(46.)Weekly News Update (21 September-27 September) Middle east conflict russia ukrain conflict US china meet Denmark agreement AI WORK

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 Weekly News Update (46)

(21 September – 27 September 2026)

प्रमुख खबरें

  • विश्व की प्रमुख घटनाएँ : संघर्ष, शक्ति-संतुलन और बदलते समीकरण
  • AI : कैसे काम करती है, कितनी सक्षम है और भविष्य क्या है? (भाग -१)

(21 – 27 September) ISW, Reuters, BBC, W POST, Aljazeera, CREA, SIPRI

विश्व की प्रमुख घटनाएँ : संघर्ष, शक्ति-संतुलन और बदलते समीकरण  

इस सप्ताह हुई Trump–Xi की मुलाकात, Greenland Agreement, United Nations General Assembly की बैठक, Iran–US युद्ध तथा उसके क्षेत्रीय विस्तार और Russia–Ukraine युद्ध जैसी प्रमुख घटनाओं ने विश्व परिदृश्य को प्रभावित करते हुए नए समीकरण विकसित किए हैं। हम इन्हीं घटनाओं के तथ्यों और उनके महत्व पर गौर करेंगे।

ईरान–अमेरिका: युद्ध से आगे बढ़ता आर्थिक दबाव

सितंबर के तीसरे सप्ताह में कई महीनों के अंतराल के बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर से अप्रत्यक्ष वार्ता हुई। इस दौरान ईरान ने एक समझौते का प्रस्ताव रखा।

ईरान के प्रस्ताव के अनुसार, समझौते पर विचार करने के लिए सात दिनों की अवधि निर्धारित की जाए। इस अवधि के भीतर गाजा, लेबनान और यमन सहित सभी मोर्चों पर लड़ाई समाप्त की जाए। साथ ही, अमेरिका ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों (जिनका मूल्य कम से कम 12 अरब डॉलर आंका गया है) को जारी करे, ईरानी तेल पर लगाए गए प्रतिबंध हटाए और नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करे।

ईरान का कहना था कि यदि ये शर्तें पूरी की जाती हैं, तो सात दिन की अवधि के अंतिम दिन होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोल दिया जाएगा। इसके अलावा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वार्ता तुरंत शुरू कर दी जाएगी। हालांकि, अमेरिका ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

आर्थिक प्रतिबंधों और नौसैनिक नाकेबंदी के बाद अमेरिका ने 23 सितंबर को ईरानी विमानन क्षेत्र पर प्रतिबंधों को और कड़ा किया। इसके तहत यदि कोई विदेशी कंपनी या देश ईरानी विमानों को ईंधन, ग्राउंड-हैंडलिंग या अन्य विमानन सेवाएं उपलब्ध कराता है, तो उस पर भी अमेरिकी secondary sanctions का खतरा है।

इन प्रतिबंधों और नाकेबंदी का प्रभाव ईरान की अर्थव्यवस्था पर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। मार्च में लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन से गिरकर अगस्त में ईरानी क्रूड और कंडेन्सेट की लोडिंग केवल लगभग 2.2–2.55 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई। स्वास्थ्य क्षेत्र भी इस दबाव से प्रभावित हुआ है। सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 800 प्रकार की दवाओं की कमी दर्ज की गई, जिनमें करीब 90 आवश्यक और जीवनरक्षक दवाएं शामिल थीं। इस प्रकार आर्थिक और परिवहन संबंधी प्रतिबंधों का प्रभाव अब सामान्य आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) और स्वास्थ्य सेवाओं तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

दूसरी ओर, यदि ईरान अमेरिकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता, तो नवंबर में होने वाले चुनावों के बाद अमेरिका द्वारा फिर से सैन्य कार्रवाई की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। इसी संभावना और हाल के युद्धों से मिले अनुभवों को देखते हुए अमेरिका भी कम लागत वाले, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले ड्रोन विकसित करने पर काम कर रहा है। इनमें उपग्रह (Satellite) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर भी काम हो रहा है, ताकि ये ड्रोन लक्ष्य की पहचान और हमले जैसी प्रक्रियाओं को अधिक स्वायत्त तरीके से पूरा कर सकें। यह बदलाव केवल Iran–US conflict तक सीमित नहीं है; Ukraine युद्ध ने भी दिखाया है कि कम लागत वाले और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले drones आधुनिक युद्ध में महंगे air-defence systems के सामने नई चुनौती पैदा कर सकते हैं।

लगभग छह-सात महीनों से जारी Iran–US संघर्ष का नया चरण अब केवल युद्धक्षेत्र में सैन्य शक्ति की परीक्षा नहीं रह गया है। इसका नया चरण आर्थिक दबाव, तेल निर्यात, समुद्री मार्ग और कूटनीतिक तोल-मोल (bargaining) के बीच तय हो रहा है। ईरान का सात-दिवसीय प्रस्ताव भी इसी बदलती स्थिति को दिखाता है – एक ओर होर्मुज ईरान की महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त (Strategic Leverage) है, तो दूसरी ओर इसी रास्ते (route) में लंबे समय तक व्यवधान से ईरान के अपने तेल निर्यात और अर्थव्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ रहा है। इसलिए वास्तविक मुकाबला यह है कि आर्थिक दबाव के इस दौर में कौन-सा पक्ष पहले अपनी स्थिति बदलने के लिए मजबूर होता है और कौन अपनी रणनीतिक बढ़त को बनाए रख पाता है।

सऊदी अरब–हूती: तेल आपूर्ति पर बढ़ता खतरा

दूसरी ओर, यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सऊदी अरब का संघर्ष भी इस सप्ताह और तेज हुआ। हूतियों ने Taif, Yanbu, Riyadh और Aramco की सुविधाओं को निशाना बनाया। यह हमला इसलिए महत्वपूर्ण है कि Yanbu एक महत्वपूर्ण तेल बंदरगाह है, जहाँ East-West Pipeline के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल पहुँचाने की क्षमता है। इस pipeline के माध्यम से तेल की आपूर्ति हाल में drone attack के बाद बाधित हुई थी, जिसे 22 सितंबर को आंशिक रूप से फिर शुरू किया गया।

इस बढ़ते खतरे के बीच सऊदी अरब ने बाहरी सैन्य सहायता भी मांगी है। ब्रिटेन ने सऊदी के अनुरोध Saudi fighter jets को हवा में ही ईंधन उपलब्ध कराने के लिए aircraft दी है जो उन्हें अधिक समय तक defensive operations में बने रहने में मदद करेगा। फ्रांस ने Yanbu की सुरक्षा के लिए सैनिकों, रडार और air-defence systems भेजने की घोषणा की है। वहीं सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बने Mecca Joint Defence Agreement के तहत तीनों देशों के सैन्य प्रमुखों की तत्काल बैठक की तैयारी हुई है। इस समझौते में एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना गया है, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान या तुर्किये सीधे यमन में सैन्य कार्रवाई करेंगे।

इसका असर अब सऊदी अरब से बाहर भी दिखाई देने लगा है। Saudi oil supply में व्यवधान के बाद यूरोपीय refiners ने वैकल्पिक crude की तलाश शुरू की है। Poland की Orlen ने Norway सहित North Sea, Britain, Algeria, Kazakhstan, Azerbaijan और अमेरिका से अतिरिक्त crude खरीदा है। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल सऊदी अरब की oil infrastructure की सुरक्षा तक सीमित नहीं है; Middle East में supply routes के बाधित होने से यूरोप को भी अपनी energy supply को नए स्रोतों की ओर मोड़ना पड़ रहा है।

इस प्रकार Saudi–Houthi संघर्ष धीरे-धीरे एक व्यापक international energy-security issue में बदल रहा है। ब्रिटेन और फ्रांस की defensive सहायता तथा यूरोप का वैकल्पिक oil supplies की ओर बढ़ना केवल सऊदी की सुरक्षा चिंता नहीं, बल्कि अपने-अपने देशों की energy और trade security को सुरक्षित रखने की कोशिश भी है। दूसरी ओर, अमेरिका ने फिलहाल Saudi–Houthi संघर्ष में सीधे सैन्य रूप से शामिल होने के संकेत नहीं दिए हैं।

इजरायल–गाजा: युद्ध के बाद की व्यवस्था का सवाल

इजरायल और गाजा के बीच संघर्ष में इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) में Benjamin Netanyahu और Mahmoud Abbas के भाषण महत्वपूर्ण रहे। Netanyahu ने Gaza में Israel की सैन्य कार्रवाई का बचाव किया और 7 October के Hamas हमले को Israel की सुरक्षा के संदर्भ में रखा। उनके भाषण से पहले बड़ी संख्या में देशों के प्रतिनिधि सभागार से बाहर चले गए।

वहीं अमेरिका ने लगातार दूसरी बार Mahmoud Abbas को UN General Assembly में शामिल होने के लिए visa नहीं दिया। अमेरिका का कहना है कि Palestinian Authority (PA) और Palestine Liberation Organization (PLO) आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं और Israel–Palestine विवाद को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं। Abbas ने BBC से बातचीत में 9/11 का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय वे स्वयं छोटे थे, लेकिन जिस राजनीतिक क्षेत्र से वे आते हैं, उसका संबंध Al-Qaeda से रहा था और आज उसी क्षेत्र का एक व्यक्ति नेता है। Visa न मिलने के कारण Abbas ने UN को prerecorded video के माध्यम से संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने Gaza में जारी मानवीय संकट का मुद्दा उठाया और ट्रम्प के 20-point Gaza plan का समर्थन करते हुए उसके अगले चरण को जल्द लागू करने तथा Gaza, West Bank और East Jerusalem को एक राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत लाने की बात कही।

इस सप्ताह की घटनाओं में महत्वपूर्ण बात यह है कि अब Gaza का प्रश्न केवल युद्ध रोकने तक सीमित नहीं है। युद्ध के बाद Gaza की सुरक्षा, reconstruction और Gaza–West Bank के राजनीतिक भविष्य पर सहमति बनाना अगली बड़ी चुनौती हो सकती है।

रूस–यूक्रेन: युद्ध की बदलती रणनीति और उसकी कीमत

पिछले लगभग एक महीने में Russia–Ukraine युद्ध का एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा है कि दोनों पक्षों ने energy infrastructure को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया है। यूक्रेन ने रूस के oil refineries, oil terminals और gas facilities तक long-range drones से हमले बढ़ाए हैं। सितंबर में Ukrainian drones ने Moscow के oil refinery और दूसरे energy infrastructure को भी निशाना बनाया। इसके जवाब में रूस लगातार यूक्रेन के electricity, heating और अन्य energy infrastructure पर हमले कर रहा है। दोनों देशों के बीच अब energy infrastructure को लेकर हमले रोकने की बात भी हुई, लेकिन धरातलीय वास्तविकता (ground reality) में हमले जारी रहे।

यूक्रेन की long-range strike क्षमता अब रूस के भीतर काफी दूर तक पहुंच रही है। अगस्त में Ukrainian attacks के कारण रूस के Novorossiysk port पर crude loading 58% घट गई और लगातार नौ दिनों तक loading बंद रही। सितंबर में मोस्को और रूस के दूसरे हिस्सों में oil infrastructure पर बड़े drone attacks हुए। इसका उद्देश्य केवल सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाना नहीं है; रूस की fuel supply और उस revenue पर दबाव डालना भी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिससे वह युद्ध को finance करता है।

Frontline पर तस्वीर इससे अलग है। रूस अभी भी यूक्रेन के लगभग 20% territory पर नियंत्रण रखता है, जिसमें Crimea और 2022 से पहले कब्जे में आए Donbas के हिस्से भी शामिल हैं। लेकिन हाल की गति काफी धीमी हुई है। ISW के अनुसार अगस्त 2026 में Russian forces ने लगभग 90.35 km² territory पर कब्जा या स्थायी नियंत्रण हासिल किया, जबकि अगस्त 2025 में यह आंकड़ा लगभग 505.55 km² था। वहीं अगस्त 2026 में Ukrainian forces ने कम-से-कम 129.81 km² territory वापस हासिल की। यानी अब युद्ध में केवल रूस का लगातार आगे बढ़ना ही तस्वीर नहीं है; कुछ क्षेत्रों में यूक्रेन भी territory वापस ले रहा है।

इस धीमी territorial advance की कीमत रूस को बहुत बड़ी manpower losses के रूप में चुकानी पड़ रही है। सितंबर में UK Chief of Defence Staff के अनुसार फरवरी 2022 से अब तक 500,000 से अधिक Russian troops मारे गए हैं, जबकि killed और wounded को मिलाकर कुल Russian military casualties लगभग 1.5 million हैं। दूसरी ओर, Ukraine के General Staff ने 15 सितंबर तक 2026 में Russian military losses 301,030 बताईं, लेकिन यह आंकड़ा killed और wounded दोनों को मिलाकर Ukrainian estimate है।

यूक्रेन ने फरवरी 2026 में अपने सैनिकों की battlefield deaths 55,000 बताई थीं। राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy ने साथ ही कहा था कि बड़ी संख्या में सैनिक अभी missing भी हैं। हालांकि independent estimates इससे काफी अधिक रहे हैं; उदाहरण के लिए CSIS ने 2025 के अंत तक Ukrainian military fatalities को लगभग 100,000–140,000 के बीच आंका था। इसलिए दोनों पक्षों के casualty आंकड़ों में बड़ा अंतर है और किसी एक संख्या को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।

फिर सवाल यह है कि इतनी बड़ी losses के बावजूद Russia अपनी war machine कैसे चला पा रहा है। इसका एक बड़ा आधार defence spending और domestic weapons production है। SIPRI के अनुसार 2025 में Russia का military spending लगभग 16 trillion rubles, यानी GDP का करीब 7.5%, था; 2026 के budget में military expenditure लगभग 14.9 trillion rubles, यानी GDP का करीब 6.3%, रखा गया है। Russia drones, missiles, ammunition और अन्य military equipment का domestic production भी बड़े पैमाने पर कर रहा है।

दूसरा बड़ा आधार oil और gas revenue है। Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) के अनुसार अगस्त 2026 में रूस की fossil-fuel export revenue लगभग €604 million प्रतिदिन रही। उसी महीने चीन ने लगभग €8.4 billion, भारत ने €4.8 billion और तुर्किये ने €1.5 billion के Russian fossil fuels खरीदे। यानी Western sanctions के बावजूद रूस को energy exports से बड़ी विदेशी आय मिल रही है। हालांकि Ukrainian attacks ने इस आय और supply system पर दबाव बढ़ाया है। अगस्त में Novorossiysk जैसी महत्वपूर्ण oil-export infrastructure पर disruption इसका उदाहरण है।

दूसरी ओर उक्रेन की war effort में European support की भूमिका बहुत बड़ी है। EU ने 2026–27 के लिए €90 billion Ukraine Support Loan की व्यवस्था की है, जिसमें लगभग €60 billion defence और €30 billion budgetary support के लिए है। सितंबर में EU ने drones और missiles की खरीद के लिए Ukraine को €3.3 billion की अतिरिक्त राशि जारी की; European Commission के अनुसार 2026 में इस support loan के तहत लगभग €14.9 billion अदा (disburse) किया जा चुका था।

इस महीने रूस में संसदिय चुनाव भी हुआ, जिसमें United Russia ने 450 में से 355 seats जीतीं। लेकिन इसे युद्ध के पक्ष में जनता की स्वतंत्र राय का सीधा माप नहीं माना जा सकता, क्योंकि anti-war opposition पर restrictions थीं और Yabloko जैसी anti-war party को federal ballot से बाहर रखा गया था। इसलिए चुनाव का व्यावहारिक महत्व यह है कि Kremlin के पास parliament में इतना मजबूत नियंत्रण बना रहा कि वह military spending, recruitment और युद्ध से जुड़े दूसरे फैसलों को आगे बढ़ा सके।

इस एक महीने की तस्वीर में Russia–Ukraine युद्ध का केंद्र केवल frontline और territory नहीं रह गया है। अब oil revenue, defence production, drones, manpower और energy infrastructure यह तय करने वाले प्रमुख factors हैं कि दोनों देश लंबे युद्ध को कितने समय तक sustain कर सकते हैं। Russia के पास बड़ी military-industrial capacity और energy revenue है, जबकि Ukraine की युद्ध क्षमता में European financial और defence support की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।

Trump–Xi: व्यापार से आगे AI और Strategic Competition

इस सप्ताह ट्रम्प और Xi Jinping की Washington में तीन दिन की मुलाकात हुई। दोनों देशों ने व्यापार युद्धविराम (trade truce) को लगभग दो महीने और आगे बढ़ाने तथा करीब 30 अरब डॉलर के non-sensitive goods पर tariffs को कम करने की दिशा में सहमति बनाई। चीन ने 2027 और 2028 में अमेरिका से कम-से-कम 1 करोड़ metric tonnes coal खरीदने की बात भी स्वीकार की। वहीं rare earths और दूसरे critical minerals की supply को लेकर बनी व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया।

लेकिन इस बैठक में trade के अलावा वे मुद्दे भी मौजूद रहे जो US–China rivalry को मूल रूप से बनाए हुए हैं – Taiwan, AI, rare earths, Iran और Russia–Ukraine war। ट्रम्प ने Xi से ईरान को मिल रहे Chinese support को लेकर भी बात की और कहा कि ईरान को nuclear weapon नहीं मिलना चाहिए। Russia–Ukraine के संदर्भ में भी चीन की भूमिका पर चर्चा हुई। इससे पहले ट्रम्प यह संकेत दे चुके हैं कि चीन जैसे देश अगर रूस से oil खरीदते हैं तो उन पर economic pressure बढ़ाया जा सकता है। अभी हालांकि Trump–Xi बैठक से ऐसा कोई specific agreement सामने नहीं आया है जिसमें चीन ने Russian oil खरीद रोकने या यूक्रेन को किसी विशेष रूप से मदद देने की सहमति दी हो।

AI को लेकर Xi Jinping ने अपने वक्तव्य में कहा कि अमेरिका और चीन के पास AI विकसित करने और उसे व्यस्थित (manage) करने की क्षमता और जिम्मेदारी दोनों हैं, लेकिन इसका development human control में रहना चाहिए और लोगों के हित में होना चाहिए। उन्होंने US–China competition को ऐसी “race” बताया जिसमें दोनों एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करें, न कि ऐसी लड़ाई जिसमें एक पक्ष जीते और दूसरा हारे। दोनों देशों ने अब Super Intelligence (SI) Dialogue शुरू करने और AI से जुड़े बड़े incidents के लिए bilateral communication channel बनाने पर भी सहमति जताई है।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य है। चीन आज केवल अमेरिका का बड़ा trading partner नहीं है, बल्कि rare-earth refining में 90% से अधिक global capacity रखता है। ये minerals electronics, electric vehicles, renewable-energy equipment और defence systems के लिए जरूरी हैं। इसलिए trade war में tariffs के साथ-साथ supply chains भी bargaining tool बन गई हैं। इसी कारण इस बार बातचीत में rare earths को लेकर तत्काल टकराव कम करने की कोशिश हुई।

ताइवान पर दोनों देशों की मूल स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। Xi ने ट्रम्प से ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करने वाली चीन की स्थिति को स्वीकार करने का आग्रह किया। दूसरी ओर ताइवान ने Chinese statement की व्याख्या पर आपत्ति जताई। इसलिए trade में temporary राहत आने के बावजूद ताइवान और advanced technology जैसे मुद्दे US–China competition के मूल केंद्र में बने हुए हैं।

इस पूरी बातचीत में एक तरफ दोनों देश ऐसे मुद्दों पर सहयोग (cooperation) का रास्ता खोज रहे हैं जहाँ सीधा टकराव दोनों के लिए महंगा हो सकता है; दूसरी तरफ AI, critical minerals, ताइवान, रूस और ईरान  जैसे मुद्दों पर उनकी strategic competition बनी हुई है। इसलिए इस समय दोनों देशों के संबंधों में टकराव खत्म होने के बजाय उसे नियंत्रित करने की कोशिश दिखाई देती है।

ग्रीनलैंड: आर्कटिक में अमेरिका की नई रणनीतिक स्थिति

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच 22 सितंबर को नया security agreement हुआ। समझौते में ग्रीनलैंड की sovereignty और self-determination को बरकरार रखते हुए अमेरिका को Narsarsuaq और Mestersvig में दो नए Defense Areas बनाने तथा मौजूदा Pituffik Space Base का विस्तार करने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ग्रीनलैंड में US Golden Dome missile-defence system लगाने और अमेरिकी aircraft तथा naval vessels को ग्रीनलैंड के पूरे क्षेत्र और territorial waters में व्यापक access देने का प्रावधान है।

समझौते में यह भी तय किया गया है कि NATO से बाहर के किसी देश को ग्रीनलैंड में military installation या permanent military presence स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा NATO से बाहर के देशों के investors को ग्रीनलैंड के sensitive sectors में control या significant influence हासिल करने से रोकने के लिए investment screening की व्यवस्था की गई है। Agreement की कोई end date नहीं है और ग्रीनलैंड के भविष्य में स्वतंत्र होने की स्थिति में भी NATO से जुड़े इन security arrangements को जारी रखने का प्रावधान रखा गया है।

इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अमेरिका ने ग्रीनलैंड को अपने territory में शामिल नहीं किया, लेकिन आर्कटिक में अपनी military और strategic position को काफी मजबूत करने के लिए वह अधिकार हासिल कर लिया जिसकी उसे जरूरत थी। इसके पीछे केवल ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति नहीं, बल्कि आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती strategic activity, नए shipping routes और critical minerals की competition भी महत्वपूर्ण है। इसलिए यह समझौता ग्रीनलैंड के ownership से ज्यादा आर्कटिक में आने वाले वर्षों की security और great-power competition से जुड़ा हुआ है।

निष्कर्ष

इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। जो देश आर्थिक, सामरिक और विभिन्न आवश्यक संसाधनों में आत्मनिर्भर हैं, वे अपनी प्रभुता और सर्वोच्चता को बनाए रखने की दिशा में लगे हुए हैं। इसके विपरीत, जो देश कुछ आवश्यक संसाधनों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, वे उन्हीं संसाधनों और अपनी उपलब्ध क्षमताओं के आधार पर अपनी प्रभुता और संप्रभुता को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रकार पूरी व्यवस्था परस्पर विकास, बंधुत्व और एक-दूसरे के हित की भावना से हटकर स्व-केंद्रित होती जा रही है। परिणामतः पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और उत्तरोत्तर विकास जैसे मानवता के व्यापक प्रश्न किसी सामूहिक और सुनियोजित प्रयास से नहीं, बल्कि अपनी स्वाभाविक गति से आगे बढ़ रहे हैं।

इस समय दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शक्ति या भू-क्षेत्र (Territory) तक सीमित नहीं है। तेल और ऊर्जा मार्ग(energy routes), ड्रोन और रक्षा उत्पादन(defence production), कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI), दुर्लभ खनिज(Rare Earths), रणनीतिक संसाधन(Strategic Resources) और महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाएँ (Critical Infrastructure) भी अब शक्ति के प्रमुख साधन बन चुके हैं। इसलिए किसी देश की शक्ति केवल उसकी सेना से नहीं, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होने लगी है कि वह अपनी आवश्यकताओं के लिए कितना स्वयं पर निर्भर रह सकता है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज के संघर्ष केवल दो देशों के बीच सीमित नहीं रह गए हैं। इन संघर्षों के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक क्षेत्र में उत्पन्न संकट दूसरे क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था, आपूर्ति-श्रृंखला (Supply Chain) और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। ऊर्जा का संकट व्यापार को, व्यापार का संकट राजनीति को और राजनीति का संकट सुरक्षा को प्रभावित करता है। इस प्रकार विश्व की विभिन्न घटनाएँ अलग-अलग दिखाई देने के बावजूद एक-दूसरे से गहराई से जुड़ती जा रही हैं।

इन घटनाओं में एक और समानता दिखाई देती है – अपने हित पर बढ़ती हुई केंद्रिता और नैतिक मूल्यों के क्षरण ने परस्पर विश्वास के उस वातावरण को कमजोर कर दिया है, जिस पर सहयोग की व्यापक व्यवस्था टिकी होती है। अब अपनी सुरक्षा और स्थायित्व (Sustainability) के लिए स्वयं पर निर्भर होना आवश्यक होता जा रहा है। परिणामतः प्रभावित क्षेत्रों में केवल अपने को सुरक्षित रखने की ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में आगे बने रहने की एक निरंतर होड़ दिखाई दे रही है।

इस प्रकार विश्व का समीकरण आने वाले समय में केवल इस बात से निर्धारित नहीं होगा कि किस देश ने कहाँ कितनी territory हासिल की या किसने किस पर हमला किया। इससे अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि कौन अपनी अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा-आपूर्ति, सैन्य उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को लंबे समय तक बनाए रखने में सक्षम होता है। यही क्षमताएँ आने वाले वर्षों में विश्व की शक्ति-संरचना (Global Power Balance) को प्रभावित करने वाली प्रमुख शक्तियाँ बनती प्रतीत हो रही है।

 

(September)

AI : कैसे काम करती है, कितनी सक्षम है और भविष्य क्या है?

AI संभवतः इस सदी का सबसे अद्भुत तकनीकी विकास है। इसकी विशेषता केवल इसकी नई तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि यह ऐसी क्षमताएँ विकसित कर रही है जिन्हें अब तक मुख्यतः मानव बुद्धि से जोड़ा जाता था जैसे – सीखना, भाषा को समझना, जानकारी का विश्लेषण करना, तर्क करना और नई सामग्री का निर्माण करना। यही कारण है कि AI का प्रभाव अब केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है।

लेकिन AI की बढ़ती क्षमताओं ने जहाँ लोगों को आश्चर्यचकित किया है, वहीं इसके भविष्य और मानव अस्तित्व को लेकर गंभीर प्रश्न भी खड़े किए हैं। इसके विकास में प्रमुख भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की चेतावनियों ने भी इन प्रश्नों को चर्चा का केंद्र बना दिया है। आखिर एक ऐसी तकनीक, जो लगातार अधिक सक्षम होती जा रही है, भविष्य में मानव जीवन और समाज को किस प्रकार प्रभावित करेगी?

इन प्रश्नों को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि AI वास्तव में क्या है, यह कैसे काम करती है, इसकी क्षमताएँ कहाँ तक पहुँच चुकी हैं और भविष्य में इसकी क्या संभावनाएँ हैं। इस लेख में हम इन्हीं प्रश्नों के माध्यम से AI को समझने का प्रयास करेंगे।

AI क्या है और कैसे कार्य करती है?

AI को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि कंप्यूटर को किसी काम के लिए पहले किस तरह निर्देश दिए जाते थे। इसका आधार पारंपरिक प्रोग्रामिंग (Traditional Programming) था। प्रोग्रामिंग का अर्थ है कंप्यूटर को किसी काम को करने के लिए नियमों और निर्देशों का स्पष्ट विवरण देना।

उदाहरण के लिए, यदि हम किसी कंप्यूटर को बिल्ली पहचानना सिखाना चाहते हैं, तो हमें उसके लिए नियम बनाने होंगे। हम ऐसा कोड लिख सकते हैं जो कहे – “यदि किसी वस्तु के त्रिकोणीय कान, मूँछें और फर हैं, तो वह बिल्ली है।” यह तरीका तब तक ठीक काम कर सकता है, जब तक कंप्यूटर के सामने वैसी ही बिल्ली आती है जिसके लिए हमने नियम बनाए हैं। लेकिन यदि हम उसे Scottish Fold बिल्ली की तस्वीर दिखाएँ, जिसके कान मुड़े हुए होते हैं, या Sphynx बिल्ली की तस्वीर दिखाएँ, जिसके शरीर पर फर नहीं होता, तो वह असफल हो सकता है। समस्या यह है कि संसार में मौजूद हर संभावित अपवाद के लिए अलग-अलग नियम लिखना संभव नहीं है।

इसी समस्या को दूर करने के लिए Machine Learning का विकास हुआ, जो आज की AI का एक मूल आधार है। इसमें कंप्यूटर को हर स्थिति के लिए नियम देने के बजाय उसे बहुत बड़ी मात्रा में उदाहरण (Examples) दिए जाते हैं। फिर वह उन उदाहरणों से स्वयं पैटर्न (Patterns) सीखने का प्रयास करता है।

इसे एक छोटे बच्चे के उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि किसी बच्चे को पहली बार बिल्ली के बारे में बताना हो, तो हम उसे बिल्ली की कोई ज्यामितीय या वैज्ञानिक परिभाषा नहीं सिखाते। हम उसे बार-बार अलग-अलग बिल्लियों की तस्वीरें दिखाते हैं और कहते हैं – “बिल्ली ऐसी होती है।” फिर हम उसे कुत्तों की तस्वीरें दिखाकर बताते हैं -“यह बिल्ली नहीं है।” अनेक उदाहरण देखने के बाद बच्चे का मस्तिष्क स्वयं कुछ समानताएँ पहचानने लगता है। उसे धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि कुछ विशेष आकृतियाँ, बनावट और विशेषताएँ सामान्यतः बिल्ली से जुड़ी होती हैं।

Machine Learning में भी कुछ इसी प्रकार होता है। कंप्यूटर को लाखों या उससे भी अधिक उदाहरण दिए जा सकते हैं और वह उनमें मौजूद ऐसे पैटर्न खोजता है जिन्हें मनुष्य के लिए शब्दों में पूरी तरह बताना भी कठिन हो सकता है। यही Pattern Recognition AI की महत्वपूर्ण क्षमताओं में से एक है।

अब प्रश्न उठता है कि कंप्यूटर इन पैटर्न को देखता और उनका मूल्यांकन कैसे करता है? इसके लिए जिस प्रमुख तकनीक का उपयोग किया जाता है, उसे Neural Network कहा जाता है। इसे “Neural” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी संरचना मानव मस्तिष्क में पाए जाने वाले neurons से प्रेरित है। हालांकि इसे मानव मस्तिष्क की वास्तविक प्रतिकृति समझना सही नहीं होगा। इसे सरल रूप में कई स्तरों (Layers) में काम करने वाले mathematical filters की एक श्रृंखला के रूप में समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए किसी अंक की पहचान करनी है और मान लीजिए वह अंक 9 है। Neural Network की शुरुआती layer को सीधे “9” दिखाई नहीं देता। वह image के pixels से प्राप्त बहुत साधारण patterns को पहचानती है – जैसे किसी स्थान पर रेखा है या कोई वक्र है। इसके बाद यह information अगली layer तक पहुँचती है।

अगली layers इन छोटी-छोटी विशेषताओं को जोड़कर अधिक जटिल patterns पहचान सकती हैं। उदाहरण के लिए ऊपर का वक्र किसी वृत्त या घुमावदार आकृति जैसा दिखाई दे सकता है और उसके साथ जुड़ी रेखाएँ किसी विशेष संरचना का संकेत दे सकती हैं। आगे की layers इन सभी patterns को जोड़कर यह अनुमान लगा सकती हैं कि पूरी आकृति 9 होने की कितनी संभावना है।

इसी प्रकार जब Neural Network में layers की संख्या और उसकी सीखने की क्षमता बहुत अधिक होती है, तो इसे Deep Learning कहा जाता है। सरल शब्दों में, शुरुआती layers अपेक्षाकृत सरल patterns और बाद की layers अधिक जटिल patterns को पहचान सकती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को एक ऐसी mathematical processing chain की तरह समझा जा सकता है जिसमें information एक स्तर से दूसरे स्तर तक जाती हुई अधिक जटिल representation में बदलती जाती है।

लेकिन अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न आता है – AI को कैसे पता चलता है कि कौन-से patterns महत्वपूर्ण हैं? उसे कैसे पता चलता है कि किसी विशेष आकृति का संबंध 9 से अधिक है और 6 से कम?

इसके लिए AI को Training की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। शुरुआत में Neural Network के भीतर मौजूद parameters सही तरीके से निर्धारित नहीं होते। इसलिए यदि उसे किसी बिल्ली की तस्वीर दिखाई जाए, तो वह गलत अनुमान भी लगा सकता है। जब उसका अनुमान सही उत्तर से अलग होता है, तो training system उसे उस गलती की जानकारी देता है और network के parameters को थोड़ा-थोड़ा बदलता है।

इन parameters में महत्वपूर्ण भूमिका Weights की होती है। इसे समझने के लिए एक विशाल mixing board की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें अरबों छोटे-छोटे knobs लगे हों। हर knob किसी information को कितना महत्व दिया जाए, इसे प्रभावित करता है। जब AI कोई गलती करता है, तो learning algorithm इन weights को बहुत थोड़ी मात्रा में बदलता है। फिर वही प्रक्रिया नए उदाहरण के साथ दोहराई जाती है।

यह प्रक्रिया लाखों या अरबों उदाहरणों पर बार-बार चल सकती है। सही और गलत परिणामों से मिलने वाले Feedback के आधार पर network अपने parameters को लगातार समायोजित(adjust) करता रहता है। इस प्रकार धीरे-धीरे वह ऐसे mathematical patterns सीख लेता है जिनके आधार पर वह नई तस्वीर या नई जानकारी मिलने पर अनुमान लगा सकता है।

यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि AI किसी वस्तु की पहचान मनुष्य की तरह उसकी कोई स्पष्ट परिभाषा बनाकर नहीं करता। उसने training के दौरान अपने mathematical parameters को इस प्रकार समायोजित किया होता है कि कुछ विशेष patterns मिलने पर किसी परिणाम की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए वह नई तस्वीर में भी उन patterns के आधार पर “बिल्ली” का अनुमान लगा सकता है, भले ही उसने उस विशेष तस्वीर को पहले कभी न देखा हो।

अब प्रश्न उठता है कि यदि AI तस्वीरों को पहचान सकता है, तो वह निबंध कैसे लिखता है, प्रश्नों के उत्तर कैसे देता है या नई image कैसे बना देता है?

यहीं से Generative AI का क्षेत्र सामने आता है। ChatGPT जैसे systems को सरल रूप में एक अत्यंत शक्तिशाली probability-based prediction system की तरह समझा जा सकता है। इसे एक उदाहरण से समझें।

यदि किसी व्यक्ति ने हिंदी का बहुत बड़ा साहित्य पढ़ा हो और उससे पूछा जाए – “आम के आम, गुठली के…” तो वह लगभग तुरंत “दाम” कह सकता है। इसी तरह “नाच न जाने…” के बाद वह “आँगन टेढ़ा” कहेगा। ऐसा इसलिए नहीं कि उसने उस क्षण कोई गणितीय calculation की, बल्कि इसलिए कि उसने भाषा में इन शब्दों को इतनी बार एक साथ देखा है कि उसे अगला शब्द बहुत अधिक संभावित दिखाई देता है।

Generative AI भी इसी मूल विचार पर काम करता है, हालांकि वास्तविक प्रक्रिया इससे कहीं अधिक जटिल है। भाषा को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर Tokens के रूप में process किया जाता है। Model सामने मौजूद context के आधार पर यह अनुमान लगाता है कि अगला token कौन-सा होना अधिक संभावित है। फिर अगले token के आधार पर आगे की prediction होती है और इस प्रकार पूरा वाक्य, paragraph या उत्तर तैयार हो जाता है।

इसलिए सरल रूप में Generative AI को एक अत्यंत शक्तिशाली Auto-complete की तरह समझा जा सकता है। लेकिन यह केवल शब्दों की सूची से अगला शब्द चुनने जितना सरल नहीं है। Training के दौरान model ने भाषा में मौजूद patterns, संबंधों और संदर्भों की विशाल मात्रा से mathematical representations सीखी होती हैं। इसी कारण वह केवल पहले से देखे हुए वाक्यों को दोहराने के बजाय नए वाक्य, उत्तर, सारांश, कहानी या अन्य सामग्री भी उत्पन्न कर सकता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है। AI जब कोई उत्तर देता है तो वह मनुष्य की तरह यह सुनिश्चित करके उत्तर नहीं देता कि सामने कही गई हर बात सत्य है। उसका मूल काम अपने सीखे हुए patterns और दिए गए context के आधार पर सबसे उपयुक्त output का निर्माण करना है। इसलिए AI का उत्तर सही भी हो सकता है और गलत भी। इसी कारण AI द्वारा दिए गए तथ्यों को महत्वपूर्ण मामलों में स्वतंत्र रूप से verify करना आवश्यक है।

यहाँ से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है – यदि AI patterns को पहचानती है, probabilities के आधार पर output बनाती है और अपने parameters को training के दौरान समायोजित(Adjusts) करती है, तो क्या इसे वास्तव में Intelligence (बुद्धिमत्ता) कहना उचित है?

AI की कार्यप्रणाली को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि वह मनुष्य की तरह दुनिया को प्रत्यक्ष अनुभव करके नहीं सीखती। उसे बड़ी मात्रा में Data दिया जाता है और उस data में मौजूद patterns तथा उनके संबंधों को mathematical रूप में सीखने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इसके बाद जब उसके सामने कोई नया प्रश्न या परिस्थिति आती है, तो वह अपने सीखे हुए patterns के आधार पर output तैयार करती है।

इसीलिए AI की “बुद्धिमत्ता” को मनुष्य की बुद्धिमत्ता के बिल्कुल समान मानना उचित नहीं होगा। मनुष्य किसी वस्तु को केवल उसके बाहरी patterns से नहीं पहचानता; वह उसे अपने अनुभव, इंद्रियों, स्मृति, भावनाओं और अपने आसपास की दुनिया के साथ संबंध के माध्यम से भी समझता है। AI किसी वस्तु के बारे में अत्यंत विस्तृत जानकारी दे सकती है, लेकिन इससे यह आवश्यक नहीं हो जाता कि वह उस वस्तु को उसी अर्थ में समझती या अनुभव करती है, जिस अर्थ में मनुष्य करता है।

इसे बिल्ली के उदाहरण से समझ सकते हैं। AI हजारों-लाखों तस्वीरों में बिल्ली से जुड़े patterns सीखकर किसी नई तस्वीर में बिल्ली को पहचान सकती है। वह बिल्ली की नस्ल, उसके शरीर की संरचना, उसके व्यवहार और उससे संबंधित अनेक तथ्यों का वर्णन भी कर सकती है। लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि AI के भीतर बिल्ली को देखने का कोई Subjective Experience (व्यक्तिगत अनुभूति) भी उत्पन्न होता है।

यही अंतर Information Processing (सूचना प्रसंस्करण) और Experience (अनुभव) के बीच का प्रश्न उठाता है। मनुष्य के लिए बिल्ली केवल pixels, आकृतियों और शब्दों का समूह नहीं है। वह एक जीव है जिसे मनुष्य देख सकता है, छू सकता है, उसके साथ संबंध बना सकता है और उसके व्यवहार को अनुभव कर सकता है। AI इन अनुभवों का भाषाई या गणितीय वर्णन कर सकती है, लेकिन क्या उसके भीतर उन अनुभवों के समान कोई आंतरिक अनुभूति होती है – यह प्रश्न अभी भी पूरी तरह अनसुलझा है।

इसी प्रकार AI “दुख”, “प्रेम”, “भय” या “करुणा” जैसे शब्दों का अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रयोग कर सकती है। वह किसी दुखी व्यक्ति से सहानुभूति के शब्द कह सकती है और प्रेम पर कविता भी लिख सकती है। लेकिन किसी भावना का सही भाषाई वर्णन कर पाना और उस भावना का स्वयं अनुभव करना एक ही बात नहीं है।

इसलिए AI को समझने के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि वह क्या कर सकती है। हमें यह भी पूछना होगा कि वह जो कर रही है, उसे किस अर्थ में “समझ” रही है। आज की AI की क्षमताएँ लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन उसकी processing, intelligence, understanding और subjective experience को मानव चेतना के समान मान लेना अभी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।

यहीं से AI का सबसे गहरा प्रश्न सामने आता है – यदि कोई मशीन लगातार सीख सकती है, समस्याएँ हल कर सकती है, भाषा का प्रयोग कर सकती है, निर्णय ले सकती है और मनुष्य जैसी बातचीत कर सकती है, तो बुद्धिमत्ता की हमारी परिभाषा क्या होनी चाहिए? और यदि भविष्य में मशीनें ऐसी क्षमताएँ विकसित कर लें जिन्हें आज हम केवल मानव बुद्धि से जोड़ते हैं, तो तब मनुष्य और मशीन के बीच का अंतर किस आधार पर निर्धारित किया जाएगा?

यही प्रश्न हमें AI के वर्तमान स्वरूप से आगे उसके भविष्य की ओर ले जाता है।

प्रारंभिक AI से आगे की ओर

अब तक हमने यह समझने का प्रयास किया कि AI क्या है, पारंपरिक प्रोग्रामिंग से यह किस प्रकार अलग है और Machine Learning, Neural Network, Deep Learning तथा Generative AI के माध्यम से यह किस प्रकार सीखती और उत्तर तैयार करती है। लेकिन AI को समझने का प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।

आज AI जिन कार्यों को करने में सक्षम हो चुकी है, उनका क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अगला प्रश्न है कि इसकी वर्तमान क्षमताएँ वास्तव में कितनी दूर तक पहुँच चुकी हैं और इसकी सीमाएँ क्या हैं। इसके साथ ही Narrow AI से आगे Artificial General Intelligence (AGI) के विकास की संभावना भी सामने आती है।

यदि AI की क्षमताएँ इसी गति से बढ़ती रहीं, तो भविष्य में यह कहाँ तक पहुँच सकती है और मानव जीवन पर इसका क्या प्रभाव होगा? AI के विकास में प्रमुख भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक इसकी संभावनाओं और खतरों को किस रूप में देखते हैं? और सबसे मूल प्रश्न – क्या AI वास्तव में मानवीय बुद्धिमत्ता, चेतना और अनुभूति के समान बन सकती है?

अगले अंक में हम इन्हीं प्रश्नों को समझने का प्रयास करेंगे।

 

सन्दर्भ :-

  • IBM, What is Machine Learning?
  • Google for Developers, Neural Networks: Training using Backpropagation
  • NIST, Artificial Intelligence Glossary
  • Simple Things – Surprising Histories, “How AI Really Works”
  • Science Simplified 4 All, “SIMPLEST Explanation of How Artificial Intelligence Works?”
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