गोरिद्म-आधारित प्रबंधन पर आधारित होती है।

क्विक कॉमर्स के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक आधार

क्विक कॉमर्स और ई-कॉमर्स के तीव्र विस्तार का एक महत्त्वपूर्ण कारण पारंपरिक बाज़ार में वस्तुओं की गुणवत्ता और मूल्य निर्धारण को लेकर उपभोक्ताओं के मन में बढ़ता अविश्वास भी है। लाभ-केंद्रित प्रवृत्ति के बढ़ते प्रभाव के कारण पारंपरिक बाज़ार के एक बड़े वर्ग ने अनेक मामलों में गुणवत्ता की अपेक्षा अधिक लाभ को प्राथमिकता देना प्रारंभ कर दिया। परिणामस्वरूप वस्तुओं की गुणवत्ता से समझौता होने लगा। इसके साथ ही उपभोक्ताओं के मन में यह धारणा भी गहराती गई कि अधिक मूल्य वाली वस्तु ही अधिक गुणवत्तापूर्ण होती है। धीरे-धीरे वस्तुओं का मूल्य उनकी वास्तविक उपयोगिता और गुणवत्ता के स्थान पर उनके ब्रांड, पैकेजिंग और बाज़ार में निर्मित छवि के आधार पर निर्धारित होने लगा। विदेशी अथवा सामान्य बोलचाल से भिन्न नाम भी इस प्रवृत्ति को और अधिक बल देने लगे।

इसके अतिरिक्त आधुनिक जीवन की बढ़ती यांत्रिकता और व्यस्तता ने भी क्विक कॉमर्स के विस्तार को गति प्रदान की है। आज अनेक लोगों के पास दैनिक आवश्यकताओं की खरीदारी के लिए पर्याप्त समय नहीं रह गया है। ऐसे में घर बैठे कम समय में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता स्वाभाविक रूप से आकर्षक प्रतीत होती है।

किन्तु प्रश्न यह उठता है कि यदि कम समय में घर बैठे आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध हो जाएँ और समय की बचत भी हो, तो इसमें हर्ज ही क्या है? निस्संदेह, यह एक सकारात्मक उपलब्धि है। यदि समय की इस बचत का उपयोग आत्मविकास,  समाज अथवा किसी रचनात्मक कार्य के लिए किया जाए, तो इससे व्यक्ति और समाज दोनों का ही कल्याण हो सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब जीवन का केंद्र आत्मविकास के स्थान पर बाह्य उपभोग और मनोरंजन बन जाता है। ऐसी स्थिति में समय की बचत भी अंततः अधिक उपभोग और मनोरंजन का साधन बन जाती है।

आधुनिक डिजिटल प्रौद्योगिकी ने इन मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को और अधिक सशक्त बना दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एल्गोरिद्म-आधारित प्रणालियाँ उपभोक्ताओं की रुचियों का विश्लेषण करके व्यक्तिगत सुझाव, सीमित अवधि के प्रस्ताव(Limited time Deal), पुश-नोटिफिकेशन तथा कैशबैक जैसी रणनीतियों के माध्यम से न केवल उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं, बल्कि नई आवश्यकताओं और तात्कालिक उपभोग की प्रवृत्तियों को भी निरंतर प्रोत्साहित करती हैं। परिणामस्वरूप यही मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियाँ एल्गोरिद्म-संचालित उपभोक्तावादी बाज़ार व्यवस्था से जुड़कर क्विक कॉमर्स जैसे मॉडल के तीव्र विस्तार का आधार बन जाती हैं।

पारंपरिक बाज़ार पर प्रभाव

क्विक कॉमर्स के तीव्र विस्तार का सबसे स्पष्ट प्रभाव पारंपरिक किराना दुकानों पर दिखाई देता है। अखिल भारतीय व्यापारी संघ (CAIT) के श्वेत पत्र के अनुसार, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पारंपरिक किराना व्यापार के लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्से पर अधिकार कर चुके हैं। ग्राहकों की संख्या में आई इस गिरावट के कारण देश की लगभग 3 करोड़ लघु खुदरा दुकानों में से लगभग एक-चौथाई वित्तीय संकट के कगार पर पहुँच गई हैं।

वास्तव में यह प्रतिस्पर्धा समान स्तर की नहीं है। एक ओर पारंपरिक किराना दुकानदार अपनी सीमित पूँजी और संसाधनों के साथ व्यापार कर रहा है, जबकि दूसरी ओर क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एल्गोरिद्म, विशाल विज्ञापन बजट, व्यक्तिगत सुझावों, पुश-नोटिफिकेशन और कैशबैक जैसी रणनीतियों के माध्यम से उपभोक्ताओं को निरंतर अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में छोटे व्यापारियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।

इसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। भारतीय समाज में किराना दुकानें केवल वस्तुओं के क्रय-विक्रय का केंद्र नहीं रही हैं, बल्कि वे सामाजिक विश्वास, आवश्यकता के समय उधार तथा स्थानीय सहयोग की भी एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था रही हैं। यदि धीरे-धीरे स्थानीय खुदरा व्यवस्था का स्थान ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म लेने लगें, तो इसका प्रभाव केवल व्यापार पर ही नहीं, बल्कि समाज के इस स्थानीय सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने पर भी पड़ेगा।

निष्कर्ष

जिस गति से विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है तथा वे मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि भविष्य में क्विक कॉमर्स जैसे अनेक नए व्यावसायिक मॉडल सामने आएँगे और उनके स्वरूप भी निरंतर बदलते रहेंगे। इसलिए मूल प्रश्न किसी एक तकनीक या व्यवसाय मॉडल का नहीं है, बल्कि उस चेतना का है जिसके आधार पर उनका विकास और उपयोग किया जा रहा है।

जैसा कि हमने देखा, आज अधिकांश तकनीकी विकास का संचालन उपयोगितावाद, उपभोक्तावाद और व्यावसायिक हितों की दृष्टि से हो रहा है। परिणामस्वरूप विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक बड़ा भाग मानव की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति से आगे बढ़कर नई-नई आवश्यकताओं और उपभोग की प्रवृत्तियों का निर्माण करने लगा है।

अतः समाधान विज्ञान, प्रौद्योगिकी या क्विक कॉमर्स का विरोध करने में नहीं, बल्कि उस मूल प्रेरक तत्व को बदलने में है जो इनके विकास और उपयोग का मार्ग निर्धारित करता है। जब तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का संचालन मनुष्य के आंतरिक विकास, नैतिक मूल्यों और व्यापक चेतना से अनुप्राणित नहीं होगा, तब तक उनके शुभ परिणाम सदैव सीमित रहेंगे और उनसे उत्पन्न होने वाली समस्याएँ किसी-न-किसी नए रूप में हमारे सामने आती रहेंगी।

(2 July) Quanta Magazine

क्या प्रयोगशाला में जीवन बनाया जा सकता है? : सिंथेटिक सेल की ऐतिहासिक उपलब्धि और भविष्य की संभावनाएँ

अरबों साल पहले पृथ्वी पर निर्जीव रसायनों से सजीव कोशिकाएँ कैसे बनीं (जिसे Abiogenesis कहते हैं), यह विज्ञान के लिए आज भी एक रहस्य है। निर्जीव चीज़ों से जीवित चीज़ बनाने की दिशा में विज्ञान ने एक आशाजनक कदम बढ़ाया है। पहली बार, बायोलॉजिस्ट ने एक सेल जैसी झिल्ली (Membrane) के अंदर निर्जीव चीज़ों (आणविक घटकों Molecular Components) को एक-एक करके डाला और देखा कि मॉलिक्यूल्स का वह समूह किसी जीवित चीज़ की तरह व्यवहार करने लगा। लैब में बनी इस सिंथेटिक कोशिका(cell) ने विकास किया, अपने DNA की कॉपी बनाई और विभाजित हुई, जिससे सेल साइकिल के बुनियादी काम दिखाई दिए।

कृत्रिम कोशिका कैसे बनाई गई?

सबसे पहले वसा (Fat) की मदद से पानी के एक छोटे बुलबुले जैसी संरचना बनाई गई, जिसे लिपोसोम (Liposome) कहते हैं। इसने सेल की बाहरी दीवार (Membrane) का काम किया। इस बुलबुले के अंदर प्रोटीन बनाने वाला एक रेडीमेड सिस्टम डाला गया, जिसे PURE कहते हैं। साथ ही इसमें 90,000 बेस पेयर्स वाला एक छोटा कृत्रिम DNA डाला गया, जिसमें सेल को चलाने के निर्देश थे।

इस सेल में भोजन पचाने (Metabolism) के जीन नहीं थे। इसलिए वैज्ञानिकों ने बाहर से छोटे ‘फीडर बुलबुले’ छोड़े, जिनमें शुगर, लिपिड और जरूरी एंजाइम भरे थे। सेल के डीएनए ने अल्फा-हेमोलिसिन नाम का प्रोटीन बनाया, जो सेल की सतह पर ‘हुक’ बन गया। इस हुक ने फीडर बुलबुलों को खींचकर खुद में मिला लिया, जिससे सेल को पोषण मिला और वह बड़ा हुआ।

बड़ा होने पर सेल ने Phi29 नाम के एंजाइम का उपयोग करके अपने पूरे डीएनए की एक और कॉपी तैयार कर ली। असली कोशिकाएँ विभाजन (Cell Division) के लिए आंतरिक ढाँचे (Cytoskeleton) का उपयोग करती हैं, जिसे कृत्रिम सेल में बनाना मुश्किल था। वैज्ञानिकों ने इसके विकल्प के रूप में सेल की दीवार पर खास प्रोटीन जमा किए। इन प्रोटीनों के अत्यधिक एकत्र होने से मेम्ब्रेन पर इतना भौतिक दबाव (Physical Pressure) बना कि सेल खुद-ब-खुद खिंचकर दो भागों में विभाजित हो गया।

इस प्रयोग की सीमाएँ और चुनौतियाँ (Limitations & Challenges)

हालाँकि यह अब तक का सबसे जीवंत कृत्रिम सेल है, लेकिन यह अभी असली जीवन से बहुत दूर है, क्योंकि—

यह आत्मनिर्भर (Self-Sustaining) नहीं है: यह सेल खुद अपना भोजन या ऊर्जा पैदा नहीं कर सकता। इसे जीवित रहने और बढ़ने के लिए लगातार वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए ‘सप्लाई पैक्स’ और फीडर बुलबुलों पर निर्भर रहना पड़ता है।

राइबोसोम नहीं बना सकता: असली कोशिकाएँ अपने प्रोटीन बनाने वाले कारखाने राइबोसोम (Ribosomes) खुद बनाती हैं। यह कृत्रिम सेल ऐसा नहीं कर सकता; इसे राइबोसोम बाहर से देने पड़ते हैं।

ऊर्जा की अधिक खपत: इसमें आंतरिक ढाँचा (Cytoskeleton) न होने के कारण, विभाजित होने के लिए इसकी सतह पर प्रोटीनों का अत्यधिक एकत्र होना आवश्यक होता है। इस प्रक्रिया में इसे अधिक समय और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।

प्राकृतिक विकास (Evolution) की कमी: विकास के लिए डीएनए में स्वाभाविक रूप से कुछ गलतियाँ (Mutations) होना आवश्यक है। लेकिन इस सेल का डीएनए कॉपी करने वाला तंत्र इतना सटीक है कि वह लगभग कोई गलती करता ही नहीं। इसलिए यह सेल प्राकृतिक रूप से अपने वातावरण के अनुसार स्वयं को बदल (Evolve) नहीं सकता। वैज्ञानिकों को अभी ” Order and Chaos ” (व्यवस्था और अराजकता) के बीच वह संतुलन (Sweet Spot) खोजना है, जहाँ डीएनए की प्रतिलिपि बनाते समय एंजाइम सीमित मात्रा में त्रुटियाँ करे, लेकिन इतनी नहीं कि सेल नष्ट हो जाए।

सीमाएँ, संभावनाएँ और भविष्य के प्रश्न

प्रयोगकर्ताओं का कहना है कि भले ही यह सेल अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर न हो, लेकिन इसने यह सिद्ध कर दिया है कि रसायनों को उचित ढंग से संयोजित करके प्रयोगशाला में जीवन जैसी प्रक्रियाएँ आरम्भ की जा सकती हैं। साथ ही, यदि केवल रासायनिक अणुओं और जैविक प्रक्रियाओं से जीवन जैसी अनेक विशेषताएँ उत्पन्न की जा सकती हैं, तो जीवन की व्याख्या के लिए किसी अतिरिक्त रहस्यमय शक्ति (Vital Force) की आवश्यकता मानने का आधार पहले की अपेक्षा कमजोर पड़ता है।

हालाँकि, यह उपलब्धि कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने रखती है। यदि भविष्य में इस प्रकार के प्रयोग पूरी तरह सफल हो जाते हैं, तो उनके वैज्ञानिक, सामाजिक और नैतिक प्रभाव दूरगामी होंगे। जीवन की कृत्रिम रचना की संभावना कोई बिल्कुल नया विचार नहीं है। श्रीअरविन्द ने भी इस दिशा में संभावना व्यक्त करते हुए लिखा है—

“…मैं यह भी कहने का साहस करूँगा कि किसी दिन उचित परिस्थितियों में जीवन की सृष्टि करना भी संभव हो जाएगा।”(CWSA vol. 35, pg 411-412)

यदि भविष्य में प्रयोगशालाओं में जीवन का निर्माण संभव हो जाता है, तो वैज्ञानिक के लिए अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न गुणों और क्षमताओं वाले जीवों का निर्माण करना संभव हो सकता है। तब प्रश्न उठेगा कि जीवन का स्वरूप और उसकी परिभाषा क्या होगी? यह भी विचारणीय है कि आज बदलते पर्यावरण, प्रदूषण और अन्य कारणों से विश्व में प्रजनन दर लगातार घट रही है। यदि भविष्य में यह प्रवृत्ति और गंभीर होती है, तो जीवन को बनाए रखने के संभावित विकल्पों में ऐसी तकनीकों की भूमिका पर भी विचार करना पड़ सकता है। यद्यपि वर्तमान में यह केवल एक संभावित संभावना है, फिर भी इस दिशा में हो रहे शोध भविष्य के लिए अनेक नए प्रश्न और संभावनाएँ खोल रहे हैं।

 

(2 July) Reuters, The Hindu

संयुक्त राष्ट्र की AI रिपोर्ट: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तीव्र विकास के साथ बढ़ते वैश्विक जोखिम

संयुक्त राष्ट्र (UN) के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर गठित स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट जारी करते हुए चेतावनी दी है कि AI की क्षमताएँ वैज्ञानिक समझ, नीतिगत तैयारी तथा नियामक ढाँचों की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से विकसित हो रही हैं। यदि इस परिवर्तन के अनुरूप वैश्विक शासन व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो भविष्य में यह तकनीक आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंधी अनेक गंभीर जोखिम उत्पन्न कर सकती है। रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं –

क्षमता (Capability) शासन (Governance) से आगे निकल गई है

रिपोर्ट के अनुसार AI की क्षमताएँ अत्यंत तीव्र गति से विकसित हो रही हैं। जो AI प्रणालियाँ कुछ समय पहले तक कठिन गणितीय अथवा तार्किक प्रश्नों को हल करने में सक्षम नहीं थीं, वे अब लगभग 19% से बढ़कर 88% सफलता तक पहुँच चुकी हैं। इसके अतिरिक्त AI अब शोध कर सकती है, प्रोग्राम लिख सकती है, वेबसाइट बना सकती है तथा जटिल डेटा विश्लेषण भी कर सकती है। इन क्षमताओं की जटिलता लगभग प्रत्येक 4–7 महीनों में दोगुनी हो रही है। इसके विपरीत सरकारों को नए कानून और नियामक ढाँचे तैयार करने में कई वर्ष लग जाते हैं। यही असंतुलन रिपोर्ट की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है।

AI अब अपने मूल्यांकन को पहचानने लगी है (Evaluation Awareness)

रिपोर्ट में Evaluation Awareness नामक एक नई प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया है। इसका अर्थ यह है कि यदि AI को यह आभास हो जाए कि उसका परीक्षण किया जा रहा है, तो वह अपना व्यवहार बदल सकती है। ऐसी स्थिति में उसकी वास्तविक क्षमताओं और संभावित जोखिमों का सही आकलन करना कठिन हो सकता है।

AI शक्ति कुछ देशों में केंद्रित होती जा रही है (Compute Divide)

उन्नत AI प्रणालियों के विकास के लिए विशाल सुपरकंप्यूटर, उच्च क्षमता वाले GPU, पर्याप्त विद्युत आपूर्ति और बड़े पैमाने पर डेटा की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 75% कंप्यूटिंग क्षमता अमेरिका के पास, लगभग 15% चीन के पास तथा शेष विश्व के पास केवल लगभग 10% क्षमता है। इससे AI के विकास और नियंत्रण का केंद्र कुछ ही देशों तक सीमित होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

निजी कंपनियाँ सरकारों से अधिक प्रभावशाली होती जा रही हैं

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 91% बड़े AI मॉडल निजी कंपनियों द्वारा विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें OpenAI, Google, Anthropic और Meta जैसी कंपनियाँ प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप AI के भविष्य की दिशा निर्धारित करने में सरकारों की अपेक्षा निजी कंपनियों की भूमिका अधिक प्रभावशाली होती जा रही है।

हार्डवेयर पर भी कुछ कंपनियों का प्रभुत्व

उन्नत AI प्रणालियों के लिए विशेष प्रकार की चिपों और उपकरणों की आवश्यकता होती है। इस क्षेत्र में NVIDIA (AI चिप डिज़ाइन), TSMC (चिप निर्माण) तथा ASML (लिथोग्राफी मशीन) जैसी कंपनियों का अपने-अपने क्षेत्रों में लगभग 80% बाज़ार पर नियंत्रण है। यदि इन कंपनियों की आपूर्ति शृंखला में कोई बाधा उत्पन्न होती है, तो उसका प्रभाव वैश्विक AI विकास पर पड़ सकता है।

अधिकांश देश AI संबंधी निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 118 देश AI नीति निर्माण से संबंधित प्रमुख वैश्विक बैठकों में शामिल ही नहीं हैं। इनमें विशेष रूप से अफ्रीका, दक्षिण एशिया तथा लैटिन अमेरिका के अनेक देश सम्मिलित हैं। ऐसी स्थिति में AI से संबंधित नियम कुछ देशों द्वारा बनाए जाएँगे, जबकि उनका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

AI Divide केवल इंटरनेट तक सीमित नहीं रहा

रिपोर्ट के अनुसार पहले Digital Divide का आशय मुख्यतः इंटरनेट की उपलब्धता से था, किंतु अब AI Divide चार स्तरों पर दिखाई देता है—पहला, सुपरकंप्यूटर और कंप्यूटिंग क्षमता किसके पास है; दूसरा, AI विशेषज्ञ और प्रतिभा कहाँ केंद्रित है; तीसरा, किन देशों के पास प्रभावी AI शासन और कानून हैं; तथा चौथा, AI अनुप्रयोगों का वास्तविक लाभ किन समाजों और देशों तक पहुँच रहा है।

भाषाई असमानता भी एक गंभीर चुनौती

विश्व में लगभग 7000 भाषाएँ बोली जाती हैं, किंतु AI अभी भी सीमित भाषाओं में ही अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती है। रिपोर्ट में उदाहरण दिया गया है कि तिग्रिन्या (इथियोपिया) भाषा में Smallpox का अनुवाद Syphilis तथा Intravenous antibiotics का अनुवाद Intravenous pesticide कर दिया गया। चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इस प्रकार की त्रुटियाँ गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं और मानव जीवन के लिए भी खतरा बन सकती हैं।

Agentic AI का उदय

पहले AI मुख्यतः प्रश्नों के उत्तर देने तक सीमित थी, जबकि अब Agentic AI स्वयं किसी कार्य की योजना बना सकती है, कोड लिख सकती है, उसका परीक्षण कर सकती है, त्रुटियों को ठीक कर सकती है तथा वेबसाइट जैसे प्रोजेक्ट को संचालित भी कर सकती है। अर्थात AI केवल सुझाव देने तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्वयं कार्य निष्पादित करने की दिशा में भी अग्रसर हो रही है।

साइबर सुरक्षा के लिए बढ़ता खतरा

रिपोर्ट के अनुसार AI जहाँ अनेक उपयोगी कार्यों को अधिक कुशल बना सकती है, वहीं वह साइबर हमलों को भी अधिक प्रभावी बना सकती है। AI सॉफ़्टवेयर की कमजोरियाँ खोज सकती है, दुर्भावनापूर्ण कोड या वायरस तैयार करने में सहायता कर सकती है तथा साइबर आक्रमणों की क्षमता बढ़ा सकती है। इसी कारण इसे Dual-use Technology माना जाता है, जिसका उपयोग लाभकारी और हानिकारक दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

Deepfake और Fake Reality का संकट

रिपोर्ट के अनुसार AI के कारण सत्य और असत्य के बीच अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है। इसमें तीन प्रमुख जोखिमों का उल्लेख किया गया है। पहला, Epistemic Erosion, अर्थात लोगों का सत्य की पहचान करने की क्षमता और विश्वास कमजोर होना। दूसरा, Liar’s Dividend, जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति वास्तविक वीडियो को भी Deepfake बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर सकता है। तीसरा, Synthetic Consensus, जिसमें AI हजारों नकली पोस्ट और संदेश तैयार करके यह भ्रम उत्पन्न कर सकती है कि पूरी जनता किसी एक मत का समर्थन कर रही है, जबकि वास्तविकता भिन्न हो सकती है।

AI की चापलूसी (Sycophancy)

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ AI प्रणालियाँ उपयोगकर्ता को संतुष्ट रखने के लिए तथ्यात्मक रूप से गलत बातों का भी समर्थन कर देती हैं। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है, क्योंकि AI का उद्देश्य सत्य और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करना होना चाहिए, न कि केवल उपयोगकर्ता को प्रसन्न करना।

मानवाधिकार संबंधी चुनौतियाँ

रिपोर्ट के अनुसार AI का दुरुपयोग Deepfake, महिलाओं के विरुद्ध अश्लील सामग्री, बाल यौन शोषण सामग्री तथा लैंगिक भेदभाव जैसी गतिविधियों में बढ़ता जा रहा है। इससे मानवाधिकारों और व्यक्तिगत गरिमा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

AI Washing क्या है?

कुछ कंपनियाँ यह दावा करती हैं कि वे AI का व्यापक उपयोग कर रही हैं, जबकि वास्तविकता में AI का उपयोग बहुत सीमित होता है। इसी प्रकार कुछ संस्थाएँ कर्मचारियों की छँटनी का कारण AI को बताती हैं, जबकि वास्तविक कारण कुछ और होते हैं। इस प्रकार की भ्रामक प्रस्तुति को AI Washing कहा जाता है।

पर्यावरणीय प्रभाव भी बढ़ रहे हैं

रिपोर्ट के अनुसार उन्नत AI प्रणालियों के संचालन के लिए विशाल डेटा केंद्रों की आवश्यकता होती है। इनसे अत्यधिक बिजली और पानी की खपत होती है, दुर्लभ खनिजों की माँग बढ़ती है तथा ई-कचरे में वृद्धि होती है। इन पर्यावरणीय लागतों का बोझ अपेक्षाकृत अधिक विकासशील देशों पर पड़ता है।

Evidence Dilemma (साक्ष्य संबंधी दुविधा)

रिपोर्ट में Evidence Dilemma का भी उल्लेख किया गया है। अनेक सरकारें तब तक कठोर नियम बनाने से बचती हैं जब तक किसी तकनीक से होने वाले नुकसान के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न हो जाएँ। किंतु AI के मामले में जब तक पर्याप्त साक्ष्य एकत्रित होते हैं, तब तक तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी होती है कि बनाए गए नियम अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाते।

निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र की यह प्रारंभिक रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास अब केवल तकनीकी प्रगति का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शासन, आर्थिक शक्ति, साइबर सुरक्षा, लोकतंत्र, मानवाधिकार, भाषाई विविधता और पर्यावरण से जुड़ा बहुआयामी प्रश्न बन चुका है। रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि AI की तीव्र प्रगति के अनुरूप समावेशी, पारदर्शी और प्रभावी वैश्विक शासन व्यवस्था विकसित करना समय की आवश्यकता है। अन्यथा AI के संभावित लाभों के साथ-साथ उसके जोखिम भी पूरी मानवता के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।

 

(1 – 12 July) BBC, ISW

अमेरिका–ईरान संघर्ष : युद्धविराम के बाद बदलती रणनीति

जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए अस्थायी युद्धविराम से यह उम्मीद की जा रही थी कि दोनों देशों के बीच बढ़ता सैन्य तनाव धीरे-धीरे कम होगा। किंतु जुलाई के पहले सप्ताह से होर्मुज़ जलडमरूमध्य, समुद्री व्यापार तथा क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ने लगा।

2 जुलाई से ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण को और सख्ती से लागू करने तथा केवल अपने द्वारा निर्धारित मार्गों से ही जहाजों को गुजरने देने की नीति के कारण युद्धविराम संकट में पड़ता दिखाई दिया। ईरान होर्मुज़ को वैश्विक दबाव के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में देख रहा है और इसके माध्यम से अमेरिका तथा पश्चिमी देशों पर अपना रणनीतिक दबाव बनाए रखना चाहता है। इसी क्रम में उसने इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर अपनी शर्तें लागू करने तथा उनसे शुल्क वसूलने की संभावना भी व्यक्त की, जिसे अनेक देश अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों और वर्तमान समझौतों के विरुद्ध मान रहे हैं।

7 जुलाई को ईरान ने आरोप लगाया कि कई जहाज उसके निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। ऐसे कुछ जहाजों पर उसने गोलीबारी और हमले भी किए। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के विभिन्न सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर नए सिरे से हमले तेज कर दिए। इन हमलों में ईरान के उस रेल नेटवर्क को भी निशाना बनाया गया, जो चीन और रूस से जुड़े अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके बाद अमेरिका लगभग प्रतिदिन सैन्य कार्रवाई कर ईरान पर दबाव बनाए हुए है। दूसरी ओर ईरान भी कुवैत, बहरीन और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार हमले कर रहा है।

ईरान ने पहले कहा था कि उसके सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार और उससे संबंधित धार्मिक अनुष्ठानों के बाद ही किसी संभावित समझौते अथवा वार्ता पर विचार किया जाएगा। 4 से 9 जुलाई के बीच नए सर्वोच्च नेता के पिता की अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार का बड़े स्तर पर आयोजन किया गया, जिसमें लाखों लोगों की उपस्थिति को व्यापक रूप से प्रचारित किया गया। ईरान ने इसे अपनी आंतरिक एकजुटता और जनता के समर्थन के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने पक्ष में माहौल और सहानुभूति बनाई जा सके। अंतिम संस्कार के बाद हाल के अमेरिकी हमलों को देखते हुए ईरान ने फिलहाल वार्ता आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। वहीं नए सर्वोच्च नेता ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने की बात दोहराई। इसके जवाब में ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका के राष्ट्रपति या शीर्ष नेतृत्व पर किसी भी प्रकार का हमला या हत्या का प्रयास किया गया तो ईरान को पूरी तरह तबाह कर दिया जाएगा। इस प्रकार दोनों पक्ष लगातार धमकियों और सैन्य कार्रवाइयों के माध्यम से एक-दूसरे पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं।

उधर लेबनान में भी स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है। इज़रायल दक्षिणी लेबनान में युद्धविराम व्यवस्था के तहत निर्धारित क्षेत्रों से आगे अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास कर रहा है, जिसके कारण सीमा के निकट रहने वाले अनेक लोगों को पलायन करना पड़ रहा है। वहीं हिज़्बुल्लाह ईरान से प्राप्त वित्तीय सहायता का उपयोग युद्ध प्रभावित और विस्थापित लोगों की सहायता में कर रहा है। इसप्रकार इन राहत कार्यों के माध्यम से वह स्थानीय जनता के बीच अपना प्रभाव और जनसमर्थन बनाए रखने का प्रयास भी कर रहा है। इस बीच 15–16 जुलाई को रोम में अमेरिका की मध्यस्थता में लेबनान और इज़रायल के बीच एक बार फिर वार्ता होने की संभावना है।

उधर 8 जुलाई को नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम अब समाप्त हो चुका है। इसके बाद अमेरिका ने सैन्य दबाव बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी नई कार्रवाई शुरू कर दी। 10 जुलाई को अमेरिका ने ईरान के नए सर्वोच्च नेता से जुड़े वित्तीय नेटवर्क, उनके प्रमुख वित्तपोषकों, मुद्रा विनिमय संस्थानों तथा उनसे जुड़ी विदेशी शेल कंपनियों पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। साथ ही ईरानी तेल व्यापार और विदेशी मुद्रा प्राप्त करने के रास्तों को भी और अधिक सीमित करने का प्रयास किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका अब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक प्रतिबंधों के माध्यम से भी ईरान की युद्ध क्षमता तथा उसके सहयोगी संगठनों को मिलने वाली आर्थिक सहायता को कमजोर करने की रणनीति अपना रहा है।

निष्कर्ष

वर्तमान घटनाक्रम से स्पष्ट है कि अमेरिका–ईरान संघर्ष अभी समाप्त होने की स्थिति में नहीं है। ईरान अपने पक्ष में मिली सामुदायिक सहानुभूति, समर्थन तथा अमेरिका के वार्ता की मेज पर आने को अपनी रणनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। अपने प्रमुख नेतृत्व को खोने के बावजूद वह अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की अपनी क्षमता को एक साहसिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहा है और इसी से अपने समर्थकों का मनोबल बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। वहीं देश के भीतर आर्थिक संकट, खाद्य आपूर्ति की कठिनाइयों तथा अन्य आंतरिक समस्याओं से जूझने के बावजूद ईरान अपने सैन्य सामर्थ्य के बल पर संघर्ष जारी रखने के लिए तैयार दिखाई देता है।

दूसरी ओर अमेरिका ईरान को होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर एकाधिकार स्थापित करने तथा उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अपनी सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसी परिस्थितियों में यह संघर्ष शीघ्र समाप्त होता नहीं दिखाई देता, बल्कि लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति में बना रह सकता है। इसके समाधान के लिए प्रमुख वैश्विक शक्तियों की सक्रिय और समन्वित भूमिका आवश्यक होगी, किंतु वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए ऐसी व्यापक सहमति निकट भविष्य में बनती हुई दिखाई नहीं देती।

 

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