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- (42.)Weekly News Update 10- 30 (August, mindnubming drugs education, Gorkhaland dispute, Ai news, east asia Diplomacy )
- (43.)Weekly News Update 31 Aug (America china ai & economical budget Sanghai Shikhar summit 2026)
- (44.)Weekly News Update 07 September-13September (Iran war-Falklands issue-Brics summit-Boss Scame)
- (45.)Weekly News Update (14 September-20 September) Saudi economy, RUPP donation, UK division and Gemenai hack, Anthropic bio lab
- (46.)Weekly News Update (21 September-27 September) Middle east conflict russia ukrain conflict US china meet Denmark agreement AI WORK
Weekly News Update (45)
(14 September – 20 September 2026)
प्रमुख खबरें
- युद्ध के बीच सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था
- RUPP: राजनीतिक चंदे और चुनावी भागीदारी की तस्वीर
- Britain के भीतर Scotland, Wales और Northern Ireland की मांग
- AI: संभावनाओं के साथ बढ़ते सवाल
(September)
युद्ध के बीच सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था (तेल, Vision 2030, व्यापार, रक्षा और वर्तमान ऊर्जा संकट)
भूमिका
सऊदी अरब पश्चिम एशिया के अरब प्रायद्वीप के ज्यादातर हिस्से में फैला एशिया का पाँचवाँ और दुनिया का बारहवाँ सबसे बड़ा देश है। इसका क्षेत्रफल लगभग 2,149,690 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के क्षेत्रफल से लगभग 35 प्रतिशत छोटा है। इसकी सीमाएँ पश्चिम में लाल सागर, उत्तर में जॉर्डन, इराक और कुवैत, पूर्व में अरब की खाड़ी, बहरीन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण-पूर्व में ओमान और दक्षिण में यमन से लगती हैं। उत्तर-पश्चिम में अकाबा की खाड़ी इसे मिस्र और इज़राइल से अलग करती है। रियाद इसकी राजधानी और सबसे बड़ा शहर है, जबकि अन्य प्रमुख केंद्रों में जेद्दा और इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर मक्का और मदीना शामिल हैं। इसकी आबादी लगभग 3.53 करोड़ है। इसमें लगभग 90 प्रतिशत सुन्नी और शेष में शिया, ईसाई, हिंदू तथा अन्य धर्मों के लोग शामिल हैं।
सऊदी अरब का राजनीतिक ढांचा एक पूर्ण राजशाही है, जिस पर सऊद राजवंश का शासन है। राजा के पास विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियां होती हैं और वे आमतौर पर प्रधानमंत्री के रूप में भी काम करते हैं। हालांकि शरिया (इस्लामी कानून) कानून बनाने का मुख्य आधार है, लेकिन नीतियों पर राजनीतिक जरूरतों, शासक परिवार की आंतरिक राजनीति और कबीलाई समीकरणों का भी असर पड़ता है। 1992 में जारी ‘सरकार का बुनियादी कानून’ (Basic Law of Government) शासन और नागरिकों के अधिकारों के लिए दिशा-निर्देश तय करता है। राजा ‘परामर्शदात्री परिषद’ (मजलिस अल-शूरा) के सदस्यों की नियुक्ति करते हैं, जो राजा की मंजूरी के लिए कानून का मसौदा तैयार कर सकती है। नीति से जुड़े बड़े फैसले शाही परिवार के भीतर आम सहमति से और धार्मिक विद्वानों (वहाबी धार्मिक प्रतिष्ठान) व प्रमुख व्यावसायिक परिवारों की राय पर विचार करके लिए जाते हैं।
आर्थिक रूप से सऊदी अरब काफी हद तक पेट्रोलियम पर निर्भर है और दुनिया के ज्ञात तेल भंडार का लगभग पांचवां हिस्सा इसके पास है। 1938 में तेल की खोज ने अर्थव्यवस्था को नया आयाम दिया और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसमें तेजी से विस्तार हुआ। तेल से मिलने वाला राजस्व लंबे समय से सऊदी अर्थव्यवस्था की ताकत रहा है, लेकिन इसी पर निर्भरता उसकी एक बड़ी चुनौती भी है। इसलिए तेल से होने वाली आय पर निर्भरता और बेरोजगारी जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने ‘विजन 2030’ जैसी पहलों के जरिए अर्थव्यवस्था में विविधता लाने की कोशिश की है।
इस आर्थिक व्यवस्था में कार्यबल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यहाँ के कार्यबल में पारंपरिक रूप से बड़ी संख्या में विदेशी मजदूर शामिल हैं, जिनके कानूनी अधिकार सीमित हैं और जिन्हें संगठन बनाने या हड़ताल करने की अनुमति नहीं है। दूसरी ओर, सरकार की आय मुख्य रूप से तेल के निर्यात से होती है, साथ ही टैरिफ, पर्यटन, फीस और टैक्स, जिसमें Value-Added Tax भी शामिल है, से भी राजस्व प्राप्त होता है। इसलिए सऊदी अरब के बजट को समझने के लिए केवल तेल की कीमत देखना पर्याप्त नहीं है; तेल उत्पादन, निर्यात, गैर-तेल अर्थव्यवस्था, सरकारी खर्च और विजन 2030 के तहत किए जा रहे निवेश को भी साथ में देखना आवश्यक है।
सऊदी अरब : अर्थव्यवस्था के प्रमुख आँकड़े
वर्तमान अर्थव्यवस्था
सऊदी अरब अरब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक और G20 का सदस्य है। तेल और गैस अभी भी GDP का लगभग 40%, निर्यात से होने वाली कमाई का 70% और सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा हैं। हालाँकि Vision 2030 ने इस संतुलन को बदलना शुरू कर दिया है। 2026 के आंकड़ों के अनुसार Nominal GDP 1.39 ट्रिलियन डॉलर, GDP per capita 37,811 डॉलर, Real Growth Rate 3.1%, सरकारी ऋण GDP का 32.1% और बजट घाटा लगभग 3.3% है, जबकि 2024 में बेरोजगारी दर 3.5% थी।
तेल अर्थव्यवस्था
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित कच्चे तेल भंडार (Proved Crude Oil Reserves) हैं, जो लगभग 270 अरब बैरल हैं। इसकी अधिकतम स्थायी उत्पादन क्षमता (Sustainable Production Capacity) लगभग 12 मिलियन बैरल प्रतिदिन है, जबकि 2024 में कुल तरल उत्पादन (Total Liquids Production) लगभग 10.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा। 12 मिलियन बैरल प्रतिदिन का अर्थ लगभग 1.9 अरब लीटर कच्चा तेल रोजाना है। घरेलू खपत अपेक्षाकृत कम होने के कारण उत्पादन का बड़ा हिस्सा निर्यात किया जाता है।
तेल निर्यात के प्रमुख मार्गों में Persian Gulf के तट पर स्थित Ras Tanura और Red Sea के तट पर स्थित Yanbu प्रमुख हैं। 2024 में सऊदी अरब का कच्चे तेल का निर्यात लगभग 6–7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जिसके प्रमुख खरीदार China, India, Japan और South Korea थे। Persian Gulf से Red Sea तक जाने वाली लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी East-West Pipeline सऊदी अरब को Hormuz से बचते हुए Yanbu के रास्ते तेल निर्यात करने का विकल्प देती है।
हालाँकि, सितंबर 2026 में स्थिति बदल गई है। East-West Pipeline पर हमले के बाद इसे बंद करना पड़ा और Yanbu से तेल लदान भी प्रभावित हुआ। Reuters के अनुसार Yanbu में उपलब्ध तेल भंडार सामान्य निर्यात को केवल लगभग 5–7 दिनों तक बनाए रख सकते हैं। सऊदी अरब ने कुछ तेल को Oman के Sohar के पास ship-to-ship transfer के जरिए Asian buyers तक भेजने की कोशिश भी की है।
सऊदी Aramco राज्य-स्वामित्व वाली राष्ट्रीय तेल कंपनी है और देश के तेल एवं गैस क्षेत्र में इसकी केंद्रीय भूमिका है। 2024 में Aramco का कुल हाइड्रोकार्बन उत्पादन लगभग 12.4 मिलियन बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन था। सऊदी अरब के पास प्राकृतिक गैस के भी बड़े भंडार हैं; 2024 में Aramco द्वारा संचालित क्षेत्रों में प्रमाणित गैस भंडार लगभग 255 ट्रिलियन घन फीट और गैस उत्पादन लगभग 10.8 बिलियन घन फीट प्रतिदिन था।
तेल के साथ सऊदी अरब ने रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल उद्योग का भी विस्तार किया है। 2024 में Aramco की रसायन उत्पादन क्षमता लगभग 57.6 मिलियन टन प्रति वर्ष थी। इसका उद्देश्य कच्चे तेल और गैस को केवल निर्यात करने के बजाय उनसे अधिक मूल्य वाले पेट्रोलियम और रासायनिक उत्पाद तैयार करना तथा तेल पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।
Vision 2030
सऊदी Vision 2030 (Vision 2030) 2016 में शुरू की गई सरकारी पहल है। इसका लक्ष्य तेल पर सऊदी अरब की निर्भरता को कम करना, अर्थव्यवस्था में विविधता लाना और स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचे, मनोरंजन तथा पर्यटन जैसे क्षेत्रों का विकास करना है। इसके तहत Tourism, Mining, Manufacturing, Logistics, Technology, Entertainment और Renewable Energy जैसे क्षेत्रों में निवेश किया जा रहा है। 2024 तक गैर-तेल गतिविधियों (Non-Oil Activities) का GDP में हिस्सा लगभग 55% हो गया था। इस बदलाव में Public Investment Fund (PIF) की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसकी संपत्ति 2016 के लगभग 720 अरब रियाल से बढ़कर 2024 में लगभग 3.53 ट्रिलियन रियाल (लगभग 940 अरब डॉलर) हो गई।
व्यापार और निवेश
सऊदी अरब का सबसे बड़ा निर्यात अभी भी कच्चा तेल और तेल उत्पाद हैं। IMF के अनुसार 2025 में कुल निर्यात का लगभग 69% हिस्सा तेल और तेल उत्पादों से आया। इसके अलावा प्लास्टिक, रसायन, उर्वरक, धातु और अन्य औद्योगिक उत्पादों का निर्यात होता है। सेवा क्षेत्र में हज, उमरा, पर्यटन और लॉजिस्टिक्स का भी योगदान बढ़ रहा है। 2025 में गैर-तेल निर्यात (Non-Oil Exports) लगभग 623 अरब रियाल तक पहुँचा।
प्रमुख आयात में औद्योगिक और विद्युत उपकरण, मशीनरी, वाहन, दवाइयाँ, खाद्य पदार्थ और रक्षा उपकरण शामिल हैं। इनमें मशीनरी तथा विद्युत उपकरण प्रमुख आयात श्रेणियों में हैं। सऊदी अरब के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों (Trading Partners) में निर्यात के लिए China, India, Japan और South Korea, जबकि आयात के लिए China, United States, UAE, Germany, Japan और India प्रमुख हैं।
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के प्रमुख स्रोतों में United States, UAE, United Kingdom, France और Japan शामिल हैं। 2026 की पहली तिमाही में शुद्ध FDI inflow लगभग 23.1 अरब रियाल रहा।
सऊदी अरब के अपने निवेश में Public Investment Fund (PIF) की महत्वपूर्ण भूमिका है। 2021 से 2025 के बीच PIF ने सऊदी अरब में नए projects में 199 अरब डॉलर से अधिक निवेश किया और 2025 के अंत में उसकी कुल assets under management 900 अरब डॉलर से अधिक थीं।
सैन्य क्षमता और रक्षा उद्योग
2025 में सऊदी अरब का सैन्य खर्च लगभग 83.2 अरब डॉलर था, जिससे वह दुनिया का आठवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बना। हथियारों के आयात के मामले में भी सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख आयातकों में है। 2020–24 के दौरान उसके प्रमुख हथियार आयात में USA की हिस्सेदारी 74%, Spain की 10% और France की 6.2% थी।
सऊदी अरब अपनी रक्षा आवश्यकताओं को धीरे-धीरे घरेलू स्तर पर विकसित करने की कोशिश कर रहा है। 2024 के अंत तक सैन्य खर्च के 24.89% हिस्से का localization हो चुका था और Vision 2030 के तहत 2030 तक इसे 50% से अधिक करने का लक्ष्य है। इसलिए अभी भी advanced weapons, aircraft, air-defence systems, spare parts और कई महत्वपूर्ण technologies के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है।
सऊदी अरब की armed forces में लगभग 5–6 लाख personnel हैं। उसकी वायुसेना विशेष रूप से मजबूत है और उसके पास 300 से अधिक combat aircraft हैं, जिनमें F-15, Eurofighter Typhoon और Tornado प्रमुख हैं। उसकी air-defence व्यवस्था में अमेरिकी Patriot PAC-2/PAC-3 और THAAD जैसे systems शामिल हैं। नौसेना के पास frigates, corvettes और अन्य naval assets हैं, लेकिन advanced naval platforms और उनकी technology में European और US suppliers की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है।
इस प्रकार सऊदी अरब के पास बड़े वित्तीय संसाधनों के कारण एक बड़ी और technologically advanced military capability विकसित करने की क्षमता है, लेकिन उसकी military strength का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विदेशी हथियार प्रणालियों, technology, maintenance और supply chains पर आधारित है। इसी कारण Vision 2030 में defense localization को आर्थिक और strategic priority बनाया गया है।
निष्कर्ष
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था वर्तमान युद्ध और तेल आपूर्ति संकट के बावजूद तत्काल वित्तीय संकट में नहीं है। 2026 के बजट में सरकार ने 1,147 अरब Riyal राजस्व और 1,313 अरब Riyal खर्च का अनुमान लगाया है, जिससे लगभग 165 अरब Riyal का बजट घाटा, यानी GDP का करीब 3.3%, बनता है। देश के पास मजबूत वित्तीय और विदेशी मुद्रा भंडार तथा बड़े sovereign assets हैं, इसलिए अभी उसे बाहरी financial bailout की आवश्यकता दिखाई नहीं देती। (Saudi Ministry of Finance, December 2025; Saudi Ministry of Finance, January 2026)
लेकिन तेल निर्यात के मोर्चे पर स्थिति गंभीर रूप से बदली है। January–February 2026 में सऊदी crude loadings 7.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक थे, जो August में लगभग 2.3 मिलियन और September के पहले आधे में लगभग 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गए। यानी reported crude loadings में लगभग 70% से अधिक की कमी आई है। हालांकि vessel-tracking से कुछ shipments छूट सकते हैं, इसलिए इसे सऊदी के वास्तविक उत्पादन या आय में 70% की गिरावट नहीं माना जा सकता। (Al Jazeera, 17 September 2026)
सऊदी इस कमी को अलग-अलग रास्तों से संभालने की कोशिश कर रहा है। Hormuz से अभी भी सऊदी crude निकल रहा है और Oman के Sohar के पास ship-to-ship transfers के जरिए September–October में लगभग 60 मिलियन बैरल, यानी करीब 1–1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन, भेजने की व्यवस्था की गई है। North में Yanbu–Egypt–SUMED route भी एक वैकल्पिक रास्ता है। लेकिन इन सभी routes की क्षमता, सुरक्षा और लागत की अपनी सीमाएँ हैं। इसलिए सऊदी के सामने समस्या तेल को सुरक्षित और पर्याप्त मात्रा में अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक पहुँचाने की है। (Al Jazeera, 17 September 2026; Reuters, 18 September 2026)
इसका सरकारी आय पर प्रभाव भी सीधा 70% नहीं होगा। तेल की export volume कम हुई है, लेकिन युद्ध के कारण ऊँची oil prices ने कम volume से होने वाले नुकसान की काफी हद तक भरपाई की है। IMF ने July 2026 में भी कहा कि ऊँची oil prices ने lower export volumes से हुए नुकसान से अधिक revenue पैदा किया है। फिर भी लंबे समय तक supply disruption रहने पर export revenue, government finances और economic growth पर दबाव बढ़ सकता है। (IMF, 29 July 2026; Al Jazeera, 17 September 2026)
दूसरी ओर, युद्ध ने सऊदी के defence expenditure और infrastructure protection की आवश्यकता बढ़ा दी है। Houthi हमलों से oil infrastructure और शहरों की सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव है। इससे एक तरफ तेल से मिलने वाली आय पर जोखिम बढ़ रहा है और दूसरी तरफ सुरक्षा, air-defence, repairs तथा shipping की लागत बढ़ रही है। इस स्थिति में सऊदी को विकास परियोजनाओं, रक्षा और आवश्यक सरकारी खर्च के बीच अधिक सावधानी से संसाधनों का बँटवारा करना पड़ सकता है। (Associated Press, 17 September 2026)
सऊदी अरब ने IMF से emergency loan या World Bank से bailout की औपचारिक मांग नहीं की है। IMF के July 2026 Article IV assessment में सऊदी की economy को मजबूत fundamentals और पर्याप्त foreign-exchange reserves वाला बताया गया है तथा किसी नए IMF lending arrangement का उल्लेख नहीं है। दूसरी ओर, सऊदी सरकार अपनी financing needs पूरी करने के लिए international banks और debt markets का इस्तेमाल कर रही है। अगस्त 2026 की Bloomberg-आधारित रिपोर्ट के अनुसार National Debt Management Center कम-से-कम 8 अरब डॉलर के नए commercial loan के लिए बैंकों से बातचीत कर रहा था। यह IMF या World Bank से सहायता लेने से अलग है और मुख्य रूप से सऊदी की सामान्य financing तथा budgetary requirements से जुड़ा है। (IMF, 29 July 2026; Bloomberg, August 2026)
अंततः सऊदी अरब की आर्थिक स्थिति को तीन बातों में समझा जा सकता है – तेल की उपलब्धता अभी भी बहुत बड़ी है, लेकिन उसका निर्यात कठिन हो गया है; सरकारी वित्तीय स्थिति मजबूत है, लेकिन युद्ध से खर्च और जोखिम बढ़ रहे हैं; और Vision 2030 जारी है, लेकिन भविष्य में पूँजी के इस्तेमाल को अधिक सावधानी से तय करना पड़ सकता है। यदि oil-export disruption और Houthi हमले लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो सऊदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती कम और महंगे export routes, बढ़ता रक्षा खर्च और घटती export volume के बीच आर्थिक विकास को बनाए रखना होगी।
स्रोत एवं संदर्भ
- International Monetary Fund (IMF) – Saudi Arabia: Article IV Consultation, 2026
- Saudi Ministry of Finance – Saudi Arabia Budget Statement, 2026
- Saudi Central Bank (SAMA) – Economic and financial data
- General Authority for Statistics (GASTAT) – Saudi Arabia economic, trade and FDI data
- Saudi Aramco – Annual Report 2024
- Public Investment Fund (PIF) – Annual Report 2025 और 2026–2030 Strategy
- Saudi General Authority for Military Industries (GAMI) – Defence localization data
- SIPRI – Military Expenditure and Arms Transfers data, 2025–26
- U.S. Energy Information Administration (EIA) – Saudi Arabia energy/oil data
- IEA – Oil security और Strait of Hormuz संबंधी data
- Kpler – Crude oil flows और alternative export routes, September 2026
- Reuters – Saudi oil exports, Yanbu, Sohar और current supply disruption, September 2026
- Associated Press (AP) – Saudi air-defence और military assistance, September 2026
- Al Jazeera – Saudi alternative oil routes और crude loadings, September 2026
(4 September) BBC
RUPP: राजनीतिक चंदे और चुनावी भागीदारी की तस्वीर
भारत की वर्तमान शासन व्यवस्था गणतांत्रिक है, जिसमें कार्यपालिका बनाने की प्रक्रिया चुनाव आधारित है। शुरुआत में कुछ नैतिक मूल्यों पर आधारित यह व्यवस्था संतुलित रूप से चलती रही, लेकिन कालांतर में मूल्यों के ह्रास से यह व्यवस्था खराब होती गई। वर्तमान में यह व्यवस्था इस भ्रष्ट दिशा में कीर्तिमान स्थापित करती दिखाई दे रही है। वर्तमान चुनाव सबसे खर्चीले और अपारदर्शी बनते दिखाई देते हैं। हाल ही में मीडिया संस्थानों द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट इस बात को स्पष्ट रूप से सामने लाती है।
भारत में चुनाव लड़ने वाली अनेक राजनीतिक पार्टियाँ हैं। किसी राजनीतिक दल को चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा कर भारतीय निर्वाचन आयोग में पंजीकरण कराना होता है। देश में हजारों राजनीतिक दल पंजीकृत हैं। इनमें से कुछ दल निर्धारित चुनावी मानदंडों को पूरा करने पर National Party या State Party के रूप में मान्यता प्राप्त करते हैं। वहीं, जो राजनीतिक दल पंजीकृत तो हैं, लेकिन उन्हें National या State Party के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है, उन्हें broadly RUPP – Registered Unrecognised Political Party कहा जाता है।
राजनीतिक दल चुनाव लड़ने और अपने राजनीतिक प्रचार आदि के लिए चंदा प्राप्त कर सकते हैं। भारत के Income Tax कानून में राजनीतिक दलों को प्राप्त होने वाली कुछ प्रकार की आय को tax exemption देने का प्रावधान है। साथ ही, पात्र राजनीतिक दलों को दिए गए qualifying donations पर donor को भी निर्धारित शर्तों के तहत tax benefit मिलता है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की व्यवस्था में Electoral Bonds भी एक माध्यम था। हालांकि, फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने Electoral Bonds Scheme को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके बाद यह व्यवस्था समाप्त हो गई।
RUPP पार्टियों के चंदे और चुनावी भागीदारी
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की व्यवस्था को समझने के बाद, अब यदि वित्त वर्ष 2023–24 में सामने आए चंदे के आंकड़ों को देखा जाए तो कुछ ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो ध्यान देने योग्य हैं। छह RUPP पार्टियों को इस वर्ष कुल लगभग ₹1,700.78 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ। यह राशि Congress, AAP, BSP, CPI(M) और National People’s Party जैसे पांच राष्ट्रीय दलों को मिले कुल लगभग ₹1,480.43 करोड़ से करीब ₹220 करोड़ अधिक थी।
इन छह RUPP पार्टियों के नाम और घोषित चंदे की राशि इस प्रकार है—
- Aam Janmat Party – ₹620 करोड़
- Satyawadi Rakshak Party – ₹330.55 करोड़
- Swatantrata Abhivyakti Party – ₹219.69 करोड़
- New India United Party – ₹200.69 करोड़
- Bharatiya National Janta Dal – ₹191.61 करोड़
- Gareeb Kalyan Party – ₹138 करोड़
इन छह पार्टियों को मिले चंदे का आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में इन सभी पार्टियों ने मिलकर केवल 15 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इसके मुकाबले इन पांच राष्ट्रीय दलों ने मिलकर 893 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे।
यदि इन पार्टियों के व्यक्तिगत आंकड़ों को देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है।
Aam Janmat Party
Aam Janmat Party को 2023–24 में लगभग ₹620 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने केवल एक उम्मीदवार उतारा था। इससे पहले 2022–23 में भी पार्टी को लगभग ₹216 करोड़ का चंदा मिला था। इस प्रकार इन दो वर्षों में पार्टी को लगभग ₹836 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ।
Aam Janmat Party का गठन 2020 में पटना में हुआ था। इसकी शुरुआती अध्यक्ष अनामिका पासवान थीं। मीडिया को दिए उनके बयान के अनुसार उन्होंने 2022 में ही पार्टी छोड़ दी थी। इसके बाद पार्टी का आधार बिहार से गुजरात के अहमदाबाद में स्थानांतरित हो गया। वर्तमान में अनामिका बिहार में BJP की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
Satyawadi Rakshak Party
Satyawadi Rakshak Party को 2023–24 में ₹330.55 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ। पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार उतारा था। पार्टी द्वारा चुनाव आयोग को दी गई audit report के अनुसार, लगभग ₹8.48 करोड़ लोकसभा चुनाव प्रचार पर और लगभग ₹316 करोड़ social welfare projects पर खर्च किए गए। लेकिन जांच में इन खर्च का धरातल पर कोई पहचान और लाभार्थी का प्रमाण नहीं मिला।
RUPP पार्टियों की गतिविधि और वित्तीय विवरण
इन छह पार्टियों के चंदे और चुनावी भागीदारी के आंकड़ों के बाद जब इनकी वास्तविक गतिविधियों को देखा गया तो कुछ और तथ्य सामने आए। BBC की जांच में इन छह में से चार पार्टियों के पंजीकृत कार्यालय अहमदाबाद में पाए गए, जबकि दो अन्य गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में स्थित थीं। जांच के दौरान कुछ कार्यालय बंद मिले और वहां नियमित राजनीतिक गतिविधियां दिखाई नहीं दीं।
यह स्थिति केवल इन छह पार्टियों तक सीमित नहीं है। Association for Democratic Reforms (ADR) की 2022–23 की रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल 2,764 RUPPs में से 2,025 यानी 73.26 प्रतिशत पार्टियों के annual audit report और contribution report सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थे। 739 यानी 26.74 प्रतिशत RUPPs के कम-से-कम इनमें से एक report उपलब्ध था। इनमें भी केवल 501 पार्टियों के दोनों reports उपलब्ध थे, यानी कुल RUPPs में केवल 18.13 प्रतिशत पार्टियों के दोनों reports उपलब्ध थे। ADR के अनुसार, RUPPs के लिए audit और contribution reports जमा करने की व्यवस्था पहले से लागू है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पार्टियों के ये financial records सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थे।
चंदे के पीछे संभावित व्यवस्था
अब सवाल यह है कि इन पार्टियों को इतना बड़ा चंदा मिला कैसे और इसके पीछे किस तरह की व्यवस्था हो सकती है। राजनीतिक दलों को दिए गए पात्र donations पर donor को Income Tax कानून के तहत tax benefit मिलता है। इसी व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग को लेकर RUPPs की गतिविधियाँ जांच के दायरे में रही हैं।
इन मामलों में एक संभावित व्यवस्था के रूप में यह अनुमान लगता है कि chartered accountants और अन्य बिचौलिये tax benefit लेने वाले लोगों को ऐसी राजनीतिक पार्टियों से जोड़ सकते हैं, जो donation स्वीकार करती हैं। जांच में सामने आए एक संभावित तरीके के अनुसार, कोई व्यक्ति राजनीतिक दल को donation देता है, उस donation के आधार पर tax benefit लेता है और बाद में donation की राशि का कुछ हिस्सा, commission काटने के बाद, वापस donor तक पहुंच सकता है।
इस जांच में New India United Party की donor list में शामिल दो लोगों से भी बात की गई। इनमें से एक व्यक्ति ने ₹5 लाख donation देने की पुष्टि की और बताया कि उसने tax बचाने के उद्देश्य से यह donation किया था तथा इसे अपनी tax declaration में भी दिखाया था। दूसरे व्यक्ति ने बताया कि उसने एक मित्र की सलाह पर donation किया था और उसे भी tax benefit मिला।
इसी जांच में Swatantrata Abhivyakti Party के अध्यक्ष सुरेन्द्र तिवारी ने बताया कि 2023–24 में पार्टी को लगभग ₹219 करोड़ का चंदा मिला था, लेकिन पार्टी के अध्यक्ष होने के बावजूद उन्हें उस धन पर पूरा नियंत्रण नहीं था। उनके अनुसार पार्टी के chartered accountant द्वारा वित्तीय मामलों को संभाला जाता था और उन्हें चुनाव प्रचार के लिए धन दिया जाता था।
निष्कर्ष
इन तथ्यों के बाद मूल सवाल यही है कि राजनीतिक चंदे की व्यवस्था को कितना पारदर्शी बनाया जा सकता है और वर्तमान व्यवस्था में उस पारदर्शिता की कितनी गुंजाइश है। साथ ही, क्या केवल इसी व्यवस्था में सुधार के जरिए आगे बढ़ने की जरूरत है या शासन-व्यवस्था के दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसका वास्तविक समाधान केवल व्यवस्था में बदलाव से आएगा या समाज की जागरूकता और चेतना में बदलाव भी जरूरी होगा – यह प्रश्न अभी बाकी है।
(15-18 September) AP news, aljazeera
Britain के भीतर Scotland, Wales और Northern Ireland की मांग
United Kingdom (UK) लंबे समय से एक राजनीतिक संघ के रूप में मौजूद है। लेकिन अब इसके भीतर फिर से यह सवाल उठ रहा है कि इसके अलग-अलग हिस्सों का भविष्य किस तरह तय होना चाहिए। Scotland, Wales और Northern Ireland के कुछ प्रमुख राजनीतिक दल इस सवाल को लेकर एक साथ सामने आए हैं।
14 सितंबर 2026 को Cardiff में इन दलों के नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने के अधिकार को लेकर एक संयुक्त समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस घटनाक्रम को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि UK की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था किस तरह काम करती है।
UK की वर्तमान व्यवस्था
United Kingdom चार constituent countries – England, Scotland, Wales और Northern Ireland से मिलकर बना है। इन चारों की अपनी अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान है।
Scotland, Wales और Northern Ireland के पास अपनी-अपनी elected institutions हैं और कुछ घरेलू मामलों में कानून बनाने की शक्तियां भी हैं। इसे Devolution कहा जाता है। लेकिन यह USA जैसी federal व्यवस्था नहीं है। कई महत्वपूर्ण शक्तियां अभी भी Westminster स्थित UK Parliament और UK Government के पास हैं, जैसे defence और foreign affairs।
यही व्यवस्था अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन रही है। Scotland, Wales और Northern Ireland के कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि उनके राजनीतिक भविष्य का फैसला केवल London/Westminster से नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, वहां के लोगों को स्वयं यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वे UK के साथ रहना चाहते हैं या अलग होना चाहते हैं। इसी विचार को Self-determination यानी आत्मनिर्णय का अधिकार कहा जाता है।
तीनों की मांग में विभिन्नता
Scotland: Scottish National Party (SNP) Scotland को UK से स्वतंत्र करने के लिए referendum की मांग करती है। Scotland में 2014 में independence referendum हुआ था। इसमें लगभग 55% लोगों ने UK के साथ रहने और 45% ने स्वतंत्र होने के पक्ष में मतदान किया था। अब SNP फिर से referendum की मांग कर रही है।
Wales: Wales में Plaid Cymru Welsh independence की समर्थक पार्टी है। उसकी मांग है कि Welsh लोगों को यह तय करने का अवसर मिले कि Wales UK के अंदर रहना चाहता है या स्वतंत्र देश बनना चाहता है। Wales की स्थिति Scotland से अलग है क्योंकि वहां अभी तक Scotland जैसा independence referendum नहीं हुआ है।
Northern Ireland: यह मामला कुछ अलग और अधिक जटिल है। Sinn Féin Northern Ireland को UK से अलग करके Republic of Ireland के साथ मिलाने की समर्थक है। इसे Irish reunification या United Ireland कहा जाता है – अर्थात Ireland के दो राजनीतिक हिस्सों को एक देश में मिलाना। इसलिए Northern Ireland का संवैधानिक मुद्दा Scotland और Wales से अलग है।
14 सितंबर की बैठक
14 सितंबर को Cardiff में John Swinney (SNP, Scotland), Rhun ap Iorwerth (Plaid Cymru, Wales) और Michelle O’Neill (Sinn Féin, Northern Ireland) के नेताओं ने मुलाकात की और एक joint agreement पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में अपने-अपने क्षेत्रों के लोगों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने के अधिकार और संवैधानिक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही गई।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह तीनों सरकारों की ओर से की गई कोई संयुक्त सरकारी treaty नहीं थी। यह संबंधित राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक थी। Northern Ireland के मामले में Michelle O’Neill ने इसमें Sinn Féin की नेता के रूप में हिस्सा लिया था, न कि Northern Ireland Executive की First Minister के रूप में।
इस बैठक का मुख्य संदेश था कि Scotland, Wales और Ireland के भविष्य का फैसला वहां के लोगों की इच्छा के अनुसार होना चाहिए और Westminster को ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
कानूनी स्थिति
राजनीतिक मांग और कानूनी अधिकार दोनों अलग-अलग बातें हैं।
Scotland: 2014 में independence referendum इसलिए हो सका क्योंकि UK Government और Scottish Government के बीच सहमति से उसके लिए कानूनी रास्ता बनाया गया था। Scottish Parliament अपने दम पर ऐसा referendum कराने का अधिकार नहीं रखती। 2026 में UK के प्रधानमंत्री Andy Burnham ने भी स्पष्ट किया है कि उनकी सरकार एक और Scottish independence referendum को फिलहाल स्वीकार नहीं करती।
Wales: Welsh Senedd के पास भी ऐसा स्वतंत्र अधिकार नहीं है कि वह अकेले referendum कराकर UK से अलग होने की प्रक्रिया शुरू कर दे। इसलिए Wales में independence की मांग फिलहाल राजनीतिक मांग है, तत्काल कानूनी प्रक्रिया नहीं।
Northern Ireland: यहां संवैधानिक रास्ता अलग है। 1998 के Good Friday Agreement के तहत Northern Ireland के संवैधानिक भविष्य पर referendum कराया जा सकता है। इसके लिए Northern Ireland Secretary को यह आकलन करना होता है कि एकीकरण के पक्ष में बहुमत होने की संभावना दिखाई दे रही है। इसलिए Northern Ireland का constitutional route Scotland और Wales से अलग है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री का रुख
UK के प्रधानमंत्री Andy Burnham का रुख इन मांगों से अलग है। जुलाई 2026 में Scotland के First Minister John Swinney से मुलाकात के दौरान Burnham ने कहा कि एक और independence referendum उनके लिए “off limits” है। उनका कहना है कि सरकार का ध्यान नए referendum के बजाय devolution को गहरा करने, आर्थिक विकास और लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं पर होना चाहिए।
Northern Ireland के मामले में भी UK सरकार ने कहा है कि border poll तभी विचार में आएगा जब वहां जनमत में स्पष्ट और महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे। सितंबर में Burnham और Irish Prime Minister Micheál Martin ने Good Friday Agreement के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
इस प्रकार फिलहाल स्थिति यह है कि Scotland, Wales और Northern Ireland के कुछ प्रमुख राजनीतिक दल अपने क्षेत्रों के आत्मनिर्णय की मांग को एक साथ उठा रहे हैं, जबकि UK सरकार संवैधानिक विभाजन के बजाय मौजूदा Union के भीतर devolution और सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कर रही है।
(18-19 September) Reuters, the guardian
AI: संभावनाओं के साथ बढ़ते सवाल
“कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा; भानुमती ने कुनबा जोड़ा।”
आज के दौर में यह कहावत AI पर भी काफी हद तक लागू होती दिखाई दे रही है। कहीं AI को लेकर आशाजनक बातें और संभावनाएं दिखाई जा रही हैं, तो कहीं इसके परिणाम निराशाजनक और चिंताजनक नजर आ रहे हैं। एक ओर इससे कई क्षेत्रों में अनोखी प्रगति की उम्मीद दिखाई दे रही है, तो दूसरी ओर मानवता के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। इन सबके बीच AI को चाहने वाले और इसके प्रति आशंकित लोग, दोनों ही तरह के लोग इसके साथ अलग-अलग तरह के प्रयोग कर रहे हैं।
जैसा कि हम जानते हैं, AI अभी प्रयोग और विकास के दौर से गुजर रहा है। इसके अब तक हुए विकास के आधार पर इसे कई क्षेत्रों में लागू भी किया जा रहा है। लेकिन इसके सामने आ रहे कुछ परिणाम चिंताजनक हैं। हाल के समय में सामने आई कुछ रिपोर्टों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिले हैं – पहला, Gemini मॉडल द्वारा तीन कंपनियों को हैक करने का मामला; दूसरा, Anthropic द्वारा AI की मदद से ड्रग्स और जैविक प्रयोगशाला संबंधी शोध; और तीसरा, एक असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को AI द्वारा अनुचित और असंवेदनशील प्रतिक्रिया देना।
इन घटनाओं के जरिए हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि AI के विकास के साथ सामने आ रही संभावनाओं और चुनौतियों की वास्तविक तस्वीर क्या है।
Gemini मॉडल द्वारा तीन कंपनियों को हैक करना
मई 2026 में Google के Gemini AI मॉडल का एक साइबर सुरक्षा परीक्षण एक स्वतंत्र कंपनी Irregular द्वारा कराया जा रहा था। परीक्षण का उद्देश्य यह देखना था कि Gemini किसी कंप्यूटर सिस्टम की सुरक्षा कमजोरियों को खोज सकता है या नहीं। Gemini को कुछ सिस्टमों की सुरक्षा जांचने का कार्य दिया गया था।
जांच के दौरान Gemini ने इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी खोजी और कुछ वेबसाइटों के लॉगिन क्रेडेंशियल (यूज़रनेम/पासवर्ड) खोजने या उनका अनुमान लगाने की कोशिश की। इन जानकारियों के आधार पर उसने तीन वेबसाइटों तक पहुंच प्राप्त कर ली। AI ने ये कदम स्वयं उठाए, इसलिए इसे “autonomously hacked” कहा गया।
Google के अनुसार, यह पहली ज्ञात घटना थी जिसमें उसके AI मॉडल ने बिना सीधे मानव निर्देश के इंटरनेट पर खोज की, जानकारी इकट्ठा की, पासवर्ड का अनुमान लगाया और किसी सिस्टम में प्रवेश प्राप्त किया। इस प्रकार AI ने कई चरणों वाली कार्रवाई स्वयं पूरी की।
पासवर्ड का अनुमान लगाना और क्रेडेंशियल ढूंढना:
एक सिस्टम में Gemini ने कई संभावित पासवर्ड आजमाए और सही पासवर्ड का अनुमान लगा लिया। इसे “brute force” जैसा हमला नहीं बताया गया। Brute force में किसी पासवर्ड को तोड़ने के लिए बड़ी संख्या में संभावित पासवर्ड एक के बाद एक आजमाए जाते हैं। इस मामले में Gemini ने कुछ संभावित पासवर्डों का अनुमान लगाकर सही पासवर्ड खोज लिया। साथ ही Gemini को इंटरनेट पर उपलब्ध एक सार्वजनिक कोड रिपॉजिटरी में लॉगिन से जुड़ी जानकारी की खोजी। उस जानकारी का उपयोग करके उसने संबंधित सिस्टम में प्रवेश कर लिया।
“Scope of the test” क्या होता है?
साइबर सुरक्षा परीक्षण शुरू करने से पहले यह तय किया जाता है कि कौन-कौन से कंप्यूटर, वेबसाइट या सिस्टम जांच के दायरे में होंगे और किन पर परीक्षण नहीं किया जाएगा। इसे परीक्षण का “scope” कहा जाता है। Gemini ने जिन तीन वेबसाइटों में प्रवेश किया, उन्हें उसने परीक्षण के दायरे में समझा। बाद में सामने आया कि परीक्षण की प्रक्रिया में कुछ समस्या थी और यह स्पष्ट करने की जरूरत थी कि किन सिस्टमों पर AI को कार्रवाई करने की अनुमति है। Google के अनुसार, तीनों मामलों में सिस्टम तक पहुंच मिलने के बाद Gemini ने आगे कोई नुकसान नहीं किया और अपनी गतिविधि रोक दी। Google ने प्रभावित तीनों संस्थाओं को इसकी सूचना दी और परीक्षण प्रक्रिया में बदलाव किए गए।
यह घटना दिखाती है कि शक्तिशाली AI मॉडल को जिम्मेदारी से व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षित करना कितना महत्वपूर्ण है।
Anthropic द्वारा AI की मदद से ड्रग्स और जैविक प्रयोगशाला संबंधी शोध
Anthropic AI का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में कर रही है। इसकी शुरुआत कंपनी के CEO के पिता की एक बीमारी से हुई मृत्यु के अनुभव से प्रभावित होकर हुई। उस बीमारी का इलाज उनकी मृत्यु के करीब एक साल बाद उपलब्ध हो पाया था। इस अनुभव से प्रभावित होकर उन्होंने AI की मदद से दवाओं की खोज को तेज करने और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों में लोगों की जान बचाने की उम्मीद के साथ इस दिशा में काम शुरू किया।
Anthropic का मानना है कि AI का सबसे बड़ा सकारात्मक उपयोग चिकित्सा और जीवन-विज्ञान के क्षेत्र में हो सकता है। कंपनी का लक्ष्य दुर्लभ बीमारियों (Rare Diseases) का इलाज ढूंढना, ऐसी बीमारियों पर काम करना जिन पर फार्मा कंपनियां कम ध्यान देती हैं, जिन्हें “Undruggable Diseases” कहा जाता है, और दवा खोज (Drug Discovery) की प्रक्रिया को तेज करना है।
इस प्रयोग के लिए Wet Lab तैयार किया गया है। Wet Lab का मतलब वास्तविक प्रयोगशाला है, जहां वैज्ञानिक कोशिकाओं (Cells) पर काम करते हैं, प्रोटीन का परीक्षण करते हैं और रसायनों तथा जैविक नमूनों पर प्रयोग करते हैं। यह केवल कंप्यूटर पर किए जाने वाले सिमुलेशन (in silico) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वास्तविक जैविक प्रयोग किए जाते हैं। पहले Anthropic मुख्य रूप से AI मॉडल बनाती थी, लेकिन अब वह वास्तविक जीवविज्ञान प्रयोगों की दिशा में भी काम कर रही है।
Anthropic केवल दवाओं की खोज के लिए AI का उपयोग नहीं कर रही है। वह यह भी देख रही है कि AI प्रयोगशाला के रोबोटों को निर्देश दे सके, जिससे रोबोट स्वतः प्रयोग कर सकें, डेटा एकत्र कर सकें और परिणामों का विश्लेषण कर सकें। हालांकि, कंपनी का मानना है कि मानव निगरानी (Human Oversight) अभी भी आवश्यक रहेगी।
लेकिन इसमें एक विरोधाभास भी दिखाई देता है। Anthropic के कुछ शोधकर्ता यह आशंका व्यक्त कर चुके हैं कि AI भविष्य में मानवता के लिए खतरा बन सकता है, AI पर नियंत्रण खोया जा सकता है और AI जैविक हथियार (Bioweapons) बनाने में भी मदद कर सकता है। इसलिए इसकी रफ्तार को धीमा करने की जरुरत है। लेकिन दूसरी ओर कंपनी स्वयं अधिक शक्तिशाली AI बना रही है,जैविक शोध में प्रवेश कर रही है, दवा विकास को तेज करना चाहती है। मतलब एक तरफ AI के जोखिमों की चेतावनी, दूसरी तरफ AI का विस्तार।
रिपोर्ट के अनुसार, Anthropic ने पाया कि उसके कुछ AI मॉडल जैविक ज्ञान से जुड़े कार्यों में काफी सक्षम हो गए हैं। सिद्धांततः इस क्षमता का दुरुपयोग खतरनाक जैविक एजेंट बनाने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, इस दावे पर कुछ विशेषज्ञों ने संदेह भी व्यक्त किया है। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है – चिकित्सा और जैविक अनुसंधान में AI जितना अधिक शक्तिशाली होगा, उसके दुरुपयोग की संभावना भी उतनी ही बढ़ सकती है।
Anthropic के अन्य कदम
रिपोर्ट के अनुसार, Anthropic ने इस क्षेत्र में कई कदम उठाए हैं। इनमें वैज्ञानिकों के लिए विशेष AI टूल Claude Science, जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप Coefficient Bio का अधिग्रहण और दवा उद्योग की विशेषज्ञता लाने के लिए Novartis के CEO को बोर्ड में शामिल करना शामिल है।
कंपनी ने Model Hardware Standard नामक एक मानक भी विकसित किया है, जिसका उद्देश्य AI को प्रयोगशाला के उपकरणों को नियंत्रित करने में सक्षम बनाना है।
रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी दवा कंपनियां भी AI का इस्तेमाल कर रही हैं। इनमें Roche की Genentech इकाई, Bristol Myers Squibb और Novo Nordisk जैसी कंपनियां शामिल हैं।
इसके अलावा, दवा कंपनियों के बीच यह चिंता भी है कि यदि वे Anthropic के AI का इस्तेमाल करती हैं तो कहीं AI उनके शोध और गोपनीय जानकारी को सीख न ले। Anthropic का कहना है कि ग्राहकों का डेटा अलग रखा जाता है और वह उनकी गोपनीय जानकारी नहीं देखती। हालांकि, यह चिंता उद्योग में मौजूद है।
संवेदनशील परिस्थितियों में AI की प्रतिक्रिया
एक व्यक्ति, जो असाध्य बीमारी (Terminal Illness) से पीड़ित था, ने Microsoft Copilot को लिखा कि वह Voluntary Assisted Dying का उपयोग करने वाला है। यह कुछ देशों में गंभीर और असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को कानूनी चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत अपना जीवन समाप्त करने की अनुमति देने वाली व्यवस्था है।
इसके जवाब में Microsoft Copilot ने “Congratulations!”, “Great to hear from you” और “That is wonderful news!” जैसे संदेश सुझाए। स्पष्ट रूप से इस संदर्भ में ऐसी प्रतिक्रिया अनुचित और असंवेदनशील थी।
यह घटना AI की एक दूसरी चुनौती को सामने लाती है। AI किसी प्रश्न का उत्तर देने या बातचीत करने में सक्षम हो सकता है, लेकिन संवेदनशील मानवीय परिस्थितियों को समझना और उनके अनुरूप प्रतिक्रिया देना अभी भी एक गंभीर चुनौती है।