(40.)Weekly News Update 27July – 2 August Rome decleration-BOB cyber attack- Iran war- Google earth ai

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 Weekly News Update (40)

(27 July – 2 August 2026)

 (16 July) vaticannews, globalnobelassembly.org

रोम डिक्लेरेशन फॉर एन अनआर्म्ड एंड डिसआर्मिंग पीस (Rome Declaration for an Unarmed and Disarming Peace)

जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का विकास बढ़ रहा है और यह हमारी रणनीतिक व सार्वजनिक निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रही है, वैसे-वैसे एक नैतिक, पारदर्शी और मानव-केंद्रित AI शासन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए, जुलाई 2026 में नोबेल पुरस्कार विजेताओं, AI वैज्ञानिकों, धार्मिक नेताओं और वैश्विक हस्तियों द्वारा हस्ताक्षरित ‘रोम डिक्लेरेशन फॉर एन अनआर्म्ड एंड डिसआर्मिंग पीस’ (Rome Declaration for an Unarmed and Disarming Peace) जारी किया गया। इस घोषणा-पत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, परमाणु हथियारों, स्वायत्त हथियार प्रणालियों, नए डिजिटल प्रोटोकॉल तथा उभरते डिजिटल विकास मॉडलों के अभिसरण (Convergence) से उत्पन्न ‘अभिसारी खतरे’ (Convergent Peril) पर चिंता व्यक्त की गई है। यह दस्तावेज़ पोप लियो XIV के विश्वपत्र ‘मैग्निफिका ह्यूमैनिटास’ से प्रेरित है, जो तकनीक की अति से मानव गरिमा की रक्षा करने के लिए एक स्पष्ट आह्वान करता है।

रोम घोषणा-पत्र (RDUDP) क्या है?

‘रोम डिक्लेरेशन फॉर एन अनआर्म्ड एंड डिसआर्मिंग पीस’ (RDUDP) अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने रखी गई एक रणनीतिक और नैतिक अपील है। सरल शब्दों में कहें तो यह घोषणा-पत्र दो मूलभूत आग्रहों पर केंद्रित है:

  • परमाणु हथियारों से AI को दूर रखना: यह एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संधि की माँग करता है जो स्वायत्त AI प्रणालियों (Autonomous AI Systems) को परमाणु मिसाइलें लाँच या दागने से जुड़े फैसलों और उनकी कमान से पूरी तरह दूर रखे।
  • मानवीय नैतिकता की सर्वोच्चता: यह इस सिद्धांत पर जोर देता है कि युद्ध, शांति और मानवता के भविष्य से जुड़े किसी भी बड़े फैसले में मानवीय नैतिकता, जवाबदेही और निर्णय लेने की क्षमता को कभी भी मशीनों (AI) के हवाले नहीं किया जाना चाहिए।

रोम घोषणा-पत्र के प्रमुख सिद्धांत (Key Principles)

रोम घोषणा-पत्र निम्नलिखित छह प्रमुख सिद्धांतों के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, परमाणु हथियारों तथा वैश्विक शांति के संबंध में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है:

  1. अगली हथियारों की होड़ को रोकना (Disarming the Next Arms Race): कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा परमाणु हथियारों के क्षेत्र में उभरती नई हथियारों की होड़ को समय रहते रोकने के लिए समन्वित वैश्विक प्रयास किए जाएँ, ताकि वही आने वाली शताब्दी की दिशा निर्धारित न करे।
  2. मानवता के हित में AI का विकास (AI for Humanity): कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास और उपयोग मानवता के हित में, अंतरराष्ट्रीय कानून तथा मानवाधिकारों के सम्मान के साथ किया जाए।
  3. पूर्णतः स्वचालित AI प्रणालियों पर प्रभावी निगरानी (Oversight of Fully Automated AI Systems): सरकारें तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ पूर्णतः स्वचालित AI प्रणालियों एवं प्रक्रियाओं पर प्रभावी निगरानी एवं उत्तरदायी शासन सुनिश्चित करें।
  4. परमाणु हथियारों पर सार्थक मानवीय नियंत्रण (Meaningful Human Control): परमाणु हथियारों के प्रयोग का अंतिम निर्णय किसी भी परिस्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को न सौंपा जाए। इसके लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधि अपनाई जाए जो परमाणु हथियारों की कमान, नियंत्रण तथा प्रक्षेपण प्रणालियों में AI के गैर-जिम्मेदाराना एकीकरण को प्रतिबंधित करे तथा हर परिस्थिति में सार्थक एवं प्रभावी मानवीय नियंत्रण सुनिश्चित करे।
  5. AI का उत्तरदायी उपयोग (Responsible Use of AI): कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास और उपयोग मानव कल्याण, वैज्ञानिक एवं चिकित्सीय प्रगति, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक लचीलापन (Resilience), शांति, सतत विकास तथा साझा हित (Common Good) को बढ़ावा देने के लिए किया जाए।
  6. परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति प्रतिबद्धता (Commitment to Nuclear Disarmament): सद्भावनापूर्ण तथा सतत वार्ताओं के माध्यम से परमाणु हथियारों के सत्यापन योग्य (Verifiable) तथा अपरिवर्तनीय (Irreversible) उन्मूलन की दिशा में वैश्विक प्रयासों को आगे बढ़ाया जाए।

घोषणा-पत्र की आवश्यकता (Need for the Declaration)

घोषणा-पत्र के अनुसार मानवता आज अपने इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, परमाणु हथियार, स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ, नए डिजिटल प्रोटोकॉल तथा उभरते डिजिटल विकास मॉडल वैश्विक सुरक्षा और मानवता के भविष्य के लिए नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस परिस्थिति में यदि तकनीकी प्रगति को नैतिक उत्तरदायित्व, मानवीय नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से न जोड़ा गया, तो यह वैश्विक शांति, मानव गरिमा और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न कर सकती है।

घोषणा-पत्र इस बात पर बल देता है कि सुरक्षा की अवधारणा भय, प्रभुत्व, धमकी या पारस्परिक विनाश पर आधारित नहीं होनी चाहिए, बल्कि संवाद, सहयोग, उत्तरदायित्व और मानव-केंद्रित तकनीकी विकास पर आधारित वैश्विक व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है।

“अभिसारी संकट” (Convergent Peril)

रोम घोषणा-पत्र के अनुसार “अभिसारी संकट” (Convergent Peril) वह स्थिति है, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, परमाणु हथियार, स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ, साइबर क्षमताएँ, नए डिजिटल प्रोटोकॉल तथा उभरते डिजिटल विकास मॉडल जैसे अनेक जोखिम एक-दूसरे से जुड़कर मानवता के लिए अभूतपूर्व खतरा उत्पन्न करते हैं। इन जोखिमों का प्रभाव अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर एक-दूसरे को और अधिक गंभीर बनाते हुए वैश्विक शांति, मानव सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय स्थिरता को चुनौती देता है।

इसी अभिसारी संकट के कारण घोषणा-पत्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तरदायी विकास, सार्थक मानवीय नियंत्रण, वैश्विक सहयोग तथा परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में तत्काल सामूहिक कार्रवाई का आह्वान करता है।

निष्कर्ष

रोम घोषणा-पत्र यह संकेत देता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव बुद्धि का विकल्प नहीं, बल्कि उसका उत्तरदायी सहायक होनी चाहिए। तकनीकी प्रगति तभी सार्थक है जब वह मानव गरिमा, नैतिक उत्तरदायित्व और वैश्विक शांति की सेवा करे। इसलिए भविष्य की सुरक्षा केवल अधिक उन्नत प्रौद्योगिकी पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि मानव समाज उसे किस विवेक, उत्तरदायित्व और सहयोग की भावना के साथ संचालित करता है।

 

(27 July) financialexpress, cyberpeace.org

बैंक ऑफ़ बड़ौदा साइबर घटना: तथ्य, दावे और उठते सवाल

घटना और प्रारम्भिक तथ्य

27 जुलाई 2026 को बैंक ऑफ़ बड़ौदा (Bank of Baroda) ने स्वीकार किया कि उस पर एक साइबर सुरक्षा हमला (Cybersecurity Attack) हुआ है। नियामकीय फाइलिंग (Regulatory Filing) के माध्यम से जारी बैंक के आधिकारिक बयान के अनुसार, एक कर्मचारी के ईमेल खाते से समझौता (Compromise) होने के कारण कुछ डेटा तक अनधिकृत पहुँच (Unauthorised Access) बनाई गई। हालांकि, बैंक ने यह नहीं बताया कि किस प्रकार का डेटा प्रभावित हुआ, कितनी मात्रा में जानकारी तक पहुँच बनाई गई या इससे कितने ग्राहक प्रभावित हो सकते हैं।

बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी कोर बैंकिंग प्रणाली (Core Banking System)—अर्थात वह केंद्रीय तकनीकी ढाँचा जिसके माध्यम से ग्राहकों के खाते और वित्तीय लेन-देन संचालित होते हैं—इस घटना से प्रभावित नहीं हुई। हालाँकि, बैंक द्वारा साझा की गई जानकारी अभी भी सीमित है और घटना के वास्तविक दायरे को लेकर कई प्रश्न अनुत्तरित हैं।

डार्क वेब पर सामने आए दावे

बैंक के आधिकारिक बयान से कुछ दिन पहले, 24 जुलाई 2026 को TripleX नामक एक नए रैनसमवेयर (Ransomware) और डेटा उगाही (Data Extortion) करने वाले साइबर अपराधी समूह ने अपनी डार्क वेब (Dark Web) लीक साइट पर बैंक ऑफ़ बड़ौदा का नाम प्रकाशित किया। समूह का दावा था कि उसने बैंक से लगभग 1 टेराबाइट (Terabyte) डेटा चुराया है। इस घटना की एक असामान्य बात यह रही कि समूह ने फिरौती (Ransom) माँगने के बजाय कथित रूप से पूरा डेटा सार्वजनिक कर दिया।

TripleX ने अपनी लीक साइट पर दावा किया कि यह कदम बैंक के कथित रूप से कमज़ोर पासवर्ड और साइबर सुरक्षा में खामियों के कारण “सज़ा” के रूप में उठाया गया। हालाँकि, इस दावे की अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और बैंक ने भी सार्वजनिक रूप से इतने बड़े पैमाने पर डेटा लीक होने की पुष्टि नहीं की है।

डिजिटल अधिकार संगठन कैशलेसकंज्यूमर (CashlessConsumer) के संस्थापक और स्वतंत्र साइबर सुरक्षा शोधकर्ता श्रीकांत लक्ष्मणन ने बैंक और संबंधित अधिकारियों को सूचना देने से पहले कथित रूप से लीक हुए डेटा के कुछ नमूनों (Samples) की जाँच की। उन्होंने बताया कि उपलब्ध नमूनों में शाखाओं की आंतरिक ऑडिट (Internal Audit) फ़ाइलें, ऋण मूल्यांकन (Loan Appraisal) से जुड़े दस्तावेज़, सतर्कता जाँच (Vigilance Investigation) के रिकॉर्ड, बैंक के bob World मोबाइल ऐप की ऑडिट रिपोर्ट तथा ग्राहकों के खाता खोलने के आवेदन पत्र (Account Opening Forms) शामिल थे।

कई मीडिया संस्थानों ने यह भी रिपोर्ट किया कि इन नमूनों में आधार संख्या, ग्राहकों के फ़ोटोग्राफ़, नेट बैंकिंग से जुड़ी जानकारी, तथा कॉर्पोरेट और एनआरआई (NRI) बैंकिंग से संबंधित रिकॉर्ड भी मौजूद थे। हालाँकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने भी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार नहीं किया है कि लीक हुए डेटा में वास्तव में किस प्रकार की जानकारी शामिल थी।

TripleX की कार्यप्रणाली

सरकारी बैंकों को निशाना बनाना TripleX के लिए नई बात नहीं है। यह साइबर अपराधी समूह पहली बार मई 2026 में सामने आया था। बैंक ऑफ़ बड़ौदा पर कथित हमले से कुछ सप्ताह पहले इसने इंडोनेशिया के सबसे बड़े सरकारी बैंक PT Bank Negara Indonesia (BNI) पर साइबर हमला करने की जिम्मेदारी भी ली थी। समूह का दावा था कि उसने वहाँ से लगभग 2 टेराबाइट (Terabyte) डेटा चुराया, जिसमें अनुबंध (Contracts), पहचान संबंधी दस्तावेज़ (Identity Documents) और लेन-देन का इतिहास (Transaction History) शामिल था।

दोनों मामलों में हमले का तरीका लगभग एक जैसा दिखाई देता है—पहले किसी कमज़ोर प्रवेश बिंदु (Entry Point) के माध्यम से नेटवर्क तक पहुँच बनाना, फिर बड़ी मात्रा में डेटा निकालना और अंत में फिरौती के लिए लंबी बातचीत करने के बजाय उसे सार्वजनिक कर देना। यदि TripleX के दावे सही हैं, तो यह रणनीति पारंपरिक रैनसमवेयर हमलों से अलग है।

सामान्यतः रैनसमवेयर (Ransomware) हमलों में हमलावर किसी संस्था के सिस्टम को एन्क्रिप्ट (Encrypt) कर देते हैं और उसे दोबारा चालू करने के बदले फिरौती की माँग करते हैं। लेकिन TripleX जैसे समूहों का ध्यान डेटा को बंधक बनाने के बजाय उसे चुराने और सार्वजनिक करने पर अधिक दिखाई देता है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति को डबल एक्सटॉर्शन (Double Extortion) का विकसित रूप मानते हैं, जिसमें संस्था पर दबाव बनाने का सबसे बड़ा हथियार उसके संवेदनशील डेटा के सार्वजनिक होने का खतरा होता है। कुछ मामलों में हमलावर भुगतान की प्रतीक्षा किए बिना ही डेटा सार्वजनिक कर देते हैं, ताकि संस्था को प्रतिष्ठा, कानूनी दायित्व और नियामकीय कार्रवाई—तीनों स्तरों पर अधिक नुकसान पहुँचे।

नियामकीय व्यवस्था और पूर्ववर्ती घटनाएँ

ऐसी साइबर घटनाओं के बाद भारत में बैंकों के लिए नियामकीय प्रक्रिया तुरंत शुरू हो जाती है। भारतीय रिज़र्व बैंक के साइबर सुरक्षा ढाँचे के अनुसार, गंभीर साइबर घटनाओं की प्रारंभिक सूचना निर्धारित समय-सीमा के भीतर देना आवश्यक है। इसी प्रकार भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (Computer Emergency Response Team–India – CERT-In) के नियमों के तहत भी कुछ श्रेणी की साइबर घटनाओं की सूचना छह घंटे के भीतर देना अनिवार्य है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने इस घटना के बाद अपने साइबर बीमा (Cyber Insurance) कार्यक्रम के अंतर्गत भी प्रारंभिक सूचना दर्ज कराई है। बताया गया है कि यह बीमा कार्यक्रम लगभग 78 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹650–700 करोड़, विनिमय दर के अनुसार) की कुल कवरेज प्रदान करता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि बीमा दावा स्वीकार किया जाएगा या वास्तविक भुगतान कितना होगा।

यह पहला अवसर नहीं है जब बैंक ऑफ़ बड़ौदा की डिजिटल प्रणालियाँ चर्चा में रही हों। वर्ष 2023 में The Reporters’ Collective और Al Jazeera की एक संयुक्त पड़ताल में आरोप लगाया गया था कि बैंक के bob World मोबाइल ऐप पर नामांकन बढ़ाने के लिए कुछ ग्राहकों की जानकारी के बिना उनके खातों से अन्य मोबाइल नंबर जोड़ दिए गए थे। बाद में कई ग्राहक अनधिकृत मोबाइल नंबर जुड़ने के कारण धोखाधड़ी का शिकार हुए। इस मामले में भारतीय रिज़र्व बैंक ने हस्तक्षेप किया, विशेष ऑडिट कराया और कुछ समय के लिए बैंक को नए bob World उपयोगकर्ताओं को जोड़ने से रोक दिया था।

हालाँकि, 2023 की घटना और मौजूदा साइबर हमले के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी, यह घटनाक्रम इस बात की याद दिलाता है कि 8,400 से अधिक घरेलू शाखाओं और 300 अरब डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों (Assets) का प्रबंधन करने वाले बैंक के लिए डेटा सुरक्षा में छोटी-सी चूक भी व्यापक सार्वजनिक, वित्तीय और नियामकीय प्रभाव डाल सकती है।

ग्राहकों के लिए जोखिम और सावधानियाँ

बैंक ऑफ़ बड़ौदा के ग्राहकों के लिए फिलहाल सबसे समझदारी भरा कदम यही है कि वे अपने खाते के स्टेटमेंट पर नियमित नज़र रखें और किसी भी अनजान या संदिग्ध लेन-देन की तुरंत जाँच करें। यदि बैंक या किसी अन्य संस्था के नाम पर फोन, ईमेल या संदेश के माध्यम से खाता संख्या, OTP, पासवर्ड या अन्य व्यक्तिगत जानकारी माँगी जाए, तो विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। पहचान संबंधी दस्तावेज़ों के कथित रूप से लीक होने की खबरों के बाद इस प्रकार के फ़िशिंग (Phishing) और सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) हमलों की आशंका बढ़ जाती है।

एहतियात के तौर पर नेट बैंकिंग का पासवर्ड और मोबाइल बैंकिंग ऐप का PIN बदल लेना भी एक व्यावहारिक कदम हो सकता है। यद्यपि बैंक ने अपने कोर बैंकिंग सिस्टम (Core Banking System) के प्रभावित होने से इनकार किया है, फिर भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से ऐसा करना उचित रहेगा। विशेष चिंता उन मामलों में होती है जहाँ पहचान संबंधी दस्तावेज़ – जैसे आधार, कथित रूप से लीक होने की बात सामने आती है। पासवर्ड बदले जा सकते हैं, लेकिन आधार संख्या या अन्य पहचान संबंधी विवरणों को उसी तरह बदला नहीं जा सकता; इसलिए यदि ऐसी जानकारी वास्तव में किसी के हाथ लग जाए, तो उसका जोखिम कहीं अधिक समय तक बना रह सकता है।

निष्कर्ष

बैंक ऑफ़ बड़ौदा की इस साइबर घटना का वास्तविक दायरा अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। बैंक ने सीमित स्तर पर डेटा तक अनधिकृत पहुँच की पुष्टि की है, जबकि डार्क वेब पर इससे कहीं बड़े डेटा लीक के दावे किए गए हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है। अंतिम निष्कर्ष जाँच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। लेकिन यह घटना इस तथ्य को अवश्य रेखांकित करती है कि डिजिटल बैंकिंग के युग में साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि ग्राहकों के विश्वास और बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता का आधार भी है।

वर्ल्ड वाइड वेब को व्यापक रूप से तीन प्रमुख स्तरों में विभाजित किया जाता है:

सरफेस वेब: यह वेब का वह भाग है जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होता है और सर्च इंजन द्वारा अनुक्रमित (Indexed) किया जाता है। उदाहरण: सामान्य वेबसाइटें, समाचार वेबसाइटें आदि।

डीप वेब: यह वेब का वह भाग है जो सर्च इंजनों द्वारा अनुक्रमित नहीं किया जाता, लेकिन वैध होता है और इसे एक्सेस करने के लिये प्रमाणीकरण (Authentication) की आवश्यकता होती है। उदाहरण: बैंकिंग पोर्टल, निजी ई-मेल इनबॉक्स, कॉर्पोरेट डेटाबेस आदि।

डार्क वेब: यह डीप वेब का एक छोटा एवं जानबूझकर छिपाया गया भाग है, जिसे एक्सेस करने के लिये विशेष सॉफ्टवेयर, जैसे टॉर ब्राउज़र की आवश्यकता होती है।

      • यह उपयोगकर्त्ता ट्रैफिक एवं IP एड्रेस की पहचान को गोपनीय बना देता है, जिससे यह अवैध ऑनलाइन बाज़ारों, साइबर अपराध एवं डेटा तस्करी के लिये एक सुरक्षित आश्रय (Safe Haven) के रूप में प्रयुक्त होता है।

(19July-2 August) ISW, Reuters, AP news, BBC, IndiaToday, armyrecognition.com

अमेरिका–ईरान संघर्ष : मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति

अमेरिका–ईरान संघर्ष के दौरान बीते दो सप्ताह में अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुईं। दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष हमलों के साथ-साथ मिलिशिया समूहों की सक्रियता बढ़ी। चीन और रूस की संभावित भूमिका को लेकर कयास लगाए गए, जबकि मिस्र और यूक्रेन की सीमित भागीदारी भी देखने को मिली। इस बीच इजरायल–हमास मोर्चे की स्थिति, भारत की हथियार आपूर्ति संबंधी रिपोर्ट, अमेरिका–सऊदी अरब के परमाणु समझौते, कुवैत–पाकिस्तान सैन्य समझौते तथा तुर्की–इराक पाइपलाइन समझौते जैसी घटनाएँ भी इसी व्यापक परिदृश्य का हिस्सा रहीं।

इन सभी घटनाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही संघर्ष के विभिन्न आयामों के रूप में समझना आवश्यक है।

अमेरिकी पक्ष

अमेरिका की वर्तमान रणनीति ईरान की सैन्य क्षमता, विशेषकर IRGC और उसके सैन्य ढाँचे, को अधिक से अधिक क्षति पहुँचाने की रही। इसी उद्देश्य से उसने ईरान के तटीय क्षेत्रों, IRGC के सैन्य अड्डों तथा Pickaxe Mountain स्थित परमाणु परिसर को निशाना बनाया। नौसैनिक नाकाबंदी भी जारी रखी गई। लगभग दो सप्ताह तक लगातार हमले करने के बाद अमेरिका ने उन्हें अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया। साथ ही, कूटनीतिक माध्यमों से इजरायल–हमास संघर्ष को नियंत्रित करने के प्रयास भी जारी रहे। मिलिशिया समूहों द्वारा सऊदी अरब पर हमलों के बाद सऊदी पहली बार इस संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुआ। 28 जुलाई को अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त अभियान चलाकर इराक स्थित ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों पर हमला किया। हालाँकि, सऊदी की सैन्य कार्रवाई फिलहाल केवल मिलिशिया समूहों तक ही सीमित है।

ईरानी पक्ष

ईरान ने अमेरिका पर युद्ध समाप्त करने और क्षेत्र से पीछे हटने का दबाव बनाने के लिए मध्य पूर्व में स्थित उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी सटीक हमले शुरू किए, जिन्हें उसने पहले निशाना नहीं बनाया था। इसके अलावा अमेरिकी सैन्य ठिकानों वाले देशों की ऊर्जा एवं जल अवसंरचना को भी निशाना बनाकर वहाँ की सरकारों पर आंतरिक राजनीतिक दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई। IRGC के दो वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, संघर्षविराम के दौरान कुद्स फ़ोर्स के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिज़्बुल्लाह, हूथी और इराकी मिलिशिया कमांडरों के साथ बैठक कर संघर्ष को विस्तारित करने तथा अमेरिकी सैन्य अभियानों की लागत बढ़ाने पर चर्चा की। इसी बीच ईरान के सर्वोच्च नेता ने हिज़्बुल्लाह का समर्थन करते हुए कहा कि “जिहाद और प्रतिरोध के अलावा आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है।” उन्होंने लेबनान और हिज़्बुल्लाह की सुरक्षा को ईरान की रणनीतिक ज़िम्मेदारी बताया तथा कहा कि अमेरिका के साथ किसी भी समझौते में लेबनान के विरुद्ध इज़रायली सैन्य कार्रवाई का अंत भी शामिल होना चाहिए।

मिलिशिया समूहों का हस्तक्षेप

हूती विद्रोही समूहों ने बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से सऊदी जहाजों के आवागमन पर समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की तथा सऊदी अरब के विभिन्न ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले जारी रखे। हूती का तर्क है कि सऊदी अरब उसके नियंत्रण वाले हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर लगी नाकेबंदी समाप्त करे तथा हूती के बुनियादी ढाँचे पर हमले बंद करे। दूसरी ओर, ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया समूहों ने सऊदी अरब और कुछ अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जिसके जवाब में अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त जवाबी कार्रवाई की।

रूस–चीन–यूक्रेन : परोक्ष हस्तक्षेप

ईरान द्वारा पहले से अधिक सटीकता के साथ उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने के पीछे रूस की भूमिका की आशंका जताई गई। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने आरोप लगाया कि रूस ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की उपग्रह तस्वीरें उपलब्ध करा रहा है, हालाँकि रूस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। 29 जुलाई 2026 की रॉयटर्स रिपोर्ट के अनुसार, ईरान को चीन निर्मित 300–400 QW-12 और FN-16 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम की पहली खेप मिलने की उम्मीद है। इसका उद्देश्य अमेरिका और इज़रायल के साथ संघर्ष के दौरान उजागर हुई ईरान की वायु रक्षा संबंधी कमियों को दूर करना है। इसी दौरान यूक्रेन ने कैस्पियन सागर में एक ईरानी वाणिज्यिक पोत पर हमला किया और दावा किया कि वह रूस के लिए ड्रोन एवं अन्य सैन्य सामग्री ले जा रहा था। दूसरी ओर, रूस यूक्रेन के विरुद्ध उन्नत शाहेद ड्रोन का उपयोग कर रहा है। ईरान ने इस हमले का बदला लेने की चेतावनी दी। पिछले कुछ महीनो में यूक्रेन ने खाड़ी देशों में अपने सैन्य विशेषज्ञ भी भेजे, ताकि वे ईरानी ड्रोन हमलों से बचाव में उनकी सहायता कर सकें।

इज़रायल–हमास पक्ष और भारत की हथियार आपूर्ति संबंधी रिपोर्ट

ट्रम्प के Board of Peace की मध्यस्थता में एक समझौता प्रस्तावित किया गया है, जिसके तहत हमास चरणबद्ध तरीके से हथियार छोड़ेगा और बदले में इज़रायल भी चरणबद्ध ढंग से गाज़ा से अपनी सेना हटाएगा। हालाँकि, इज़रायल का कहना है कि जब तक हमास का वास्तविक निरस्त्रीकरण नहीं होता, तब तक इज़रायली रक्षा बल (IDF) मौजूदा येलो लाइन से पीछे नहीं हटेगा। नेतन्याहू और ट्रम्प की हालिया मुलाकात के बाद ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि यदि वार्ता विफल रहती है, तो ईरान के ऊर्जा एवं सैन्य ठिकानों पर दोबारा कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी ओर, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी नई रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत ने इज़रायल को हथियारों की आपूर्ति जारी रखी है, जिनका उपयोग गाज़ा में सैन्य अभियानों में हो रहा है। इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश के पास रणनीतिक व्यापार नियंत्रण का एक मज़बूत कानूनी एवं नियामक ढाँचा है तथा वह अपने राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप ही डुअल-यूज़ वस्तुओं और प्रौद्योगिकी का निर्यात करता है।

सऊदी–अमेरिका परमाणु समझौता और कुवैत–पाकिस्तान सैन्य समझौता

सऊदी अरब और अमेरिका ने असैन्य परमाणु सहयोग (123 Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत अमेरिका सऊदी अरब को असैन्य परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित करने, परमाणु रिएक्टरों के निर्माण तथा “तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराएगा। हालाँकि, राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि इस समझौते का अंतिम क्रियान्वयन तभी होगा, जब सऊदी अरब अब्राहम समझौते (Abraham Accords) में शामिल होकर इज़रायल के साथ संबंध सामान्य करेगा। सऊदी अरब को भविष्य में यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) की संभावित अनुमति तथा परमाणु प्रसार की आशंकाओं को लेकर चिंता की दृष्टि से देखा जा रहा है।

कुवैत ने 2023 में पाकिस्तान के साथ हुए रक्षा सहयोग समझौते को 29 जुलाई को औपचारिक रूप से अनुमोदित कर दिया। यह समझौता दोनों देशों की सेनाओं के बीच सैन्य प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी, रसद सहायता, रक्षा प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, संयुक्त सैन्य गतिविधियों तथा अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए एक संस्थागत ढाँचा तैयार करता है। इसके क्रियान्वयन के लिए एक संयुक्त सैन्य समिति का गठन किया जाएगा, जिसकी बैठक वर्ष में एक बार होगी। यह समझौता दोनों देशों के अन्य अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को प्रभावित नहीं करेगा तथा दोनों पक्षों की लिखित सहमति से इसमें संशोधन किया जा सकेगा।

तुर्की–इराक पाइपलाइन समझौता

तुर्की और इराक ने दोनों देशों के बीच कच्चे तेल की पाइपलाइन के संचालन को एक वर्ष तक जारी रखने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका उद्देश्य इराक के तेल निर्यात को निर्बाध बनाए रखना तथा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता को कम करना है। दोनों देश इस पाइपलाइन को आगे व्यापक ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय ऊर्जा गलियारे के रूप में विकसित करने पर भी विचार कर रहे हैं। ईरान–अमेरिका संघर्ष के बीच यह समझौता ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक मार्गों की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। साथ ही, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी वैकल्पिक ऊर्जा मार्गों और पाइपलाइन नेटवर्क को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं, जिससे भविष्य में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम की जा सके।

निष्कर्ष
बीते दो सप्ताह की घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि अमेरिका–ईरान संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा है। इसके प्रभाव क्षेत्रीय गठबंधनों, ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य सहयोग और वैश्विक शक्तियों की रणनीतियों तक पहुँच चुके हैं। ऐसे में इस संकट का दीर्घकालिक समाधान अंततः सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि कूटनीतिक वार्ता से ही संभव होगा।

 

(31July) BBC

Google Earth का नया AI फ़ीचर: संभावनाएँ और चुनौतियाँ

Google द्वारा विकसित Google Earth एक ऐसा सॉफ़्टवेयर और ऑनलाइन सेवा है, जिसके माध्यम से पूरी पृथ्वी को उपग्रह (Satellite) तथा हवाई (Aerial) चित्रों के रूप में देखा जा सकता है। यह उपयोगकर्ता को ऐसा अनुभव कराता है मानो वह अंतरिक्ष से पृथ्वी का अवलोकन कर रहा हो और फिर किसी भी स्थान पर ज़ूम करके सड़क, भवन, पर्वत, नदी अथवा जंगल तक पहुँच सकता हो।

Google Earth की सहायता से विश्व के लगभग किसी भी स्थान को खोजा जा सकता है। अनेक शहरों को त्रि-आयामी (3D) रूप में देखा जा सकता है। पर्वत, घाटियाँ, समुद्र, नदियाँ तथा अन्य प्राकृतिक स्थलों का अवलोकन किया जा सकता है। किसी स्थान के अक्षांश-देशांतर (Latitude–Longitude) ज्ञात किए जा सकते हैं तथा कई क्षेत्रों की पुरानी उपग्रह तस्वीरों (Historical Imagery) के माध्यम से समय के साथ हुए परिवर्तनों का अध्ययन भी किया जा सकता है।

हाल ही में Google ने Google Earth में अपने AI इमेज जनरेशन फ़ीचर Nano Banana 2 को जोड़ने की घोषणा की। इसका उद्देश्य उपयोगकर्ताओं को टेक्स्ट प्रॉम्प्ट(Text prompt)के आधार पर मौजूदा चित्रों का AI की सहायता से संपादन (Edit) करने तथा नए दृश्य (Generate) तैयार करने की सुविधा प्रदान करना था। जब इसे Google Earth के साथ जोड़ा गया, तो इसका लक्ष्य किसी स्थान की कल्पनात्मक अथवा डिज़ाइन संबंधी तस्वीरें तैयार करने में सहायता देना था।

इस फ़ीचर के माध्यम से उपयोगकर्ता किसी खाली भूमि पर यह कल्पना कर सकता था कि वहाँ पार्क, भवन या अन्य संरचना बनने पर वह कैसी दिखाई देगी। इसी प्रकार किसी क्षेत्र में पेड़, सड़क अथवा अन्य निर्माण जोड़कर संभावित दृश्य तैयार किए जा सकते थे। शहरी नियोजन, वास्तुकला (Architecture), डिज़ाइन, शिक्षा तथा रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए यह एक उपयोगी उपकरण सिद्ध हो सकता था।

किन्तु इस सुविधा के साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई। इस फ़ीचर की सहायता से वास्तविक उपग्रह, हवाई अथवा 3D चित्रों की आधार-परत (Base Layer) पर टेक्स्ट प्रॉम्प्ट(Text prompt)के माध्यम से ऐसे काल्पनिक दृश्य तैयार किए जा सकते थे, जिनमें नकली इमारतें, सैन्य उपकरण, बाढ़, आग, सड़कें अथवा अन्य संरचनाएँ दिखाई दें, जबकि वास्तविकता में उनका कोई अस्तित्व न हो। इन चित्रों को डाउनलोड करके अन्य मंचों पर साझा करना भी संभव था, जिससे गलत सूचना (Misinformation) फैलने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया।

इस फ़ीचर की परीक्षण प्रक्रिया के दौरान कई चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। AI की सहायता से एफिल टॉवर को ध्वस्त अवस्था में दिखाया गया, गीज़ा के पिरामिड को एक विशाल सिंकहोल में समाते हुए प्रदर्शित किया गया तथा यूक्रेन की राजधानी कीव में रूसी टैंकों की काल्पनिक तस्वीरें तैयार की गईं। इसी प्रकार ईरान में ऐसे परमाणु ऊर्जा संयंत्र का चित्र बनाया गया जो वास्तविकता में अस्तित्व ही नहीं रखता। अमेरिका–मेक्सिको सीमा पर एक काल्पनिक शरणार्थी शिविर तथा गाज़ा में बम विस्फोट के गड्ढे के साथ एक नकली अस्पताल का दृश्य भी तैयार किया गया।

परीक्षण करने वालों ने पाया कि Google Earth ने वास्तविक भौगोलिक निर्देशांकों (Coordinates) से जुड़ी उपग्रह और 3D तस्वीरों पर काल्पनिक दृश्य बनाने की अनुमति दे दी थी। परिणामस्वरूप AI द्वारा निर्मित चित्र वास्तविक उपग्रह चित्रों जैसे प्रतीत होने लगे, जिससे उनके दुरुपयोग और भ्रम फैलाने की संभावना और अधिक बढ़ गई।

इस पर Google ने स्पष्ट किया कि उसके AI टूल से तैयार की गई सभी तस्वीरों में अदृश्य (Invisible) डिजिटल वॉटरमार्क लगाए जाते हैं, जो यह संकेत देते हैं कि चित्र AI द्वारा बनाया या संशोधित किया गया है। कंपनी ने यह भी कहा कि यदि किसी चित्र की प्रामाणिकता पर संदेह हो, तो Gemini चैटबॉट अथवा Google Search के Lens फ़ीचर की सहायता से उसकी जाँच की जा सकती है।

किन्तु BBC Verify द्वारा किए गए परीक्षणों में पाया गया कि सामान्य परिस्थितियों में ये जाँच-पद्धतियाँ प्रभावी थीं, परंतु कुछ मामलों में इन्हें दरकिनार भी किया जा सकता था। परीक्षण के दौरान Gemini को इस प्रकार भ्रमित किया गया कि उसने Google Earth की कुछ AI-निर्मित नकली तस्वीरों को वास्तविक मान लिया। बाहरी AI-डिटेक्शन टूल्स से किए गए परीक्षणों में भी अनेक मामलों में इन चित्रों की सही पहचान नहीं हो सकी।

Google का कहना था कि उसके AI मॉडल में ऐसी सुरक्षा-व्यवस्थाएँ (Guardrails) हैं, जो हानिकारक अथवा भ्रामक विषयों से संबंधित चित्र बनाने से रोकती हैं। किन्तु BBC Verify ने पाया कि यदि टेक्स्ट प्रॉम्प्ट (Text prompt) में थोड़ा-सा परिवर्तन कर दिया जाए, तो इन सुरक्षा-व्यवस्थाओं को भी बायपास किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, ब्रिटेन की संसद के निकट “गद्दारों को फाँसी देने के लिए ऊँचा चबूतरा” बनाने का अनुरोध AI ने अस्वीकार कर दिया। किन्तु अपेक्षाकृत सामान्य शब्दों में वही अनुरोध करने पर उसने चित्र तैयार कर दिया। इसी प्रकार व्हाइट हाउस के लॉन पर घास काटकर “Trump” शब्द बनाने का अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया, जबकि उसी स्थान पर एक सामुदायिक उद्यान (Community Garden) बनाने की अनुमति दे दी गई।

इन घटनाओं के सामने आने के 48 घंटे से भी कम समय के भीतर Google ने इस AI फ़ीचर को अस्थायी रूप से रोकने की घोषणा कर दी। कंपनी ने कहा कि वह इसे और अधिक सुरक्षित बनाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू कर रही है। शुक्रवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में Google ने स्वीकार किया कि कुछ उपयोगकर्ता ऐसी तस्वीरें साझा कर रहे थे जो उसकी नीतियों का उल्लंघन करती थीं। इसी कारण इस फ़ीचर को फिलहाल स्थगित करने का निर्णय लिया गया, ताकि आवश्यक सुरक्षा सुधार लागू किए जा सकें।

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